Notice: Function _load_textdomain_just_in_time was called incorrectly. Translation loading for the colormag domain was triggered too early. This is usually an indicator for some code in the plugin or theme running too early. Translations should be loaded at the init action or later. Please see Debugging in WordPress for more information. (This message was added in version 6.7.0.) in /home/vivace/public_html/wp-includes/functions.php on line 6131
मुग़ल साम्राज्य Mughal Empire – Vivace Panorama

मुग़ल साम्राज्य Mughal Empire

मुग़ल साम्राज्य (1526-1707 ई.)

बाबर (1526-1530 ई.)

  • दिल्ली सल्तनत के अंतिम शासक इब्राहिम लोदी को 1526 ई. में पराजित कर बाबर ने मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की।
  • बाबर फरगना का शासक था। बाबर को भारत आने का निमंत्रण पंजाब के सूबेदार दौलत खां लोदी तथा इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खां ने लोदी ने दिया था।
  • बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध से पूर्व भारत पर चार बार आक्रमण किया था। पानीपत विजय उसका पांचवा आक्रमण था।
  • बाबर ने जिस समय भारत पर आक्रमण किया उस समय भारत में बंगाल, मालवा, गुजरात, सिंध, कश्मीर, मेंवाड़, खानदेश, विजयनगर और बहमनी आदि स्वतंत्र राज्य थे।
  • बाबर का पानीपत के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण युद्ध राणा सांग के विरुद्ध खानवा का युद्ध (1527 ई.) था, जिसमें विजय के पश्चात बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की।
  • बाबर ने 1528 में मेंदिनी राय को परास्त कर चंदेरी पर अधिकार कर लिया।
  • बाबर ने 1529 में घाघरा के युद्ध में बिहार और बंगाल की संयुक्त अफगान सेना को पराजित किया, जिसका नेतृत्व महमूद लोदी ने किया था।
  • बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में ‘तुगलकनामा युद्ध पद्धति’ का प्रयोग किया था, जिसे उसने उज्बेकों से ग्रहण किया था।
  • बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में विजयनगर के तत्कालीन शासक कृष्णदेव राय को समकालीन भारत का सबसे शक्तिशाली राजा कहा है।
  • बाबर ने दिल्ली सल्तनत के शासकों की परम्परा ‘सुल्तान’ को तोड़कर अपने को बादशाह घोषित किया।
  • अपनी उदारता के कारण बाबर को ‘कलन्दर’ कहा जाता था। उसने पानीपत विजय के पश्चात काबुल के प्रत्येक निवासी को एक-एक चांदी का सिक्का दान में दिया था।
  • बाबर ने आगरा में बाग लगवाया, जिसे ‘नूर-ए-अफगान’ के नाम से जाना जाता था, किन्तु अब इसे ‘आराम बाग’ कहा जाता है।
  • बाबर ने ‘गज-ए-बाबरी’ नामक नाप की एक इकाई का प्रचलन किया।
  • बाबर ने ‘मुबइयान’ नामक एक पद्य शैली का विकास किया। ‘रियाल-ए-उसज’ की रचना बाबर ने ही की थी।
  • 26 दिसंबर, 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गयी, उसे नूर-ए-अफगान बाग में दफनाया गया।

हुमायूं (1530 ई.-1556 ई.)

  • बाबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हुमायूं मुग़ल वंश के शासन पर बैठा।
  • बाबर के चरों पुत्र-कामरान, अस्करी, हिंदाल और हुमायूं में हुमायूं सबसे बड़ा था।
  • हुमायूं ने अपने साम्राज्य का विभाजन भाइयों में किया था। उसने कामरान को काबुल एवं कंधार, अस्करी को संभल तथा हिंदाल को अलवर प्रदान किया था।
  • हुमायूं के सबसे बड़े शत्रु अफगान थे, क्योंकि वे बाबर के समय से ही मुगलों को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए प्रयत्नशील थे।
  • हुमायूं का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी अफगान नेता शेर खां था, जिसे शेरशाह शूरी भी कहा जाता है।
  • हुमायूं का अफगानों से पहला मुकाबला 1532 ई. में ‘दोहरिया’ नामक स्थान पर हुआ। इसमें अफगानों का नेतृत्व महमूद लोदी ने किया था। इस संघर्ष में हुमायूं सफल रहा।
  • 1532 में हुमायूं ने शेर खां के चुनार किले पर घेरा डाला। इस अभियान में शेर खां ने हुमायूं की अधीनता स्वीकार कर अपने पुत्र क़ुतुब खां के साथ एक अफगान टुकड़ी मुगलों की सेवा में भेज दी।
  • 1532 ई. में हुमायूं ने दिल्ली में ‘दीन पनाह’ नामक नगर की स्थापना की।
  • 1535 ई. में ही उसने बहादुर शाह को हराकर गुजरात और मालवा पर विजय प्राप्त की।
  • शेर खां की बढती शक्ति को दबाने के लिए हुमायूं ने 1538 ई. में चुनारगढ़ के किले पर दूसरा घेरा डालकर उसे अपने अधीन कर लिया।
  • 1538 ई. में हुमायूं ने बंगाल को जीतकर मुग़ल शासक के अधीन कर लिया। बंगाल विजय से लौटने समय 26 जून, 1539 को चौसा के युद्ध में शेर खां ने हुमायूं को बुरी तरह पराजित किया।
  • शेर खां ने 17 मई, 1540 को बिलग्राम के युद्ध में पुनः हुमायूं को पराजित कर दिल्ली पर बैठा। हुमायूं को मजबूर होकर भारत से बाहर भागना पड़ा।
  • 1544 में हुमायूं ईरान के शाह तहमस्प के यहाँ शरण लेकर पुनः युद्ध की तैयारी में लग गया।
  • 1545 ई. में हुमायूं ने कामरान से काबुल और गंधार छीन लिया।
  • 15 मई, 1555 को मच्छीवाड़ा तथा 22 जून, 1555 को सरहिंद के युद्ध में सिकंदर शाह सूरी को पराजित कर हुमायूं ने दिल्ली पर पुनः अधिकार लिया।
  • 23 जुलाई, 1555 को हुमायूं एक बार फिर दिल्ली के सिंहासन पर आसीन हुआ, परन्तु अगले ही वर्ष 27 जनवरी, 1556 को पुस्तकालय की सीढियों से गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गयी।
  • लेनपूल ने हुमायूं पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हुमायूं जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते हुए उसने अपनी जान दे दी।“
  • बैरम खां हुमायूं का योग्य एवं वफादार सेनापति था, जिसने निर्वासन तथा पुनः राजसिंहासन प्राप्त करने में हुमायूं की मदद की।

शेरशाह सूरी (1540 ई. -1545 ई.)

  • बिलग्राम के युद्ध में हुमायूं को पराजित कर 1540 ई. में 67 वर्ष की आयु में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इसने मुग़ल साम्राज्य की नींव उखाड़ कर भारत में अफगानों का शासन स्थापित किया।
  • इसके बचपन का नाम फरीद था। शेरशाह का पिता हसन खां जौनपुर का एक छोटा जागीरदार था।
  • दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खां लोहानी ने शेर मारने के उपलक्ष्य में फरीद खां की उपाधि प्रदान थी।
  • बहार खां लोहानी की मृत्यु के बाद शेर खां ने उसकी विधवा ‘दूदू बेगम’ से विवाह कर लिया।
  • 1539 ई. में बंगाल के शासक नुसरतशाह को पराजित करने के बाद शेर खां ने ‘हजरत-ए-आला’ की उपाधि धारण की।
  • 1539 ई. में चौसा के युद्ध में हुमायूं को पराजित करने के बाद शेर खां ने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की।
  • 1540  में दिल्ली की गद्दी पर बैठने के बाद शेरशाह ने सूरवंश अथवा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की।
  • शेरशाह ने अपनी उत्तरी पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए ‘रोहतासगढ़’ नामक एक सुदृढ़ किला बनवाया।
  • 1542 और 1543 ई. में शेरशाह ने मालवा और रायसीन पे आक्रमण करके अपने अधीन कर लिया।
  • 1544 ई. में शेरशाह ने मारवाड़ के शासक मालदेव पर आक्रमण किया। बड़ी मुश्किल से सफलता मिली। इस युद्ध में राजपूत सरदार ‘गयता’ और ‘कुप्पा’ ने अफगान सेना के छक्के छुड़ा दिए।
  • 1545 ई में शेरशाह ने कालिंजर के मजबूर किले का घेरा डाला, जो उस समय कीरत सिंह के अधिकार में था, परन्तु 22 मई 1545 को बारूद के ढेर में विस्फोट के कारण उसकी मृत्यु हो गयी।
  • भारतीय इतिहास में शेरशाह अपने कुशल शासन प्रबंध के लिए जाना जाता है।
  • शेरशाह ने भूमि राजस्व में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया, जिससे प्रभावित होकर अकबर ने अपने शासन को प्रबंध का अंग बनाया।
  • प्रसिद्द ग्रैंड ट्रंक रोड (पेशावर से कलकत्ता) की मरम्मत, करवाकर व्यापार और आवागमन को सुगम बनाया।
  • शेरशाह का मकबरा बिहार के सासाराम में स्थित है, जो मध्यकालीन कला का एक उत्कृष्ट नमूना है।
  • शेरशाह की मृत्यु के बाद भी सूर वंश का शासन 1555 ई. में हुमायूं द्वारा पुनः दिल्ली की गद्दी प्राप्त करने तक कायम रहा।

अकबर (1556 ई. – 1605 ई.)

  • 1556 ई. में हुमायूं की मृत्यु के बाद उसके पुत्र अकबर का कलानौर नामक स्थान पर 14 फरवरी, 1556 को मात्र 13 वर्ष की आयु में राज्याभिषेक हुआ।
  • अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 को अमरकोट के राजा वीरमाल के प्रसिद्द महल में हुआ था।
  • अकबर ने बचपन से ही गजनी और लाहौर के सूबेदार के रूप में कार्य किया था।
  • भारत का शासक बनने के बाद 1556 से 1560 तक अकबर बैरम खां के संरक्षण में रहा।
  • अकबर ने बैरम खां को अपना वजीर नियुक्त कर खाना-ए-खाना की उपाधि प्रदान की थी।
  • 5 नवम्बर, 1556 को पानीपत के द्वितीय युद्ध में अकबर की सेना का मुकाबला अफगान शासक मुहम्मद आदिल शाह के योग्य सेनापति हैमू की सेना से हुआ, जिसमें हैमू की हार एवं मृत्यु हो गयी।
  •  1560 से 1562 ई. तक दो वर्षों तक अकबर अपनी धय मां महम अनगा, उसके पुत्र आदम खां तथा उसके सम्बन्धियों के प्रभाव में रहा। इन दो वर्षों के शासनकाल को पेटीकोट सर्कार की संज्ञा दी गयी है।
  • अकबर ने भारत में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जो इस प्रकार है: 
प्रदेश वर्ष (काल)
मालवा 1561 ई.
चुनार 1561 ई.
गोंडवाना 1564 ई.
गुजरात 1571-72 ई.
काबुल 1581 ई.
सिंध 1591 ई.
बलूचिस्तान 1595 ई.
बंगाल एवं बिहार 1574-76 ई.
कश्मीर 1586 ई.
उड़ीसा 1590-91 ई.
कंधार 1595 ई.
राजपूत राज्य
आमेंर 1562
मेंड़ता 1562
हल्दी घाटी युद्ध 1568 ई.
रणथम्बौर 1576 ई.
कालिंजर 1569 ई.
मारवाड़ 1570 ई.
जैसलमेंर 1570 ई.
बीकानेर 1570 ई.
  •  अकबर ने दक्षिण भारत के राज्यों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था। खानदेश (1591), दौलताबाद (1599), अहमदनगर (1600) और असीर गढ़ (1601) मुग़ल शासन के अधीन किये गए।
  • अकबर ने भारत में एक बड़े साम्राज्य की स्थापना की, परन्तु इससे ज्यादा वह अपनी धार्मिक सहिष्णुता के लिए विख्यात है।
  • अकबर ने 15 75 ई. में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना की स्थापना की। इस्लामी विद्वानों की अशिष्टता से दुखी होकर अकबर ने 1578 ई. में इबादतखाना में सभी धर्मों के विद्वानों को आमंत्रित करना शुरू किया।
  • 1582 ई. में अकबर ने एक नवीन धर्म ‘तोहिद-ए-इलाही’ या ‘दीन-ए-इलाही’ की स्थापना की, जो वास्तव में विभिन्न धर्मों के अच्छे तत्वों का मिश्रण था।
  • अकबर ने सती प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया, साथ ही विधवा विवाह को क़ानूनी मान्यता दी। अकबर ने लड़कों के विवाह की उम्र 16 वर्ष और लड़कियों के लिए 14 वर्ष निर्धारित की।
  • अकबर ने 1562 में दास प्रथा का अंत किया तथा 1563 में तीर्थयात्रा पर से कर को समाप्त कर दिया।
  • अकबर ने 1564 में जजिया कर समाप्त कर सामाजिक सदभावना को सुदृढ़ किया।
  • 1579 में अकबर ने ‘मजहर’ या अमोघवृत्त की घोषणा की।
  • अकबर ने गुजरात विजय की स्मृति में फतेहपुर सीकरी में ‘बुलंद दरवाजा’ का निर्माण कराया था।
  • अकबर ने 1575-76 ई. में सम्पूर्ण साम्राज्य को 12 सूबों में बांटा था, जिनकी संख्या बराड़, खानदेश और अहमदनगर को जीतने के बाद बढ़कर 15 हो गयी।
  • अकबर ने सम्पूर्ण साम्राज्य में एक सरकारी भाषा (फारसी), एक समान मुद्रा प्रणाली, समान प्रशासनिक व्यवस्था तथा बात माप प्रणाली की शुरुआत की।
  • अकबर ने 1573-74 ई. में ‘मनसबदारी प्रथा’ की शुरुआत की, जिसकी खलीफा अब्बा सईद द्वारा शुरू की गयी तथा चंगेज खां और तैमूरलंग द्वारा स्वीकृत सैनिक व्यवस्था से मिली थी।

जहाँगीर (1605 ई.- 1627 ई.)

  • 17 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र सलीम जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा।
  • गद्दी पर भटकते ही सर्वप्रथम 1605 ई. में जहाँगीर को अपने पुत्र खुसरो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। जहाँगीर और खुसरो के बीच भेरावल नामक स्थान पर एक युद्ध हुआ, जिसमें खुसरो पराजित हुआ।
  • खुसरो को सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुन देव का आशीर्वाद प्राप्त था। जहाँगीर ने अर्जुन देव पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए फांसी की सजा दी।
  • 1585 मेँ जहाँगीर का विवाह आमेंर के राजा भगवान दास की पुत्री तथा मानसिंह की बहन मानबाई से हुआ, खुसरो मानबाई का ही पुत्र था।
  • जहाँगीर दूसरा विवाह राजा उदय सिंह की पुत्री जगत गोसाईं से हुआ था, जिसकी संतान शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) था।
  • मई 1611 जहाँगीर ने मेंहरुन्निसा नामक एक विधवा से विवाह किया जो, फारस के मिर्जा गयास बेग की पुत्री थी। जहाँगीर ने मेंहरुन्निसा को ‘नूरमहल’ एवं ‘नूरजहाँ’ की उपाधि दी।
  • नूरजहाँ के पिता गयास बेग को वजीर का पद प्रदान कर एत्माद्दुदौला की उपाधि दी गई, जबकि उसके भाई आसफ खाँ को खान-ए-सामा का पद मिला।
  • 1605 से 1615 के मध्य कई लड़ाइयों के बाद जहाँगीर ने मेंवाड़ के राजा अमर सिंह के साथ संधि कर ली।
  • अकबर के समय मेँ खानदेश तथा अहमदनगर के कुछ भागो को जीत लिया गया था, परन्तु अहमदनगर का राज्य समाप्त नहीँ हुआ था। मुगलो और अहमदनगर के बीच कई युद्ध हुए और अंततः 1621 मेँ दोनो के बीच संधि हो गई।
  • 1621 ने जहाँगीर ने अपना दक्षिण अभियान समाप्त कर दिया क्योंकि इसके बाद वह 1623 ई. में शाहजहाँ के विद्रोह, 1626 मेँ महावत ख़ाँ के विद्रोह के कारण उलझ गया।
  • जहाँगीर के दक्षिण विजय मेँ सबसे बडी बाधा अहमदनगर के योग्य वजीर मलिक अंबर की उपस्थिति थी। उसने मुगलोँ के विरोध ‘गुरिल्ला युद्ध नीति’ अपनाई और बडी संख्या मेँ सेना मेँ मराठोँ की भरती की।
  • जहाँगीर ने 1611 मेँ खरदा, 1615 मेँ खोखर, 1620 मेँ कश्मीर के दक्षिण मेँ किश्तवाड़ तथा 1620 में ही कांगड़ा को जीता।
  • जहाँगीर के शासन की सबसे उल्लेखनीय सफलता 1620 मेँ उत्तरी पूर्वी पंजाब की पहाडियोँ पर स्थित कांगड़ा के दुर्ग पर अधिकार करना था।
  • 1626 मेँ महावत खान का विद्रोह जहाँगीर के शासनकाल की एक महत्वपूर्ण घटना थी। महावत खां ने जहाँगीर को बंदी बना लिया था। नूरजहाँ की बुद्धिमानी के कारण महावत ख़ाँ की योजना असफल सिद्ध  हुई।
  • नूर जहाँ से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण घटना उसके द्वारा बनाया गया ‘जुंटा गुट’ था। गुट मेँ उसके पिता एत्माद्दुदौला, माता अस्मत बेगम, भाई आसफ खान और शाहजादा खुर्रम सम्मिलित थे।
  • जहाँगीर ने ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ नाम से अपनी आत्मकथा की रचना की।
  • नूरजहाँ, जहाँगीर के साथ झरोखा दर्शन देती थी। सिक्कोँ पर बादशाह के साथ उसका नाम भी अंकित होता था। जहाँगीर के चरित्र की सबसे मुख्य विशेषता उसकी ‘अपरिमित महत्वाकांक्षा’ थी।
  • जहाँगीर ने तंबाकू के सेवन पर प्रतिबंध लगाया था।
  • जहाँगीर के शासन काल में इंग्लैड के सम्राट जेम्स प्रथम ने कप्तान हॉकिंस (1608) और थॉमस (1615)  को भारत भेजा। जिससे अंग्रेज भारत मेँ कुछ व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने मेँ सफल हुए।
  • नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम ने इत्र बनाने की विधि का आविष्कार किया।
  • जहाँगीर धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु था। वह अकबर की तरह ब्राम्हणों और मंदिरोँ को दान देता था। उसने 1612 ई. में पहली बार रक्षाबंधन का त्योहार मनाया।
  • किंतु कुछ अवसरों पर जहाँगीर ने इस्लाम का पक्ष लिया। कांगड़ा का किला जीतने के बाद उसने एक गाय कटवाकर जश्न मनाया।
  • अकबर सलीम को शेखूबाबा कहा करता था। उसने अकबर द्वारा जारी गो हत्या निषेध की परंपरा को जारी रखा।
  • जहाँगीर ने सूरदास को  अपने दरबार मेँ आश्रय दिया था, जिसने ‘सूरसागर’ की रचना की।
  • जहांगीर के शासन काल मेँ कला और साहित्य का अप्रतिम विकास हुआ। नवंबर 16 27 में जहाँगीर की मृत्यु हो गई। उसे लाहौर के शाहदरा मेँ रावी नदी के किनारे दफनाया गया।

शाहजहाँ (1627 ई. 1658 ई.)


  • शाहजहाँ (खुर्रम) का जन्म 1592 मेँ जहाँगीर की पत्नी जगत गोसाईं से हुआ।
  • जहाँगीर की मृत्यु के समय शाह जहाँ दक्कन में था। जहाँगीर की मृत्यु के बाद नूरजहाँ ने लाहौर मेँ अपने दामाद शहरयार को सम्राट घोषित कर दिया। जबकि आसफ़ खां ने शाहजहाँ के दक्कन से आगरा वापस आने तक अंतरिम व्यवस्था के रुप मेँ खुसरो के पुत्र द्वार बक्श को राजगद्दी पर आसीन किया।
  • शाहजहाँ ने अपने सभी भाइयो  एवम सिंहासन के सभी प्रतिद्वंदियोँ तथा अंत मेँ द्वार बक्श की हत्या कर 24 फरवरी 1628 मेँ आगरा के सिंहासन पर बैठा।
  • शाहजहाँ का विवाह 1612 ई. मेँ आसफ की पुत्री और नूरजहाँ की भतीजी ‘अर्जुमंद बानू बेगम’ से हुआ था, जो बाद मेँ इतिहास मेँ मुमताज महल के नाम से विख्यात हुई।
  • शाहजहाँ को मुमताज महल 14 संतानेँ हुई लेकिन उनमेँ से चार पुत्र और तीन पुत्रियाँ ही जीवित रहै। चार पुत्रों मेँ दारा शिकोह, औरंगजेब, मुराद बख्श और शुजाथे, जबकि रोशनआरा, गौहन आरा, और जहांआरा पुत्रियाँ थी।
  • शाहजहाँ के प्रारंभिक तीन वर्ष बुंदेला नायक जुझार सिंह और खाने जहाँ लोदी नामक अफगान सरदार के विद्रोह को दबाने मेँ निकले।
  • शाहजहाँ के शासन काल मेँ सिक्खोँ के छठे गुरु हरगोविंद सिंह से मुगलोँ का संघर्ष हुआ जिसमें सिक्खों की हार हुई।
  • शाहजहाँ ने दक्षिण भारत मेँ सर्वप्रथम अहमदनगर पर आक्रमण कर के 1633 में उसे मुग़ल साम्राज्य मेँ मिला लिया।
  • फरवरी 1636 में  गोलकुंडा के सुल्तान अब्दुल्ला शाह ने शाहजहाँ का आधिपत्य स्वीकार कर लिया।
  • मोहम्मद सैय्यद (मीर जुमला), गोलकुंडा के वजीर ने, शाहजहाँ को कोहिनूर हीरा भेंट किया था।
  • शाहजहाँ ने 1636  में बीजापुर पर आक्रमण करके उसके शासक मोहम्मद आदिल शाह प्रथम को संधि करने के लिए विवश किया।
  • मध्य एशिया पर विजय प्राप्त करने के लिए शाहजहाँ ने 1645 ई. में शाहजादा मुराद एवं 1647 ई. मेँ औरंगजेब को भेजा पर उसको सफलता प्राप्त न हो सकी।
  • व्यापार, कला, साहित्य और स्थापत्य के क्षेत्र मेँ चर्मोत्कर्ष के कारण ही इतिहासकारोँ ने शाहजहाँ के शासनकाल को स्वर्ण काल की संख्या दी है।
  • शाहजहाँ ने दिल्ली मेँ लाल किला और जामा मस्जिद का निर्माण कराया और आगरा मेँ अपनी पत्नी मुमताज महल की याद मेँ ताजमहल बनवाया जो कला और स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करते हैं।
  • शाहजहाँ के शासन काल का वर्णन फ्रेंच यात्री बर्नियर, टेवरनियर तथा इटालियन यात्री मनुची ने किया है।
  • शाहजहाँ ने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षोँ में इस्लाम का पक्ष लिया किंतु कालांतर मेँ दारा और जहाँआरा के प्रभाव के कारण वह सहिष्णु बन गया था।
  • शाहजहाँ ने अहमदाबाद के चिंतामणि मंदिर की मरमत किए जाने की आज्ञा दी तथा खंभात के नागरिकोँ के अनुरोध पर वहाँ गो हत्या बंद करवा दी थी।
  • पंडित जगन्नाथ शाहजहाँ के राज कवि थे जिनोने जिंहोने गंगा लहरी और रस गंगाधर की रचना की थी।
  • शाहजहाँ के पुत्र दारा ने भगवत गीता और योगवासिष्ठ का फारसी मेँ अनुवाद करवाया था। शाहजहाँ ने दारा को शाहबुलंद इकबाल की उपाधि से विभूषित किया था।
  • दारा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य वेदो का संकलन है, उसने वेदो को ईश्वरीय कृति माना था। दारा सूफियोँ की कादरी परंपरा से बहुत प्रभावित था।
  • सितंबर 1657 ई.  में शाहजहाँ के बीमार पड़ते ही उसके पुत्रों के बीच उत्तराधिकार के लिए युद्ध प्रारंभ हो गया।
  • शाहजहाँ के अंतिम आठ वर्ष आगरा के किले के शाहबुर्ज मेँ एक बंदी की तरह व्यतीत हुए। शाहजहाँ दारा को बादशाह बनाना चाहता था किन्तु अप्रैल 1658 ई. को धर्मत के युद्ध मेँ औरंगजेब ने दारा को पराजित कर दिया।
  • बनारस के पास बहादुरपुर के युद्ध मेँ शाहशुजा, शाही सेना से पराजित हुआ।
  • जून 1658 में सामूगढ़ के युद्ध मेँ औरंगजेब और मुराद की सेनाओं का मुकाबला शाही सेना से हुआ, जिसका नेतृत्व दारा कर रहा था। इस युद्ध मेँ दारा पुनः पराजित हुआ।
  • सामूगढ़ के युद्ध मेँ दारा की पराजय का मुख्य कारण मुसलमान सरदारोँ का विश्वासघात और औरंगजेब का योग्य सेनापतित्व था।
  • सामूगढ़ की विजय के बाद औरंगजेब ने कूटनीतिक से मुराद को बंदी बना लिया और बाद मेँ उसकी हत्या करवा करवा दी।
  • औरंगजेब और शुजा के बीच इलाहाबाद खंजवा के निकट जनवरी 1659 मेँ एक युद्ध हुआ जिसमें पराजित होकर शुजा अराकान की और भाग गया।
  • जहाँआरा ने दारा शिकोह का, रोशनआरा ने औरंगजेब का और गौहन आरा ने मुराद बख्श का पक्ष लिया था।
  • शाहजहाँ की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ताज महल मेँ मुमताज महल की कब्र के नजदीक दफनाया गया था।

औरंगजेब (1658-1707 ई.)

  • औरंगजेब का जन्म 3 नवंबर 1618 को उज्जैन के निकट दोहन नामक स्थान पर हुआ था।
  • उत्तराधिकार के युद्ध मेँ विजय होने के बाद औरंगजेब 21 जुलाई 1658 को मुग़ल साम्राज्य की गद्दी पर  आसीन हुआ।
  • एक  शासक के सारे गुण औरंगजेब में थे, उसे प्रशासन का अनुभव भी था क्योंकि बादशाह बनने से पहले औरंगजेब गुजरात, दक्कन, मुल्तान व सिंधु प्रदेशों का गवर्नर रह चुका था।
  • औरंगजेब ने 1661 ई. में मीर जुमला को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया जिसने कूच बिहार की राजधानी को अहोमो से जीत लिया। 1662 ई. में  मीर जुमला ने अहोमो की राजधानी गढ़गाँव पहुंचा जहां बाद मेँ अहोमो ने मुगलो से संधि कर ली और वार्षिक कर देना स्वीकार किया।
  • 1633 मेँ मीर जुमला की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खां को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया। शाइस्ता खां ने 1666 ई. मेँ पुर्तगालियोँ को दंड दिया तथा बंगाल की खाड़ी मेँ स्थित सोन द्वीप पर अधिकार कर लिया। कालांतर मेँ उसने अराकान के राजा से चटगांव जीत लिया।
  • औरंगजेब शाहजहाँ के काल मेँ 1636 ई. से 1644 ई.  तक दक्षिण के सूबेदार के रुप मेँ रहा और औरंगाबाद मुगलोँ की दक्षिण सूबे की राजधानी थी।
  • शासक बनने के बाद औरंगजेब के दक्षिण मेँ लड़े गए युद्धों को दो भागोँ मेँ बाँटा जा सकता है – बीजापुर तथा गोलकुंडा के विरुद्ध युद्ध और मराठोँ के साथ युद्ध।
  • ओरंगजेब ने 1665 ई. में राजा जयसिंह को बीजापुर एवं शिवाजी का दमन करने के लिए भेजा। जय सिंह शिवाजी को पराजित कर पुरंदर की संधि (जून, 1665) करने के लिए विवश किया। किंतु जयसिंह को बीजापुर के विरुद्ध सफलता नहीँ मिली।
  • पुरंदर की संधि के अनुसार शिवाजी को अपने 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े तथा बीजापुर के खिलाफ मुगलों की सहायता करने का वचन देना पड़ा।
  • 1676 में मुगल सुबेदार दिलेर खां ने बीजापुर को संधि करने के लिए विवश किया। अंततः 1666 ई. मेँ बीजापुर के सुल्तान सिकंदर आदिल शाह ने औरंगजेब के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया फलस्वरुप बीजापुर को मुग़ल साम्राज्य मेँ मिला लिया गया।
  • 1687 ई. मेँ औरंगजेब ने गोलकुंडा पर आक्रमण कर के 8 महीने तक घेरा डाले रखा, इसके बावजूद सफलता नहीँ मिली। अंततः अक्टूबर 1687 मेँ गोलकुंडा को मुग़ल साम्राज्य मेँ मिला लिया गया।
  • जयसिंह के बुलाने पर शिवाजी औरंगजेब के दरबार मेँ आया जहाँ उसे कैद कर लिया गया, किंतु वह गुप्त रुप से फरार हो गये।
  • शिवाजी की मृत्यु के बाद के बाद उनके पुत्र संभाजी ने मुगलों से संघर्ष जारी रखा किंतु 1689 ई. मेँ उसे पकड़ कर हत्या कर दी गई।
  • संभाजी की मृत्यु के बाद सौतेले भाई राजाराम राजाराम ने भी मुगलोँ से संघर्ष जारी रखा, जिसे मराठा इतिहास मेँ ‘स्वतंत्रता संग्राम’ के नाम से जाना जाता है।
  • औरंगजेब ने राजपूतोँ के प्रति अकबर, जहांगीर, और शाहजहाँ द्वारा अपनाई गई नीति मेँ परिवर्तन किया।
  • औरंगजेब के समय आमेर (जयपुर) के राजा जयसिंह, मेंवाड़ के राजा राज सिंह, और जोधपुर के राजा जसवंत सिंह प्रमुख राजपूत राजा थे।
  • मारवाड़ और मुगलोँ के बीच हुए इस तीस वर्षीय युद्ध (1679 – 1709 ई.) का नायक दुर्गादास था, जिसे कर्नल टॉड ने ‘यूलिसिस’ कहा है।
  • औरंगजेब ने सिक्खोँ के नवें गुरु तेग बहादुर की हत्या करवा दी।
  • औरंगजेब के समय हुए कुछ प्रमुख विद्रोह मेँ अफगान विद्रोह (1667-1672), जाट विद्रोह (1669-1681), सतनामी विद्रोह (1672), बुंदेला विद्रोह (1661-1707), अकबर द्वितीय का विद्रोह (1681), अंग्रेजो का विद्रोह (1686), राजपूत विद्रोह (1679-1709) और सिक्ख विद्रोह (1675-1607 ई.) शामिल थे।
  • औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसका प्रमुख लक्ष्य भारत मेँ दार-उल-हर्ष के स्थान पर    दार-उल-इस्लाम की स्थापना करना था।
  • औरंगजेब ने 1663 ई. मेँ सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया प्रथा हिंदुओं पर तीर्थ यात्रा कर लगाया।
  • औरंगजेब ने 1668 ई. मेँ हिंदू त्यौहारोँ और उत्सवों को मनाने जाने पर रोक लगा दी।
  • औरंगजेब के आदेश द्वारा 1669 ई. में  काशी विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशवराय मंदिर तथा गुजरात का सोमनाथ मंदिर को तोड़ा गया।
  • औरंगजेब ने 1679 ई. मेँ हिंदुओं पर जजिया कर आरोपित किया। दूसरी ओर उसके शासनकाल मेँ हिंदू अधिकारियो की संख्या संपूर्ण इतिहास मेँ सर्वाधिक (एक तिहाई) रही।
  • औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 को हो गई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *