संघ की न्यायपालिका: उच्चतम न्यायालय The Union Judiciary: Supreme Court

न्यायपालिका सरकार का महत्वपूर्ण अंग है। सरकार का स्वरूप चाहे कोई भी हो, न्यायपालिका की व्यवस्था किसी-न-किसी रूप में अवश्य की जाती है। संघीय शासन प्रणाली में स्वतंत्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका का होना अनिवार्य है क्योंकि शक्तियों के विभाजन के कारण संघ तथा राज्यों में प्रायः विवाद उत्पन्न होते रहते हैं।इन विवादों का निपटारा करने तथा संविधान की व्याख्या करने के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है। भारत में संघीय शासन प्रणाली की व्यवस्था होने के कारण संविधान के अंतर्गत स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है।

भारत में संघात्मक शासन प्रणाली है परंतु संघात्मक सिद्धांतों के अनुसार केंद्र तथा राज्यों में पृथक्-पृथक् न्याय प्रबंध नहीं है बल्कि एकात्मक न्याय प्रणाली की व्यवस्था की गई है। इस एकात्मक न्याय प्रणाली में उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च है। सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रीय स्तर का एकमात्र न्यायालय है। राज्यों में उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ यायालय हैं (अनुच्छेद-233-237)। राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालयों में अपील की जाती है और उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। इस प्रकार भारत में पिरामिडाकार एकल संगठित न्याय प्रणाली है, जसके शीर्ष पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय है। सर्वोच्च न्यायालय के नीचे विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालय हैं और प्रत्येक उच्च न्यायालय के नीचे अधीनस्थ न्यायालय हैं।

सर्वोच्च न्यायालय

उच्चतम न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायालय है। इसके द्वारा दिये गये निर्णय अंतिम होते है तथा इन निर्णयों के विरुद्ध किसी और न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 124 से 147 तक के अनुच्छेदों का संबंध सर्वोच्च न्यायालय से है। संविधान के अनुच्छेद 124(1) में सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है।

संगठन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार प्रारम्भ में सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीश निश्चित किये गये थे परंतु इसी अनुच्छेद में संसद को न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के अनुसार, न्यायाधीशों की संख्या मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 10 कर दी गई थी। 1960 में संसद द्वारा न्यायाधीशों की संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 14 कर दी गयी। परंतु 1977 में भारतीय संसद ने एक कानून के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की कुल सख्या 18 कर दी। 1986 में संसद ने एक अन्य कानून पारित करके सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 18 से बढ़ाकर 26 कर दी। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008-09 में संसद ने एक विधेयक पारित कर न्यायाधीशों की संख्या 30 कर दी है।

वर्तमान में कुल 31 न्यायाधीश हैं जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश एवं 30 अन्य न्यायाधीश हैं। इन 30 न्यायाधीशों के अतिरिक्त यदि राष्ट्रपति उचित समझे तो अन्य तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है।

तदर्थ न्यायाधीश

संविधान के अनुच्छेद 127(1) के अनुसार यदि किसी कारणवश न्यायालय की बैठक करने के लिए निश्चित गणपूर्ति कोरम (गणपूर्ति 3 निश्चित की गई है) पूरा नहीं होता तो राष्ट्रपति की अग्रिम स्वीकृति द्वारा मुख्य न्यायाधीश तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति कर सकता है। उस व्यक्ति को, जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखता हो, तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है।

न्यायाधीशों की नियुक्ति

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने पूर्ण अधिकारों के अंतर्गत करता है और इसके लिए वह आवश्यकतानुसार सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों का भी परामर्श ले सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में भी वह सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के चाहे जितने न्यायाधीशों की सलाह ले सकता है। संविधान में स्पष्ट प्रावधान के बावजूद भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राजनीतिक फैसले से प्रभावित होती है। पहले न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय वरिष्ठता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था परंतु विधि आयोग ने अपनी 80वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के समय वरिष्ठता पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।

नियुक्ति हेतु अर्हताएं

संविधान के अनुच्छेद 124(3) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं-

  1. वह भारत का नागरिक हो,
  2. वह कम से कम लगातार पांच वर्ष तक किसी एक या दो या इससे अधिक उच्च न्यायालयों का न्यायाधीश रह चुका हो,
  3. उसने कम-से-कम 10 वर्ष तक लगातार किसी एक या दो या इससे अधिक उच्च न्यायालयों में वकालत की हो, तथा;
  4. राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता हो।

पदावधि

संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर आसीन रहते हैं। उनकी नियुक्ति हेतु कोई न्यूनतम आयु अथवा नियत पदावधि का नित्धारण नहीं किया गया है। 65 वर्ष की आयु से पहले कोई भी न्यायाधीश अपनी इच्छानुसार त्याग-पत्र दे सकता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति किसी भी न्यायाधीश को बुरे व्यवहार या अयोग्यता के कारण 65 वर्ष की आयु से पहले भी पदच्युत कर सकता है। इसके लिए यह अनिवार्य है कि संसद के दोनों सदन अपने-अपने कुल सदस्यों की संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा प्रस्ताव पारित करके राष्ट्रपति के पास भेजें। संसद द्वारा किसी न्यायाधीश के विरुद्ध प्रस्ताव पास किए बिना राष्ट्रपति किसी न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश जारी नहीं कर सकता है [(अनुच्छेद 124(4)]।

ऐसा हटाया जाना केवल निम्नलिखित दो आधारों पर ही हो सकता है-

  1. सिद्ध कदाचार, तथा;
  2. असमर्थता

न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 एवं अनुच्छेद-124(4) के प्रावधानों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को महाभियोग लगाकर तथा निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाकर ही उसके पद से हटाया जा सकता है-

  • लोक सभा के न्यूनतम 100 अथवा राज्य सभा के न्यूनतम 50 सदस्यों द्वारा राष्ट्रपति को सम्बोधित एक प्रस्ताव लोक सभा के अध्यक्ष अथवा राज्य सभा के सभापति को दिया जाता है।
  • इस प्रस्ताव का अन्वेषण एक तीन सदस्यीय समिति द्वारा किया जाता है। इन तीन सदस्यों में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं एक प्रख्यात विधिवेत्ता होता है।
अभी तक का प्रथम महाभियोग पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बी. रामास्वामी के विरुद्ध कदाचार (वित्तीय) के आधार पर 1991 में लगाया गया।

लोकसभा में महाभियोग की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। अंततः मतदान में महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो सका, फलस्वरूप असफल हो गया।

  •  यदि समिति आरोपित न्यायाधीश की कदाचार का दोषी अथवा कार्य संपादन में असमर्थ पाती है तो प्रस्ताव की समिति के प्रतिवेदन के साथ विचारार्थ उस सदन में भेज दिया जाता है, जिसमें प्रस्ताव लम्बित है।
  • यदि प्रस्ताव संसद के प्रत्येक सदन में उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के न्यूनतम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर दिया जाता है तो राष्ट्रपति को समावेदन प्रस्तुत किया जाता है।
  • राष्ट्रपति द्वारा समावेदन पर आदेश देने पर न्यायाधीश अपने पद से पदच्युत हो जाएगा।

उल्लेखनीय है कि, सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय दोनों के न्यायाधीशों के लिए महाभियोग की प्रक्रिया एक समान ही है।

अनुच्छेद 124(6) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अपना पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ लेते हैं।

वेतन तथा भत्ते

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा न्यायाधीशों के वेतन आदि संविधान की दूसरी अनुसूची में अंकित किए गए हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते भारत की संचित निधि से दिये जाते हैं। यह ऐसी निधि है जो संसद के मतदान के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। सेवानिवृत्ति के पश्चात् न्यायाधीशों को नियमानुसार पेंशन दी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्हें आतिथ्य सत्कार भत्ता तथा यात्रा भत्ता भी दिया जाता है। संसद समय-समय पर इस वेतन-भत्ते में बढ़ोतरी कर सकती है लेकिन किसी न्यायाधीश के सेवा काल में उसके वेतन भत्तों में कमी नहीं कर सकती। केवल वित्तीय आपात की स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों के वेतन भत्ते कम किए जा सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय की स्वाधीनता सुनिश्चित वाले उपबंध

भारतीय संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वतंत्रता की बनाए रखने के लिए अनेक प्रावधानों का निर्धारण किया है-

  1. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है, फिर भी राष्ट्रपति इस विषय में भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करता है।
  2. संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार राष्ट्रपति किसी भी न्यायाधीश को बुरे आचरण या अयोग्यता के कारण पदच्युत कर सकता है परन्तु इसके लिए आवश्यक है की संसद के दोनों सदन अपने कुल सदस्यों की संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित तथा मत देने वाले दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव राष्ट्रपति को ज्ञापित करें।
  3. संविधान के अनुच्छेद 125(2) के अनुसार न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते, छुट्टी तथा पेंशन में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। परंतु अनुच्छेद 360 (4क) के अनुसार वित्तीय आपातकाल के समय में राष्ट्रपति ऐसा कर सकता है।
  4. संविधान के अनुच्छेद 146(3) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासनिक व्यय, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते आदि भारत की संचित निधि से दिये जाते हैं।
  5. संविधान के अनुच्छेद 124(7) के अनुसार जो व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश के पद पर रह चुका है, वह भारतीय क्षेत्र में पुनः किसी भी न्यायालय या अन्य किसी अधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता है।

संविधान के अधीन सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति

संविधान के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की अत्यधिक शक्तियां एवं प्राधिकार प्रदान किए गए हैं। वस्तुतः भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियां किसी भी अन्य देश के सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में अधिक हैं। यह परिसंघ न्यायालय भी है, अपीलीय न्यायालय भी है, संविधान का संरक्षक भी तथा उसके द्वारा संविधान के अधीन अपनी अधिकारिता के प्रयोग में घोषित विधि भारत के राज्य क्षेत्र में अन्य सभी न्यायालयों पर आबद्धकर है (अनुच्छेद-141)।

न्यायाधीशों को प्राप्त उन्मुक्तियां

न्यायाधीशों के निर्णयों या व्यवहार को लेकर संसद में महाभियोग के अतिरिक्त आलोचना नहीं की जा सकती। जनता में भी इस प्रकार की आलोचना नहीं की जा सकती। न्यायालय की कार्रवाहियों के समय न्यायाधीशों की प्रकृति पर आलोचनात्मक टीका-टिप्पणी करने पर न्यायालय को उनके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा चलाने का अधिकार है।

सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार, शक्ति तथा कार्य

सर्वोच्च न्यायालय भारत का सबसे बड़ा तथा अंतिम न्यायालय है अर्थात् सर्वोच्च न्यायालय एकीकृत न्यायिक व्यवस्था की सर्वोच्च संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 141 में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किये गये सिद्धांत भारतीय सीमा में आने वाले सभी न्यायालयों पर लागू होते हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकारों, शक्तियों तथा कार्यों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं-

आरंभिक अधिकार क्षेत्र

संविधान के अनुच्छेद 131 में सर्वोच्च न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र की व्याख्या की गई है। इस अधिकार क्षेत्र का अभिप्राय उन अभियोगों से है जिन्हें सीधे ही सर्वोच्च न्यायालय में आरंभ किया जा सकता है तथा जिन्हें अन्य निम्न न्यायालयों में आरंभ नहीं किया जा सकता है। आरंभिक अधिकार क्षेत्र में निम्नलिखित अभियोग आते हैं-

  1. एक ओर भारत सरकार तथा दूसरी ओर एक या एक से अधिक राज्य हों;
  2. एक ओर भारत सरकार के साथ एक या एक से अधिक राज्य हों तथा दूसरी ओर एक या एक से अधिक अन्य राज्य हो, तथा;
  3. दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद हो।
  • भारतीय न्यायिक व्यवस्था एकीकृत एवं पिरामिडाकार है, जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय है, जिसके निर्णयों के विरुद्ध किसी अन्य न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती।
  • इसमें एक मुख्य न्यायाधीश एवं 30 अन्य न्यायाधीश हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय की बैठक हेतु आवश्यक गणपूर्ति 3 है।
  • न्यायाधीशों को केवल सिद्ध कदाचार अथवा असमर्थता के आधार पर संविधान में वर्णित महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है।
  • किसी भी विषय पर राष्ट्रपति को कानूनी परामर्श देने हेतु न्यूनतम 5 न्यायाधीशों की तथा अन्य मुकदमों की अपीलें सुनने हेतु न्यूनतम 3  न्यायाधीशों की बेंच होनी अनिवार्य है।

अपवाद

सर्वोच्च न्यायालय के आरंभिक अधिकार क्षेत्र में निम्नलिखित प्रकार के वाद नहीं आते हैं-

  1. सरकारों के मध्य उत्पन्न विवाद किसी न्याय योग्य अधिकार पर आधारित होना अनिवार्य है। अभिप्राय यह है कि विवाद का कारण राजनीतिक नहीं, बल्कि वैधानिक होना चाहिए। जिन सरकारों के मध्य विवाद का आधार वैधानिक न हो, वे सर्वोच्च न्यायालय के आरम्भिक अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आते हैं।
  2. संविधान के 7वें संशोधन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के आरम्भिक अधिकार क्षेत्र में वे अभियोग नहीं आते हैं जिनका संबंध उन संधियों, समझौतों अथवा सनदों से है जो संविधान के लागू होने से पूर्व की गई थीं और जो अब भी जारी हैं अथवा जिनमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया हो कि उनके संबंध में सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा अधिकार प्राप्त नहीं होगा।
  3. संविधान के तीसरे खंड में दिये गये मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए नागरिकों को सर्वोच्च न्यायालय का आश्रय लेने का अधिकार प्राप्त है नागरिकों के मौलिक अधिकारों से संबंधित अभियोग भी सर्वोच्च न्यायालय के आरंभिक क्षेत्र में आते हैं क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 32 के अनुसार, नागरिकों को, मौलिक अधिकारों की अवहेलना पर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका या रिट देने का अधिकार दिया गया है। अर्थात नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय में रिट दायर कर सकता है। नागरिक अधिकारों को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय यथोचित निर्देश, आदेश या लेख जारी कर सकता है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय निम्नलिखित लेख जारी कर सकता है-
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण आदेश
  • परमादेश
  • प्रतिषेध लेख
  • उत्प्रेषण लेख
  • अधिकार पृच्छा लेख

राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद सर्वोच्च न्यायालय के मूल अधिकार क्षेत्र में आते हैं क्योंकि ऐसे विवादों की सुनवाई कोई अन्य न्यायालय नहीं कर सकता है।

भारतीय एवं अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालयों की तुलना
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालयभारतीय सर्वोच्च न्यायालय

इसकी अपीलीय अधिकारिता परिसंघीय सम्बन्धों से उत्पन्न होने वाले अथवा विधियों एवं संधियों की संवैधानिक विधिमान्यता से सम्बंधित मामलों तक ही सीमित है।

यह परिसंघीय न्यायालय होने के साथ-साथ संविधान का संरक्षक भी है तथा संविधान के निर्वचन के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले मामलों के अतिरिक्त सिविल एंवं दाण्डिक मामलों के सम्बन्ध में यह देश का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है (अनुच्छेद-183-184)।

इसे अमेरिका के राज्य क्षेत्र में किसी भी न्यायालय अथवा अधिकरण के विनिश्चय से अपील ग्रहण करने का अधिकार नहीं है।

इसे भारतीय सीमा क्षेत्र में किसी भी न्यायालय अथवा अधिकरण के विनिश्चय से अपील ग्रहण करने की असाधारण शक्ति है। इस विवेकाधिकार की कोई सीमा नहीं है (अनुच्छेद-136)।

इसने सरकार को परामर्श प्रदान करने सम्बन्धी शक्ति ग्रहण करने से इंकार कर दिया तथा किसी भी विषय के पक्षकारों के मध्य वास्तविक विवाद को निपटाने तक ही स्वयं को सीमित रखा है।

इसे राष्ट्रपति द्वारा उसे निर्दिष्ट किसी तथ्य अथवा विधि के प्रश्न पर परामर्श देने की शक्ति प्रदान की गई है (अनुच्छेद-148)।

अपीलीय अधिकार क्षेत्र

अपीलीय अधिकार क्षेत्र में ऐसे अभियोग आते हैं, जिनका आरम्भ तो निम्न स्तरीय न्यायालयों में होता है, परंतु उनके निर्णय के प्रति सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। अपीलीय अधिकार क्षेत्र को चार भागों में बांटा जा सकता है-

संवैधानिक अभियोगों में अपील

संविधान के अनुच्छेद 132 के अनुसार किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय के द्वारा दिये गये निर्णय, डिक्री या आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यदि सम्बंधित उच्च न्यायालय अभियोग के सम्बन्ध में यह प्रमाण-पत्र दे कि अभियोग में संवैधानिक व्याख्या का प्रश्न है। संवैधानिक व्याख्या से संबंधित किसी भी अभियोग में, चाहे वह दीवानी हो या फौजदारी, उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।

दीवानी या सिविल अभियोगों में अपील

संविधान के अनुच्छेद 133 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को दीवानी अभियोगों के निर्णय के विरुद्ध भी अपीलें सुनने का अधिकार प्राप्त है।

फौजदारी या दाण्डिक अभियोगों में अपील

संविधान के अनुच्छेद 134 के अनुसार उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध निम्नलिखित फौजदारी अभियोगों में सर्वोच्च न्यायालय को अपील सुनने का अधिकार प्राप्त है-

  • ऐसा अभियोग, जिसमें निम्न न्यायालयों ने व्यक्ति को रिहा कर दिया हो, परंतु अपील करने पर उच्च न्यायालय ने उसे मृत्यु दण्ड दिया हो।
  • ऐसा अभियोग, जो निम्न न्यायालयों में चल रहा हो परंतु उच्च न्यायालय उस अभियोग को अपने हाथ में लेकर व्यक्ति को दोषी घोषित कर दे और मृत्यु दण्ड दे दे, तथा;
  • उच्च न्यायालय यह प्रमाण-पत्र दे दे कि अभियोग सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने योग्य है।
  • संसद कानून द्वारा सर्वोच्च न्यायालय का अपीलीय अधिकार क्षेत्र बढ़ा सकती है।

विशेष अपीलें सुनने का अधिकार

संविधान के अनुच्छेद 136 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय अपील करने की विशेष आज्ञा दे सकता है। अनुच्छेद 136(1) में यह व्यवस्था है कि सर्वोच्च न्यायालय भारत की भूमि पर स्थित किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा किसी भी विषय संबंधी दिए गए निर्णय, परिणाम, दण्ड या आदेश के विरुद्ध अपील करने की विशेष आज्ञा स्वेच्छानुसार दे सकता है, परंतु सैनिक कानून के अनुसार स्थापित किये गये किसी सैन्य न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 136 के अंतर्गत भी अपील करने की विशेष आज्ञा देने का अधिकार नहीं है।

परामर्शदात्री अधिकार क्षेत्र

संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार भारत के राष्ट्रपति को किन्हीं वैधानिक समस्याओं के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श लेने का अधिकार है। जब कभी राष्ट्रपति यह अनुभव करे कि कोई वैधानिक समस्या उत्पन्न हो गई है तो वह समस्या को सर्वोच्च न्यायालय की वैधानिक राय लेने के लिए भेज सकता है। जब राष्ट्रपति की ओर से सर्वोच्च न्यायालय को वैधानिक परामर्श देने के लिए कोई विषय भेजा जाता है तो न्यूनतम 5 न्यायधीशों की बेंच द्वारा उस मामले के प्रति निर्णय करना अनिवार्य है। किसी विषय के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई वैधानिक राय को मानना राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य नहीं हैं।


प्रेसीडेंशियल रेफरेंस

भारत के संविधान में प्रेसीडेंशियल रेफरेंस (अध्यक्षीय संदर्भ) का प्रावधान अनुच्छेद-143 में किया गया है। इस प्रावधान के तहत-यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उपस्थित हुआ है, या उत्पन्न होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकृति का और ऐसे व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना आवश्यक है, तो वह उस प्रश्न पर विचार करने के लिए उसे न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और न्यायालय ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकेगा।

राष्ट्रपति द्वारा प्रतिवेदन प्राप्त होने पर भारत के मुख्य न्यायाधीश एक विशेष संवैधानिक पीठ की स्थापना करते हैं। जिसमें कम से कम 5 न्यायाधीश होते हैं, जो सरकार द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार करते हैं। प्रेसीडेंशियल रेफरेंस के मामले में निर्णय सामान्य निर्णय से भिन्न है, क्योंकि ऐसे मामले में दो पक्षकारों के बीच कोई वाद नहीं होता तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसे निर्देश में दी गई राय सरकार पर आबद्धकारी नहीं होती। यह राय केवल सलाहकारी है और सरकार किसी विषय पर कार्यवाही करने में उस पर विचार कर सकती है, किंतु इस प्रकार की राय के अनुरूप कार्य करने के लिए वह बाध्य नहीं हैं। उच्चतम न्यायालय को यह अधिकार है कि यदि अनुच्छेद-143 के अधीन उससे पूछा गया प्रश्न व्यर्थ या अनावश्यक है तो वह उसका उत्तर देने से मना कर सकता है। वह पूछे गए प्रश्न का उत्तर कभी भी दे सकता है, क्योंकि संविधान में इसके लिए कोई स्पष्ट समय सीमा का उल्लेख नहीं है। अगस्त 2004 में, सरकार ने पंजाब और हरियाणा राज्य के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर प्रेसीडेंशियल रेफरेंस लिया था। इससे पूर्व 1991 में कावेरी जल विवाद, 1993 में राम जन्म भूमि मामला, 1998 में न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले आदि में उच्चतम न्यायालय से सलाह मांग चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के मामले में मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वैकटचेलैया की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सलाह का कोई जवाब देने से मना कर दिया था। दी गई सलाह राज्य सरकार पर आबद्धकारी नहीं होती।

देश में 2-जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक आवंटन के घोटालों के बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह बताया कि प्राकृतिक संसाधनों को बेचने का एकमात्र जरिया नीलामी ही नहीं है। न्यायालय के अनुसार सरकार व्यापक जनहित में इन संसाधनों को अन्य तरीके से भी वितरित कर सकती है। 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2 फरवरी, 2012 के फैसले के संदर्भ में एक प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के उत्तर में शीर्ष अदालत ने 27 सितंबर, 2012 को यह व्यवस्था दी। तात्कालिक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.एच. कपाड़िया की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मामले में स्पष्ट किया कि संविधान यह निर्देश नहीं देता कि प्राकृतिक संसाधनों का वितरण सिर्फ नीलामी से ही किया जाए। यह संवैधानिक रूप से आवश्यक भी नहीं है। अधिकतम राजस्व के लिए नीलामी सर्वश्रेष्ठ तरीका हो सकता है, लेकिन जनता की भलाई के लिए यह उपयोगी नहीं होती है। प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन सरकार की अपनी आर्थिक नीति के तहत् किया जाता है क्योंकि नीति निर्धारण सरकार का विशेषाधिकार है। आवंटन प्रक्रिया में किसी तरह की धांधली होने पर अदालतें हस्तक्षेप करने के लिए स्वतंत्र हैं। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से संवैधानिक स्थिति स्पष्ट हो गई तथा केंद्र सरकार देश की आर्थिक नीतियों के अनुरूप संसाधनों के आवंटन हेतु अब स्वतंत्र है। न्यायालय ने मात्र 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में ही नीलामी की प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी। इसका अर्थ है कि स्पेक्ट्रम के अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक संसाधन जैसे तेल, गैस, कोयला, लोहा, तथा अन्य अयस्क और खनिजों की सरकार बिना नीलामी के बेच सकेगी। 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन के लाइसेंस रद्द करने का निर्णय न्यायालय के इस निर्णय से अप्रभावित रहेगा।


संविधान की व्याख्या तथा सुरक्षा का अधिकार

संविधान की व्याख्या तथा सुरक्षा का अधिकार भी सर्वोच्च न्यायालय को ही प्रदान किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई संविधान की व्याख्या सर्वोपरि एवं सर्वोत्तम मानी जाती है और साथ ही संविधान के अनुच्छेद 187 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालयको न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है अर्थात् सर्वोच्च न्यायालय को अपने द्वारा सुनाए गये निर्णय या दिए गए आदेश का पुनर्विलोकन करने की शक्ति है। यदि संसद द्वारा निर्मित कानून या केंद्रीय कार्यपालिका द्वारा जारी किए गए आदेश संविधान के किसी अनुच्छेद की अवहेलना करते हो, तो सर्वोच्च न्यायालय ऐसे कानून या आदेश की अवैध घोषित कर सकता है। यदि केंद्र सरकार या राज्य सरकार अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर किसी कानून का निर्माण करे तो सर्वोच्च न्यायालय ऐसे कानून को रद्द कर सकता है। संविधान देश का सर्वोपरि कानून है, उनकी सुरक्षा करना सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख वैधानिक कर्तव्य है।

न्यायिक पुनर्विलोकन

न्यायालय द्वारा कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका के कार्यों की वैधता की जाँच करना अथवा न्यायालय द्वारा व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित कानूनों एवं प्रशासनिक नीतियों की असंवैधानिक घोषित करना, जो संविधान के किसी अनुच्छेद का अतिक्रमण करती हो, न्यायिक पुनर्विलोकन कहलाता है। भारत में न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक घोषित किया गया है। इसके अंतर्गत संविधान के किसी भी अनुच्छेद अथवा भागका अतिक्रमण करने वाली अथवा उसके मूलभूत ढांचे पर आघात करने वाली विधियों को विधि-शून्य करार देने का अधिकार देश के सर्वोच्च न्यायालय एवं राज्यों के उच्च न्यायालयों को प्रदान किया गया है।संसद एवं राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित किए गए कानूनों एवं नीतियों की समीक्षा एवं उनकी वैधानिकता की जांच को ही न्यायपालिका का न्यायिक पुनर्विलोकन का अधिकार कहा जाता है।

न्यायिक पुनर्विलोकन के सिद्धांत का उद्भव सर्वप्रथम संयुक्त राज्य अमेरिका की शासन व्यवस्था में लगभग 193 वर्ष पूर्व हुआ। बाद में भारत सहित विश्व की विभिन्न शासन व्यवस्थाओं में भी इस सिद्धांत का अंकुरण हुआ। साधारणतः अधिकांश देशों की शासन व्यवस्थाओं के अंतर्गत न्यायपालिका की पुनर्विलोकन की असाधारण शक्ति संविधान द्वारा प्रदान नहीं की गयी है, बल्कि इसे न्यायपालिका द्वारा अनौपचारिक रूप से हस्तगत किया गया है। शनैः-शनैः न्यायिक पुनर्विलोकन के इस अधिकार ने महती परिपाटी का स्वरूप धारण कर लिया। साथ ही वर्तमान समय में यह संवैधानिक विकास के विभिन्न आयामों में गरिमामय स्थान का परिचायक भी बन गया है। भारतीय संविधान के अंतर्गत भी न्यायिक पुनर्विलोकन सम्बन्धी प्रावधानों का उल्लेख कहीं भी प्राप्त नहीं होता। न्यायिक पुनरीक्षण हेतु आधारभूत तत्वों की वर्तमान स्थिति के कारण इस सिद्धांत का विकास स्वतः ही हुआ है। साधारणतः न्यायिक पुनर्विलोकन हेतु निम्नलिखित शर्ते अपरिहार्य मानी गई हैं-

  1. लिखित एवं कठोर संविधान;
  2. संघ एवं राज्यों के मध्य शक्तियों एवं अधिकारों का विभाजन,तथा;
  3. मौलिक अधिकारों की व्यवस्था

भारत की शासन व्यवस्था उल्लिखित तीनों अपरिहार्य शर्तों की पूर्ति करती है। अतः तत्सम्बन्धी स्पष्ट संवैधानिक प्रावधानों के अभाव में भी यहां न्यायिक पुनर्विलोकन के सिद्धांत का विकास हुआ तथा सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक अवसरों पर इसका प्रयोग करते हुए कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका के उन कार्यों एवं कानूनों को अवैधानिक घोषित किया जो किसी-न-किसी रूप में संविधान के प्रावधानों के प्रतिकूल थे।

सैद्धांतिक दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो हमें सम्पूर्ण संविधान में कहीं भी न्यायिक पुनर्विलोकन के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलेगा किंतु व्यावहारिक रूप से देखने पर यह ज्ञात होता है कि भारतीय संविधान के अनेक प्रावधानों के अंतर्गत न्यायिक पुनर्विलोकन के अधिकार का सुदृढ़ आधार उपलब्ध है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया जा सकता है कि संविधान निर्माता न्यायपालिका को इस प्रकार का अधिकार अथवा शक्ति सौंपने के पक्षधर रहे होंगे। ये संवैधानिक आधार हैं।

अनुच्छेद-13: इस अनुच्छेद के अनुसार यदि राज्य द्वारा निर्मित कोई कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है तो उस कानून को न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा सकता है।

अनुच्छेद-32: इस अनुच्छेद के प्रावधानों के अनुसार मौलिक अधिकारों के हनन की अवस्था में कोई भी भारतीय नागरिक अपने अधिकारों की रक्षार्थ न्यायालय की शरण ले सकता है। इस प्रकार मौलिक अधिकारों के संरक्षण हेतु न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका एवं संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा अथवा अवलोकन किया जा सकता है।

अनुच्छेद-246: इस अनुच्छेद के माध्यम से संघ एवं राज्यों के मध्य विधायी सीमा का उल्लेख किया गया है। संघ अथवा राज्यों द्वारा संविधान द्वारा प्रदत्त अपने विधायी क्षेत्राधिकार को तोड़कर बनाए गए संविधान में उल्लिखित संघ-सूची में अंकित किसी विषय पर कानून बनाए तो यह संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध होगा और सर्वोच्च न्यायालय राज्य द्वारा निर्मित उस कानून को अवैध करार देकर निरस्त करेगा।

अनुच्छेद-254: इस अनुच्छेद के प्रावधानों के अनुसार समवर्ती-सूची में अंकित किसी विषय पर यदि राज्य एवं संघ द्वारा परस्पर विरोधी कानून बनाएं जाएं तो न्यायालय राज्य द्वारा निर्मित कानून को अवैध घोषित करेगा।

अनुच्छेद-368: यह अनुच्छेद संविधान में संशोधन सम्बन्धी अधिकार एकमात्र संघीय संसद को ही प्रदान न करके उसमें राज्य विधानसभाओं की भी निश्चित भूमिका का उल्लेख करता है। संविधान में उल्लिखित प्रक्रिया के अनुसार न होने वाले किसी संशोधन को न्यायालय अवैध घोषित कर सकता है।

अनुच्छेद-132: इस अनुच्छेद के अनुसार ऐसे मामलों में, जिनमें संविधान की व्याख्या का प्रश्न निहित है, सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। अतः स्पष्ट है कि संवैधानिक मामलों पर निर्णय देने का अंतिम अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनेक अवसरों पर न्यायिक पुनर्विलोकन के अधिकार का प्रयोग करते हुए विभिन्न अभियोगों में निर्णय दिए गए हैं। उदाहरणार्थ, गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्वगामी निर्णयों को पलटते हुए मौलिक अधिकारों को अक्षुण्ण घोषित किया। बैंक राष्ट्रीय अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय ने उसमें निहित क्षतिपूर्ति का सिद्धांत अप्रासंगिक होने के आधार पर अवैध घोषित कर दिया। राजाओं के प्रिवीपर्स एवं विशेषाधिकारों को राष्ट्रपति के अध्यादेश के माध्यम से समाप्त करने की भी सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर दिया। अप्रैल 1973 में सरकार की अखबारी कागज नीति के अंतर्गत समाचार-पत्रों हेतु 10 पृष्ठों की सीमा निर्धारित करने सम्बन्धी नीति को सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध घोषित किया था। इसी प्रकार केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अप्रैल, 1973 को 25वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम की धारा-III के द्वितीय खण्ड [अनुच्छेद-39(ख)(ग)] को अवैध घोषित किया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा की संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन तो कर सकती है किंतु संविधान के मूल ढांचे पर आघात करने वाले संशोधनों को न्यायालय असंवैधानिक घोषित कर सकता है। जनवरी 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की नवीं अनुसूची, जो कि न्यायिक समीक्षा से बाहर मानी जाती है, को भी अपनी समीक्षा के दायरे में रखते हुए उसमें सम्मिलित 284 कानून (शुरू में इसमें मात्र 13 कानून थे) की वैधानिकता की जांच हेतु सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की एक पीठ का गठन किया। उल्लिखित उदाहरणों से भारत में न्गायिक पुनर्विलोकन का प्रचलन स्पष्ट हो जाता है।

अभियोगों को स्थानांतरित करने की शक्ति

संविधान के अनुच्छेद 139(क) के अनुसार कुछ अभियोग जिनका संबंध एक या लगभग एक ही प्रकार के कानून के प्रश्नों से है, जो कि एक या एक से अधिक उच्च न्यायालयों के पास निर्णय के लिए पड़े हैं तो सर्वोच्च न्यायालय अपनी पहल के आधार पर या भारत के महान्यायवादी द्वारा दिये अनुरोध-पत्र के आधार पर या अभियोग से संबंधित किसी पक्ष की ओर से किये विनय-पत्र द्वारा संतुष्ट होने पर कि ऐसे प्रश्न असाधारण महत्व वाले महत्वपूर्ण प्रश्न हैंतो सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामले उच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों से अपने पास मंगवा सकता है और उन समस्त अभियोगों का निर्णय स्वयं कर सकता है।

अभिलेख न्यायालय

संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय कों एक अभिलेख न्यायालय माना गया है। इसकी सम्पूर्ण कार्यवाहियां तथा निर्णय प्रमाण के रूप में प्रकाशित किये जाते हैं तथा देश के सभी न्यायालयों द्वारा इन निर्णयों को न्यायिक दृष्टांत के रूप में मानना अनिवार्य है। जब किसी न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का स्थान दिया जाता है तो उसे न्यायालय का अपमान करने वाले व्यक्ति को दण्ड देने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी को भी न्यायालय का अपमान करने के दोष में दण्ड दे सकता है।

अपने निर्णयों पर पुनर्विचार का अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को कानून के समान मान्यता दी जाती है, पंरतु इसका अभिप्राय यह नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय स्थायी रूप में स्थिर रहते हैं और उन्हें बदला नहीं जा सकता। अनुच्छेद 137 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय अपने पहले दिये गये निर्णयों पर पुनर्विचार कर सकता है अर्थात् सर्वोच्च न्यायालय अपने पूर्व निर्णयों को बदल सकता है।

प्रकीर्ण अधिकारिता

संविधान के अनुच्छेद 317; आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 257; एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम, 1969 की धारा 7; सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 138क और केंद्रीय उत्पाद-शुल्क और नमक अधिनियम, 1994 की धारा 35ज में उच्चतम न्यायालय को निर्देश करने के बारे में उपबंध है।

लोकं प्रतिनिधित्व अधिनियम, एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम, अधिवक्ता अधिनियम, न्यायालय अवमान अधिनियम, केन्द्रीय उत्पाद शुल्क और नामक अधिनियम, आतंकवादी क्षेत्र (विशेष न्यायालय) अधिनियम, 1984 और आतंकवादी तथा विध्वंसक क्रिया-कलाप निवारण अधिनियम, 1985 में उच्चतम न्यायालयको अपील किए जाने का उपबंध है। राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम, 1952 के अधीन निर्वाचन अर्जियां सीधे उच्चतम न्यायालय में फाइल की जाती हैं।

विविध कार्य

सर्वोच्च न्यायालय को निम्नलिखित विविध शक्तियां भी प्राप्त हैं-

  1. सर्वोच्च न्यायालय भारत के सभी न्यायालयों के निरीक्षण करने तथा उनके कुशल प्रबंध के लिए नियम बना सकता है।
  2. राष्ट्रपति संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों को तभी अपदस्थ कर सकता है, यदि सर्वोच्च न्यायालय जाँच करके उन्हें प्रमाणित कर दे।
  3. सर्वोच्च न्यायालय विधि विशेषज्ञों के लिए उचित नियम बना सकता है।
  4. सर्वोच्च न्यायालय सभी प्रशासनिक तथा न्यायिक अधिकारियों से सहायता ले सकता है।

अतः सर्वोच्च न्यायालय को प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं। संविधान की सुरक्षा, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को ही प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय के पास देश में विभिन्न न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील करने की विशेष आज्ञा देने का अधिकार इतना व्यापक है कि सभी न्यायिक शक्तियां सर्वोच्च न्यायालय में ही केंद्रित हो सकती हैं। इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के संविधान की व्याख्या करने का अधिकार इतना महत्वपूर्ण है कि संविधान वही रूप धारण कर सकता है, जिस रूप में न्यायाधीश उसकी व्याख्या करें।

सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार
∎ आरम्भिक क्षेत्राधिकार (इसमें वे अभियोग आते हैं, जिन्हें सीधे केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही आरम्भ किया जा सकता है, अन्य न्यायालयों में नहीं);
∎ अपीलीय क्षेत्राधिकार (इसमें वे अभियोग आते हैं, जिनका आरम्भ तो निचले न्यायालयों में होता है, किंतु उनके निर्णयों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है), तथा;
∎ परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार (वैधानिक समस्याओं के सम्बन्ध में मांगे जाने पर न्यायालय राष्ट्रपति को उपयुक्त परामर्श दे सकता है)।

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