सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता पर अपने पूर्व निर्णय को बरकरार रखा The Supreme Court upholds the decision on homosexuality

सर्वोच्च न्यायालय ने 28 जनवरी, 2014 को केंद्र सरकार द्वारा दायर समलैंगिकता के निर्णय पर पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया और आईपीसी की धारा 377 की वैधता की पुष्टि की। समलैंगिक अधिकारों के लिए कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय की निराशाजनक कहा।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 11 दिसंबर 2013 की भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की संवैधानिक वैधता कायम रखते हुए समलैंगिक संबंधों को दंडनीय अपराध ठहराया, जिसमें उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति एस जे मुखोपाध्याय की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 2009 में दिए गए उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें दो वयस्कों के बीच एकांत में आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों की अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों द्वारा दायर की गयी याचिकाओं को स्वीकार कर लिया, जिनमें दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को इस आधार पर चुनौती दी गई थी। कि समलैंगिक संबंध देश के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 में कोई संवैधानिक कमजोरी नहीं है, जो समलैंगिक संबंधों को ऐसा दंडनीय अपराध तःरती है, जिसमे उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

शीर्ष न्यायालय के इस निर्णय के बाद समलैंगिक संबंधों के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधान फिर से बहाल हो गए हैं। पीठ ने कहा कि संसद की धारा 377 को खत्म करने का अधिकार है, पर जब तक दंडात्मक प्रावधान मौजूद हैं, जब तक अदालत इस तरह के कम-संबंधों को वैध नहीं तहरा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय समलैंगिक अधिकार विरोधी निर्णय के विरुद्ध दायर की गई याचिकाओं के बैच पर दिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जुलाई 2009 को आईपीसी की धारा 377 में अपराध ठहराए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था और कहा था कि दो वयस्कों द्वारा एकांत में आपसी सहमति से काम-संबंध बनाना अपराध नहीं होगा। शीर्ष अदालत में इस मामले को लेकर 15 फरवरी, 2012 से नियमित सुनवाई हुई।

केंद्र सरकार ने 13 मार्च, 2012 की सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल किए गए हलफनामे में भारत में कुल 25 लाख पुरुष समलैंगिक और 24 लाख लोग एचआईवी संक्रमित होने का आंकड़ा दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के मुद्दे से संबंधित सुनवाई के तहत् केंद्र सरकार से एचआईवी संक्रमण व समलैंगिक लोगों के बारे में आंकड़ा मांगा था।

केंद्र सरकार के अनुसार 25 लाख पुरुष समलैंगिकों में से 4 लाख समलैंगिक पुरुष एचआईवी के गंभीर खतरे की जद में हैं। साथ ही इनमें से 28 हजार से 31 हजार पुरुष समलैंगिक एचआईवी संक्रमित हो सकते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा दिए गए आंकड़े के अनुसार महाराष्ट्र में 99,533 पुरुष समलैंगिक गंभीर खतरे की जद में हैं, जबकि दिल्ली में इनकी संख्या 28,999 है। आंकड़े के अनुसार एचआईवी संक्रमित 24 लाख लोगों में से 20 लाख वयस्क (15 से 49 वर्ष), 3 लाख बुजुर्ग (49 वर्ष से अधिक) और 1 लाख बच्चे (15 वर्ष से कम आयु के) हैं।

सरकार ने अप्राकृतिक यौनाचार को अपराध बताने वाली धारा-377 को संवैधानिक घोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर 20 दिसंबर, 2013 को पुनर्विचार याचिका दायर की।

सरकार चाहती है कि वयस्कों द्वारा आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंध अपराध न माने जाएं।

दायर याचिका में केंद्र सरकार ने 11 दिसंबर के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुन:विचार के लिए 76 आधार दिए थे।

जिसके लिए उम्र कैद तक की सजा हो सकती है। फैसले से पूर्व धारा-377 का बचाव करने के बाद बिलकुल उलट पुनर्विचार याचिका दायर करने वाली सरकार को सुप्रीम कोर्ट में कई असहज सवालों का सामना करना पड़ सकता है। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और सिखों के धार्मिक संगठन इसका विरोध करेंगे वह अलग है।

सरकार ने हाईकोर्ट में कहा था कि धारा-377 के दुरुपयोग होने के प्रमाण नहीं हैं। जबसे यह अस्तित्व में आई है तब से (150 वर्ष में) सिर्फ 200 मामलों में लोगों को सजाएं दी गई हैं। इसके अलावा समलिंगी सेक्स करने वाले लोगों की संख्या पूरे देश में महज 25 लाख है।

इन लोगों में एड्स का फैलाव भी ज्यादा नहीं है। सुनवाई के समय गृह मंत्रालय ने हाईकोर्ट में दिए गए अपने शपथपत्र को अपना लिया था और कहा था कि विधि आयोग ने अपनी 42वीं रिपोर्ट में धारा-377 को बरकरार रखने की सिफारिश की थी क्योंकि समाज में इसके खिलाफ रोष है। दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद मंत्रिसमूह ने भी उस पर कोई रुख नहीं लिया था और कहा था कि हाईकोर्ट के फैसले में उसे कोई त्रुटि नजर नहीं आती मगर फिर भी सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला देगा उसे माना जाएगा।

अब सरकार के पास दो विकल्प उपलब्ध हैं—(i) कानूनी समाधान के लिए उच्चतम न्यायालय में क्यूरेटिव पेटिशन दायर करना; और (ii) संसद के माध्यम से कानून में संशोधन करना।

भारतीय दंड संहिता की धारा 377:  धारा 377 अप्राकृतिक अपराध; किसी पुरुष, स्त्री या पशु के साथ स्वेच्छा से प्रकृति-विरुद्ध शारीरिक सभागम करने वाले व्यक्ति की आजीवन या दस वर्ष तक की कैद और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

समलैंगिकता पर केंद्र सरकार के तर्क
1. सरकार ने कहा था कि धारा किसी भी असंवैधानिकता से ग्रस्त नहीं है।
2. एक गैरकानूनी कार्य सिर्फ इस वजह से कानूनी नहीं हो जाता कि उसे करने वाले उसे आपसी सहमति से कर रहे हैं।
3. धारा-377 पीड़ित की शिकायत पर ही लागू होती है, इसलिए इसके मनमाने ढंग से इस्तेमाल होने के कोई उदाहरण नहीं है।
4. धारा संविधान के अनुच्छेद 14, 21 (बराबरी और जीवन के अधिकार) के विपरीत नहीं है।
5. धारा सिर्फ प्रकृति के आदेश के खिलाफ किए गए यौनाचार को ही दडित करती है।
6. जनता का सम्मान करते हुए विधायिका ने इस धारा को बरकरार रखने का फैसला किया है।
7. यह कोर्ट का काम नहीं है वह समाज पर असाधारण नैतिक मूल्य लादे।
8. धारा-377 का प्रावधान संविधान में प्रदत्त समता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
9. प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ सहवास को अपराध बनाने वाली धारा ब्रिटिश काल के पुराने कानूनों का रूप है जिसे भारत में 1860 में लाया गया था।
10. धारा की कोई कानूनी शुद्धता नहीं है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के प्रावधानों के मद्देनजर गैर कानूनी है।
11. सुप्रीम कोर्ट खुद कहता है कि एक कानून जो लागू किए जाने के समय न्यायोचित था समय के साथ मनमाना और अनुचित हो सकता है। निर्णय मध्ययुगीन और प्रतिगामी है।
12. शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की इस दलील पर विचार नहीं किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय में किसी प्रकार की कानूनी खामी नहीं है।

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