प्रान्तीय राजवंश: कश्मीर Provincial Dynasty: Kashmir

1315 ई. में शाह मिर्जा नामक स्वात का एक मुस्लिम साहसिक कश्मीर के हिन्दू राजा की नौकरी में नियुक्त हुआ। राजा शीघ्र ही मर गया। 1320 में मंगोल आक्रमणकारी दलूचा ने यहाँ हमला किया। दलूचा के आक्रमण के बाद कश्मीर से हिन्दू शासन का खात्मा हो गया। शाह मिर्जा ने 1339 अथवा 1346 ई. में शम्शुद्दीन शाह के नाम से कश्मीर की गद्दी पर अधिकार कर लिया तथा अपने नाम के सिक्के ढलवाने और खुत्बा पढ़वाने लगा। उसने अपनी नव-प्राप्त शक्ति का बुद्धिमानी से प्रयोग किया। 1339 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसके पुत्र जमशीद, अलाउद्दीन, शहबुद्दीन एवं कुतुबुद्दीन क्रमश: लगभग छियालीस वर्षो तक राज्य करते रहे। 1394 ईं में कुरुबुदीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकन्दर कश्मीर के सिंहासन पर बैठा।

तैमूर के भारत-आक्रमण के समय सिकन्दर राज्य कर रहा था। उसने उसके साथ दूत-विनिमय भी किया, यद्यपि वे दोनों कभी एक-दूसरे से नहीं मिले। वह अपने धर्म के लोगों के प्रति उदार था। फारस, अरब तथा मेसोपोटामिया से बहुत-से प्रकांड मुस्लिम विद्वान् उसके दरबार में एकत्र होते थे। पर उसका सामान्य ढंग उदार नहीं था। माना जाता है कि इसका मंत्री सुहाभट्ट हुआ। सुहाभट्ट ने इस्लाम धारण कर हिन्दुओं को घाटी छोड़ कर जाने का आदेश दिया। कई मंदिर नष्ट कर दिए गए। बाईस वर्ष एवं नौ महीने राज्य करने के पश्चात् 1416 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र अली शाह कुछ वर्षों तक राज्य करता रहा। पीछे उसका भाई शाही खाँ उसे पराजित कर जून, 1420 ई. में जैनुल आबदीन (Zain-ul-Abidin) की उपाधि ले गद्दी पर बैठ गया।

जैनुल आबदीन परोपकारी, उदार एवं ज्ञानी शासक था। उसने स्थानीय अपराधों के लिए ग्रामीण मंडलियों के उत्तरदायित्व के सिद्धान्त को लागू कर अपने राज्य में चोरी एवं आम पर होने वाली डकैती को कम करने की यथाशक्ति कोशिश की। उसने वस्तुओं का मूल्य निश्चित किया और लोगों पर कर के बोझ को हल्का किया। उसके पूर्वगामियों के राज्य-कालों में सिक्कों की धातु में खोट मिलायी गयी थी, पर वह उन्हें फिर पूर्वावस्था में ले आया। उसके सार्वजनिक कार्यों से उसकी प्रजा का बड़ा उपकार हुआ। वह उदार विचारों वाला पुरुष था। वह अन्य धर्मावलम्बियों के प्रति विलक्षण सहिष्णुता प्रदर्शित करता था। उसने अपने पिता के समय में राज्य छोड़कर गये ब्राह्मणों को वापस बुलाया, अपने समाज में विद्वान् हिन्दुओं को प्रविष्ट किया, जजिया कर उठा दिया तथा सब को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। अपनी भाषा के अतिरिक्त उसे फारसी, हिन्दी तथा तिब्बती का अच्छा ज्ञान था। वह साहित्य, चित्रकारी तथा संगीत को प्रश्रय देता था। उसकी प्रेरणा से महाभारत एवं राजतरंगिणी का संस्कृत से फारसी में तथा कई अरबी और फारसी पुस्तकों का हिन्दी भाषा में अनुवाद हुआ। इस प्रकार, इन सभी गुणों के लिए, यथार्थ ही उसका कश्मीर के अकबर के रूप में वर्णन किया गया है, यद्यपि वह उससे (अकबर से) व्यक्तिगत चरित्र के कुछ लक्षणों में भिन्न था। उसके स्थापत्य का एकमात्र नमुना जैन उल-लंका है जो वूलर झील के पास बनाया गया था। यह इतिहास में बड़शाह के नाम से प्रसिद्ध है। 1470 ई. के नवम्बर अथवा दिसम्बर में उसकी मृत्यु हो गयी तथा उसका पुत्र हैदरशाह उसका उत्तराधिकारी बना।

कश्मीर के उत्तरकालीन सुल्तानों का इतिहास नीरस तथा महत्वहीन है। जैनुलआबेदीन की मृत्यु के पश्चात् नाममात्र के शासकों के अधीन, जिन्हें आत्मोत्कर्ष और लूट के उद्देश्यों से प्रधानता चाहने वाले विभिन्न दलों के षड्यंत्रों के चिन्ह स्वरूप गद्दी पर बैठाया गया था, अराजकता आरम्भ हो गयी। 1540 ई. के अन्त में हुमायूँ के एक सम्बन्धी मिर्जा हैदर ने कश्मीर को जीत लिया। वह इस पर सिद्धान्त रूप में हूमायूँ की ओर से, पर व्यवहार में स्वतंत्र शासक की तरह, शासन करता रहा। 1551 ई. मे कश्मीर के सरदारों ने उसे उखाड़ फेंका। उनके षड्यंत्र तथा कलह पुनः आरम्भ हो गये। 1555 ई. के लगभग चक्कों ने कश्मीर की गद्दी को हथिया लिया, पर उपद्रवग्रस्त राज्य को कोई आराम न मिला। अकबर के समय में यह राज्य मुग़ल-साम्राज्य में मिला लिया गया।

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