जवाहरलाल नेहरू के प्रमुख विचार Principal Ideas of Jawaharlal Nehru

राष्ट्रवाद

जवाहर लाल नेहरू आधुनिक भारत के सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। नेहरू ने भारत की सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक चिंतन प्रक्रिया एवं कार्यक्रमों को गहरे रूप में प्रभावित किया। ‘गहन राष्ट्रवाद' नेहरू के उस वैचारिक दृष्टिकोण का अभिन्न अंग था, जो राष्ट्रीय आंदोलन के मंथन से उत्पन्न हुआ था। प्रखर अंतरराष्ट्रीयतावादी होने के बावजूद नेहरू की मान्यता थी कि राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रवाद की धाराएं परस्पर सौहार्दपूर्ण ढंग से मिश्रित हैं। नेहरू की इस मान्यता के पृष्ठ में स्वतंत्रता संघर्ष में भागीदार जनता की इच्छाओं का उत्प्रेरण भी मौजूद था।

नेहरू के अनुसार “प्रत्येक राष्ट्र में राष्ट्रवाद का विशिष्ट स्थान है और उसे प्रसार मिलना चाहिए किंतु इसे आक्रामक तथा अंतरराष्ट्रीय विकास में बाधक नहीं बनने देना चाहिए।” राष्ट्रवाद की भावना राष्ट्रीय उन्नति के लिए अनिवार्य है क्योंकि यह नागरिकों में एकता उत्साह व सहयोगी प्रवृत्ति को जन्म देती है, लेकिन राष्ट्रवाद की कुछ सीमाएं होना जरूरी हैं। नेहरू द्वारा धार्मिक और कट्टर राष्ट्रवाद को नकारा गया। नेहरू के अनुसार संकीर्ण और मतांध राष्ट्रवाद एक अभिशाप है। उन्होंने आक्रामक राष्ट्रवाद की कड़ी आलोचना की, क्योंकि यह विध्वंसात्मक तथा पड़ोसी देशों के दिमाग में भय और संदेह पैदा करने वाला होता है। नेहरू द्वारा ऐसे राष्ट्रवाद को अस्वीकृत किया गया जो विस्तारवाद को प्रोत्साहित करता है। उनके अनुसार राष्ट्रवाद की प्रकृति उदार, सीमित तथा संतुलित होनी चाहिए।

अपनी आत्मकथा में भारतीय राष्ट्रवाद पर अपने विचार प्रकट करते हुए नेहरू ने लिखा है कि “राष्ट्रवाद एक विरोधाभास है जो अन्य राष्ट्रीय समूहों के विरुद्ध घृणा और क्रोध पर पोषित एवं पल्लवित होता है। 1921 के दौरान भारत में यह घृणा एवं क्रोध अंग्रेजों के विरुद्ध व्याप्त था किंतु अन्य राष्ट्रों के प्रति यह असाधारणतः न के बराबर था।” नेहरू ने भारतीय राष्ट्रवाद को यूरोप के फासीवादी राष्ट्रवाद से पूर्णतः पृथक रूप में व्याख्यायित किया। उनके अनुसार “भारतीय राष्ट्रवाद स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक ऐतिहासिक लहर के रूप में जन्मा था जबकि फासीवाद प्रतिक्रिया का अंतिम आश्रय था।”

नेहरू के मतानुसार भारतीय राष्ट्रवाद अपने आरंभ से ही एक व्यापक ‘बुद्धिवाद' की सार्वभौमिक मान्यताओं में मौजूद थीं।

सम्प्रदायवाद और धर्मनिरपेक्षता

जवाहरलाल नेहरू भारतीय पुनर्जागरण की संतान थे। अपने स्वभाव, अध्ययन एवं अभिधारणाओं के कारण वे रूढ़ीवाद, सम्प्रदायवाद तथा कट्टरवाद क्र विरोधी थे। सम्प्रदायवाद के बारे में उनके विचार अभिनव और शिक्षाप्रद थे, विशेषतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब संकुचित धार्मिक मतों, अविवेकपूर्ण प्रतिमानों तथा विखण्डनवादी प्रवृत्तियों द्वारा राष्ट्रत्व को खतरा पैदा किया जा रहा है। नेहरू भारत के प्रथम नेता थे जिन्होंने सम्प्रदायवाद के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक आयामों, उसकी प्रकृति, लक्षणों तथा कारणों को ठीक प्रकार से समझा। अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती वर्षों से ही नेहरू सम्प्रदाय के विरोधी थे, किंतु उस समय ये विरोध साम्प्रदायिक दंगों, धार्मिक असहिष्णुता और कट्टरवाद की सामान्य आलोचना से अधिक नहीं था। उस समय नेहरू द्वारा साम्प्रदायिकता का निदान भी परम्परागत ‘हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई’ के राष्ट्रवादी उपागम तथा स्वराज्य प्राप्ति हेतु हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील में सीमित समझा गया। 1928 के दौरान की गयी नेहरु की राजनितिक यात्राओं तथा विभिन्न युवा एवं विद्यार्थी सम्मेलनों में दिये गये भाषणों में साम्प्रदायिकता को मुख्य निशाना बनाया गया। नेहरू तथा अन्य राष्ट्रवादियों द्वारा स्थापित ‘स्वतंत्र भारत लीग' में किसी भी सम्प्रदायवादी या साम्प्रदायिक संगठन से जुड़े व्यक्ति को सदस्यता प्रदान करने का निषेध किया गया था।

नेहरू द्वारा भी महात्मा गांधी की भांति धर्म की नैतिक अनिवार्यता को व्यावहारिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया गया। नेहरू की भारत के बारे में समझ तथा ऐतिहासिक ज्ञान ने उन्हें भारतीय सभ्यता के उन विशिष्ट लक्षणों से परिचित कराया, जो भारत को एक पृथक पहचान तथा मजबूती प्रदान करते हैं।

नेहरू के अनुसार भारतीय सभ्यता के विशिष्ट लक्षणों में विविधता में मौलिक एकता की उपस्थिति तथा विभिन्न प्रभावों को ग्रहण करने, आत्मसात करने तथा संश्लेषित करने की क्षमता शामिल है। नेहरू का विचार था कि भारत भविष्य में इन विशेषताओं के माध्यम से ही अपनी शक्ति प्राप्त करेगा तथा जो अनुदारवाद और संकीर्णतावाद की प्रवृत्तियों को भी कम करने में सहायक होगी।

नेहरू के दृष्टिकोण में लोकतंत्र, समाजवाद तथा धर्मनिरपेक्षवाद आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे तथा ये संयुक्त रूप से एक ऐसे मजबूत भारत की नीव रखेंगे जो मानव की महत्ता तथा उसके व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास पर आधारित हो और जिसमें गरीबों एवं दलितों के जीवन स्तर में सुधार दिखाई दें।

नेहरू ने सहिष्णुता और संश्लेषण की परंपरा में से समकालीन धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक प्रतिमानों को प्राप्त किया। यही वे परंपराएं थी, जिनके कारण हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता अनेक उतार-चढ़ावों (सैनिक, आर्थिक, सामाजिक) के बावजूद अपना अस्तित्व बनाये रखने में सफल रही थी। नेहरू ने लिखा था कि “हम धर्मनिरपेक्ष भारत के बारे में बात करते हैं, क्या इसका तात्पर्य ऐसे राज्य से है जो सभी प्रकार के मतों को समान अवसर तथा सम्मान देता है, जो एक राज्य के रूप में खुद को किसी भी धर्म या विश्वास से सम्बद्ध नहीं रखता, इस प्रकार यह एक राज्य धर्म बन जाता है....भारत में धार्मिक सहिष्णुता का लम्बा इतिह्रास रहा है। यह धर्मनिरपेक्ष राज्य का मात्र एक पहलू है। भारत जैसे बहुधर्मी देश में धर्मनिरपेक्षता के अभाव में वास्तविक राष्ट्रवाद का निर्माण करना दुष्कर है। कोई भी संकीर्ण सोच जनसंख्या का अनिवार्य रूप से विभाजन करती है और उस स्थिति में राष्ट्रवाद भी अपने सीमित अर्थों में सामने आता है।”

नेहरू का दृष्टिकोण पश्चिमी एवं आधुनिक था। साथ ही वे भारतीय परिस्थितियों की जटिलताओं को भी समझते थे। वे एक अज्ञेयवादी थे जिन्होंने धर्म को मात्र एक सांस्कृतिक प्रेरणा तथा विरासत के रूप में ही स्वीकार किया। वे संगठित धर्म के विरोधी थे। उनके अनुसार “कोई भी संगठित धर्म निरपवाद रूप से एक निहित स्वार्थ बन जाता है, जो अनिवार्यतः प्रगति एवं परिवर्तन विरोधी प्रतिक्रियावादी शक्ति के रूप में परिवर्तित हो जाता है।” नेहरू ने धर्म के राजनीतिकरण का तिरस्कार किया।

नेहरू ने सम्प्रदायवाद के प्रभाव को सबसे अधिक उस जनसमूह पर माना, जिसके न तो अपने कोई निहित स्वार्थ थे और न ही जिसका ब्रिटिश साम्राज्यवाद से कोई लेन-देन था। नेहरू का विश्वास था कि साम्प्रदायिकता एक मध्य वर्गीय प्रपंच है और जब तक मध्यवर्गीय तत्वों का राजनीति पर प्रभाव कायम है, तब तक कोई भी व्यक्ति पूर्णरूपेण साम्प्रदायिकता से दूर नहीं जा सकता।

नेहरू द्वारा साम्प्रदायिकता की आर्थिक पृष्ठभूमि को पहचाना गया किंतु उनका मानना था कि इसका कारण राजनीतिक अधिक था। उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक शत्रुता या विरोध द्वारा साम्प्रदायिकता के प्रसार में बहुत ही अल्प भूमिका निभाई गई है। वर्तमान साम्प्रदायिक प्रश्न धार्मिक नहीं है, यद्यपि कभी-कभी यह धार्मिक भावनाओं का शोषण अवश्य करता है, जो संकटकारी है। नेहरू के अनुसार धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि लोग अपने-अपने धर्मो का त्याग कर दें, बल्कि इसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मो की सुरक्षा करे किंतु दूसरों की कीमत पर किसी धर्म का पक्षपोषण न करे और न ही किसी धर्म को राज्यधर्म के रूप में स्वीकार करे। इसी भावना को महत्व देते हुए भारतीय संविधान में सभी धर्मो को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की गई।

स्वतंत्र भारत में सम्प्रदायवाद के अंत के लिए प्रतिबद्ध नेहरू द्वारा अनंतशेनम आयंगर के माध्यम से संसद में एक संकल्प पारित कराया गया। नेहरू साम्प्रदायिकता को किसी भी वाह्य आक्रमण से अधिक खतरनाक मानते थे। वाह्य आक्रमण के विरुद्ध कोई भी पूरी प्रतिबद्धता के साथ लड़ सकता है किंतु अन्य आक्रमण (साम्प्रदायिकता) अधिक बुरा है क्योंकि यह हमें अपने पूर्ण महत्व और खतरे से अनभिज्ञ रखकर हमारे मस्तिष्क को क्रमिक रूप से अपने शिकंजे में ले लेता है। नेहरू द्वारा विज्ञान एवं तकनीक के प्रचार-प्रसार पर बल दिया गया ताकि बुद्धिवादी और धर्म-निरपेक्ष सहक्तियाँ मजबूती प्राप्त क्र सकें। उन्होंने भाखड़ा नंगल जैसे बांधों को आधुनिक मंदिर, मकबरा या विश्वविद्यालय की संज्ञा दी। उन्होंने धर्म निरपेक्षता को एक आदर्श के रूप में सामने रखा और समाज में उसके प्रचार-प्रसार हेतु गंभीरता से कार्य किया।

नेहरू द्वारा अपने जीवन के अंतिम चरण में अनेक साम्प्रदायिक दंगों की श्रृंखला देखी गयी जो 1961 से 1964 के मध्य उत्तरी भारत तथा उत्तर-पूर्वी भारत के शहरों व कस्बों में व्याप्त थी। 1962 में जबलपुर के दंगों ने नेहरू को पूरी तरह झकझोर दिया और उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया। नेहरू बहुसंख्यकों से अल्पसंख्यकों के प्रति उदारतापूर्वक व्यवहार की आशा करते थे।

वे साम्प्रदायिकता की उत्पत्ति तथा विकास एवं ‘बांटो और शासन करो' की ब्रिटिश नीति के मध्य घनिष्ठ संबंध की स्पष्ट समझ रखते थे लेकिन वे इस प्रचलित और सरलीकत मत को स्वीकार नहीं करते थे कि साम्प्रदायिकता मूल रूप से ब्रिटिश नीतियों की उपज है। उनके अनुसार साम्प्रदायिकता के उदय का कारण भारतीय समाज में मौजूद कुछ निश्चित परिस्थितियों में निहित था। उपनिवेशवादी शासन द्वारा साम्प्रदायिकता को विभिन्न तरीकों से मात्र इसलिए प्रोत्साहित किया गया क्योंकि यह उसके औपनिवेशिक प्रभुत्व की अनेक जरूरतें पूरी करती थी। सम्प्रदायवाद से उन धार्मिक सम्प्रदायों को भी कोई लाभ नहीं पहुंचा, जिनके हितों को नुकसान पहुंचाने या बढ़ाने का यह दावा करता था।

नेहरू ने साम्प्रदायिकता को अपने समय की सबसे खतरनाक प्रवृति के रूप में चिन्हित किया, जिसके साथ सभी मोचों पर लड़ा जाना चाहिए। नेहरू द्वारा सार्वजानिक भाषणों, रेडियों प्रसारणों, संसदीय व्यक्तव्यों, निजी पत्रों तथा मुख्यमंत्रियों को प्रेषित पत्रों के माध्यम से साम्प्रदायिकता के विरुद्ध व्यापक सार्वजनिक एवं निजी अभियान चलाये गये।

धर्मनिरपेक्षता के प्रति नेहरू की प्रतिबद्धता संपूर्ण, व्यापक और शर्तरहित थी। स्वतंत्रता के पश्चात की सर्वाधिक असहज परिस्थितियों में एक धर्मनिरपेक्ष संविधान का निर्माण तथा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और समाज की नींव स्थापना, नेहरू के प्रयासों से ही संभव हो सकी।

समाजवाद

स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही नेहरू पर समाजवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ चुका था। 1917 की रूसी क्रांति ने नेहरू को गहरे रूप में प्रभावित किया। नेहरू का लक्ष्य भारत के लोगों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था। 1936 में नेहरू ने लिखा था कि “में इस बात से अश्वस्त हूं कि विश्व की और भारत की समस्याओं का अंतिम समाधान सभाजवाद में निहित है और में इस शब्द का प्रयोग एक अस्पष्ट मानवतावादी उपाय के बजाय आर्थिक एवं वैज्ञानिक अर्थों में करता हूं। समाजवाद मात्र एक आर्थिक सिद्धांत ही नहीं बल्कि एक जीवनदर्शन भी है और अपने इसी स्वरूप में मुझे प्रेरित करता है।” उनके अनुसार विश्व स्तर पर समाजवाद के विस्तार के पश्चात् ही वास्तविक विश्वशांति एवं व्यवस्था कायम हो सकती है।

नेहरू द्वारा मार्क्सवाद से भिन्न प्रकार के ‘लोकतांत्रिक समाजवाद' की स्वीकार किया गया। लोकतांत्रिक समाजवाद, लोकतंत्र का एक तार्किक एवं वैज्ञानिक उपागम है जो नियोजित कार्यक्रमों के द्वारा आय के समान वितरण पर बल देता है। तत्कालीन भारत में पूंजीवाद की गहरी जड़ों के कारण नेहरू द्वारा आमूलचूल परिवर्तन को कठिन और हानिकारक माना गया। नेहरू का विचार था कि पूंजीवाद और राज्य स्वामित्व के मध्य समझौता करना देश के लिए अधिक हितकर होगा। उनकी आर्थिक विचारधारा इस तथ्य पर आधारित थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सतत उन्नति इसे दो क्षेत्रों-सार्वजनिक एवं निजी में बांटकर ही संभव हैं। ये क्षेत्र स्थायी और सहन वृद्धि के लिए मिलकर कार्य करेंगे। नेहरू के अनुसार समाजवाद राष्ट्रहित में पूंजी का नियंत्रण था न कि निजी उद्यमों पर लादा गया प्राधिकार। अधिनायकवाद की बजाय सामाजिक नियंत्रण में विश्वास रखने वाले नेहरू द्वारा सभी प्रकार के विशेषाधिकारों और सुविधाओं का तिरस्कार किया गया। उन्होंने प्राधिकारवाद से नीचे आकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल दिया। नेहरू का वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक समाजवाद, जो व्यक्तियों को अपेक्षित आजादी और अनुशासन प्रदान करके प्राप्त हो सकता था, सैद्धांतिक एवं आदर्शवादी प्रकार के निरंकुश समाजवाद से भिन्न था। यह एक ऐसे आदर्श समाज की संकल्पना थी, जो भावनात्मक रूप से भारतीय, दृष्टिकोणात्मक रूप से धर्मनिरपेक्ष तथा कार्यात्मक रूप से लोकतात्रिक हो।

नेहरू के मतानुसार उत्पादन ही संपदा है, जिसे व्यापक श्रम शक्ति द्वारा प्रचुरता में प्राप्त किया जा सकता है किंतु इसके लिए श्रम की महत्ता को हर प्रकार से प्रोत्साहन मिलना चाहिए। उन्होंने प्रबंधन कुशलता तथा तकनीकी प्रशिक्षण हेतु शिक्षा के विस्तार पर बल दिया ताकि औद्योगिक विकास की गति को तीव्र किया जा सके।

नियोजन सम्बंधी दृष्टिकोण

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही नेहरू में आर्थिक नियोजन की चेतना का निर्माण हो चुका था, जिसने उन्हें कांग्रेस को उग्रसुधारवाद की दिशा ले जाने की प्रेरणा दी। 1930 के दशक के अंतिम वर्षों में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत में पूंजीवादी व्यवस्था को पूर्णतः समाप्त करना न तो संभव है और न ही अनिवार्य। नेहरू चाहते थे कि पूंजीवादी व्यवस्था में समाजवाद के कुछ मूल सिद्धांतों को अपनाकर क्रमिक समाजवाद दोनों को समायोजित करने की प्रक्रिया पूर्ण कर सके। स्वतंत्रता प्राप्ति से काफी समय पूर्व ही नेहरू ने अनुभव कर लिया था कि उन्नतशील आधुनिक जीवन के लिए आर्थिक पुनर्संरचना एक पूर्वशर्त है, जो मात्र संगठित नियोजन द्वारा ही पूरी की जा सकती है। सामाजिक एवं आर्थिक पुनर्निर्माण हेतु नियोजन का आग्रह, नेहरू के विचारों का मूलभूत तत्व बन गया था। वे नियोजन के माध्यम से की गई पूर्व सोवियत संघ की आर्थिक प्रगति से अत्यधिक प्रभावित थे।

1935 के अधिनियम के अंतर्गत हुए निर्वाचन के उपरांत कांग्रेस ने कई राज्यों में प्रशासन का कार्यभार संभाला, जिससे नेहरू के आर्थिक नियोजन के विचार को नवीन आयाम प्राप्त हुए। 1938 में नेहरू, कांग्रेस द्वारा स्थापित ‘राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने। इस दायित्व को पूरी गंभीरता एवं उत्साह से निभाते हुए नेहरू द्वारा एक व्यापक आधार वाली समिति गठित की गई वैज्ञानिकों की सेवाओं को भी सूचीबद्ध किया गया। किंतु द्वितीय विश्व युद्ध भड़कने तथा नेहरू के जेल चले जाने के कारण यह कार्य अधूरा रह गया। नेहरू के लिए नियोजन, समाजवादी अर्थव्यवस्था का लोकतांत्रिक संरचना में अनिवार्य मिश्रण था। वे समाजवादी पहलू पर अत्यधिक बल देकर समाज के किसी भी वर्ग को भयभीत करना नहीं चाहते थे। इसी कारण नियोजन का लक्ष्य तय करते समय थोड़ी-सी अस्पष्टता और अनिश्चितता मौजूद रही थी। उनके अनुसार “कांग्रेस का आदर्श भारत में एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक राज्य स्थापित करना है। ऐसे स्वतंत्र लोकतांत्रिक राज्य में एक आत्मनिर्भर समाज शामिल है, जिसमें सभी सदस्यों को आत्म अभिव्यक्ति और आत्मसंतुष्टि के समान अवसर उपलब्ध हैं। ऐसे समाज में सभी लोगों को पर्याप्त न्यूनतम सभ्य जीवन स्तर की गारंटी हासिल है ताकि वे समान अवसरों की उपलब्धियों को यथार्थविक बना सकें। यही हमारी योजना की पृष्ठभूमि या आधारशिला होनी चाहिए।”

नेहरू की नियोजन की अवधारणा किसी पूर्वाग्रह या सैद्धांतिक विचार पर आधारित नहीं थीं। वे किसी विचारधारात्मक समझ की बजाय त्वरित परिणामों की अभिलाषा द्वारा निर्देशित थे। उनकी इच्छा मात्र यह थी कि लोगों को स्थायी आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति के पथ पर लाया जाय। उनके अनुसार ‘मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कौन-सा ‘वाद' लोगों को उस रास्ते पर ले जाने में सहायता करेगा। यदि एक चीज असफल हो जाती है तो हम दूसरे प्रयास करेगें।” यही वो व्यावहारिक और लचीली सोच थी, जो नेहरू को उस दृढ़ विश्वास तक ले गयी जिसके अनुसार भारत के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को ही सर्वाधिक उपयुक्त समझा गया।

नेहरू की नियोजन की अवधारणा के अंतर्गत निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की संयुक्त भागीदारी को विकास गतिविधियों के लिए आवश्यक माना गया। अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को राज्य के पूर्ण नियंत्रण में रखा जाना था जबकि अन्य क्षेत्रों को निजी हाथों में। लेकिन निजी क्षेत्र को राज्य की अधीनता में कार्य करना था ताकि वे राष्ट्रीय योजना के उद्देश्यों से विरत न हों। नेहरू के अनुसार “निजी क्षेत्र पर नियंत्रण का विस्तार उसके लाभांशों और मुनाफे तक ही सीमित नहीं होगा बल्कि यह नियंत्रण देश की अर्थव्यवस्था के रणनीतिक बिंदुओं तक व्याप्त होगा।”

राष्ट्रीय योजना के विशाल ढांचे के अंतर्गत निजी उद्यमों को विभिन्न क्षेत्रों  में अपने कार्यों को संचालित करने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाना था। नेहरू के मतानुसार निजी क्षेत्र पर राज्य के नियंत्रण को धीरे-धीरे समय के साथ-साथ बढ़ाना था ताकि मिश्रित अर्थव्यवस्था खुद को परिवर्तित परिस्थितियों में ढालने की पर्याप्त क्षमता जुटा सके।

नेहरू मानते थे कि भारत के लिए किसी अन्य देश के आर्थिक प्रारूप का अनुसरण करना बुद्धिसंगत नहीं था। भारत को ऐसी व्यवस्था का विकास करना चाहिए, जो उसकी प्रकृति और आवश्यकताओं के अनुकूल हो। अतः मिश्रित अर्थव्यवस्था के विचार को सबसे श्रेष्ठ समझा गया। नेहरू ने पूर्णतः आश्वस्त होकर यह घोषित किया कि “परिवर्तन लोकतांत्रिक रूप से नियोजित समष्टिवाद की दिशा में ही निर्देशित होने चाहिए। लोकतांत्रिक समष्टिवाद के अंतर्गत निजी सम्पत्ति के उन्मूलन की बजाय आधारभूत और प्रमुख उद्योगों पर सार्वजनिक स्वामित्व को वरीयता दी जायेगी। विशेषतः भारत में बड़े उद्योगों को ऐसे स्वामित्व में रखा जाना आवश्यक होगा। जबकि लघु और ग्रामीण उद्योगों को सहकारी स्वामित्व में रखा जायेगा। ऐसे लोकतांत्रिक समष्टिवाद हेतु सतर्क और निरंतर नियोजन एवं लोगों की बदलती जरूरतों के साथ समायोजन की आवश्यकता होगी।”

लेकिन भारत की वर्तमान परिस्थितियों में नियोजन एवं आर्थिक विकास के बावजूद गरीबी की समस्या का अंत नहीं किया जा सका है। नियोजन के श्रेष्ठ प्रयासों के पश्चात् भी समाज का एक बहुत बड़ा भाग सुनिश्चित न्यूनतम जीवन स्तर को प्राप्त कर पाने में असमर्थ है। निजी पूंजी की त्वरित वृद्धि एवं नियोजन की अनुचित राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के फलस्वरूप हुए राष्ट्रीय संसाधनों के विशाल अपव्यय ने गरीब और अमीर के बीच की खाई को निरंतर बढ़ाया है।

हालांकि यह नियोजन की अवधारण नहीं है, जो असफल सिद्ध हुई है बल्कि अधिकांश मामलों में विफलता का उत्तरदायी निकृष्ट कार्यान्वयन है जिसने असंतुलित विकास एवं एकपक्षीय वृद्धि को विस्तारित किया है।

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