भारत का सफल मंगल अभियान India's successful Mars Mission

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने 24 सितंबर की सुबह पहले ही प्रयास में अपना मंगलयान अंतरिक्ष में स्थापित कर लिया है| इस अभियान की सफलता 24 मिनट के उन आखिरी चरणों पर निर्भर थी जिसमे 300 दिनों से सुप्त इंजिनों (एक 440 न्यूटन लिक्विड अपोजी मोटर-440 Newton Liquid Apogee Motor और 8 छोटे इंजन) को चालू करना था और यान की गति 1099 मी./से. तक करनी थी जिससे यान खुद ही मंगल के गुरुत्वाकर्षण से उसकी अंडाकार कक्षा में स्थापित हो जाये| शुबह लगभग 8:30 पर मंगलयान से इसरो को सिग्नल मिला और यह सुनिश्चित हो गया की यान मंगल की कक्षा में स्थापित हो गया है| इन संकेतो को यान से पृथ्वी तक आने में करीब 12 मिनट लगते हैं| अब यान मंगल की अंडाकार कक्षा में परिक्रमा कर जिसका मंगल से निकटतम बिंदु (Periapsis) 421.7 किमी. और दूरस्थ बिंदु (Apoapsis) 76993.6 किमी. है| मंगल ग्रह के भूमध्यवर्ती  कक्षा के साथ यान का झुकाव, 150 डिग्री है| इसे मंगल की एक परिक्रमा पूरी करने में 72 घंटे, 51 मिनट और 51 सेकंड लगते हैं|

22 अक्तूबर 2008 को प्रक्षेपित चंद्रयान-1 की सफलता से मंगल अभियान की नींव पड़ी| सन 2010 में एक कार्यदल ने यह निष्कर्ष दिया की भारत मंगल पर एक मानव रहित वैज्ञानिक अभियान भेजने में समर्थ है|

3 अगस्त 2012 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने इस अभियान को मंजूरी दे दी| यह मंजूरी नासा के क्यूरोसिटी रोवर के मंगल ग्रह पर उतरने के 96 घंटे पहले मिली| क्यूरोसिटी रोवर 6 अगस्त 2012 को मंगल ग्रह पर उतरा था

मंगलयान अभियान की कुल लागत 450 करोड़ रुपये है, जो की किसी भी देश के मंगल अभियान में सबसे किफायती है| यह अमेरिकी मंगल मिशन से 10 गुना कम है|

मार्स आर्बिटर अंतरिक्षयान (Mars orbiter Spacecraft) का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड (Hindustan Aeronautics Limited-HAL) ने किया है| 2012 में निर्मित इस यान के निर्माण में 3 महीने का समय लगा| इस यान की कीमत पूरी परियोजना की लगत की 10% से भी कम है| मार्स आर्बिटर अल्युमिनियम और कार्बन फाइबर (Composite Fiber Reinforced Plastic -CFRP) से बना है| इस यान के निर्माण में किसी भी विदेशी सामग्री का उपयोग नहीं किया गया है| इस यान का कुल वज़न 1337 किग्रा. है|

भारत के अंतरिक्ष शोध कार्यक्रमों में यह एक ऐतिहासिक घटना है|

मंगल अभियान के लक्ष्य Mission Objectives

तकनीकी लक्ष्य  Technological Objectives: ऐसे मार्स आर्बिटर अंतरिक्षयान का डिज़ाइन तैयार करना जो की अंतरिक्ष में 300 दिनों की यात्रा करने में सक्षम हो और इसके बाद मंगल की कक्षा में प्रवेश कर सके|

सुदूर अंतरिक्ष संचार, नेविगेशन, मिशन परियोजना और प्रबंधन|

अपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए स्वतः चालित तकनीक विकसित करना|

वैज्ञानिक लक्ष्य Scientific Objectives: स्वदेशी वैज्ञानिक उपकरणों से मंगल की सतह का अन्वेषण, आकृति, जमीनी संरचना, खनिज सम्पदा और मंगल पर निवास के लिए वातावरण का अध्ययन करना|

मंगल के वायुमंडल में जीवन के संभावनाओ के लिए अति आवश्यक मीथेन का पता लगाना, साथ ही इस बात का पता लगाना की मंगल का वायुमंडल वर्तमान में इतनी विरल और शुष्क अवस्था में कैसे पहुँच गया| इसरो यह निर्धारित करने का कम भी कर रहा है की मंगलयान धूमकेतु C/2013 A1 की वैज्ञानिक माप एकत्र कर सके| यह धूमकेतु 19 अक्तूबर 2014 को मंगल के बहुत नजदीक से गुजरेगा|

पेलोड Payloads: इस अभियान के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये 5 पेलोड भेजे गए गए है इन पेलोड में एक कैमरा, दो स्पेक्ट्रोमीटर, एक रेडियोमीटर और एक दीप्तिमापी| इन सभी का वज़न लगभग 15 किलो है|

लाईमन अल्फा फोटोमीटर (Lyman Alpha Photometer -LAP) : यह अब्जार्प्शन सेल फोटोमीटर है| यह लाईमन अल्फा उत्सर्जन से ड्यूटीरियम और हाइड्रोजन की सापेक्षिक प्रचुरता का अध्ययन करता है| ड्यूटीरियम और हाइड्रोजन बहुतायत अनुपात (Deuterium to Hydrogen abundance Ratio) मापने की प्रक्रिया द्वारा इस बात का अध्ययन किया जाता है की मंगल ग्रह पर पानी की कमी कैसे हो गयी|

मीथेन सेंसर फार मार्स (Methane Sensor for Mars - MSM) : इस उपकरण को मंगल ग्रह के वातावरण में मीथेन (CH4) गैस का अध्ययन करने के लिए लगाया गया है|

मार्स एक्सोस्फोरिक न्यूट्रल कॉंपोज़िशन एनलाइसर (Mars Exospheric Neutral Composition Analyzer - MENCA) : यह एक मास स्पेक्ट्रोमीटर है जो 1-3000 amu तक न्यूट्रल कम्पोजीशन का अध्ययन करने में सक्षम है|

मार्स कलर कैमरा (Mars Color Camera -MCC) : तीन रंगों वाला यह कैमरा  मंगल ग्रह की सतह की संरचना के बारे सूचनाएं देने में सक्षम होगा| यह वहां के मौसम की निगरानी भी करेगा और मंगल के दोनों उपग्रहों का अध्ययन करने में भी उपयोगी साबित होगा|

थर्मल इन्फ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर (Thermal Infrared Imaging Spectrometer -TIS) : यह दिन और रात में तापीय उत्सर्जन, खनिज सम्पदा और मिट्टी के प्रकार का अध्ययन और मंगल की सतह की संरचना और इसके अवयवों का अध्ययन करने में सक्षम है|

मंगल ग्रह का सुनहरा सफ़र

05 नवम्बर 2013 – दोपहर 2:38 पर आन्ध्र प्रदेश में श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुवीय प्रक्षेपण यान PSLV C-25 द्वारा मंगल यान का प्रक्षेपण, 44 मिनट बाद यान पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर लिया गया|

30 नवम्बर 2013 – सबसे जोखिम भरी प्रक्रिया के अंतर्गत मंगल यान को पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकला गया इसके साथ ही सूर्य की कक्षा में मंगल यान की 10 महीने की 68 करोड़ किमी. लम्बी  यात्रा शुरू हुई| यान की गति को 648 मी. प्रति सेकण्ड बढाकर इसे पृथ्वी की आखरी कक्षा से बहार निकाला गया|

02 दिसंबर 2013 – यान करीब 3.85 लाख किमी. दूर चंद्रमा की कक्षा से भी बाहर निकल गया|

10 दिसंबर 2013 – यान के प्रक्षेपपथ में सफलतापूर्वक सुधार किया गया इस समय यान पृथ्वी से करीब 29 लाख किमी. की दूरी तय कर चुका था|

08 अप्रैल 2014 – यान आधी दूरी यानि 33.75 करोड़ किमी की यात्रा पूरी कर चुका था|

21 जुलाई 2014 – यान ने अपना 80% सफ़र यानि 54 करोड़ की यात्रा पूरी कर चुका था|

15 अगस्त 2014 – 90 प्रतिशत सफ़र पूरा हुआ|

10 सितंबर 2014 – लगभग 64.3 करोड़ किमी. की दूरी तय|

17 सितंबर 2014 – यान को मंगल की कक्षा में प्रवेश कराने के लिए कमांड अपलोड|

22 सितंबर 2014 – यान का मंगल ग्रह के गुरुत्वीय प्रभाव के क्षेत्र में प्रवेश| मुख्य इंजिन का 4 सेकंड का सफल परीक्षण|

11 नवम्बर 2013 को यान को पृथ्वी की कक्षा से निकालने की चौथी प्रक्रिया में भी दिक्कत आयी, इससे पहले के 3 चरण सफल रहे थे| चौथी प्रक्रिया में यान को 1 लाख किमी. के दूरस्थ बिंदु को प्राप्त करने में असफलता हाथ लगी थी| तब इसरो ने कहा था यान सामान्य है और इसरो ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए दूसरे दिन योजना बनाई|

30 नवम्बर 2013 की रात्रि 12:49 बजे वैज्ञानिको ने जब मंगल यान की सर्वाधिक जोखिम वाली ट्रांस मार्स इंजेक्शन प्रक्रिया (यान को पृथ्वी की कक्षा से बाहर ले जाने की प्रक्रिया) शुरू की, उस समय तरल इंधन को 23 मिनट तक दगा जाना था| लेकिन इससे कुछ सेकंड पहले इसरो का मार्स आर्बिटर से संपर्क टूट गया था, जबकि वैज्ञानिको ने इंजिन को चालू कर दिया था, इसके पश्चात् 5 मिनट तक वैज्ञानिकों को कोई भी डाटा प्राप्त नहीं हुआ था, इससे नियंत्रण कक्ष में एकदम सन्नाटा छा गया| जल्द ही इसरो का संपर्क यान से पुनः हो गया|

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