चोल साम्राज्य Chola Empire

चोल राज्य बहुत प्राचीन राज्य था। इसका उल्लेख महाभारत, मेगास्थनीज के यात्रा-वृत्तांत और अशोक के शिलालेखों से प्राप्त होता है। संगम साहित्य में अनेक चोल शासकों का वर्णन है। इस राज्य में मद्रास, उसके आसपास का क्षेत्र और कर्नाटक के कुछ क्षेत्र सम्मिलित थे। संगम साहित्य में करिकाल को चोलवंश का संस्थापक कहा गया है। उसका अभ्युदय-काल दूसरी शताब्दी मानी जाती है। उसने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए सक्रिय प्रयास किए। उसकी बढ़ती हुई शक्ति से चिन्तित पाण्ड्यों और चेरों आदि ने उसके विरुद्ध संघ बनाया किन्तु करिकाल के सामने वे ठहर न सके। उसने अपनी पुत्री आदिनन्दि का विवाह चेर राजकुमार अति के साथ कर दिया था। करिकाल एक सफल विजेता होने के साथ ही कुशल शासक भी था। उसके शौर्य की गाथाओं को कवियों ने ओजस्वी स्वर दिए हैं। पट्टूपट्टू नामक काव्य-संग्रह में उसके शौर्य की गाथाएं संकलित हैं। करिकाल के बाद उसका पुत्र नेद्युदिकिल्ल राजसिंहासन पर बैठा। वह एक अशक्त शासक था। फलत: उसके शासन-काल में चोल राजवंश पतन के गर्त्त में चला गया। उसे पतन के गर्त्त से निकलने में लम्बा समय लगा। नवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में उस राजवंश का पुन: उत्कर्ष हुआ। इसका श्रेय चोलवंशी शासक विजयालय को है। विजयालय पल्लवों का एक सामन्त था। पल्लवों और पाण्ड्यों के युद्ध के समय उसने तंजौर पर अधिकार करके अपनी राजनैतिक शक्ति स्थापित की और तंजौर को अपनी राजधानी बनाया। वहां उसने निशुम्भसूदनी का मंदिर बनवाया। इस प्रकार 850 ई. के आसपास उसने स्वतन्त्र चोल राज्य की स्थापना की। उसे चोल साम्राज्य का द्वितीय संस्थापक भी कहा जाता है। विजय के अवसर पर उसने नरकेशरी की उपाधि धारण की थी।

आादित्य प्रथम (871-907)

विजयालय के बाद उसका पुत्र आदित्य प्रथम 871 ई. में राजा बना। उसने चोल राज्य की शक्ति और सीमा का विस्तार किया। उसने कोंदराम की उपाधि ली। आदित्य प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र परान्तक प्रथम शासक बना। उसने 907 ई. से 955 ई. तक राज्य किया और दक्षिणी भारत में चोल शक्ति को बढ़ाया। उसने पाण्ड्य राजा का राज्य जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और इस विजय के उपलक्ष्य में मदुराई कोण्ड की उपाधि धारण की। परान्तक प्रथम को राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय से घमासान युद्ध करना पड़ा और परान्तक प्रथम पराजित हुआ और चोल राज्य के कुछ भागों पर कृष्ण तृतीय का अधिकार हो गया। इस पराजय से चोल शक्ति को आघात पहुंचा। उसका उत्तराधिकारी गुंडारादित्य और फिर परांतक द्वितीय हुआ। परांतक द्वितीय उत्तम चोल के नाम से भी जाना जाता है।

राजराज महान् (985-1014 ई.)

चोल साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक राजराज महान् था जिसने 985 ई. से 1014 ई. तक राज्य किया। राजराज एक महान् विजेता और साम्राज्य निर्माता था। उसने वेगी के पूर्वी चालुक्य राजा, मदुरा के पाण्ड्य राजा और मालाबार तट के सामंतों को हराकर अपने अधीन किया। उसने लंका का उत्तरी भाग जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। उसने उनकी राजधानी अनुराधापुर को नष्ट कर दिया। लंका के जीते भाग का मामुंडीचोल पुरम नाम रखा। इसी विजय की खुशी में जगन्नाथ ने सिरुद धारण किया। उसने नाइ राजधानी पोलोन्नरुवा बनाई जिसका बाद में नाम जन्जत्मंग्लम रखा। उसने कलिंग को विजय किया। उसने एक शक्तिशाली जहाजी बेड़े का निर्माण किया और समुद्र-तट पर अपना अधिकार स्थापित किया। इस बेड़े द्वारा उसने लक्षद्वीप और मालद्वीप टापुओं पर अधिकार किया और पूर्वी द्वीपसमूह पर आक्रमण किया। उसने वेंगी को जीतकर अपने पक्ष के शक्ति वर्मा को वहां का शासक बनाया। ऐसा करने में उसका प्रयोजन यह था कि चोल वंश के विरुद्ध पश्चिमी तथा पूर्वी चालुक्य मिलकर एक न हो। को और घनिष्ठ बनाने के लिए उसने अपनी पुत्री का विवाह शक्ति वर्मा के छोटे भाई से कर दिया।

राजराज के राज्यकाल में चोल साम्राज्य समस्त सुदूर दक्षिण में फैल गया। इसके अतिरिक्त लक्षद्वीप, मालद्वीप और उत्तरी लंका का भाग उसके साम्राज्य में शामिल था। राजराज एक महान् विजेता ही नहीं था, बल्कि एक योग्य प्रशासक भी था। उसने अपने राज्य में स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन दिया। वह कलाप्रेमी था और विद्वानों का आश्रयदाता था। वह शिव का भक्त था और उसने भव्य शिव मन्दिरों का निर्माण कराया। उसने तंजौर में राजराजेश्वर शिव मन्दिर का निर्माण कराया। राजराज प्रथम शैव था जिसने शिवपाद शेखर की उपाधि ली। रविकुलमाणिक्य, मुम्माडिचोलदेव, चोलमार्तण्ड आदि अन्य उपाधियां थी। अपने शासन के दौरान उसने ऐतिहासिक प्रशस्ति के साथ चोल अभिलेखों का निर्माण करवाने की प्रथा शुरू की। उसने सुमात्रा के विजय साम्राज्य के सम्राट् भार विजयोतुंग वर्मन को नागपट्टम में चूड़ामणि बौद्ध विहार बनाने की आज्ञा दी।

राजेन्द्र प्रथम (1014-1044 ई.)

राजराज महान् के पश्चात् उसका पुत्र राजेन्द्र प्रथम राजा बना। राजराज ने अपने शासन-काल में ही उसे युवराज घोषित कर दिया था और उसने प्रशासन और सैनिक अभियानों का अच्छा अनुभव प्राप्त किया था। उसने 1044 ई. तक राज्य किया और अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य को और भी अधिक सुदृढ़ एवं विस्तृत बनाया। राजराज ने उत्तरी लंका को जीतकर अपने राज्य में मिलाया था, परन्तु राजेन्द्र प्रथम ने सन् 1018 ई. में समस्त लंका को जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसके राज्यकाल में लक्षद्वीप और मालद्वीप पर चोलों का अधिकार बना रहा। पश्चिमी चालुक्य राजा जयसिंह द्वितीय के साथ उसका संघर्ष हुआ, परन्तु राजेन्द्र प्रथम को कोई निर्णायक सफलता नहीं मिली और तुगभद्रा तट के प्रदेशों पर जयसिंह द्वितीय का अधिकार बना रहा। राजेन्द्र प्रथम ने एक विशाल सेना पूर्वी भारत की ओर भेजी जो उड़ीसा होते हुए बंगाल पहुंची और गंगा प्रदेश में अपनी विजय पताका फहराई। इस विजय की खुशी में उसने गगैकोंड चोलपुरम नामक नई राजधानी की स्थापना कर गंगैकोंडचोल की उपाधि ग्रहण की। उसकी अन्य उपाधियां थीं मुण्डिकोण्ड तथा पण्डित। सिंचाई हेतु चोलगंगम नामक झील बनवायी। उसने मुंडीकोंड चोल, उत्तम चोल एवं पंडित चोल की उपाधि ली। उसने पूर्वी द्वीपसमूह में भी सफल सैनिक अभियान भेजे।

राजेन्द्र प्रथम को अपने शासन-काल के अन्तिम चरण में आन्तरिक विद्रोहों का सामना करना पड़ा। लंका ने अपनी स्वतंत्रता के लिए विद्रोह कर दिया। पाण्ड्य और केरल राज्यों में भी विद्रोह हो गया परन्तु राजेन्द्र प्रथम के पुत्र राजाधिराज प्रथम ने इन विद्रोहों को कुचल दिया।

राजेन्द्र प्रथम के समय में चोल साम्राज्य का बहुत विस्तार हुआ। 1044 ई. में उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र राजाधिराज प्रथम शासक बना। उसने 1052 ई. तक राज्य किया। चालुक्य शासक सोमेश्वर को पराजित कर उसने विजय राजेन्द्र तथा वीराभिषेक की उपाधि ली। उसने अश्वमेध यज्ञ किया जो प्राचीन भारत में यज्ञ का अंतिम उदाहरण है। 1052 ई. में राजाधिराज तथा सोमेश्वर चालुक्य नरेश सोमेश्वर की सेनाओं से कोप्पम में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में राजाधिराज वीरगति को प्राप्त हुआ किन्तु उसके अनुज राजेन्द्र द्वितीय ने चालुक्यों के साथ युद्ध जारी रखा और अन्त में सोमेश्वर को परास्त करने में सफल हुआ। राजेन्द्र द्वितीय (1052-1063 ई.) का संघर्ष चालुक्यों से चलता रहा। सिंहल द्वीप के शासन से भी उसका संघर्ष हुआ। राजेन्द्र द्वितीय अपने साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा करने में सफल रहा। वीर राजेन्द्र प्रथम (1063-1070 ई.) राजेन्द्र द्वितीय का उत्तराधिकारी हुआ। उसने चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम को पराजित किया। चोलों और चालुक्यों का दूसरा संघर्ष कुण्डलशरगम नामक स्थान में हुआ। वीर राजेन्द्र ने इस विजय के उपलब्धि में तुंगभद्रा नदी के तट पर अपना विजय-स्तम्भ स्थापित किया। उसने चालुक्यों पर विजय के उपलक्ष्य में आइवभल्लकुलकाल की उपाधि धारण की। उसने भूमिदान द्वारा चालीस हजार विद्वानों तथा वेदशास्त्री ब्राह्मणों को सन्तुष्ट किया। उसके समय में बुद्ध भित्त ने वीर सोवियम नामक तमिल ग्रन्थ की रचना की। 1070 ई. में वीर राजेन्द्र की मृत्यु के उपरान्त अधिराजेन्द्र सिंहासन पर बैठा।

वीर राजेन्द्र की मृत्यु के उपरान्त अधिराजेन्द्र सिंहासन पर बैठा किन्तु उसकी विद्रोहियों ने हत्या कर दी। इस प्रकार उसकी हत्या से चोल नरेशों की प्रधार परम्परा का अन्त हो गया। उसकी मृत्यु के उपरान्त राजराज प्रथम का प्रपौत्र कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1118 ई.) राज सिंहासन पर बैठा। उसने पाण्ड्य राज्य और केरल के नरेश को पराजित किया। उसने अपनी पुत्री का विवाह सिंहल युवराज से किया। इसके साथ ही उसने कन्नौज, कम्बोज, चीन तथा वर्मा से अपने कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किए। उसने 1077 ई. में 72 व्यापारियों को चीन भेजा था। उसके शासन में चोल साम्राज्य की समृद्धि को नए आयाम मिले। उसने दो  बार भूमि की, पैमाइश कराई। उसने करों को हटाकर शुगतविर्त्त (करों को हटाने वाला) की उपाधि धारण की। उसके समय में कांची की भी बडी उन्नति हुई। उसके समय में गंगकोड चोलपुरम् चोल राज्य की राजधानी थी।

कुलोत्तुंग प्रथम के उपरान्त क्रमशः विक्रम चोल कुलोत्तुंग द्वितीय, राजराज द्वितीय, राजाधिराज द्वितीय कुलोत्तुंग तृतीय, राजराज तृतीय तथा राजेन्द्र तृतीय सिंहासन पर बैठे। इनका राजत्वकाल लगभग सौ वर्षों तक रहा। परन्तु चोल साम्राज्य उत्तरोत्तर पतन के गर्त्त में गिरता गया। इसका मुख्य कारण आन्तरिक कलह तथा काकतीयों, होयसलों और पाण्ड्यों के आक्रमण थे। अन्त में 1258 ई. में पाण्ड्य शासक सुन्दर ने चोल नरेश राजेन्द्र तृतीय को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार चोल राज्य के स्वतंत्र अस्तित्व का अन्त हो गया।

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