बाल कल्याणकारी नीतियां एवं कार्यक्रम Child Welfare Policies and Programs

बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीति 22 अगस्त, 1974 को अंगीकृत की गयी थी। इसके अंतर्गत प्रावधान है कि शासन बच्चों को उनके जन्म से पूर्व और उसके बाद तथा उनके पूरे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए बढ़ती उम्र के दौरान उपयुक्त सेवाएं उपलब्ध कराएगा। इसके अंतर्गत सुझाये गये उपायों में एक समग्र स्वास्थ्य कार्यक्रम, माताओं और बच्चों के लिए पूरक पोषण, 14 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, शारीरिक शिक्षा और मनोरंजक गतिविधियों को बढ़ावा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे कमजोर वर्गों के बच्चों की विशेष देखभाल शामिल है। विद्यमान आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुसार इस नीति की समीक्षा की जाती है।

बच्चों के लिए राष्ट्रीय घोषणापत्र: 9 फरवरी, 2004 को अधिसूचित यह घोषणापत्र सरकार का बच्चों के लिए एजेण्डा है। इसमें बच्चों के उत्तरजीविता के अधिकार, स्वास्थ्य और पोषण, जीवन स्तर, खेल और आराम, शुरुआती बाल्यकाल में देखभाल, शिक्षा, बालिकाओं की सुरक्षा किशोरों का सशक्तिकरण, समानता,जीवन और स्वच्छंदता, नाम और राष्ट्रीयता, अभिव्यक्ति की आजादी, एकत्रीकरण की छूट, परिवार में होने की आजादी, आर्थिक शोषण और सभी प्रकार की बुराइयों से सुरक्षा जैसी सरकार की प्रतिबद्धताओं पर जोर दिया गया है। बच्चों के प्रति शासन और समुदाय को जिम्मेदारियों के साथ-साथ परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति बच्चों के कर्तव्यों का भी इसमें जिक्र है।

एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) योजना: एकीकृत बाल विकास सेवा वर्ष 1975 में केंद्र प्रायोजित योजना के तौर पर शुरू की गई। इसके उद्देश्य हैं-

  1. छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं के पौष्टिक आहार तथा स्वास्थ्य स्तर में सुधार
  2. बच्चों के समुचित मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और सामाजिक विकास की नींव डालना
  3. बाल मृत्युदर, कुपोषण और स्कूली शिक्षा अधूरी छोड़ने वाले बच्चों की दर में कमी लाना
  4. बाल विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न विभागों के बीच नीति तथा कार्यान्वयन में कारगर तालमेल
  5. स्वास्थ्य तथा पोषाहार, शिक्षा की समुचित व्यवस्था करके, माताओं तथा बच्चों की स्वास्थ्य व पोषाहार संबंधी जरूरतों की देखरेख की क्षमता बढ़ाना।

योजना छह साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती और स्तनपान करने वाली माताओं को निम्नलिखित सेवाएं प्रदान करती है-

  1. अनुपूरक पोषण
  2. प्रतिरक्षण
  3. स्वास्थ्य जांच
  4. पोषण व स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा
  5. संदर्भ सेवाएं
  6. स्कूली शिक्षा से पूर्व गैर-औपचारिक शिक्षा

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को उनकी योग्यता और अनुभव के आधार पर ₹ 2958 से ₹ 3063 प्रतिमाह की मानद राशि दी जाती है। आंगनवाड़ी सहायिकाओं को ₹ 1500 प्रतिमाह दिये जाते हैं। इसके अतिरिक्त राज्य/संघ प्रदेश अपने संसाधनों से अतिरिक्त कार्य के लिए अन्य वितीय लाभ भी देते हैं।

खाद्य और पोषाहार बोर्ड: खाद्य और पोषाहार बोर्ड (एफएनबी) महिला और बाल विकास मंत्रालय का हिस्सा है जो अपने देश के लोगों में पोषण स्थिति में सुधार लाने के लिए नए उपाय करने हेतु नीतियां बनाता है और रणनीतियां विकसित करता है। यह पोषाहार की शिक्षा देकर, कम कीमत वाले स्थानीय स्तर पर उपलब्ध खाद्य को प्रोत्साहित करके, गृह आधारित प्रसंस्करण के माध्यम से फलों और सब्जियों के संरक्षण और पोषण पर स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित करके लोगों की पोषाहार संबंधी खान-पान की आदतों में सुधार पर बल देता है।

केंद्र में एफएनबी की एक तकनीकी शाखा है तथा चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं। इसकी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में क्वालिटी कंट्रोल प्रयोगशालाएं हैं और 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 43 सामुदायिक खाद्य और पोषण विस्तार इकाइयां हैं।

राष्ट्रीय पोषाहार नीति को वर्ष 1993 में प्रतिपादित किया गया और वर्ष 1995 में अनुवर्तन के रूप में राष्ट्रीय कार्रवाई योजना को विकसित किया गया। इस कार्रवाई योजना के तहत् सरकार के विभिन्न क्षेत्रों की पहचान की गई ताकि वे कुपोषण से लड़ने के लिए समन्वित कार्रवाई कर सकें। शिशु और बच्चों के भोजन पर राष्ट्रीय दिशा-निर्देश तय किए गए और शिशु दुग्ध विकल्प, दुग्धपान बोतल और शिशु आहार (उत्पादन,आपूर्ति और वितरण) अधिनियम, 1992 का कार्यान्वयन और वर्ष 2003 में इसके संशोधन (आईएमएस अधिनियम) को खाय और पोषाहार बोर्ड को सींपा गया।

कार्यक्रम का लक्ष्य मास्टर प्रशिक्षकों को तैयार करना था, जैसे मेडिकल ऑफिसर्स, चाइल्ड डेवलपमेंट प्रॉजेक्ट ऑफिसर्स, साथ ही फील्ड स्तर के अधिकारियों को तैयार करना। अनेक प्रकार के पोपाहार जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसके तहत गृह आधारित फलों और सब्जियों के प्रसंस्करण आदि के बारे में जानकारी दी गई। इससे किशोरियों और महिलाओं में कौशल विकास को भी बढ़ावा मिला। कम मूल्यवाली पौष्टिक आहार की विधियों को प्रदर्शित करके, बेहतर पोषण हासिल करने का तरीका बताया गया। अनुपूरक पोषाहार की पौष्टिकता और स्वास्थ्य एवं पोषण के संबंध में शिक्षा के लिए आईसीडीसी के साथ नियोजन भी स्थापित किए गए।

शिशु और बच्चों के भोजन, संतुलित आहार, अल्पाहार और कुपोषण से होने वाली कमियों की रोकथाम, खाद्य संबंधी गंभीर गैर संचरणीय बीमारियों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर फिल्म, ऑडियो और वीडियो स्पॉट्स, रेडियो प्रोग्राम भी प्रचार का अंग हैं। नियमित स्तर परपोषाहार पर प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं और विश्वस्तनपान सप्ताह, राष्ट्रीय पोषाहार सप्ताह, विश्व खाद्य दिवस मनाए जाते हैं।

एफएनबी के विभिन्न प्रकाशन और वॉल कैलेंडर भी हैं जो बड़े पैमाने पर लोगों के बीच पोषण संबंधी मूलभूत जानकारियां पहुंचाते हैं। महिला और बाल विकास मंत्रालय की वेवसाइट पर इन प्रकाशनों की सूची मौजूद है।

एफएनबी ने महिला और बाल विकास मंत्रालय को सहायता प्रदान की, जिसने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिलकर भारत की पोषाहार चुनौतियों का सामना करने के बारे में रणनीतिक नोट तैयार किया। विभिन्न हितधारियों, संसद की परामर्श समिति और नौजवान सांसदों के साथ पोषाहार पर बैठक और विचार विमर्श के बाद योजना आयोग ने प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय परिषद के लिए इस विषय पर एजेण्डा नोट तैयार किया।

24 नवम्बर, 2010 को भारत की पोषाहार संबंधी चुनौतियों पर प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय परिषद की पहली बैठक में निम्नलिखित प्रमुख अनुसंशाएं की गयी-

  • आईसीडीएस स्कीम का पुनर्गठन और सशक्तिकरण
  • अधिक बोझ वाले चुनिंदा 200 जिलों में मातृ एवं बाल कुपोषण से निपटने के लिए एक बहुक्षेत्रीय कार्यक्रम की शुरुआत।
  • कुपोषण के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी सूचना, शिक्षा और संचार अभियान शुरू करना।
  • संबंधित मंत्रालयों की स्कीमों में पोषाहार पर बल।

कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय क्रेच स्कीम; इसके तहत् ₹ 12000 से कम मासिक आय वाले परिवारों के 6 वर्ष तक के बच्चों की दिनभर देखभाल की जाती है। बच्यों के लिए एक सुरक्षित स्थान होने के अलावा क्रेच में पूरक आहार, स्कूल पूर्व शिक्षा और आपात कालीनस्वास्थ्य देखभाल आदि सेवाएं भी मिलती हैं। वर्तमान में यह स्कीम केंद्रीय समाजकल्याण बोर्ड और भारतीय बाल कल्याण परिषद् के माध्यम से कार्यान्वित की जा रही है।

स्कीम के तहत् एक क्रेच के लिए ₹ 3552 प्रतिमाह का अनुदान दिया जाता है जो योजनागत अथवा वास्तविक व्यय में से जो कम हो उसके 90 प्रतिशत तक सीमित है जबकि बाकी खर्च कार्यान्वयन एजेंसी को उठाना होता है। क्रेच कर्मियों का मानदेय पूरी तरह स्कीम के अंतर्गत वित्त पोषित होता है।

राज्यवार निगरानी तंत्र की स्थापना की गई है जिसमें सामाजिक कार्यस्कूल, महिला अध्ययन केंद्र और अन्य प्रतिष्ठित एजेंसियां शामिल हैं। इसके लिए प्रत्येक निगरानी एजेंसी को ₹ 10,000 की एकमुश्त राशि और प्रति क्रेच दौरे के लिए ₹ 700 दिए जाते हैं। दो वर्ष की अवधि में प्रत्येक क्रेच का दौरा आवश्यक है।

केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड द्वारा तैयार सामान्य संचालय प्रक्रिया में उसकी राज्य इकाइयों, स्थानीय समितियों और जिला निगरानी समितियों के कर्तव्यों का विवरण दिया गया है। स्थानीय समितियों में ग्राम विकास अधिकारी को सदस्य रखा जाता है। क्रेच के संतुष्टिपूर्ण कार्य करने के प्रमाणपत्र पर सभी सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। जिला समिति की अध्यक्षता जिलाधिकारी करते हैं। भारतीय बाल कल्याण परिषद भी ऐसा दस्तावेज तैयार कर रही है।

एकीकृत बाल सुरक्षा योजना (आईसीपीएस): महिला और बाल विकास मंत्रालय ने वितीय वर्ष 2009-10 के लिए एकीकृत बात सुरक्षा योजना नाम से नई योजना का शुभारंभ किया है जिसका कार्यान्वयन राज्य व केंद्रशासित प्रदेशों के माध्यम से किया जाएगा। इस योजना का उद्देश्य मुसीबत में फंसे बच्चों के कल्याण में योगदान देना और बच्चों के उत्पीड़न, तिरस्कार, शोषण परित्याग और माता-पिता से बिछुड़ने वाली संवेदनशील स्थितियों और कार्यों को रोकना है। पूर्व निर्धारित परिव्यय विभाजन के आधार पर राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के माध्यम से यह योजना कार्यान्वित की जाएगी।

आईसीपीएस जरूरतमंद बच्चों को रोकथाम, सांविधिक, देखभाल और पुनर्वास सेवाएं प्रदान करती है। साथ ही बाल न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम, 2000 के तहत् बच्चों को सुरक्षा देती है। आईसीपीएस गैर-सरकारी संगठनों की मदद से अथवा राज्य सरकार/केंद्रशासित प्रदेश के प्रशासनों द्वारा सेवाओं के गठन और संचालन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इन सेवाओं में शामिल हैं-

  1. चाइल्ड लाइन के माध्यम से आपात स्थिति में फंसे बच्चों तक पहुंचना
  2. शहरी और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में जरूरतमंद बच्चों के लिए खुले आश्रय स्थल
  3. परिवास आधारित गैर-संस्थागत देखभाल
  4. संस्थागत सेवाएं वर्ष 2011-12 में 802 आश्रयस्थल, 196 विशिष्ट एजेंसियां और 121 खुले आश्रय खोलने के लिए सहायता दी गई।

इस योजना में प्रावधान है कि राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेशों को निम्नलिखित सांविधिक सेवाओं के गठन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाए (क) बाल कल्याण समिति और (ख) बाल न्याय बोर्ड (जेजेबी)। राज्य सरकारों/संघ प्रदेशों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक 548 समितियां और 561 बोर्ड गठित किए जा चुके हैं।

स्कीम के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने और बच्चों को स्तरीय सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए राज्य और जिला स्तर पर कार्यनिष्ठ स्टाफ सहित सेवा प्रदाय ढांचा स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाती है। राज्य सरकारों/संघ प्रदेशों को एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करके अपने हिस्से के वित्त पोषण की जिम्मेदारी उठानी होती है। जम्मू और कश्मीर राज्य के अतिरिक्त सभी राज्य/संघ प्रदेशों ने इस स्कीम के कार्यान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित किए हैं। बाल संरक्षण के मुद्दों पर आपसी सहमति बनाने में यह स्कीम बहुत कारगर सिद्ध हुई है। इसे अब सभी हितधारियों द्वारा उच्च प्राथमिकता दी जा रही है जिससे सभी बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण के उद्भव की उम्मीद जागी है।

चाइल्डलाइन सेवाएं: मुसीबत में फंसे बच्चों की मदद के लिए 1098 नंबर को 24 घंटे की निःशुल्क फोन सेवा उपलब्ध कराई गई है। इस सेवा का उपयोग मुसीबत में फंसा बच्चा या मुसीबत में फंसे की तरफ से कोई भी वयस्क कर सकता है। अभी चाइल्ड लाइन सेवा 174 शहरों में काम रही है। चाइल्ड लाइन का मूल उद्देश्य है-

  1. आपात स्थिति में फंसे बच्चों को तुरंत मदद पहुंचाना और उन्हें उनकी आवश्यकता सेवा
  2. बाल संरक्षण की सेवाओं को नेटवर्क उपलब्ध कराना
  3. बच्चों की आवश्यकताओं के मद्देनजर पुलिस,नगर निगम, अस्पताल, मेडिकल कर्मियों को आग्रही बनाना
  4. बच्चों के अधिकारों का संरक्षण करना
  5. मुसीबत में फंसे बच्चों की जरूरत के समय समाज को जवाब देने के मौके उपलब्ध कराना।

चाइल्ड लाइन सेवा प्रचालन का समन्वय, निगरानी और विस्तार चाइल्ड लाइन फाउंडेशन करता है। इसका गठन भारत सरकार के एक अंब्रेला संगठन के तौर पर किया है जिसका उद्देश्य बच्चों को उत्तम गुणवत्ता की सेवा उपलब्ध कराना है।

जरूरतमंद कामकाजी बच्चों की देखरेख व संरक्षण संबंधी कल्याण की योजना: यह योजना जनवरी 2005 से लागू की गई है। योजना का उद्देश्य उन कामकाजी बच्चों को, जिन्होंने किसी कारणवश पढ़ाई छोड़ दी है, शिक्षा ग्रहण ही नहीं कर सके, उन्हें अनौपचारिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण मुहैया कराना है जिससे वे दोबारा मुख्यधारा की शिक्षा में प्रवेश पुनः प्रवेश पा सकें ताकि उनका भविष्य में शोषण न हो।

इस स्कीम के तहत् गैर-सरकारी संघठनों को कामकाजी बच्चों के लिए कम्पोजिट केंद्र खोलने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है।

कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम: कन्याओं के प्रति अपराघ और हिंसा उसके पैदा होने से पहले से शुरू हो जाती है। कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि उन्हें जन्म लेने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। मंत्रालय ने स्वास्थ्य मंत्रालय को सुझाव दिया है कि प्री-कसेप्शन और प्री-नेटल डायग्नोस्टिक (प्रोहिबिशन ऑफ सेक्स सेलेक्शन) ऐक्ट, 1994 के प्रावधानों का अमल, उनकी निगरानी और प्रशासन को और मजबूत करें। लिंग की पहचान करने और भ्रूण हत्या की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक तंत्र की स्थापना भी की जाए।

जागरूकता और वकालत में बेहतरी भी आवश्यक है। अन्य उपायों में शामिल हैं: बालिकाओं से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रव्यापी जागरूकता सृजित करना, वर्ष 2009 में 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया गया, वर्ष 2010 के समारोहों के एक भाग में बालिकाओं का मान: लिंग आधारित गर्भपात और बालविवाह की चुनौतियों का सामना विषय पर पैनल विचार-विमर्श आयोजित किया गया। 2011 में राष्ट्रीय बालिका दिवस पर नई शुरू की गयी सबला स्कीम पर विशेष ध्यान देते हुए किशोरियों के सशक्तिकरण की थीम अपनाई गई। राज्यों से भी बालिकाओं से जुड़े मसलों पर जानकारी फैलाने के कार्यक्रम शुरू करने का अनुरोध किया गया।

घनलक्ष्मी: महिला और बाल विकास मंत्रालय ने 3 मार्च, 2008 को बालिकाओं की बीमा कवर सहित शर्तबन्द नकद राशि देने के लिए धनलक्ष्मी नामक पायलट योजना को आरंभ किया।

योजना के तहत् निम्नलिखित परिस्थितियों में बालिका के परिवारीजनों (विशेषकर माता) को नकद राशि दी जाती है-

  • जन्म और जन्म के पंजीकरण
  • टीकाकरण की प्रगति पर (छह माह में राशि देना)
  • टीकाकरण पूरा होने पर
  • विद्यालय में दाखिला करने पर (मंत्रालय कक्षा आठ तक धनराशि देता है और मानव संसाधन विकास मंत्रालय कक्षा 9-12 तक धनराशि देता है),
  • कन्या शिशु को बचाए रखने और उन्हें शिक्षा देने के लिए परिवारों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।
  • कन्या के प्रति परिवार की मनोवृति में बदलाव लाना। इससे परिवार के लोग कन्या को बोझ की बजाय संपदा समझेंगे क्योंकि उसके कारण परिवार की धन मिलेगा।

यह योजना सात राज्यों के 11 जिलों में चलाई जा रही है- आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखण्ड, बिहार, उत्तर-प्रदेश और पंजाब।

असाधारण उपलब्धि के लिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार: 1996 में शुरू इन पुरस्कारों में शिक्षा,कला, संस्कृति और खेलकूद आदि विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया गया है। 4 से 15 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को शामिल किया जाता है। प्रतिवर्ष एक स्वर्ण पदक और 35 रजत पदक (प्रत्येक राज्य/संघ प्रदेश के लिए एक) दिये जाते हैं। इसमें स्वर्ण पदक पाने वाले को ₹ 20,000 नकद, एक प्रशस्ति और प्रमाण-पत्र दिया जाता है जबकि रजत पदक पाने वाले 35 बच्चों को ₹ 10,000 नकद और एक प्रशस्ति एवं प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

बाल कल्याण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार: 1979 में शुरू यह पुरस्कार बाल कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन करने वाले 5 संस्थानों और 3 व्यक्तियों को दिये जाते हैं। इसमें प्रत्येक संस्थान की ₹ 3 लाख नकद और एक प्रमाण-पत्र तथा प्रत्येक व्यक्ति ₹ 1 लाख नकद और प्रमाण पत्र दिये जाते हैं।

राजीव गांधी मानव सेवा पुरस्कार: बच्चों की सेवा में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों के सम्मान में यह पुरस्कार 1994 में शुरू किया गया था। बाल विकास, कल्याण और संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले 3 व्यक्तियों को एक-एक लाख रुपए नकद, रजतपट्टिका और प्रशस्ति पत्र दिये जाते हैं।

महिला एवं बाल विकास पर नवीन कार्य के लिए आम अनुदान सहायता स्कीम: ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जो किसी भी स्कीम में शामिल होने से रह जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों के लिए इस स्कीम के तहत् नवीन प्रकृति के कार्यों को सहायता दी जाती है अर्थात् किसी विशिष्ट समस्या को या किसी ऐसे ग्राहक समूह के साथ काम करना जो पहले शामिल नहीं किया गया हो। इसमें आवृति और गैर-आवृति व्यय पर अनुमोदित लागत के 90 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाती है।

यूनिसेफ से सहयोग: भारत में यूनिसेफ कार्यक्रमों का संचालन यूनिसेफ और भारत सरकार की ओर से महिला एवं बालविकास मंत्रालय के बीच हुए समझौते के माध्यम से किया जा रहा है। यह समझौता आपसी विचार-विमर्श और सहमति से बनाया गया है। महिला और बाल विकास मंत्रालय समझौते के कार्यान्वयन और समन्वय के लिए शीर्षस्थ मंत्रालय है। मंत्रालय समय-समय पर कार्यक्रम के कार्यान्वयन तथा व्यय की निगरानी और समन्वय के लिए समीक्षा बैठक करता है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और यूनिसेफ के बीच 3 जून, 2008 को नई दिल्ली में वर्ष 2008-12 की अवधि के लिए एक नया समझौता कंट्री प्रोग्राम ऐक्शन प्लान (सीपीएपी) हुआ। इसका कार्यान्वयन एवं मातृ मृत्यु दर में कमी लाना, कुपोषण का मुकाबला करना, कन्या शिशु को प्रोत्साहन देना, बाल हिंसा से निपटाना, बेहतर शिक्षा, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराना और एचआईवी की समस्या से निपटना है।

यूनिसेफ भारत सरकार द्वारा सामाजिक क्षेत्र में चलाए जा रहे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की सहायता तथा भारत में सहयोग के पंचसाला कार्यक्रम के लिए 51 करोड़ 20 लाख अमेरिकी डॉलर एकत्र करने के लिए प्रतिबद्ध है। सीपीएपी वर्ष 2008-12 बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र समझौते और अन्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुरूप है।

महिलाओं के प्रति भेदभाव को समाप्त करने पर सम्मेलन (सीईडीएडब्ल्यू): भारत ने महिलाओं के प्रति भेदभाव को समाप्त करने संबंधी सम्मेलन (सीईडीएडब्ल्यू) पर 30 जुलाई, 1980 में हस्ताक्षर किए थे और एक आरक्षित और दो घोषित वक्तव्यों के साथ 9 जुलाई, 1993 को उसकी पुष्टि कर दी थी। सम्मेलन या संधि में शामिल देशों की महिलाओं के प्रति भेदभावको दूर करने के लिए अपने यहांकानून बनाने और दूसरे उपाय करने की बाध्यता है और उन्हें पुरुषों के समान मूल अधिकारों और मानवाधिकारों का उपयोग करने की गारंटी का प्रावधान है। इस सिलसिले में पहली रिपोर्ट 21 अक्टूबर, 1997 को जमा की गई जिस पर 24 और 30 जून, 2000 को विचार किया गया तथा दूसरी और तीसरी रिपोर्ट संयुक्त रूप से जून 2005 में जमा की थी। सीईडीएडब्ल्यू पर संयुक्त राष्ट्र की समिति ने इन रिपोर्टों पर 18 जनवरी, 2007 को विचार किया गया।

बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संधि (यूएनसीआरसी): भारत ने बच्चों के प्रति अपनी वचन बद्धता दोहराते हुए 11 दिसंबर, 1992 को बच्चों के अधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र संधि का अनुमोदन किया। इस संधि का उद्देश्य बच्चे को स्वास्थ्य और अनुकूल माहौल मेंजीने और बढ़ने का अधिकार देता है। भारत ने बच्चों के अधिकारों पर दो वैकल्पिक, संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं-

  1. सशस्त्र संघर्ष में बच्चों की भागीदारी और
  2. बच्चों को खरीद-फरोख्त, बाल वेश्यावृति और बाल अश्लील साहित्य पर संधि। तीसरी और चौथी संयुक्त आवधिक रिपोर्ट यूएनसीआरसी को और दो वैकल्पिक संधियों पर प्रारंभिक रिपोर्ट 26 अगस्त, 2011 को सौंप दी गई हैं।

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