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चोल साम्राज्य में समाज Society in Chola Empire – Vivace Panorama

चोल साम्राज्य में समाज Society in Chola Empire

प्राचीन काल में हिन्दू समाज चार वर्गों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित था। इस काल में समाज में अनेक जातियां और उपजातियां हो गयीं। अनेक जातियां पेशों के आधार पर बन गयीं, जैसे लोहे का काम करने वाला लुहार, सोने का काम करने वाला स्वर्णकार, लकड़ी का काम करने वाला बढ़ई और चमड़े का काम करने वाला चर्मकार कहलाया। अनुलोम और प्रतिलोम विवाह के कारण भी मिश्रित जातियां बनीं। अनुलोम विवाह वह विवाह था जिसमे पिता की जाति ऊंची और माता की जाति नीची हो। जब ऊंची जाति की कन्या अपने से नीची जाति के लड़के से विवाह करती थी तो उसे प्रतिलोम विवाह कहते थे।

समाज में ब्राह्मण का ऊँचा स्थान था। दक्षिण भारत में बल्लालो का भी भी स्थान ऊपर था। ब्राह्मण भी अनेक समूह में विभाजित हो गये, जैसे सारस्वत, सरयूपारी, पाठक, शुक्ल, अग्निहोत्री, द्विवेदी, चतुर्वेदी इत्यादि। ब्राह्मणों का मुख्य कार्य पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान कराना और मन्दिरों में पुरोहित का कार्य करना था। ब्राह्मणों के बाद क्षत्रियों का स्थान था जिन्हें राजपूत कहा जाता था। इनका कार्य देश की रक्षा करना, प्रशासन चलाना और युद्ध करना आदि था। वैश्यों का कार्य व्यापार, दुकानदारी और खेती-बाड़ी करना था। इन तीनों वर्गों को द्विज के नाम से जाना जाता था। शूद्रों का क्षेत्र सेवा-कार्य करना था। समाज में इनकी दशा शोचनीय थी। एक नई जाति का उदय हुआ जिसे कायस्थ कहते थे। नवीं शताब्दी के आरम्भ में कायस्थ कर्मचारी के लिये प्रयुक्त होता था। परन्तु बारहवीं शताब्दी में कायस्थ एक जाति के रूप में माने जाने लगे। जाति का विभाजन बलंगै (दायीं भुजा वाले) और इलंगै (बायीं भुजा वाले) में भी होता था। इन दोनों में क्रमश: 98-98 जातियाँ थीं। इन वर्गों में वलंगै के पास विशेषाधिकार थे। इन दोनों के बीच कभी-कभी संघर्ष भी छिड़ जाते थे। ऐसा ही एक संघर्ष कुलोत्तुंग के समय हुआ था। ब्राह्मण और बल्लाल जो समाज में सबसे महत्त्वपूर्ण थे, वलंगै जातियों का समर्थन करते थे क्योंकि ये जातियां किसी न किसी रूप में कृषि उत्पादन से संबंधित थीं। इलंगै जातियों में कम्माल जाति अपनी आर्थिक उपयोगिता के कारण सबसे महत्त्वपूर्ण थी। चोल सम्राटों ने उनकी आर्थिक उपयोगिता देखते हुए उन्हें यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार दिया। इलंगै जातियों को अधिक कर देना पड़ता था। इस तरह हम देखते हैं कि समकालीन दक्षिण भारत में सामाजिक जीवन का आधार आर्थिक था।

हिन्दू समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कारों का प्रचलन था। इनमें विवाह संस्कार प्रमुख था। आम तौर पर सजातीय विवाह होते थे, परन्तु अन्तर्जातीय विवाह का भी प्रचलन था। एक गोत्र के लोगों में विवाह अमान्य था। आमतौर पर पुरुष एक पत्नी रखते थे, परन्तु राजाओं और सामन्तों में बहु-विवाह का प्रचलन था। लोग शाकाहारी थे, परन्तु राजपूतों में मांस-मदिरा का सेवन होता था। मुसलमानों के सम्पर्क का सामाजिक रीति-रिवाजों और भोजन पर भी प्रभाव पड़ा। आरम्भ में दोनों के सम्बन्ध कटु रहे। मन्दिरों के विनाश और बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन ने एक नयी उथल-पुथल पैदा कर दी। समाज में प्रायश्चित के विधान द्वारा हिन्दू से मुसलमान बने हुए व्यक्तियों को पुन: हिन्दू धर्म में दीक्षित करने के अनेक प्रयास हुए। परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में पुरोहितों ने शुद्धि को प्रोत्साहन देना बन्द कर दिया और इस कारण हिन्दुओं का इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद पुनः हिन्दू धर्म में लौटना कठिन हो गया।

जीवन-स्तर- राजा, उसके मन्त्री और सामंत शान-शौकत का जीवन बिताते थे। वे विशाल भवनों में रहते थे, बढ़िया वस्त्र धारण करते थे और बहुमूल्य आभूषणों को धारण करते थे। इनके परिवार में अनेक स्त्रियां होती थीं। राज-परिवार और सामन्तों के घरों में बड़ी संख्या में नौकर-चाकर होते थे। व्यापारी वर्ग समृद्ध था।

व्यापारी रहन-सहन में सामन्तों की नकल करते थे। नगरों में रहने वाले लोग भी आमतौर पर खुशहाल थे। परन्तु समाज में निर्धन वर्ग भी था। कृषक जनता की आर्थिक स्थिति साधारण थी। यद्यपि भूमिकर कम था, परन्तु किसान को अन्य कर भी देने पड़ते थे। दुर्भिक्ष भी समय-समय पर पड़ते थे और ऐसे समय अन्य स्थानों से सहायता न पहुँचने पर निर्धन लोगों को भूखों मरना पड़ता था। इस प्रकार धनी और निर्धन व्यक्ति के जीवन-स्तर में महान् अन्तर था।

स्त्रियों की दशा- इस काल में स्त्रियों के सामाजिक स्तर में गिरावट आयी। नारी की स्वतंत्रता पर अनेक अंकुश लग गये। बचपन में उसे पिता पर और युवावस्था में पति पर निर्भर रहना होता था। कन्या को अपना जीवन-साथी चुनने की स्वतंत्रता थी। स्वयंवर का प्रचलन था। इस काल में कन्या के विवाह की आयु कम कर दी गयी और यह कहा गया कि युवावस्था से पूर्व कन्या का विवाह कर देना चाहिए। बारहवीं शताब्दी में तुर्कों द्वारा स्त्रियों के अपहरण को रोकने के लिए कन्या के विवाह की आयु और कम कर दी गई। समाज में पर्दे की प्रथा का प्रचलन नहीं था, परन्तु कालान्तर में मुस्लिम सम्पर्क के कारण पर्दे की प्रथा का प्रचलन हो गया जिससे नारी जाति की उन्नति अवरुद्ध हो गयी।

समाज में सती प्रथा का प्रचलन था। पति की मृत्यु के बाद पत्नी उसकी चिता पर जलकर भस्म हो जाती थी। अरब लेखक सुलेमान के अनुसार, राजा की मृत्यु पर उसकी रानियाँ भी उसकी चिता के साथ सती हो जाती थीं। राजपूतों में जौहर की प्रथा प्रचलित थी। जब राजपूत विजय की आशा नहीं देखते थे, तब केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु पर टूट पड़ते थे और स्त्रियाँ अपने सतीत्व की रक्षा के लिये सामूहिक रूप से जल जाती थीं। इस प्रथा को जौहर कहते थे।


शिक्षा

बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा मन्दिरों में बनी पाठशालाओं में या गुरु के घर पर दी जाती थी। संस्कृत के स्थान पर बोलचाल की भाषा हिन्दी का प्रचलन हो गया था। बच्चों को अक्षरज्ञान के साथ गणित भी सिखाया जाता था। उच्च शिक्षा के लिये बड़े-बड़े नगरों में महाविद्यालय खोले गये, जहाँ पर विद्यार्थी दूर-दूर से पढ़ने आते थे। नालन्दा विश्वविद्यालय अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का विश्वविद्यालय था जहाँ चीन, तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्वी द्वीपसमूह से बड़ी संख्या में विद्यार्थी आते थे। विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के भोजन और वस्त्र की व्यवस्था राज्य की ओर से होती थी।

आयुर्वेदविज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी। आयुर्वेद में शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) की भी शिक्षा दी जाती थी। मनुष्य-चिकित्सा के अतिरिक्त पशु-चिकित्सा की शिक्षा भी दी जाती थी। राजकुमारों और सामंत-पुत्रों को सैनिक शिक्षा दी जाती थी।

इस काल में स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट आयी। लड़की के विवाह की आयु कम कर दिये जाने के कारण उसे शिक्षा मिलना कठिन हो गया। राजघरानों और धनी परिवारों की लड़कियों को घरों पर ही शिक्षा दी जाने लगी। शिक्षा की कमी के कारण नारी का सम्मान भी कम हो गया।

इस काल में विद्वानों का दृष्टिकोण अधिक संकीर्ण हो गया। उन्होंने विदेशों से वैज्ञानिक विचारों को ग्रहण करने का कोई प्रयत्न नहीं किया। नये विचारों को ग्रहण करने के स्थान पर वे अपने प्राचीन विचार पर ही निर्भर थे। प्रसिद्ध विद्वान् अलबेरूनी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि हिन्दू यह समझते हैं कि उनके अलावा किसी को विज्ञान का ज्ञान नहीं है और न उनके समान विदेशों में कोई विद्वान् है। इसी कारण उसने ब्राह्मण को घमण्डी, दम्भी और संकीर्ण प्रवृति का बतलाया है। इस प्रवृति से समाज को हानि हुई। इस समय दक्षिण भारत में ये विश्वविद्यालय प्रसिद्ध थे – इन्नाइरम, त्रिभुवनी, तिरूवादुतुराई और तिरूवरियूरा।

चूंकि शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा तमिल न होकर संस्कृत थी इसलिए महाविद्यालय में अध्ययन करने वाले अधिकांश विद्यार्थियों का दैनिक जीवन से संपर्क टूट जाता था।

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