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भारत में सिविल सेवाओं का विकास Development of Civil Services In India – Vivace Panorama

भारत में सिविल सेवाओं का विकास Development of Civil Services In India

लार्ड कार्नवालिस (गवर्नर-जनरल, 1786-93) पहला गवर्नर-जनरल था, जिसने भारत में इन सेवाओं को प्रारंभ किया तथा उन्हें संगठित किया। उसने भ्रष्टाचार को रोकने के लिये निम्न कदम उठाये-

  • वेतन में वृद्धि।
  • निजी व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध।
  • अधिकारियों द्वारा रिश्वत एवं उपहार इत्यादि लेने पर पूर्ण प्रतिबंध।
  • वरिष्ठता (seniority) के अधर पर तरक्की (Promotion) दिए जाने को प्रोत्साहन।

वर्ष 1800 में, वैलेजली (गवर्नर-जनरल, 1798-1805) ने प्रशासन के नये अधिकारियों को प्रशिक्षण देने हेतु फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना की। वर्ष 1806 में कोर्ट आफ डायरेक्टर्स ने वैलेजली के इस कालेज की मान्यता रद्द कर दी तथा इसके स्थान पर इंग्लैण्ड के हैलीबरी (Haileybury) में नव-नियुक्त अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु ईस्ट इंडिया कॉलेज की स्थापना की गयी। यहां भारत में नियुक्ति से पूर्व इन नवनियुक्त प्रशासनिक सेवकों को दो वर्ष का प्रशिक्षण लेना पडता था।

1853 का चार्टर एक्ट

इस एक्ट के द्वारा नियुक्तियों के मामले में डायरेक्टरों का संरक्षण समाप्त हो गया तथा सभी नियुक्तियां एक प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा की जाने लगीं जिसमें किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं रखा गया।

कंपनी के उच्च पदों में नियुक्ति के लिये प्रारंभ से ही भारतीयों के लिये द्वार पूर्णतया बंद थे। कार्नवालिस का विचार था कि “हिन्दुस्तान का प्रत्येक नागरिक भ्रष्ट है।” 1793 के चार्टर एक्ट द्वारा 500 पाउंड वार्षिक आय वाले सभी पद, कंपनी के अनुबद्ध अधिकारियों (Covenanted Servents) के लिये आरक्षित कर दिये गये थे। कंपनी के प्रशासनिक पदों से भारतीयों को पृथक रखने के निम्न कारण थे-

  • अंग्रेजों का यह विश्वास कि ब्रिटिश हितों को पूरा करने के लिये अंग्रेजों को ही प्रशासन का दायित्व संभालना चाहिये।
  • अंग्रेजों की यह धारणा कि भारतीय, ब्रिटिश हितों के प्रति अयोग्य, अविश्वसनीय एवं असंवेदनशील हैं।
  • यह धारणा कि जब इन पदों के लिये यूरोपीय ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं तथा उनके बीच ही इन पदों को प्राप्त करने हेतु कड़ी प्रतिस्पर्धा है, तब ये पद भारतीयों को क्यों दिये जायें।

यद्यपि 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा कंपनी के पदों हेतु भारतीयों के लिये भी प्रवेश के द्वार खोल दिये गये किंतु वास्तव में कभी भी इस प्रावधान का पालन नहीं किया गया। 1857 के पश्चात, 1858 में साम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा में यह आश्वासन दिया गया कि सरकार सिविल सेवाओं में नियुक्ति के लिये रंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगी तथा सभी भारतीय स्वतंत्रतापूर्वक अपनी योग्यतानुसार प्रशासनिक पदों को प्राप्त करने में सक्षम होगे। किंतु इस घोषणा के पश्चात भी सभी उच्च प्रशासनिक पद केवल अंग्रेजों के लिये ही सुरक्षित रहे। भारतीयों को फुसलाने एवं समानता के सिद्धांत का दिखावा करने के लिए डिप्टी मैजिस्ट्रेट तथा डिप्टी कलेक्टर के पद सृजित कर दिये गये, जिससे भारतीयों को लगा कि वे इन पदों को प्राप्त कर सकते हैं किंतु स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही।

भारतीय सिविल सेवा अधिनियम, 1861 Indian Civil Services Act 1861


इस अधिनियम द्वारा कुछ पद अनुबद्ध सिविल सेवकों के लिये आरक्षित कर दिये गये किंतु यह व्यवस्था की गयी कि प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती के लिये अंग्रेजी माध्यम से एक प्रवेश परीक्षा इंग्लैण्ड में आयोजित की जायेगी, जिसमें ग्रीक एवं लैटिन इत्यादि भाषाओं के विषय होगे। प्रारंभ में इस परीक्षा के लिये आयु 23 वर्ष थी। तदुपरांत यह 23 वर्ष से, 22 वर्ष (1860 में), फिर 21 वर्ष (1866 में) और  अंत में घटाकर 19 वर्ष (1878) में कर दी गयी।

1863 में, सत्येंद्र नाथ टैगोर ने इंडियन सिविल सर्विस में सफलता पाने वाले प्रथम भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया।

1878-79 में, लार्ड लिटन ने वैधानिक सिविल सेवा (Statutory Civil Service) की योजना प्रस्तुत की। इस योजना के अनुसार, प्रशासन के 1/6 अनुबद्ध पद उच्च कुल के भारतीयों से भरे जाने थे। इन पदों के लिये प्रांतीय सरकारें सिफारिश करेंगी तथा वायसराय एवं भारत-सचिव की अनुमति के पश्चात उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी जायेगी। इनकी पदवी और वेतन संश्रावित सेवा से कम होता था। लेकिन यह वैधानिक सिविल सेवा असफल हो गयी तथा 8 वर्ष पश्चात इसे समाप्त कर दिया गया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मांग

1885 में अपनी स्थापना के पश्चात कांग्रेस ने मांग की कि-

  • इन सेवाओं में प्रवेश के लिये आयु में वृद्धि की जाये। तथा
  • इन परीक्षाओं का आयोजन क्रमशः ब्रिटेन एवं भारत दोनों स्थानों में किया जाये।

लोक सेवाओं पर एचिसन कमेटी, 1886 (Aitchison Committee on Public Services, 1886)

इस कमेटी का गठन डफरिन ने 1886 में किया। इस समिति ने निम्न सिफारिशें की-

  • इन सेवाओं में अनुबद्ध (Covenanted) एवं अ-अनुबद्ध (uncovenanted) शब्दों को समाप्त किया जाये।
  • सिविल सेवाओं को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाये-
  1. सिविल सेवाः इसके लिये प्रवेश परीक्षायें इंग्लैण्ड में आयोजित की जायें।
  2. प्रांतीय सिविल सेवाः इसके लिये प्रवेश परीक्षायें भारत में आयोजित की जाये।
  3. अधीनस्थ सिविल सेवाः इसके लिये भी प्रवेश परीक्षायें भारत में आयोजित की जाये।
  • सिविल सेवाओं में आयु सीमा को बढ़ाकर 23 वर्ष कर दिया जाये। 1893 में, इंग्लैण्ड के हाऊस आफ कामन्स में यह प्रस्ताव पारित किया गया की इन सेवाओं के लिए प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन अब क्रमशः इंग्लैंड एवं भारत दोनों स्थानों में किया जायेगा। किंतु इस प्रस्ताव को कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। भारत सचिव किम्बरले ने कहा कि “सिविल सेवाओं में पर्याप्त संख्या में यूरोपीयों का होना आवश्यक है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसे त्यागा नहीं जा सकता”।

मांटफोर्ड सुधार, 1919

इन सुधारों में-

  • इस नीति की घोषणा की गयी कि-“यदि भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना होती है तो लोक सेवाओं में ज्यादा से ज्यादा भारतीय नियुक्त हो सकेंगे, जो भारतीयों के हित में होगा”।
  • इसने भी सिविल सेवा की प्रवेश परीक्षा का आयोजन क्रमशः इंग्लैण्ड एवं भारत में कराने की सिफारिश की।
  • इसने प्रशासनिक सेवा के एक-तिहाई पदों को केवल भारतीयों से भरे जाने की सिफारिश की तथा इसे प्रतिवर्ष 1.5 प्रतिशत की दर से बढ़ाने का सुझाव दिया।

ली आयोग (1924): इस आयोग ने निम्न सिफारिशें कीं-

  • भारत सचिव को ही- भारतीय सिविल सेवा, सिंचाई विभाग के इंजीनियरों, तथा भारतीय वन सेवा इत्यादि में नियुक्तियों की प्रक्रिया जारी रखनी चाहिये।
  • स्थानांतरित क्षेत्रों यथा- शिक्षा एवं लोक स्वास्थ्य सेवाओं में नियुक्तियों का दायित्व प्रांतीय सरकारों को दे दिया जाये।
  • इंडियन सिविल सर्विसेज में भारतीयों एवं यूरोपियों की भागेदारी 50:50 के अनुपात में हो तथा भारतीयों को 15 वर्ष में यह अनुपात प्राप्त करने की व्यवस्था की जाये।
  • अतिशीघ्र एक लोक सेवा आयोग का गठन किया जाये (1919 के भारत सरकार अधिनियम में भी इसकी सिफारिश की गयी थी)।

भारत सरकार अघिनियम, 1935

इस अधिनियम में सिफारिश की गयी कि केंद्रीय स्तर पर एक संघीय लोक सेवा आयोग तथा प्रांतों में प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की स्थापना की जाये ।

लेकिन प्रशासन में नियंत्रण एवं अधिकार जैसे मुद्दे अंग्रेजों के हाथो में ही सफलता नहीं मिली क्योंकि अभी भी सरकार, प्रशासन में भारतीयों की भागेदारी के पक्ष में नहीं थी।

पुलिस (Police)

1791: सर्वप्रथम लार्ड कार्नवालिस ने कानून एवं व्यवस्था की स्थापना के लिये पुलिस बल को भली-भांति संगठित किया। उसने पुरानी पुलिस व्यवस्था का गया। प्रत्येक थाने (क्षेत्र) को एक दरोगा के अधीन रखा गया तथा दरोगा की सहायता के लिये पुलिस कर्मचारी नियुक्त किये गये। प्रत्येक जिले को पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) के अधीन रखा गया, पुलिस अधीक्षक जिले का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी था। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीदारों के पुलिस संबंधी अधिकार समाप्त कर दिये गये।

पुलिस कर्मचारियों में तत्परता तथा इमानदारी लाने के लिये उसने, इनके वेतन बढ़ा दिये तथा हत्यारों, एवं चोरों को पकड़ने पर उनके लिये पुरस्कार की व्यवस्था की गयी।

1808: मेयो ने प्रत्येक डिवीजन के लिये एक एस.पी. (Suprentendent of Police) की नियुक्ति की तथा इसकी सहायता के लिये बहुत से गोयेंदा (Spies) नियुक्त किये गये। किंतु कालांतर में गोयेंदा भ्रष्ट हो गये तथा स्थानीय जनता के मध्य लूट-खसोट मचाने लगे।

1814: कोर्ट आफ डायरेक्टर्स के एक आदेश द्वारा बंगाल को छोड़कर अन्य सभी स्थानों में कंपनी द्वारा दरोगा एवं उसके सहायकों की नियुक्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया गया।

लार्ड विलियम बैंटिक, गवर्नर-जनरल 1828-35

पुलिस अधीक (S.P) के कार्यालय को समाप्त कर दिया गया। अब यह व्यवस्था की गयी कि जिले का कलेक्टर या दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) पुलिस विभाग का प्रमुख तथा प्रत्येक संभाग (Division) का आयुक्त, (commissioner) पुलिस अधीक्षक के पद का दायित्व भी निभायेगा। लेकिन इस व्यवस्था से अनेक दुष्प्रभाव उत्पन्न हुये। पुलिस बल का संगठन दुर्बल हो गया तथा जिला दंडाधिकारी कार्य के बोझ से दब गये। सर्वप्रथम प्रेसीडेंसी नगरों में जिला दंडाधिकारियों एवं कलेक्टरों के कार्यों को पृथक किया गया।

1860 में पुलिस आयोग की सिफारिशों से भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 बना। इस आयोग ने निम्न सिफारिशें कीं-

  • नागरिक पुलिस वाहिनी की व्यवस्था- यह गांवों की वर्तमान चौकसी व्यवस्था को संचालित करेगा (गांवों में चौकीदार यह कार्य करता था) तथा इसका अन्य पुलिस वाहनियों से प्रत्यक्ष संबंध होगा।
  • प्रांतों में पुलिस महानिदेशक (Inspector-General) पूरे प्रांत के पुलिस विभाग का प्रमुख होगा। उप-महानिदेशक (Deputy-Inspector General) रेंज के एवं पुलिस अधीक्षक (S.P) जिले के पुलिस प्रमुख होंगे।

पुलिस विभाग को सुसंगठित रूप प्रदान करने से विभिन्न आपराधिक गतिविधियों यथा-डकैती, चोरी, हत्या, ठगी इत्यादि में धीरे-धीरे कमी आने लगी लेकिन विभिन्न अपराधों की जांच-पड़ताल करने में साधारण जनता से पुलिस का व्यवहार अशोभनीय होता था। सरकार ने राष्ट्रीय आंदोलन के दमन में भी पुलिस का भरपूर दुरुपयोग किया।

अंग्रेजों ने अखिल भारतीय स्तर पर पुलिस व्यवस्था की स्थापना नहीं की। 1861 के पुलिस अधिनियम में केवल प्रांतीय स्तर पर ही पुलिस विभाग के गठन से संबंधित दिशा-निर्देश थे।

1902 में, पुलिस आयोग ने केंद्र में केंद्रीय जांच ब्यूरो (central intelligence bureau, CBI) एवं प्रान्तों में सी. आई. दी. (criminal investigation department) की स्थापना की सिफारिश की।

न्यायपालिका (न्यायिक सुधार)

प्रारंभ में न्याय व्यवस्था जमींदारों के अधीन थी तथा न्याय का कार्य उनकी स्वच्छाचारिता पर निर्भर था।

वारेन हेस्टिंग्स के अधीन सुधार 1772-1785

न्याय सुधारों की दिशा में वारेन हेस्टिंग्स द्वारा किये गये प्रयास अत्यधिक सफल रहे। उसने मुगल शासकों की न्यायिक प्रणाली को अपनाने का प्रयास किया। इससे पूर्व न्याय-व्यवस्था अत्यंत अस्पष्ट एवं असंतोषजनक थी। वारेन हेस्टिंग्स ने न्याय-व्यवस्था को दुरस्त करने के लिये निम्न कदम उठाये-

  • प्रत्येक जिले में एक जिला दीवानी अदालत व एक जिला फौजदारी अदालत स्थापित की गयी।
  • जिला दीवानी अदालत में न्याय का कार्य कलेक्टर के अधीन होता था तथा यहां दीवानी मामलों की सुनवायी की जाती थी। इन अदालतों में हिन्दुओं के लिये हिंदू विधि तथा मुसलमानों के लिये मुस्लिम विधि लागू होती थी। इन अदालतों में 500 रुपये तक के मुकद्दमे की सुनवायी हो सकती थी। जिला दीवानी अदालत के ऊपर सदर दीवानी अदालत होती थी, जहां जिला दीवानी अदालत के फैसले के विरुद्ध अपील की जा सकती थी। सदर दीवानी अदालत में अध्यक्ष, सर्वोच्च परिषद के प्रधान तथा अन्य सदस्य होते थे। इनकी सहायता के लिये भारतीय अधिकारी होते थे।
  • जिला फौजदारी अदालत में फौजदारी मामलों की सुनवायी की जाती थी। यह अदालत एक भारतीय अधिकारी के अधीन होती थी, जिसकी सहायता के लिये मुफ्ती और काजी होते थे। यह अदालत भी कलेक्टर के सामान्य नियंत्रण में होती थी। इस अदालत में मुस्लिम कानून लागू होता था तथा न्याय की कार्यवाही खुली अदालत में की जाती थी। सम्पत्ति की जब्ती तथा मृत्युदंड के लिये मुर्शिदाबाद स्थित सदर निजामत अदालत से स्वीकृति मिलना आवश्यक था। जिला निजामत अदालत के विरुद्ध सदर निजामत अदालत में अपील की जा सकती थी। इसका अध्यक्ष एक उप-निजाम होता था तथा एक मुख्य मुफ्ती, एक मुख्य काजी तथा तीन मौलवी उसकी सहायता करते थे।
  • 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट द्वारा कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गयी। इसके अधिकार क्षेत्र में कलकत्ता में रहने वाले सभी अंग्रेज तथा भारतीय आते थे। यदि किसी मामले में दोनों पक्ष सहमति दें तो यह कलकत्ता से बाहर के मुकदमों की सुनवायी भी कर सकता था। यहां अंग्रेजी कानून लागू होता था। लेकिन अक्सर सुप्रीम कोर्ट एवं अन्य न्यायालयों के मध्य टकराव होता रहता था।

कार्नवालिस के अधीन सुधार 1786-1793

  • जिला फौजदारी न्यायालय समाप्त कर दिये गये तथा इनके स्थान पर चार भ्रमणकारी न्यायालयों (Circuit Court) की स्थापना-कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद एवं पटना में की गयी। इन भ्रमणकारी न्यायालयों के न्यायाधीश यूरोपीय होते थे तथा ये दीवानी एवं फौजदारी दोनों प्रकार के मामलों की सुनवायी कर सकते थे।
  • सदर निजामत अदालत को कलकत्ता स्थानांतरित कर दिया गया। यह अदालत गवर्नर-जनरल तथा उसके पार्षदों के अधीन कार्य करती थी। इनकी सहायता के लिये मुख्य काजी तथा मुख्य मुफ्ती होते थे।
  • जिला कलेक्टरों से न्यायिक तथा फ़ौजदारी शक्तियां ले ली गयीं। जिला दीवानी अदालतों को अब जिला या शहर अदालत के नाम से जाना जाने लगा। इन जिला अदालतों की सभी न्यायिक शक्तियां, जिला न्यायाधीशों को दे दी गयीं। कलेक्टर के पास अब केवल कर संबंधी अधिकार शेष रह गये।
  • दीवानी अदालतों की एक क्रमिक लड़ी (Gradation) स्थापित की गयी
  1. मुंसिफ अदालत भारतीय अधिकारी के अधीन।
  2. रजिस्ट्रार की अदालत यूरोपीय न्यायाधीश के अधीन।
  3. जिला न्यायालय, जिला न्यायाधीश के अधीन।
  4. जिला न्यायालयों के ऊपर चार प्रांतीय न्यायालय।
  5. कलकत्ता में सदर निजामत अदालत। तथा
  6. सपरिषद सम्राट (King-in-council), जहां 5 हजार से अधिक मूल्य के मामलों की सुनवायी हो सकती थी।

कार्नवालिस संहिताः लार्ड कार्नवालिस ने अपने न्यायिक सुधारों को अंतिम रूप देकर उन्हें 1793 में एक संहिता (Code) के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे कार्नवालिस संहिता के नाम से जाना जाता है। यह संहिता मुख्यतया ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत पर आधारित थी। इस संहिता द्वारा कार्नवालिस ने-

  • कर तथा न्याय प्रशासनों को पृथक कर दिया।
  • यूरोपियों के मामलों को भी अदालतों के अधीन कर दिया।
  • सरकारी अधिकारियों को सरकारी कायों के लिये दीवानी अदालतों के सम्मुख जवाबदेह बना दिया।
  • कानून के विशिष्टता का सिद्धांत (Principle of sovereignty of Law) स्थापित किया।

विलियम बैंटिक के अधीन सुधार 1828-1833

  • कार्नवालिस द्वारा स्थापित चार प्रांतीय अपीलीय तथा भ्रमणकारी न्यायालय समाप्त कर दिये गये तथा इनका कार्य कलेक्टरों तथा दण्डनायकों को दे दिया गया, जो राजस्व तथा भ्रमणकारी आयुक्तों (Revenue and circuit commissioners) के अधीन होते थे।
  • दिल्ली तथा आधुनिक उत्तर प्रदेश (upper provinces) के लोगों की सुविधा के लिए इलाहबाद में एक पृथक सदर दीवानी अदालत तथा एक सदर निजामत अदालत की स्थापना की गयी। अब यहां के निवासियों की अपील के लिये कलकत्ता नहीं जाना पड़ता था।
  • इस समय न्यायालयों की भाषा फारसी थी। अब न्यायालयों में फारसी के स्थान पर स्थानीय भाषाओं के प्रयोग की अनुमति दे दी गयी। जबकि सुप्रीम कोर्ट में फारसी के स्थान पर अंग्रेजी का प्रयोग किया जाने लगा।

1833: भारतीय विधि को संहिताबद्ध करने के लिये मैकाले की अध्यक्षता में एक विधि आयोग का गठन किया गया। इसके परिणामस्वरूप, दीवानी नियम संहिता (1859), भारतीय दंड संहिता (1860) तथा फौजदारी नियम संहिता (1861) का निर्माण किया गया।

1860: अब यूरोपीय, फौजदारी मामलों के अतिरिक्त अन्य मामलों में विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकते थे साथ ही भारतीय न्यायाधीशों से अंग्रेजों के मामलों की सुनवायी का अधिकार छीन लिया गया।

1865: सुप्रीम कोर्ट तथा सदर अदालतों का कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास में स्थित उच्च न्यायालयों में विलय कर दिया गया।

1935: के भारत सरकार अधिनियम द्वारा एक संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना (1937 में) की गयी। यह न्यायालय सरकारी विवादों का निपटारा करता था तथा उच्च न्यायालयों की सीमित अपीलों की सुनवायी कर सकता था ।

ब्रिटिश शासन के अधीन न्यायपालिका के पहलू

सकारात्मक पहलू

  • विधि का शासन (Rule of Law) स्थापित किया गया।
  • शासकों के व्यक्तिगत एवं धार्मिक कानूनों की जगह संहिताबद्ध कानून लागू किया गया।
  • यद्यपि यूरोपियों के मामलों को भी कानून के दायरे में ला दिया गया किंतु फौजदारी मामलों में उनकी सुनवायी केवल अंग्रेज न्यायाधीश ही कर सकते थे।
  • सरकारी अधिकारियों को अपने कार्यों के प्रति दीवानी न्यायालयों के सम्मुख जवाबदेह बना दिया गया।

नकारात्मक पहलू

  • न्याय व्यवस्था अत्यधिक दुरुह, जटिल एवं खर्चीली बन गयी। धनवान एवं प्रभावशाली व्यक्ति इसका दुरुपयोग करने लगे।
  • मुकदमा दायर करने का तात्पर्य था न्याय में देरी होना।
  • मुकदमों की संख्या बढ़ने से न्यायालय कार्य के बोझ से दब गये।
  • अक्सर यूरोपीय न्यायाधीश भारतीय परम्पराओं एवं तौर-तरीकों से परिचित नहीं होते थे। फलतः निष्पक्ष न्याय की संभावना नगण्य हो जाती थी।

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