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वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद Finance, Property, Contracts And Suits – Vivace Panorama

वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद Finance, Property, Contracts And Suits

संघ और राज्यों की संपत्ति

संविधान में संघ और राज्यों को कानूनी व्यक्ति माना गया है जो संपत्ति के स्वामी हो सकते हैं, संपत्ति का अर्जन कर सकते हैं, अनुबंध कर सकते है, कारोबार एवं व्यापार चला सकते हैं, क़ानूनी कार्यवाही में भाग ले सकते हैं। यह सब उन्हीं उपांतरों के अधीन होगा जो संविधान में विनिर्दिष्ट किए जाएं। संघ एवं राज्य अनेक प्रकार से संपत्ति अर्जित कर सकते हैं।

उत्तराधिकार

संविधान के प्रारंभ के समय जो संपत्ति अस्तियां, अधिकार और दायित्व डोमिनियन ऑफ इंडिया के या गर्वनर के प्रांत के या देशी रियासत के थे, वे संविधान के आधार पर, संघ को या तत्समान राज्य की प्राप्त हो गए (अनुच्छेद 294-295)।

स्वामीविहीन

भारत के राज्यक्षेत्र में कोई संपत्ति जो यदि यह संविधान प्रवर्तन में नहीं आया होता तो राजगामी या व्यपगत होने से या अधिकारवान स्वामी के अभाव में स्वामीविहीन होने से यथास्थिति, हिज मेजेस्टी को या देशी राज्य के शासक को प्रोद्भूत हुई होती, वह संपत्ति, यदि राज्य में स्थित है तो ऐसे राज्य में और किसी अन्य दशा में संघ में निहित होगी (अनुच्छेद 296)।

समुद्र के नीचे की वस्तुएं


भारत के राज्य क्षेत्रीय सागर खंड में समुद्र के नीचे की सभी भूमि, खनिज और अन्य मूल्यवान वस्तुएं केंद्र में निहित होगी (अनुच्छेद 297)।

कानून द्वारा अन्वेषण, अर्जन या अधिग्रहण

संघ और राज्य के विधान मंडल दोनों ही कानून बनाकर संपत्ति का अन्वेषण, अर्जन या अधिग्रहण करने के लिए सक्षम हैं। उल्लेखनीय है कि 44वें संशोधन अधिनियम, 1978द्वारा अनुच्छेद 31(2)का लोप करके प्रतिकर देने की सांविधानिक बाध्यता समाप्त कर दी गई है।

कार्यपालिका शक्ति के अधीन अर्जन

भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार, अपनी-अपनी सरकार के प्रयोजन के लिए प्राइवेट व्यक्तियों के समान ही अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए क्रय करके या विनिमय द्वारा संविदा कर सकेगी और विक्रय या विनिमय द्वारा संपत्ति अर्जित कर सकेगी (अनुच्छेद 298)। किंतु किसी व्यक्ति की संपत्ति का अनिवार्य अर्जन करने के लिए उसे प्राधिकृत करने वाली विधि होनी आवश्यक है (अनुच्छेद 300क)।

  • संविधान द्वारा संघ एवं राज्यों को कानूनी व्यक्ति मानते हुए सम्पत्ति का स्वामी होने एवं उसका अर्जन करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
  • भारतीय राज्यक्षेत्र में स्थित कोई स्वामी विहीन सम्पत्ति यदि किसी राज्य में स्थित है तो वह उस राज्य की अन्यथा किसी दूसरी दशा में संघ की सम्पति मानी जाएगी।

 व्यापार करने की शक्ति

संघ और राज्यों की सरकारें किसी भी व्यापार को करने के प्रयोजनार्थ अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए कोई संविदा करने के लिए सक्षम हैं। यह व्यापार सक्षम विधानमंडल के द्वारा विनियमित किया जा सकेगा अर्थात् यदि संघ सरकार राज्य सूची में सम्मिलित किसी विषय के संबंध में व्यापार करती है तो यह व्यापार राज्य विधानमंडल की विधायी अधिकारिता के अधीन होगा [अनुच्छेद 298 का परन्तुक (क)]।

जब केंद्र या राज्य अपने द्वारा चलाए जाने वाले व्यापार के विषय में विधान बनाते हैं तब उन सांविधानिक मर्यादाओं से उन्मुक्ति होती है जिनके वह अन्यथा अधीन होती। यदि कोई सामान्य विधि किसी नागरिक को किसी विशिष्ट व्यापार को चलाने से पूर्णतः या भागतः अपवर्जित करती है तो अनुच्छेद 19(6) के अधीन ऐसी विधि की युक्तियुक्तता की परीक्षा की जाएगी। यदि राज्य किसी युक्तियुक्त औचित्य के बिना किसी निजी व्यापारी के पक्ष में कोई एकाधिकार का सृजन करता है तो न्यायालय ऐसी विधि को असांविधानिक ठहरा सकता है। किंतु यदि कोई विधि व्यापारी के रूप में राज्य के पक्ष में एकाधिकार का सृजन करती है, चाहे नागरिक उससे भागतः अपवर्जित हो या पूर्णतः, तो ऐसी विधि की युक्तियुक्तता को न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता [अनुच्छेद 19(6) का अपवाद (ii)]।

  • संघ सरकार द्वारा राज्य-सूची के किसी विषय से सम्बन्धित व्यापार करने पर उस व्यापार पर विधायी अधिकारिता राज्य विधानमण्डल की होगी।
  • किसी भी व्यापार को करने हेतु संविदा करने के लिए संघ एवं राज्यों की सरकारों द्वारा अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग किया जाता है।

सरकारी संविदाओं के लिए औपचारिकताएं

संघ और राज्य की सरकारों को प्राइवेट व्यक्तियों के समान ही अपनी-अपनी कार्यपालिका शक्ति के क्षेत्र में संविदा करने की शक्ति है। सरकार की यह संविदा शक्ति संविधान द्वारा अपेक्षित कुछ विशेष औपचारिकताओं के अधीन है। ये औपचारिकताएं उनके अतिरिक्त हैं जो भारत में की गई संविदाओं के लिए संविदा अधिनियम में अधिकथित हैं। संघ या राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में की गई संविदाओं की औपचारिकता अनुच्छेद 299 में दी गई है। उनके अनुसार-

  1. संविदा का निष्पादन, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा किया जाना चाहिए,
  2. संविदा का निष्पादन ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए, जो यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल की ओर से सम्यकतः प्राधिकृत हो,
  3. संविदा यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा की गई कही जानी चाहिए।

यदि इन शर्तों में से किसी का अनुपालन नहीं किया जाता है तो संविदा न तो सरकार पर आबद्धकर होगी और न सरकार के विरुद्ध प्रवृत्तनीय होगी। जिस अधिकारी ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत में यह संविदा की थी उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकता है।

संघ और राज्य के विरुद्ध वाद

सामान्य न्यायालयों में प्राइवेट व्यक्ति की भांति वाद लाने के सरकार के अधिकार और उसके विरुद्ध वाद लाए जाने पर दायित्व के बारे में भी कुछ विशेष प्रावधान हैं।

संविधान के अनुच्छेद 300(1) के अनुसार-

“भारत सरकार भारत संघ के नाम से वाद ला सकेगी या उस पर वाद लाया जा सकेगा और किसी राज्य की सरकार उस राज्य “के नाम से वाद ला सकेगी या उस पर वाद लाया जा सकेगा और ऐसे उपबंधों के अधीन रहते हुए, जो इस संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों के आधार पर अधिनियमित संसद के या ऐसे राज्य के विधानमंडल के अधिनियम द्वारा किए जाए, वे अपने-अपने कार्यकलाप के संबंध में उसी प्रकार का वाद ला सकेंगे या उन पर उसी प्रकार का वाद लाया जा सकेगा जिस प्रकार, यदि यह संविधान अधिनियमित नहीं किया गया होता तो, भारत डोमिनियन और तत्स्थानी प्रांत या तत्स्थानी देशी राज्य वाद ला सकते थे या उन पर वाद लाया जा सकता था”।

यह अनुच्छेद किसी वाद हेतु को जन्म नहीं देता किन्तु यह केवल यह कहता है कि राज्य वाद ला सकता है और उस पर वाद लाया जा सकता है वैसे ही जैसे किसी विधिक व्यक्ति की दशा में होता है। यह उन सभी विषयों में किया जा सकेगा जिनमें यदि यह संविधान अधिनियमित नहीं किया गया होता तो वाद लाया जा सकता था। यह शक्ति समुचित विधानमंडल द्वारा बनाए गए अधिनियम के अधीन होगी। अभी तक ऐसा कोई विधान नहीं बनाया गया है। इसलिए राज्य के दायित्व के बारे में अधिष्ठायी विधि के लिए हमें संविधान के प्रारंभ के पहले की विधि के बारे में निर्देश करना होता है।

वाद लाने का अधिकार

केंद्र सरकार भारत संघ के नाम से वाद ला सकती है और राज्य सरकार अपने राज्य के नाम से वाद ला सकती है उदाहरणार्थ मुम्बई राज्य। कोई भी सरकार किसी प्राइवेट व्यक्ति या किसी अन्य सरकार के विरुद्ध वाद ला सकती है, जैसे- संघ एक या अधिक राज्यों के विरुद्ध वाद ला सकता है, कोई राज्य किसी अन्य राज्य या संघ के विरुद्ध वाद ला सकता है (अनुच्छेद 131)।

वाद के प्रति दायित्व

इस विषय में संविदाजात दायित्व और अपकृत्य या सिविल दोष के विरुद्ध दायित्व के बीच विभेद करना होगा क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के समय से संविधान के प्रारंभ होने तक यह भेद किया जाता रहा है और संसद के विधान के अधीन रहते हुए, संविधान के अनुच्छेद 300 ने इस स्थिति को कायम रखा है।

  1. संविदा: भारत में संविदा के मामले में ईस्ट इंडिया कंपनी, सैक्रेटरी आफ स्टेट या विद्यमान सरकार के विरुद्ध सीधे वाद लाना अनुज्ञात किया गया था। इंग्लैण्ड में ब्रिटिश प्रजा सम्राटके विरुद्ध पिटिशन ऑफ राइट देकर वाद लाती थी। भारत शासन अधिनियम में सरकार को प्राइवेट व्यक्तियों से संविदा करने की शक्ति अभिव्यक्त रूप से दी गई और संविधान के अनुच्छेद 299(1) में तत्समान उपबंध करके इस स्थिति को बनाए रखा गया।
  2. अपकृत्य: विद्यमान विधि के अधीन राज्य का अपने सेवकों द्वारा किए गए अनुयोज्य दोषों के लिए क्या दायित्व है यह इतने सादे ढंग से नहीं कहा जा सकता, जितना संविदा के बारे में कहा जाता है। यह विधि अनावश्यक रूप से जटिल हो गई है, क्योंकि उसे सामान्य विधि के अधीन ब्रिटिश सम्राट की स्थिति पर आधारित किया गया है। ये दोनों ही बहुत पुराने हैं और इतिहास और विधि में परिवर्तन होने के कारण मानने योग्य नहीं हैं।

राज्य के प्रधान के विरुद्ध वाद

ऐतिहासिक कारणों से कुछ मामलों में राज्य को दायित्व से उन्मुक्ति है किंतु हमारे संविधान में किसी लोक सेवक को ऐसे शासकीय कृत्यों के लिए, जो देश की सामान्य विधि के अधीन विधि विरुद्ध है, कोई उन्मुक्ति नहीं दी गई है। इस नियम का अपवाद वह उन्मुक्ति है जो राज्य के अध्यक्षों को दी गई है अर्थात् राष्ट्रपति और राज्यपाल को। यह उनके पद पर रहते हुए किए गए सभी कार्यों के लिए है, चाहे वे राजनीतिक हो या वैयक्तिक (अनुच्छेद 361)।

राज्याध्यक्ष को शासकीय कृत्यों हेतु प्राप्त उन्मुक्तियां

राष्ट्रपति या राज्यपाल को अपने शासकीय कृत्यों के लिए दी गई उन्मुक्ति आत्यंतिक है किंतु यह राष्ट्रपति और राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से दी गई है। कोई अन्य व्यक्ति अपने विधिक दायित्व से इस आधार पर नहीं बच सकता कि वह कार्य राष्ट्रपति या राज्यपाल के आदेश के अधीन किया गया था।

राष्ट्रपति या राज्यपाल की विधिक कार्यवाही से उन्मुक्ति है और उनके विरुद्ध किसी न्यायालय में वाद नहीं लाया जा सकता। यह स्थिति उनके द्वारा किए गए या किए गए तात्पर्यिक किसी कार्य के लिए या संविधान द्वारा या किसी विधि द्वारा दी गई शक्तियों के प्रयोग में [अनुच्छेद 361(1)] या उसमें अधिकथित कर्तव्यों के अनुपालन में की गई किसी संविदा [अनुच्छेद 299(2)] के लिए है। यद्यपि शासकीय शक्तियों के प्रयोग में किए गए असांविधानिक कार्य के लिए राष्ट्रपति पर अनुच्छेद 61 के अधीन महाभियोग चलाया जा सकता है और राष्ट्रपति राज्यपाल को पदच्युत कर सकता है किंतु न्यायालयों में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।

इस व्यक्तिगत उन्मुक्ति के नियम से यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई न्यायालय राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी शक्ति का प्रयोग करने के लिए या किसी कर्तव्य का पालन करने के लिए विवश नहीं कर सकता। इसी प्रकार कोई न्यायालय उसे किसी शक्ति का प्रयोग करने से या किसी कर्तव्य का अनुपालन करने से विरत रहने के लिए भी विवश नहीं कर सकता। वह किसी न्यायालय द्वारा निकाली गई रिट या निर्देश के अधीन नहीं है।

राष्ट्रपति या राज्यपाल के सदोष शासकीय कृत्यों से व्यथित व्यक्ति की दो प्रकार के उपचार मिलते हैं-

  1. जहां ऐसी कार्यवाहियां हो सकती हैं वहां वह सरकार के विरुद्ध समुचित कार्यवाही करे [अनुच्छेद 361(1) का परन्तुक 2]।
  2. लोकसेवक के विरुद्ध जिसने राष्ट्रपति या राज्यपाल का सदोष आदेश निष्पादित किया था, उसे ही आदेश की परिधि या अपकृत्य संबंधी सामान्य विधि के अधीन रहते हुए उत्तर देना होगा।

पदावधि के दौरान व्यक्तिगत कार्य: राष्ट्रपति या राज्यपाल की अपनी पदावधि के दौरान किए गए अवैध व्यक्तिगत कार्यों के लिए उन्मुक्ति ऐसी अवधि के लिए ही परिसीमित है।

  1. अपराध के लिए उनके विरुद्ध जब तक वे पद पर बने रहते हैं तब तक कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। किंतु अवधि की समाप्ति पर, पदच्युत किए जाने पर या अन्यथा पदावधि के अवसान के पश्चात् ऐसी कार्यवाही किए जाने पर कोई रोक नहीं है।
  2. सिविल कार्यवाहियों के बारे में ऐसी कोई उन्मुक्ति नहीं है किंतु संविधान ने एक प्रक्रियात्मक शर्त लगा दी है। राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरुद्ध उनके व्यक्तिगत कार्यों की बावत सिविल कार्यवाहियां की जा सकती हैं। किंतु राष्ट्रपति या राज्यपाल को दो मास की लिखित पूर्व सूचना देने के पश्चात् ही ऐसा किया जा सकता है।
  • राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में वाद नहीं लाया जा सकता।
  • देश का कोई भी न्यायालय राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल की कर्तव्य पालन अथवा किसी शक्ति के अनुप्रयोग हेतु विवश नहीं कर सकता।
  • राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के विरुद्ध उनके व्यक्तिगत कार्यों के सम्बन्ध में दो माह पूर्व लिखित सूचना देकर सिविल कार्यवाही की जा सकती है।

मंत्रियों की स्थिति

इस संबंध में यह ध्यान देने योग्य है कि संविधान ने राष्ट्रपति या राज्यपाल को उनके शासकीय कृत्यों के लिए व्यक्तिगत उन्मुक्ति प्रदान की है किंतु मंत्रियों को ऐसी कोई उन्मुक्ति नहीं है। किंतु मंत्रियों की विचित्र स्थिति के कारण, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल के शासकीय कृत्य के लिए न्यायालय में मंत्री को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि शासकीय कृत्य राष्ट्रपति या राज्यपाल के नाम से किए जाते हैं।

लोक अधिकारियों की वादशक्यता

संविधान में सरकारी सेवकों द्वारा अपनी शासकीय या व्यक्तिगत हैसियत से किए गए विधि विरुद्ध कार्यों के लिए व्यक्तिगत दायित्व के बारे में कोई विभेद नहीं किया गया है। संविधान में लोक सेवकों के दायित्व के बारे में केवल एक उपबंध है किंतु साधारण विधि में उनके शासकीय कार्यों के बारे में दायित्व के संबंध में कुछ शर्ते अधिरोपित की गई हैं क्योंकि उनकी स्थिति विचित्र-सी है। इस बारे में विश्लेषण निम्न रूप में प्रस्तुत है-

संविदा करने पर

यदि सरकारी सेवक द्वारा अपनी शासकीय हैसियत से की गई संविदा अनुच्छेद 299 में अधिकथित औपचारिकताओं के पालन में की गई है। तो ऐसी संविदा की बाबत सम्पृक्त सरकार दायी होगी वह अधिकारी नहीं जिसने संविदा निष्पादित की थी [अनुच्छेद 299(2)]। किंतु यदि संविदा अनुच्छेद 299(2) के निर्बंधनों के अनुसार नहीं की गई है तो जिस अधिकारी ने उसका निष्पादन किया था वह उसके लिए विधिक रूप से उत्तरदायी होगा चाहे उसने संविदा से कोई व्यक्तिगत लाभ न उठाया हो।

अपकृत्य की स्थिति में

भारत में सरकार अपने प्रभुतासंपन्न कृत्यों के लिए क्षतिपूर्ति देने के लिए उत्तरदायी नहीं है ऐसे मामलों में जिस अधिकारी के माध्यम से कार्य किया जाता है उसे भी पूरी उन्मुक्ति है। अन्य मामलों में सरकार के विरुद्ध और व्यक्तिगत रूप से अधिकारी के विरुद्ध भी कार्यवाही की जा सकेगी जब तक कि-

  1. वह कार्य किसी अधिनियम द्वारा अधिरोपित कर्तव्यों के अनुपालन में सद्भावपूर्वक न किए गए हों।
  2. वह न्यायिक अधिकारी संरक्षण अधिनियम, 1850 के अर्थातर्गत न्यायिक अधिकारी न हो। इस अधिनियम द्वारा न्यायिक अधिकारी को उसके शासकीय कृत्यों के निर्वहन के लिए कार्यों में सिविल कार्यवाही से पूर्ण उन्मुक्ति दी गई है।

किंतु किसी लोक अधिकारी के विरुद्ध संविदा या अपकृत्य में सिविल कार्यवाही के लिए, जो ऐसे कार्यों के सम्बन्ध में हो जो लोक अधिकारी ने अपने शासकीय कृत्य में किए हो या जिसका इस प्रकार किया जाना तात्पर्यित हो, सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80-82 की प्रक्रिया संबंधी परिसीमाओं के अधीन होगी। इसमें यह भी अनिवार्य है कि ऐसा वाद लाने के दो मास पहले सूचना दी जानी चाहिए।

अपराध की स्थिति में

लोक सेवक का आपराधिक दायित्व वही है जो सामान्य नागरिक का है। इसके अपवाद हैं-

  1. न्यायिक कार्यों के लिए या न्यायिक आदेश के अनुसरण में किए गए कार्यों के लिए कोई दायित्व नहीं है (भारतीय दंड संहिता की धारा 77-78)।
  2. न्यायिक अधिकारियों से भिन्न अधिकारी को भी ऐसे कार्यो के लिए उन्मुक्ति है जो विधि या तथ्य संबंधी किसी भूल के कारण सद्भावपूर्वक यह समझता था कि ऐसा करना विधि द्वारा आबद्धकर है।
  3. जहां कोई लोक सेवक, जिसे केंद्र या राज्य सरकार द्वारा उसकी मंजूरी से ही अपने पद से हटाया जा सकता है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है जो उसने अपने शासकीय कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किया है या जिसका इस प्रकार किया जाना तात्पर्यित है तो कोई भी न्यायालय, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं करेगा।
  4. ऐसे क्षेत्र में, जिसमें सैन्य विधि प्रवृत्त थी, व्यवस्था बनाए रखने या पुनः स्थापित करने के लिए किए गए कार्य के लिए संसद उन्मुक्ति अधिनियम बनाकर ऐसे कार्यों को विधिमान्य बनाते हुए सम्पृक्त अधिकारियों को दायित्व से छूट दे सकती है (अनुच्छेद 34)।

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