संयुक्त राष्ट्र संघ United Nations Organisation - UNO

स्थापना

संयुक्त राष्ट्र संघ एक अंतरराष्ट्रीय अंतरसरकारी संगठन के निर्माण का विश्व का दूसरा प्रयास था। राष्ट्र संघ की असफलता ने एक ऐसे नये संगठन की स्थापना के विचार को जन्म दिया, जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक समतापूर्ण व न्यायोचित बनाने में केन्द्रीय भूमिका अदा कर सके। यह विचार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उभरा तथा 5 राष्ट्रमंडल सदस्यों तथा 8 यूरोपीय निर्वासित सरकारों द्वारा 12 जून, 1941 को लंदन में हस्ताक्षरित अंतर-मैत्री उद्घोषणा में पहली बार सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त हुआ। इस उद्घोषणा के अंतर्गत एक स्वतंत्र विश्व के निर्माण हेतु कार्य करने का आह्वान किया गया, जिसमें लोग शांति व सुरक्षा के साथ रह सकें।

इस घोषणा के उपरांत अटलांटिक चार्टर (14 अगस्त, 1941) पर हस्ताक्षर किये गये। इस चार्टर को संयुक्त राष्ट्र के जन्म का सूचक माना जाता है। इस चार्टर पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल तथा अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट द्वारा अटलांटिक महासागर में मौजूद एक  युद्धपोत पर हस्ताक्षर किये गये थे। अटलांटिक चार्टर ने एक ऐसे विश्व की आशा को अभिव्यक्त किया, जहां सभी लोग भयमुक्त वातावरण में रह सकें तथा निजीकरण एवं आर्थिक सहयोग के मार्ग की खोज कर सकें।

1 जनवरी, 1942 की वाशिंगटन में अटलांटिक चार्टर का समर्थन करने वाले 26 देशों ने संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पर हस्ताक्षर किये। यहां पहली बार राष्ट्रपति रूजवेल्ट द्वारा अभिकल्पित नाम संयुक्त राष्ट्र का प्रयोग किया गया।

इंग्लैंड, चीन, सोवियत संघ तथा अमेरिका द्वारा 30 अक्टूबर, 1943 को सामान्य सुरक्षा से सम्बंधित मास्को घोषणा पर हस्ताक्षर किये गये। यह घोषणा भी शांति बनाये रखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के विचार का अनुमोदन करती थी। नवंबर-दिसंबर 1943 में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट, ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल तथा सोवियत संघ के प्रधान (Premier) स्टालिन ने तेहरान में मुलाकात की तथा संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना हेतु विभिन्न योजनाओं पर विचार-विमर्श किया। यह द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मुख्य मित्र राष्ट्र नेताओं की प्रथम बैठक थी।

1944 में अगस्त से अक्टूबर तक सोवियत संघ, अमेरिका, चीन तथा ब्रिटेन के प्रतिनिधियों द्वारा वाशिंगटन के डम्बर्टन ओक्स एस्टेट में कई बैठकें आयोजित की गयीं, जिनका उद्देश्य एक शांतिरक्षक संगठन की योजना बनाना था। वे एक प्राथमिक योजना का खाका खींचने में सफल हुए। 7 अक्टूबर, 1944 को संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावित ढांचे को प्रकाशित किया गया। इन प्रस्तावों पर आगे चलकर याल्टा सम्मेलन (फरवरी 1945) में विचार-विमर्श किया गया, जहां सोवियत संघ, अमेरिका एवं ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक हुई थी। अंत में, अंतरराष्ट्रीय संगठन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में 50 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। 25 अप्रैल, 1945 को सेन फ्रांसिस्को में आयोजित इस सम्मेलन को सभी सम्मेलनों की समाप्ति करने वाला सम्मेलन माना जाता है। जहां नये संगठन का संविधान तैयार किया गया। 26 जून, 1945 की सभी 50 देशों ने चार्टर पर हस्ताक्षर किये। पोलैंड सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले सका था किंतु थोड़े समय बाद चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह भी संस्थापक सदस्यों की सूची में शामिल हो गया। लिखित अनुमोदनों की अपेक्षित संख्या अमेरिकी विदेश विभाग में जमा हो जाने के बाद 24 अक्टूबर, 1945 से चार्टर प्रभावी हो गया। 31 दिसंबर, 1945 तक सभी हस्ताक्षरकर्ता देश चार्टर का अनुमोदन कर चुके थे।

24 अक्टूबर को प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाता है

मुख्यालय

संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय न्यूयार्क में है। 14 दिसंबर, 1946 को संयुक्त राष्ट्र ने अपना मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका में रखने के पक्ष में मतदान किया। न्यूयार्क में ईस्ट नदी (East River) के किनारे सात हेक्टेयर भूमि खरीदने के लिए अमेरिका के जॉन डी. रॉकफेलर जूनियर ने 85 लाख डॉलर की रकम दान में दी। नगर प्रशासन द्वारा भी उस क्षेत्र में कुछ अतिरिक्त भूमि उपलब्ध करायी गयी। संगठन की इमारत 1952 में बनकर तैयार हुई। न्यूयार्क के लांग आईलैंड में लेक सक्सेस पर अस्थायी मुख्यालय बनाया गया था। 10 जनवरी, 1946 को लंदन में महासभा का प्रथम सत्र आयोजित हुआ था।

ध्वज

संयुक्त राष्ट्र के ध्वज को 1947 में आधिकारिक प्रतीक के रूप में अंगीकृत किया गया। ध्वज में हल्के नीले रंग की पृष्ठभूमि के अंतर्गत सफेद रंग से विश्व के वृत्ताकार मानचित्र (जैसाकि उत्तरी ध्रुव से दिखाई देता है) को दर्शाया गया है, जो जैतून की शाखाओं के हार द्वारा घिरा हुआ है। जैतून की शाखाएं शांति का प्रतीक हैं।

राष्ट्र संघ

राष्ट्र संघ, संयुक्त राष्ट्र संघ से पूर्व संगठन, देशों का अंतरराष्ट्रीय संगठन था जिसने 1920 और 1946 के बीच कार्य किया। प्रथम विश्व युद्ध और वर्साय की संधि इसके निर्माण के तुरंत उत्प्रेरक थे। विश्व युद्ध के विध्वंस को देखते हुए यह विश्व के नेताओं, विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ने एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की जो विभिन्न राष्ट्रों के बीच शांति बनाए रख सके। विल्सन का विश्वास था कि अंतरराष्ट्रीय अराजकता, शक्ति संतुलन और स्व-सहायता की अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में, विश्व युद्ध निरंतर होते रहेंगे, और जब तक प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहना होगा। ऐसी स्थिति में राष्ट्र प्रतिस्पर्धी समूह बनाएंगे, एक-दूसरे के विरुद्ध रक्षात्मक उपाय के तौर पर स्वयं की रक्षा उपकरणों से सुसज्जित करेंगे। अपने प्रसिद्ध 14 बिंदुओं के भाषण में राष्ट्रपति ने राष्ट्रों का एक सामान्य संघ बनाने का निवेदन किया जो छोटे और बड़े दोनों राष्ट्रों को एकसमान राजनीतिक स्वतंत्रता एवं क्षेत्रीय अखण्डता की परस्पर गारंटी दे सके। यह सामूहिक सुरक्षा का तंत्र होगा। यह 14 बिंदु राष्ट्र संघ के निर्माण का आधार बने।प्रथम विश्व युद्ध के विजेताओं- फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, इटली, जापान एवं अमेरिका - ने राष्ट्र संघ के लिए 1919 में एक संविधान तैयार किया। संविधान में ऐसे अनुच्छेद हैं जो सदस्य राष्ट्रों को सभी सदस्यों की युद्ध से रक्षा एवं उनकी स्वतंत्रता तथा क्षेत्रीय अक्षुण्णता का संरक्षण करने की शपथ दिलाते हैं। राष्ट्र संघ का औपचारिक रूप से गठन जनवरी 1920 में किया गया और इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में बनाया गया। इसकी स्थापना के समय इसमें 42 सदस्य राष्ट्र थे।राष्ट्र संघ के तीन मुख्य अंग थे- परिषद्, सभा एवं सचिवालय। परिषद् मुख्य शांति रक्षण अभिकरण थी।

राष्ट्र संघ के इतिह्रास में इसका आकार 8 से 14 सदस्यों के अनुसार परिवर्तित होता रहा। राष्ट्र संघ के सर्वाधिक शक्तिशाली सदस्यों की स्थायी सदस्यता प्राप्त थी। स्थायी सदस्यता प्राप्त देशों में समय-समय पर परिवर्तन होता रहा, लेकिन ग्रेट ब्रिटेन, इटली, सोवियत संघ, फ्रांस, जापान एवं जर्मनी की स्थायी सदस्यता बनी रही जब तक वे संघ में बने रहे। अन्य सदस्य तीन वर्षों के लिए चुने जाते थे परिषद् की वर्ष में तीन बार बैठक होती थी। विशेष प्रकार के राजनीतिक विवादों से निपटने का काम परिषद् का था।सभा में सभी सदस्य राष्ट्र होते थे, और प्रत्येक सदस्य का एक वोट होता था। इसके कार्यों में सामान्य नीति का निर्णय, राष्ट्र संघ के बजट का नियंत्रण, नए सदस्यों को शामिल करना, अस्थायी परिषद् सदस्यों का चुनाव और संविधान में संशोधन करना, शामिल थे। इसकी बैठक वार्षिक होती थी ।सचिवालय, पेपर वर्क देखता था, एजेंडा तैयार करना, प्रस्तावों को लिखना तथा लीग के निर्णयों पर रिपोर्ट तैयार करना जैसे कार्य इसके अंतर्गत थे। महासचिव इसका प्रमुख होता था, जिसे परिषद् द्वारा पद्नामित एवं सभा द्वारा अनुमोदन प्राप्त होता था।राष्ट्र संघ 1946 में समाप्त कर दिया गया। लेकिन देशों के बीच संबंधों के सुधार में इसके प्रयास को सराहा जाता रहा। इसने विभिन्न मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने में भी सफलता प्राप्त की। इसकी कई समितियों एवं आयोगों ने उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए।

राष्ट्र संघ की एक बेहद सफलता अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना करना था, जिसने सफलतापूर्वक बड़ी एवं वृहद् मात्रा में सूचना संग्रहण एवं प्रकाशन किया और अधिकतर सरकारें अधिकतम कार्य के घंटे, दिन एवं सप्ताह के निर्धारण, पर्याप्त न्यूनतम मजदूरी, बीमारी एवं बेरोजगारी, लाभ, वृद्धावस्था पेंशन इत्यादि के निर्धारण पर कदम उठाने के लिए इस पर निर्भर रहते थे।1920 के दशक के पूर्वार्द्ध में कई राजनीतिक विवाद लीग को सौंपे गए और इसके निर्णयों को स्वीकारा गया। हालांकि, इनमें से कोई भी विवाद इतना गंभीर नहीं था कि वह वैश्विक शांति के लिए खतरा बन सके, और न ही लीग के निर्णय प्रमुख बड़े राज्यों के विरुद्ध थे जो इसके निर्णयों को चुनौती दे सकते थे।

यद्यपि राष्ट्र संघ को कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं हुई, तथापि यह बात भी सत्य है कि इसके आने से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विकास में एक बड़ा एवं आमूल-चूल कदम उठाया गया।

भाषाएं

संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में अरबी, चीनी, फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी तथा स्पेनिश शामिल हैं। अरबी को छोड़कर शेष सभी कार्यकारी भाषाएं हैं।

उद्देश्य, लक्ष्य एवं सिद्धांत

संयुक्त राष्ट्र चार्टर ही संगठन का संविधान है। इसमें कुल 19 अध्याय हैं, जिन्हें 111 अनुच्छेदों में विभाजित किया गया है, जो संगठन के लक्ष्यों, सिद्धांतों तथा कार्यपद्धतियों को विश्लेषित करते हैं।

चार्टर की प्रस्तावना में संयुक्त राष्ट्र के चार मुख्य उद्देश्यों को रेखांकित किया गया है, जो इस प्रकार हैं-

  1. आगामी पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाना।
  2. मूलभूत मानवाधिकारों, मानवीय गरिमा व कार्यो, महिलाओं, पुरुषों व राष्ट्रों के समान अधिकारों में निष्ठा को पुनर्स्थापित करना।
  3. ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करना, जिनमें न्याय तथा संधियों या अन्य अंतरराष्ट्रीय कानूनी स्रोतों से उत्पन्न प्रतिबद्धताओं के प्रति सम्मान को कायम रखा जा सके।
  4. व्यापकतर स्वतंत्रता के अंतर्गत सामाजिक उन्नति एवं बेहतर जीवन स्तर को संवर्धित करना !

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 1 में इसके लक्ष्यों का निर्धारण किया गया है, जो निम्नलिखित हैं-

  1. अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा कायम रखना।
  2. राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बंधों का विकास करना।
  3. आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रकृति की समस्याओं को सुलझाने में सम्मान को प्रोत्साहित व संवर्द्धित करना।
  4. उपर्युक्त लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु राष्ट्रों की कार्यवाहियों के सामंजस्य केन्द्र के रूप में कार्य करना।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रस्तावना

लगभग 200 शब्दों की प्रस्तावना चार्टर के अध्यायों की भूमिका बताती है तथा संगठन की मार्ग-दर्शक भावना को अभिव्यक्त करती है। दक्षिण अफ्रीका के जान क्रिश्चियन स्मट्स को प्रस्तावना की रूपरेखा तैयार करने का श्रेय प्राप्त है। पूर्ण प्रस्तावना उद्धृत करती है कि-“हम संयुक्त राष्ट्र के लोग प्रतिबद्ध हैं आगामी पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका, जो हमारे जीवनकाल में दो बार मानव जाति को अकथनीय दुःख पहुंचा चुकी है, से बचाने के लिए, तथामूलभूत मानवाधिकारों, मानवीय प्रतिष्ठा, स्त्री पुरुष और छोटे-बड़े राष्ट्रों के समान अधिकारों में निष्ठा को पुनर्स्थापित करने के लिए, तथाऐसी परिस्थितियों की स्थापना के लिए, जिनके अंतर्गत संधियों व अंतरराष्ट्रीय विधि के अन्य स्रोतों से उपजी प्रतिबद्धताओं के प्रति सम्मान एवं न्याय को कायम रखा जा सके, तथाव्यापक स्वतंत्रता के वातावरण में सामाजिक उन्नति और बेहतर जीवन स्तरों को प्रोत्साहित करने के लिए,और इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा कायम रखने हेतु अपनी शक्ति को संगठित करने के लिए, तथा प्रणालियों की संस्था एवं सिद्धांतों के स्वीकरण द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए कि सशस्त्र बल का उपयोग सर्वहित को बचाने में ही किया जाए, तथा

सभी लोगों की समाजार्थिक उन्नति को प्रोत्साहन देने हेतु एन अंतर्राष्ट्रीय कार्यतंत्र की स्थापना के लिए,

अपने प्रयासों को संयुक्त करके इन उद्देश्यों की पूर्ति करने का संकल्प करते हैं।

हमारी सरकारें, जो अच्छे एवं अपेक्षित रूप में अपनी पूर्ण शक्तियों का प्रदर्शन कर चुकी हैं, सैन फ्रांसिस्को में एकत्रित अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र के वर्तमान चार्टर पर सहमत हुई हैं और इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र के रूप में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना करती हैं।”

चार्टर के अनुच्छेद 2 में संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों की पूर्ति हेतु निम्नलिखित सिद्धांतों को अपरिहार्य माना गया है-

  1. संगठन सभी सदस्यों की प्रभुसत्तात्मक समानता के सिद्धांत पर आधारित हो।
  2. सभी सदस्य चार्टर के अधीन ग्रहण की गयी प्रतिबद्धताओं का पालन सद्निष्ठा के साथ करें।
  3. सभी सदस्य अपने अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण साधनों के द्वारा ही करें।
  4. सभी सदस्य अपने अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों में शक्ति के प्रयोग या धमकी से परहेज रखें।
  5. वे संयुक्त राष्ट्र द्वारा चार्टर के अनुरूप की जाने वाली किसी भी कार्यवाही में हर प्रकार की सहायता प्रदान करें तथा ऐसे किसी भी राज्य की सहायता न दें, जिसके विरुद्ध संगठन द्वारा निवारक या दंडात्मक कार्यवाही की जा रही हो।
  6. संयुक्त राष्ट्र द्वारा यह भी सुनिश्चित किया गया है कि गैर-सदस्य राष्ट्र भी उस सीमा तक इन सिद्धांतों का पालन करें, जहां तक कि अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बनाये रखने की दृष्टि से यह अनिवार्य होता हो।
  7. संगठन द्वारा किसी राज्य के घरेलू मामलों में अनिवार्य रूप से हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा। फिर भी, यह प्रावधान शांति के उल्लंघन, शांति के लिए पैदा खतरे या आक्रमण अनुप्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।

सदस्यता वर्ष 2015 के मध्य तक संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या 193 थी। संस्थापक सदस्यों की संख्या 51 है, जबकि अन्य सदस्यों को चार्टर के अनुच्छेद 4 के अंतर्गत सुरक्षा परिषद की अनुशंसा पर महासभा द्वारा निर्वाचित किया जाता है।

संगठन की सदस्यता उन सभी शांतिप्रिय राज्यों के लिए खुली हुई है, जो चार्टर द्वारा अपेक्षित कर्तव्यों को वहन करने की इच्छा और सामर्थ्य रखते हैं। नये सदस्य को संगठन में प्रवेश पाने के लिए सुरक्षा परिषद के कम-से-कम नौ सदस्यों (पांच स्थायी सदस्यों सहित) के सकारात्मक मत तथा महासभा के दो-तिहाई बहुमत के समर्थन की आवश्यकता होती है।

चार्टर का उल्लंघन करने वाले सदस्य राष्ट्र की निलंबित या निष्कासित किया जा सकता है किंतु अभी तक इस प्रकार की कोई कार्यवाही अस्तित्व में नहीं आयी है। ताइवान तथा वेटिकन सिटी राज्य संयुक्त राष्ट्र के सदस्य नहीं हैं। इस प्रकार, संगठन की सार्वभौमिकता का लक्ष्य अभी तक पूरा नहीं हो सका है।

मुख्य अंग

चार्टर में संयुक्त राष्ट्र के छह अंगों की स्थापना का प्रावधान है, जिनमें महासभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक और सामाजिक परिषद्, न्यास परिषद्, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तथा सचिवालय शामिल हैं।

सहायक अंग

इसके अतिरिक्त विशिष्ट मामलों से निपटने के लिए सहायक या तदर्थ निकायों का गठन भी किया जाता है। इनमें शांतिरक्षण अभियानों पर विशेष समिति, मानवाधिकारों पर आयोग, निरस्त्रीकरण सम्मेलन, अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग, बाह्यतर अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर समिति, नाभिकीय विकिरण के प्रभावों पर वैज्ञानिक समिति, फिलीस्तिनियों के लिए समाधान आयोग, उपनिवेशों को स्वतंत्रता प्रदान करने की घोषणा के क्रियान्वयन पर विशेष समिति, दक्षिण अफ्रीकी सरकार की रंगभेद की नीतियों पर विशेष समिति इत्यादि।

महासभा के सहायक अंगों की समितियों, आयोगों, बोर्डों, परिषदों और पैनल तथा कार्यकारी समूहों एवं अन्य में विभाजित किया जाता है। एजेंडा के मदों पर विचार करने के पश्चात्, जहां संभव हो राज्यों की विभिन्न तरीकों में समन्वय करना, सहायक अंग अपनी अनुशंसाए प्रस्तुत करते हैं, यह सामान्यतः ड्राफ्ट्र प्रस्तावों के और निर्णयों के रूप में होता है, जिससे सभा में इस पर विचार हो सके। .

महासभा

महासभा एकमात्र ऐसा प्रमुख दीर्घ अंग है, जिसमे संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों का प्रतिनिधित्व होता है। इसे विश्व की नगर बैठक भी कहा जाता है। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र पांच प्रतिनिधियों को महासभा में भेज सकता है किंतु उनका मत एक ही माना जाता है। महासभा द्वारा प्रत्येक वार्षिक सत्र के आरंभ में एक नये अध्यक्ष, 21 उपाध्यक्षों तथा 7 मुख्य समितियों के अध्यक्षों का निर्वाचन किया जाता है। न्यायोचित भौगोलिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए महासभा की अध्यक्षता का भार प्रतिवर्ष चक्रानुक्रम आधार पर राष्ट्रों के 5 भौगोलिक समूहों (अफ्रीकी, एशियाई, पूर्वी यूरोपीय, लैटिन अमेरिकी, पश्चिमी यूरोपीय तथा अन्य राज्य) के मध्य सौंपा जाता है। अध्यक्ष का मुख्य कर्तव्य महासभा के विचार-विमशों को सही दिशा में आगे बढ़ाना तथा उसके कार्यो को निर्देशित करना है।

बैठकें

महासभा प्रतिवर्ष एक नियमित वार्षिक सत्र आयोजित करती है, जो 1 सितंबर के बाद आने वाले प्रथम मंगलवार की आरंभ होता है। विचार-विमर्श एवं वाद-विवाद सितंबर के तीसरे सप्ताह से आरंभ होते हैं और प्रायः मध्य दिसंबर तक जारी रहते हैं। सुरक्षा परिषद के विशेष आग्रह या सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के अनुरोध या बहुमत की सहमति प्राप्त सदस्य राष्ट्र के अनुरोध पर महासभा का विशेष सत्र आयोजित किया जा सकता है। समान तरीके द्वारा या सुरक्षा परिषद के 9 सदस्यों का मत समर्थन प्राप्त सुरक्षा परिषद के अनुरोध पर महासभा 24 घंटे के भीतर अपना आपातकालीन सत्र आयोजित कर सकती है।

मतदान

महासभा में मतदान हेतु प्रस्तुत अधिकांश प्रश्नों का निर्णय साधारण बहुमत द्वारा किया जाता है। कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के सम्बंध में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इनमें शांति व सुरक्षा सम्बंधी मुद्दे, नये सदस्यों का चुनाव तथा बजट इत्यादि शामिल हैं।

शक्तियां

महासभा संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक अंग के प्रति कुछ-न-कुछ उत्तरदायित्व रखती है। यह अन्य प्रमुख अंगों के सदस्यों का चुनाव करती है, जैसे-सुरक्षा परिषद के दस अस्थायी सदस्य, आर्थिक व सामाजिक परिषद के 54 सदस्य, न्यास परिषद के निर्वाचित सदस्य इत्यादि। यह सुरक्षा परिषद के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों का चुनाव करती है। महासभा द्वारा सुरक्षा परिषद की अनुशंसा पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की नियुक्ति की जाती है। इसे नये सदस्यों को संगठन में प्रवेश देने की शक्ति प्राप्त है। महासभा संयुक्त राष्ट्र के बजट को स्वीकृति देती है, संगठन के खचों को सदस्यों के बीच बांटती है तथा अन्य दूसरे अंगों से रिपोटें प्राप्त करके उन पर विचार-विमर्श करती है। इसे सहायक अंगों एवं तदर्थ समितियों की स्थापना करने की शक्ति भी प्राप्त है। यह संयुक्त राष्ट्र से सम्बंध रखने वाले किसी भी प्रश्न पर विचार कर सकती है। जब सदस्यों में मतैक्य के अभाव के कारण सुरक्षा परिषद शांति के उल्लंघन या आक्रमण की कार्यवाही की स्थिति में अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी की निभा पाने में असमर्थ हो जाती है, तब महासभा उस मुद्दे पर विचार कर सकती है और शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित अंतरराष्ट्रीय वातावरण की पुनर्स्थापना हेतु सामूहिक कार्यवाही का सुझाव दे सकती है। इस प्रकार शांतिरक्षण के सम्बंध में सुरक्षा परिषद के उत्तरदायित्वों को महासभा अनुपूरकता प्रदान करती है।

मुख्य समितियां

संयुक्त राष्ट्र चार्टर को अपने कार्य के निर्वहन हेतु जरुरी समितियां स्थापित करने का अधिकार दिया गया है। छह मुख्य समितियों में सभी सदस्य राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व होता है। ये समितियां हैं-

  • प्रथम समिति (निरस्त्रीकरण एवं अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित);
  • द्वितीय समिति (आर्थिक एवं वितीय);
  • तृतीय समिति (सामाजिक, मानवीय तथा सांस्कृतिक);
  • चतुर्थ समिति (विशेष राजनीतिक एवं विऔपनिवेशीकरण);
  • पंचम समिति (प्रशासक एवं बजटीय), तथा;
  • षष्टम समिति (वैधानिक)।

प्रत्येक समिति अपने से जुड़े विषयों पर सौंपे गये मामलों का अध्ययन करती है तथा महासभा के पास अपनी सिफारिशें भेजती है।

28 सदस्यीय सामान्य समिति (General Committee) द्वारा महासभा एवं उसकी समितियों की कार्यवाहियों में समन्वय किया जाता है। दो स्थायी समितियां भी कार्य करती हैं-

प्रथम, 16 सदस्यीय परामर्शदात्री समिति, जो प्रशासनिक एवं बजटीय प्रश्नों से सम्बद्ध है;

द्वितीय, 18 सदस्यीय योगदान समिति जो (Committee on Contributions) संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों द्वारा किए जाने वाले भुगतान का निर्धारण करने के सम्बंध में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करती है।

भारत और संयुक्त राष्ट्र

भारत, संयुक्त राष्ट्र के उन प्रारंभिक सदस्यों में शामिल था जिन्होंने 01 जनवरी, 1942 को वाशिंग्टन में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे तथा 25 अप्रैल से 26 जून, 1945 तक सेन फ्रांसिस्को में ऐतिहासिक संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन सम्मेलन में भी भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत, संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पुरजोर समर्थन करता है और चार्टर के उद्देश्यों को लागू करने तथा संयुक्त राष्ट्र के विशिष्ट कार्यक्रमों और एजेंसियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोणः राजनीतिक स्वतंत्रता और रंगभेद

स्वतंत्र भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सदस्यता को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण गारंटी के रूप में देखा। भारत, संयुक्त राष्ट्र के उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरूद्ध संघर्ष के अशांत दौर में सबसे आगे रहा। भारत औपनिवेशिक देशों और कौमों को आजादी दिए जाने के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक घोषणा 1960 का सह-प्रायोजक था जो उपनिवेशवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों को बिना शर्त समाप्त किए जाने की आवश्यकता की घोषणा करती है। भारत राजनीतिक स्वतंत्रता समिति (24 की समिति) का पहला अध्यक्ष भी निर्वाचित हुआ था जहां उपनिवेशवाद की समाप्ति के लिए उसके अनवरत प्रयास रिकार्ड पर हैं।

भारत, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और नस्लीय भेदभाव के सर्वाधिक मुखर आलोचकों में से था। वस्तुतः भारत संयुक्त राष्ट्र (1946 में) में इस मुद्दे को उठाने वाला पहला देश था और रंगभेद के विरूद्ध आम सभा द्वारा स्थापित उप समिति के गठन में अग्रणी भूमिका निभाई थी। जब 1965 में सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन से संबंधित कन्वेंशन पारित किया गया था, भारत सबसे पहले हस्ताक्षर करने वालों में शामिल था।

गुट निरपेक्ष आंदोलन और समूह-77 के संस्थापक सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में भारत की हैसियत, विकासशील देशों के सरोकारों और आकांक्षाओं तथा अधिकाधिक न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना के अग्रणी समर्थक के रूप में मजबूत हुई।

समकालीन प्राथमिकताएं: संयुक्त राष्ट्र सुधार, सतत् विकास, आतंकवादरोध एवं निरस्त्रीकरण

भारत को दृढ़ विश्वास है कि सयुंक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के आदर्श जिसका उसने पोषण किया है, आज की वैश्विक चुनौतियों का मुकाबला करने के सर्वाधिक प्रभावी साधन बने हुए हैं। भारत, हमारे सामने आ रही सभी समस्याओं के व्यापक और न्यायोचित समाधान के लिए बहुपक्षवाद की भावना से राष्ट्रों की समिति के साथ कार्य करने के अपने प्रयासों में अडिग है। इन समस्याओं में विकास और गरीबी उन्मूलन, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, समुद्री डकैती, निरस्त्रीकरण, शांति स्थापना और मानवाधिकार शामिल हैं।

भारत यह सुनिश्चित करने के लिए समान विचारधारा वाले देशों के साथ सहयोग कर रहा है कि सतत् विकास पर चर्चा गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित रहे और कि 2015 के पश्चात विकास की कार्यसूची को मूर्त रूप प्रदान करने से संबंधित वैश्विक संवाद में आरआईओ सिद्धांत अटल रहें। भारत समान और साझा किंतु अलग-अलग जिम्मेदारी के सिद्धांतों के आधार पर एक व्यापक, न्यायोचित और संतुलित परिणाम के जरिए जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत सभी प्रकार के आतंकवाद के प्रति 'पूर्ण असहिष्णुता' के दृष्टिकोण का समर्थन करता रहा है। आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक कानूनी रूपरेखा प्रदान करने के उद्देश्य से भारत ने 1996 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के संबंध में व्यापक कन्वेंशन का मसौदा तैयार करने की पहल की थी और उसे शीघ्र अति शीघ्र पारित किए जाने के लिए कार्य कर रहा है।

शांति स्थापना और निरस्त्रीकरण, संयुक्त राष्ट्र के अत्यधिक विशेष प्रयासों में शामिल है क्योंकि वे इस दुनिया को बेहतर स्थान बनाने के लिए संगठन के आश्वासन और सहज संभावना को साकार करते हैं। 43 शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी के साथ भारत का संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी का गौरवशाली इतिहास रहा है और यह 1950 के दशक से ही इन अभियानों में शामिल होता रहा है।

भारत, परमाणु हथियारों से संपन्न एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जो परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने और उन्हें समाप्त करने के लिए परमाणु अस्त्र कन्वेंशन की स्पष्ट रूप से मांग करता रहा है। भारत समयबद्ध, सार्वभौमिक, निष्पक्ष, चरणबद्ध और सत्यापन योग्य रूप में परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है जैसा कि सन् 1998 में आम सभा के निरस्त्रीकरण से संबंधित विशेष अधिवेशन में पेश की गई राजीव गांधी कार्य योजना में प्रतिबिम्बित होता है।

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