भारतीय संविधान का दर्शन The Philosophy of The Indian Constitution

प्रत्येक संविधान का अपना एक दर्शन होता है। संविधान के दर्शन का अभिप्राय उन आदशों से है, जिनसे भारतीय संविधान अभिप्रेरित हुआ और उन नीतियों से है जिन पर हमारा संविधान और शासन प्रणाली आधारित है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना

22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा ने जिस उद्देश्य प्रस्ताव को अंगीकार किया था, उसे जवाहर लाल नेहरू ने 15 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा में अत्यंत प्रेरणात्मक और महत्वपूर्ण भाषण के रूप में प्रस्तुत किया था। यही उद्देश्य प्रस्ताव भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार है। यही उद्देश्य ही संवैधानिक सिद्धांतों का शिलान्यास करते हुए संविधान की विचारधारा का निर्माण करते हैं।

भारतीय संविधान की अंतरात्मा न्याय, समता, अधिकार और बंधुत्व के आसव से अभिसिंचित है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय हमारे वर्तमान संविधान की नियामक महत्वाकांक्षाओं में से एक है।

जवाहरलाल नेहरू द्वारा जिन आदर्शों को प्रस्तुत किया गया, वे निम्नलिखित हैं-

  1. संविधान सभा दृढ़तापूर्वक, सत्यनिष्ठा से भारतको एक सम्पूर्ण प्रभुसत्ता-संपन्न गणराज्य घोषित करती है और उसके भावी प्रशासन के लिए एक संविधान की संरचना करने का वचन देती है।
  2. इसमें ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र, भारतीय राज्यों के क्षेत्र और वह क्षेत्र जो ब्रिटिश भारत और भारतीय राज्यों की सीमा से बाहर है और जो स्वतंत्र, प्रभुता संपन्न भारत के संवैधानिक भाग बनना चाहते हैं, सब को एकीकृत किया जाएगा।
  3. ये सभी क्षेत्र अपनी वर्तमान सीमाओं अथवा संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के साथ भारत के स्वायत्त एकक माने जाएंगे। संघ के लिए नियोजित अथवा अन्तर्निहित शक्तियों के अतिरिक्त वह सरकार और प्रशासन के लिए सभी अवशिष्ट शक्तियों का प्रयोग करेंगे।
  4. स्वतंत्र भारत की संपूर्ण शक्ति और सत्ता, इसके संविधायी संघटक तथा प्रशासनिक उपकरण भारतीय जनता से व्युत्पन्न हैं।
  5. भारत की जनता को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय की गारंटी दी जाएगी। कानून और सार्वजनिक नैतिकता के अंतर्गत सब  को पदोन्नति के समान अवसर, विचार की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति, धर्म, आस्था, उपासना, व्यवसाय, साहचर्य तथा कार्यकारिता के अवसर प्रदान किए जाएंगे।
  6. इसमें अल्पसंख्यकों, पिचड़े तथा आदिवासियों और दलितों एवं अन्य पिचड़े वर्गों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
  7. भारत के गणराज्य के क्षेत्रों और धरती, समुद्रों और वायु पर उसके अधिकारों को सभ्य राष्ट्रों के नियमों के अनुसार सुरक्षित रखा जाएगा।
  8. इस प्राचीन देश की विश्व में न्याय संगत और सम्मानित स्थान प्राप्त हुआ है और यह विश्व-शांति तथा मानव-कल्याण के लिए जी जान से सहयोग देगा।

संविधान की प्रस्तावना में इन सभी आदर्शों को समाहित किया गया है। मूल रूप से संविधान की प्रस्तावना नेहरू द्वारा प्रस्तुत तथा सर्वसम्मति से संविधान सभा द्वारा अंगीकृत उद्देश्यों के प्रस्ताव पर आधारित है। कानून की दृष्टि से प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है, किंतु व्यवहार में यही कार्यपालिका और व्यवस्थापिका का मार्ग-दर्शन करने वाला प्रकाश-स्तम्भ है।

संविधान की प्रस्तावना
हम, भारत के लोग, भारत की एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को:सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक न्याय

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए

तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता

और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ने के लिए

दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26-11-1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान की अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं

(इसमें समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़े गए)

प्रस्तावना का महत्व

उच्चतम न्यायालय के अनेक निर्णयों में प्रस्तावना का महत्व और उसकी उपयोगिता बताई गई है। प्रस्तावना को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं किया जा सकता [गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) एस.सी.आर.88 (198), यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मदन गोपाल (1954) एस.सी.आर. 541;555], लेकिन लिखित संविधान की प्रस्तावना में वे उद्देश्य लेखबद्ध किए जाते हैं जिनकी स्थापना और प्रवर्तन के लिए संविधान की रचना होती है। बेरुबाड़ी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने इस बात से सहमति प्रकट की थी कि प्रस्तावना संविधान निर्माताओं के मन की कुंजी है। जहां शब्द अस्पष्ट पाए जाएं या उनका अर्थ स्पष्ट न हो, वहां संविधान निर्माताओं के आशय को समझने के लिए प्रस्तावना आर्थात उद्देशिका की सहायता ली जा सकती है और पता लगाया जा सकता है कि उस शब्द विशेष का प्रयोग व्यापक संदर्भ में किया गया है या संकीर्ण संदर्भ में। इस संबंध में उल्लेखनीय है कि, इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं माना था, जबकि बाद में केशवानंद भारती वाद में इसे संविधान का अंग घोषित कर दिया गया।

सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य के मामले में न्यायमूर्ति मघोलकर ने कहा था कि प्रस्तावना पर गहन विचार-विमर्श की छाप है, उस पर सुस्पष्टता का ठप्पा है और उसे संविधान निर्माताओं ने विशेष महत्व दिया है।

प्रस्तावना के आदर्श एवं लक्ष्य

उद्देशिका से दो प्रयोजन सिद्ध होते हैं-

  1. उद्देशिका यह बताती है कि संविधान के प्राधिकार का स्रोत क्या है;
  2. वह यह भी बताती है कि संविधान किन उद्देश्यों की संवर्द्धित या प्राप्त करना चाहता है।

इन आदशों का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है-

स्वतंत्रता और प्रभुता संपन्न

भारत का संविधान ब्रिटिश संसद की देन नहीं है। इसे भारत के लोगों ने एक प्रभुत्वसंपन्न संविधान सभा में समवेत अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अधिकथित किया था। “हम भारत के लोग... इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं” ये शब्द भारत के लोगों की सर्वोच्च प्रभुता की घोषणा करते हैं और इस बात की ओर संकेत करते हैं कि संविधान का आधार उन लोगों का प्राधिकार है। 26 जनवरी, 1950 की जब संविधान प्रवृत्त हुआ, इंग्लैंड के सम्राट का भारत में कोई विधिक या सांविधानिक प्राधिकार नहीं रहा। संपूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न या सार्वभौम शब्द का प्रयोग किया जाना इस बात का द्योतक है कि भारत के आंतरिक तथा वैदेशिक मामलों में भारत सरकार सार्वभौम तथा स्वतंत्र है।

शासन के लक्ष्यों की घोषणा

प्रस्तावना में शासन के तीनों अंगों (कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका) के ध्येयों की स्पष्ट रूप से घोषणा की गई है। प्रस्तावना के अनुसार भारतीय गणतंत्र के 4 प्रमुख ध्येय हैं- न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व। भारतीय संविधान निर्माता इस तथ्य से पूर्णतः भिज्ञ थे कि सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता नगण्य है अतः उन्होंने स्वतंत्रता, समानता एवं भातृत्व के आदर्श सिद्धांतों पर भारत के संविधान को आधार प्रदान किया।

लोकतांत्रिक गणराज्य

संविधान की प्रस्तावना में भारत की एक लोकतांत्रिक राज्य घोषित किया गया है। प्रस्तावना में लोकतंत्रात्मक गणराज्य का जो चित्र है वह लोकतंत्र, राजनैतिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टिकोण से है अर्थात्न केवल शासन में लोकतंत्र होगा बल्कि समाज भी लोकतंत्रात्मक होगा, जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता की भावना होगी। राजशक्ति पर किसी एक वर्ग विशेष का एकाधिकार नहीं होगा और शासन का संचालन बहुमत के सिद्धांत के आधार पर होगा। उन्हीं कानूनों को लागू किया जाएगा जिन्हें जनता का समर्थन प्राप्त होगा। प्रस्तावना में गणराज्य शब्द का उपयोग इस विषय पर प्रकाश डालता है कि दो प्रकार की लोकतंत्रीय व्यवस्थाओं वंशानुगत लोकतंत्र तथा लोकतंत्रीय गणतंत्र में से भारतीय संविधान के अंतर्गत लोकतंत्रीय गणतंत्र को अपनाया गया है।

न्याय

न्याय की स्वतंत्रता और रक्षा के लिए भारतीय संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया है। उद्देशिका में सभी नागरिकों को न्याय का आश्वासन दिया गया है। न्याय का अर्थ है - व्यक्तियों के परस्पर हितों, समूहों के परस्पर हितों के बीच और एक के बीच सामंजस्य स्थापित हो। न्याय की संकल्पना वस्तुतः अति व्यापक है। यह केवल संकीर्ण कानूनी न्याय तक सीमित नहीं, जो न्यायालयों द्वारा दिया जाता है। इसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी तरह के न्याय को महत्व दिया गया है।

सामाजिक न्याय से अभिप्राय है कि मानव-मानव के बीच में जाति, वर्ण के आधार पर भेद न माना जाए और प्रत्येक नागरिक को उन्नति के समुचित अवसर सुलभ हों। आर्थिक न्याय से अभिप्राय है कि उत्पादन एवं वितरण के साधनों का न्यायोचित वितरण हो और धन सम्पदा का केवल कुछ ही हाथों में केंद्रीकरण न हो जाए। राजनीतिक न्याय का अभिप्राय है कि राज्य के अंतर्गत समस्त नागरिकों को समान रूप से नागरिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों। इस प्रकार प्रस्तावना में उपबंधित न्याय के विचार से लोक कल्याणकारी राज्य का विचार दृष्टिगोचर होता है और नागरिकों को अन्य क्षेत्रों में न्याय का आश्वासन भी दिया गया है।

स्वतत्रता

संविधान की उद्देशिका में स्वतंत्रता का तात्पर्य केवल नियंत्रण या आधिपत्य का अभाव ही नहीं है। इसमें विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता के अधिकार की सकारात्मक संकल्पना है। इस सकारात्मक अर्थ बोध में स्वतंत्रता का अर्थ है- किसी व्यक्ति की अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता।

मतदान में भाग लेना, प्रतिनिधियों को चुनना, निर्वाचन में खड़ा होना, सार्वजनिक पद पर नियुक्ति का अधिकार, सरकारी नीतियों की आलोचना करना आदि राजनीतिक स्वतंत्रताए हैं।

समानता

राजनीति विज्ञान के संदर्भ में समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी पुरुष तथा स्त्रियां सभी परिस्थितियों में समान हैं। उनके बीच शारीरिक, मानसिक और आर्थिक अंतर तो होंगे ही। समानता से अभिप्राय है कि अपने व्यक्तित्व के समुचित विकास के लिए प्रत्येक मनुष्य को समान अवसर उपलब्ध होने चाहिए। सभी नागरिकों की देश के शासन विधान में समान भाग मिलना चाहिए। समान योग्यता और समान श्रम के लिए वेतन भी समान होना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी एक व्यक्ति या एक वर्ग को अन्य व्यक्तियों या वगों के शोषण करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। भारतीय संविधान की नजर में सभी नागरिक समान होंगे और उन्हें देश की विधियों का समान रूप से संरक्षण प्राप्त होगा। संविधान की प्रस्तावना में सभी नागरिकों को स्थान और अवसर की समता भी प्रदान की गई है। सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश तथा लोक नियोजन के विषय में धर्म, मूलवंश, जाति, स्त्री-पुरुष या जन्म स्थान के आधार पर एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच कोई विभेद नहीं होगा।

बंधुत्व

सर्वसामान्य नागरिकता से संबंधित उपबंधों का उद्देश्य भारतीय बंधुत्व की भावना को मजबूत करना तथा एक सुदृढ़ लोकतंत्र का निर्माण करना है। यदि सभी लोगों के बीच बंधुता की भावना उत्पन्न नहीं होगी तो भारतीय लोकतंत्र कमजोर हो सकता है। यह भावना होनी चाहिए कि हम सभी एक ही भूमि के, एक ही मातृभूमि के पुत्र हैं। यह भारत जैसे देश के लिए और भी आवश्यक है क्योंकि यहां के लोग विभिन्न मूलवंश, धर्म, भाषा और संस्कृति वाले हैं।

बंधुता का एक अंतरराष्ट्रीय पक्ष भी है जो विश्व-बंधुत्व की संकल्पना वसुधैव कुटुंबकम अर्थात् संपूर्ण विश्व एक परिवार है- के प्राचीन भारतीय आदर्श की ओर ले जाता है। इसे संविधान के अनुच्छेद 51 में नीति-निदेशक सिद्धांतों के अंतर्गत स्पष्ट किया गया है।

समाजवाद

समाजवादी शब्द मूलतः उद्देशिका में समाविष्ट नहीं था बल्कि इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के द्वारा संविधान की उद्देशिका में अंतर्निर्हित किया गया है।

समाजवादी शब्द का आशय यह है कि-  ऐसी संरचना जिंसमें उत्पादन के मुख्य साधनों, पूंजी, जमीन, सम्पति आदि पर सार्वजनिक स्वामित्वया नियंत्रण के साथ वितरण में समतुल्य सामंजस्य हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय संविधान निजी सम्पत्ति के उन्मूलन में विश्वास रखता है बल्कि यह उस पर कुछ निर्बंधन लगाता है, जिससे उसका उपयोग राष्ट्रीय हित में किया जा सके।

आर्थिक क्षेत्र में राज्य का बढ़ता हुआ हस्तक्षेप और भागीदारी वर्तमान सदी का एक विशिष्ट उप-लक्षण है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं जहां विभिन्न आर्थिक, औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्र के प्रबंध में वहां की सरकार सक्रिय रूप से भाग न लेती हो। आमतौर से इसकी राज्य की प्रक्रिया पर समाजवाद का प्रभाव माना जाता है।

भारतीय संविधान में किए गए अनेक संशोधनों से यह स्पष्ट होता है कि इसकी प्रगति की दिशा लोकतांत्रिक नहीं, सामाजिक आदशों की ओर उन्मुख है और इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ये संशोधन किए जाते रहे हैं।

पंथनिरपेक्ष

राज्य अनेक मतों के मानने वाले भारत के लोगों की एकता और उनमें बंधुता स्थापित करने के लिए संविधान में पंथनिरपेक्ष राज्य का आदर्श रखा गया है। इसका अर्थ है कि राज्य सभी मतों की समान रूप से रक्षा करेगा और स्वयं किसी भी मत की राज्य के धर्म के रूप में नहीं मानेगा।

राज्य के इस पंथनिरपेक्ष उद्देश्य को 42वें संविधान संशोधन, 1976 के द्वारा उद्देशिका में अंतःस्थापित करके सुनिश्चित किया गया है। इसे अनुच्छेद 25-29 में धर्म की स्वतंत्रता से संबंधित सभी नागरिकों के मूल अधिकार के रूप में समाविष्ट करके क्रियान्वित किया गया है। ये अधिकार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देते हैं तथा राज्य की ओर से और इसके साथ ही राज्य की विभिन्न संस्थाओं की ओर से सभी धर्मो के प्रतिपूर्ण निष्पक्षता सुनिश्चित करते हैं। भारतीय संदर्भ में डोनाल्ड यूजीन स्मिथ की पंथनिरपेक्षता की संकल्पना इस प्रकार है- पंथनिरपेक्ष राज्य वह राज्य है जो धर्म की व्यक्तिगत तथा समवेत स्वतंत्रता प्रदान करता है, जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है और जो धर्म का न तो प्रचार करता है तथा न ही उसमें हस्तक्षेप करता है

भारत एक धर्म प्रधान देश रहा है, फिर भी यहां धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाया गया। पश्चिम के कतिपय प्रगतिशील देशों ने अपने यहां के प्रचलित प्रधान धर्म को राज्य धर्म के रूप में ग्रहण कर रखा है। फिर भी भारत में नए संविधान और लोकतंत्र की स्थापना करते समय धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत अपनाया गया जबकि भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र ही धर्म रहा है, धर्म ही भारतीयों का प्राण रहा है, उनका सम्पूर्ण जीवन धर्म से ओत-प्रोत रहा है। पुरुषार्थ, धर्म, अर्थऔर काम के अंतर्गत धर्म को अत्यधिक महत्व दिया गया है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाये जाने के कारणों के पक्ष में प्रसिद्ध विधिवेत्ता डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी के अनुसार- यह राष्ट्रीय एकीकरण का एक साकार विचार है जिसमें राष्ट्रीय जीवन की बिखरी हुई सम्पन्नता को पल्लवित करने की क्षमता है।

धर्मनिरपेक्षता ही भारत की राष्ट्रीयता का आधार है। धर्मनिरपेक्षता विविधता में एकता और हमारे देश की गौरवमयी विभिन्नताओं के प्रति हमारे आदर का प्रतीक हैं। धर्मनिरपेक्षता अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों के सर्वोत्तम तत्वों के साथ हमारे आत्मविश्वास भरे सम्पर्क की दीर्घ परम्परा का परिणाम है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का विरोध या अधार्मिकता नहीं है; अपितु, इसका अर्थ है-सर्वधर्म समभाव अर्थात् सभी धर्मों को समान आदर देना, चाहे वह बहुसंख्यकों का धर्म हो या अल्पसंख्यकों का। धर्मनिरपेक्षता में प्रत्येक व्यक्ति को पूजा और प्रचार की पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है, लेकिन राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और वह किसी धर्म विशेष के आधार पर अपने किसी भी नागरिक के साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव और पक्षपात् का निषेध करता है।

राष्ट्रीय एकता

भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक इत्यादि की पर्याप्त विविधता होते हुए भी सम्पूर्ण भारत एक है। अतः भारतीय संविधान की प्रस्तावना में राष्ट्रीय एकता पर पर्याप्त बल प्रदान किया गया है। प्रस्तावना में उन दो विशेष आधारों पर बल प्रदान किया गया है, जिनके माध्यम से राष्ट्रीय एकता दृढ़ होती है-

  1. प्रस्तावना में व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं महत्व पर बल दिया गया है। व्यक्ति को लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण इकाई मानते हुए राष्ट्रीय एकता को एक महत्वपूर्ण आधार माना गया है। राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना की जागृति, व्यक्ति के स्वाभिमान की भावना से सम्बन्धित है, परंतु व्यक्ति के स्वाभिमान की भावना राज्य एवं समाज में, उसके महत्व को स्वीकार करने पर निर्भर है। यदि राज्य तथा समाज में को उसकी उचित प्रतिष्ठा तथा अधिकार प्राप्त हैं। यह स्वाभाविक कि नागरिक के रूप में देश के प्रति उसकी आस्था बनी रहेगी तथा इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय भावना तथा एकता दृढ़ होगी।
  2. माना जाता है कि, समाज एवं राज्यद्वारा व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं अधिकारों की स्वीकृति, राज्य तथा समाज में नागरिकों के मध्य बन्धुत्व अथवा स्नेह की भावना प्रज्ज्वलित करेगी, जिससे राष्ट्रीय एकता दृढ़ होगी।

इस प्रकार, प्रस्तावना में निहित इन दो आधारों पर संविधान निर्माताओं द्वारा राष्ट्रीय एकता को दृढ़ नानाने का आश्वासन दिया गया है।

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