भारतीय राष्ट्रवाद का युग The Era Of Indian Nationalism

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर विभिन्न शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। युद्धोपरांत, भारत में राष्ट्रवादी गतिविधियां पुनः प्रारंभ हो गयीं लेकिन एशिया एवं अफ्रीका के अन्य उपनिवेश भी युद्ध के प्रभाव से अछूते नहीं रहे और इन उपनिवेशों में भी साम्राज्यवाद विरोधी शक्तियां सिर उठाने लगीं । ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने इस समय एक निर्णायक मोड़ लिया। इसका सबसे प्रमुख कारण था-भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर महात्मा गांधी का अभ्युदय। राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी के प्रवेश के बाद इसके जनाधार एवं लोकप्रियता में अपार वृद्धि हुई तथा यह सम्पूर्ण भारतीय जनमानस का आंदोलन बन गया।

राष्ट्रवाद के पुनः जीवंत होने के कारण

युद्धोपरांत उत्पन्न हुई आर्थिक कठिनाइयां

प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के पश्चात् भारतीयों को अनेक क्षेत्रों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

उद्योग मूल्यों में अत्यधिक वृद्धि- इसके पश्चात् भारतीय उद्योगों में विदेशी पूंजी निवेश को प्रोत्साहन देने के कारण भारतीयों के स्वामित्व वाले उद्योगों में इसका काफी बुरा प्रभाव पड़ा। इसके फलस्वरूप कई उद्योग न केवल रुग्णता के शिकार हो गये बल्कि बंद भी हो गये। फलतः भारतीय उद्योगपति सरकार से सहायता तथा उनके उत्पादों के विरुद्ध आयात को बंद किये जाने की मांग करने लगे।

दस्तकार और शिल्पकार- अंग्रेजी शासन के कारण यह वर्ग बर्बाद हो गया। ये लोग जहां एक ओर भारी संख्या में बेरोजगार हो गये, वहीं दूसरी ओर मंहगाई की इन पर दोहरी मार पड़ी।

कृषक- ये भारी करापोषण तथा निर्धनता से त्रस्त थे। ये किसी ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में थे, जिसमें वे अपने विरोध स्वर को मुखरित कर सकें।


सैनिक- विदेशों में नियुक्त भारतीय सैनिक युद्ध के पश्चात् जब वापस आये तो उन्होंने अपने युद्ध के अनुभव भारतीयों को सुनाए तथा उन्हें साम्राज्यवाद का विरोध करने हेतु प्रोत्साहित किया।

शिक्षित शहरी वर्ग- यह वर्ग बेरोजगारी की समस्या से बुरी तरह पीड़ित था।

इन कठिनाइयों से भारतीयों का लगभग हर वर्ग त्रस्त था तथा ब्रिटिश शासकों की अकर्मण्यता ने इसे और बदतर बना दिया। फलतः समाज का हर वर्ग आदोलन में भागीदारी हेतु उद्वेलित हो उठा।

विश्वव्यापी साम्राज्यवाद से राष्ट्रवादियों का मोहभंग होना

युद्ध में सम्मिलित सभी साम्राज्यवादी राष्ट्रों ने अपने उपनिवेशों को विभिन्न आश्वासन दिये। उन्होंने विश्वास दिलाया कि युद्धोपरांत सभी उपनिवेशों में लोकतंत्र एवं आत्म-निर्णय का नया युग प्रारम्भ किया जायेगा। युद्ध में सम्मिलित दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की कलंकित करने का भरपूर प्रयास किया तथा एक-दूसरे के अत्याचारी-अमानवीय कायों तथा उपनिवेशवादी तथा शोषणात्मक ब्यौरों को सार्वजनिक किया। किन्तु शीघ्र ही पेरिस शांति सम्मेलन तथा कुछ अन्य तात्कालिक शांति सम्मेलनों से साम्राज्यवादियों की यह मंशा स्पष्ट हो गयी कि वे अपने उपनिवेशों में अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते। इन सम्मेलनों में वे विजित उपनिवेशों को बांटने में जुट गये। युद्ध में अंग्रेजों की सांस्कृतिक तथा सैन्य श्रेष्ठता का मिथक टूट गया। इन सभी के परिणामस्वरूप, युद्धोपरांत एशिया तथा अफ्रीका के विभिन्न देशों यथा- तुर्की, मिस्र, इरान, अफगानिस्तान, बर्मा, मलाया, फिलीपीन्स, इंडोनेशिया, हिन्द-चीन, चीन तथा कोरिया इत्यादि में उग्र-राष्ट्रवादी गतिविधयां प्रारंभ हो गयीं।

रूसी क्रांति का प्रभाव

7 नवंबर 1917 को सम्पन्न हुई रूस की क्रांति में बोल्शेविक दल के समर्थकों ने रूस के निरंकुश, स्वेच्छाचारी व अत्याचारी जारशाही का शासन समाप्त कर दिया तथा वी.आई. लेनिन के नेतृत्व में प्रथम समाजवादी राज्य ‘सोवियत संघ' की स्थापना की। सोवियत संघ ने शीघ्र ही चीन तथा एशिया के अन्य भागों से जारशाही के साम्राज्यवादी अधिकारों को समाप्त करने की घोषणा की तथा जारशाही के अधीन सभी एशियाई उपनिवेशों को आत्मनिर्णय के अधिकार दिये तथा उनकी सीमाओं के साथ उन्हें समान दर्जा प्रदान किया।

इस क्रांति से यह बात सिद्ध हो गयी कि जनसमूह की एकता में अपार शक्ति है तथा वह जार जैसी निष्ठुर महाशक्ति को भी समूल नष्ट कर सकती है। इस क्रांति से यह संदेश भी मिला कि संगठित, संयुक्त एवं दृढ़निश्चयी जनसमूह किसी भी साम्राज्यवादी शासन को समाप्त कर सकता है।

भारत में अंग्रेज किसी प्रकार से शक्ति का बंटवारा नहीं चाहते थे तथा वे भारतीयों को प्रशासन में भागीदार बनाये जाने के किसी भी प्रयास के विरुद्ध थे। उनकी नीति, भारतीयों को लालच या भ्रम में रखकर उन पर शासन करते रहने की थी। ब्रिटेन, महायुद्ध के समय की राष्ट्रवादी क्रांतिकारी गतिविधियों से अत्यन्त रूष्ट था तथा वह किसी भी प्रकार उनको भुलाने के लिये तैयार न था। फलतः कांग्रेस के उदारवादियों को संतुष्ट करने के लिये उसने एक ओर 1919 में माटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार प्रस्तुत किये, वहीं दूसरी ओर क्रांतिकारियों का दमन करने के लिये रोलेट एक्ट बनाया।

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