प्रान्तीय राजवंश: उड़ीसा Provincial Dynasty: Orissa

उड़ीसा को एक शक्तिशाली राज्य के रूप में अनन्तवर्मन् चोडगंग ने अपने सत्तर वर्षों से भी अधिक लम्बे राज्यकाल (करीब 1076-1148 ई.) में संगठित किया था। अनेक अभिलेखों से यह पता चलता है कि उस समय राज्य गंगा के मुहाने से दक्षिण में गोदावरी के मुहाने तक फैला था। शान्ति के क्षेत्र में भी चोडगंग की सफलताएँ अपूर्व रहीं। वह धर्म तथा संस्कृत एवं तेलुगु साहित्य का आश्रयदाता था। पुरी का विशाल जगन्नाथ मंदिर उसके राज्य काल में उड़ीसा की कलात्मक शक्ति एवं समृद्धि के देदीप्यमान स्मारक के रूप में खड़ा है। चोडगंग के उत्तराधिकारियों ने सफलतापूर्वक मुसलमानों के आक्रमणों को रोका तथा अपने राज्य की समृद्धि को बनाये रखा। उनमें सबसे विख्यात था नरसिंह प्रथम (1238-1264 ई.), जिसने, बंगाल के मुस्लिमों के विरुद्ध विलक्षण सफलता पाने के अतिरिक्त, शायद पुरी के जगन्नाथ मंदिर के निर्माण को पूरा किया तथा जिले के कोणार्क में सूर्य देवता का विशाल मंदिर बनावाया। नरसिंह की मृत्यु के पश्चात् इस वंश की भाग्य-लक्ष्मी क्षीण होने लगी। लगभग 1434-1435 ई. में एक सूर्यवंशी ने इसे उखाड़ फेंका तथा उड़ीसा में एक सदी से अधिक तक राज्य करता रहा।

नये वंश का संस्थापक कपिलेन्द्र बहुत योग्यता एवं शक्ति से सम्पन्न था। उसने उड़ीसा के राज्य की प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित कर दिया, जो उत्तरकालीन गंगों के शासनकाल में धूल में मिल गयी थी। उसने अपने देश के प्रबल विद्रोहियों का दमन किया, बीदर के बहमनियों एवं विजयनगर के शासकों के साथ सफलतापूर्वक लड़ा तथा अपने राज्य को गंगा से कावेरी तक बढ़ाने में सफल हुआ। यही नहीं, वह बहमनी राज्य के मध्य में बीदर के पाश्र्व तक अपनी विजयी सेना लेकर पहुँच गया। गोपीनाथपुर के अभिलेख में लिखा हुआ है कि उसने विजयनगर के एक राजप्रतिनिधि की राजधानी उदयगिरि तथा कांजीवरम् (कांची) पर अधिकार कर लिया। अगले शासक पुरुषोत्तम (1470-1497 ई.) के राज्य काल में प्रारम्भ में कुछ अव्यवस्था हुई। इसमें उड़ीसा के राज्य ने अपना दक्षिणी आधा मार्ग, जो गोदावरी से नीचे पड़ता था, खो दिया। सालुव नरसिंह ने कृष्णा के दक्षिण के भाग पर अधिकार कर लिया तथा बहमनियों से गोदावरी-कृष्णा दोआब को ले लिया, पर अपने शासनकाल के अन्त में पुरुषोत्तम दोआब को फिर ले लिया तथा आंध्र देश के एक भाग को-आधुनिक गुंटूर जिले तक-पुनः प्राप्त कर लिया। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उसने कपिलेन्द्र के साम्राज्य के तमिल जिलों को पुनः जीता या नहीं।

पुरुषोत्तम का पुत्र एवं उत्तराधिकारी प्रतापरुद्र (1497-1540 ई.) चैतन्य का समकालीन एवं शिष्य था। उसे (अपने पूर्वगामी) ऐसा राज्य मिला, जो पश्चिम बंगाल के हुगली एवं मिनापुर जिलों से लेकर आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले तक फैला था तथा जिसमें तेलंगाना की उच्च भूमि का एक भाग भी सम्मिलित था। पर विजयनगर के कृष्णदेव राय तथा पूर्वी तट पर गोलकुंडा के बढ़ते हुए कुतुबुशाही राज्य के आक्रमणों के कारण इसका अधिक समय तक यह विस्तार बनाये रखना नहीं बदा था। तीन आक्रमणों के फलस्वरूप प्रतापरुद्र को विजयनगर के अपने अधिक शक्तिशाली समकालीन शासक को अपने राज्य का वह भाग सौंपना पड़ा, जो गोदावरी के दक्षिण में था। गोलकुंडा के सुल्तान कुली कुतुब शाह ने 1522 ई. में उड़ीसा राज्य पर आक्रमण किया।

कुछ का विश्वास है कि उड़ीसा का यह राजनैतिक पतन चैतन्य द्वारा प्रचारित वैष्णव धर्म के फलस्वरूप उसके शासकों एवं लोगों में फौजी जोश के अभाव के कारण हुआ। चाहे जो कुछ भी हो, पर यह सच है कि सोलहवीं सदी के प्रारम्भ से उड़ीसा राज्य की पुरानी शक्ति जाती रही। 1541-1542 ई. के लगभग कपिलेन्द्र के वंश को भोई-वंश ने उखाड़ फेंका। इस वंश का यह नाम इसलिए पड़ा कि इसका संस्थापक गोविन्द, जो पहले प्रतापरुद्र का एक मंत्री था, भोई अथवा लेखक जाति का था। गोविन्द, उसके पुत्र तथा दो पौत्रों ने लगभग अठारह वर्षों तक राज्य किया। इस वंश को लगभग 1559 ई. में मुकुन्द हरिचन्दन ने निकाल दिया। मुकुद हरिचन्दन ने 1568 ई. में अपनी मृत्यु तक उड़ीसा के राज्य को मुस्लिम-आक्रमणों से बचाने का भरसक प्रयत्न किया। अकबर ने भी बंगाल के अफगानों पर दोनों ओर से आक्रमण करने की अपनी नीति का अनुसरण करते हुए उससे मित्रता करनी चाही। बंगाल के कररानी सुल्तानों ने 1568 ई. में उड़ीसा को अपने राज्य में मिला लिया। कहा जाता है कि हिन्दू धर्म-त्यागी काला पहाड़ ने, जो सुलेमान कररानी के पुत्र बायजीद के साथ उड़ीसा गया था, जगन्नाथ के मंदिर को अपवित्र कर दिया तथा लकड़ी की मूर्तियों को नष्ट करने तक की कोशिश की। इसके बाद उड़ीसा पर अधिकार करने के लिए मुगलों तथा अफगानों की बीच संघर्ष प्रारंभ हो गया।

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