मानव-पर्यावरण सम्बन्ध Man-Environment Relationship

पर्यावरण का अर्थ Meaning Environment

प्रकृति में वायु, जल, मृदा, पेड़-पौधे तथा जीव-जन्तु सभी सम्मिलित रूप में पर्यावरण की रचना करते हैं। सामान्यतया किसी स्थान विशेष में मानव के चरों तरफ (स्थल, जल, वायु, मृदा आदि) का वह आवरण जिससे वह घिरा है, पर्यावरण (Environment) कहलाता है; अर्थात् पर्यावरण से अभिप्राय आसपास या पासपड़ोस (surrounding) अर्थात् हमारे चारों ओर फैले हुए मानव, जन्तुओं या पौधों के उस वातावरण एवं परिवेश से है, जिससे हम घिरे हुए हैं।

‘Environment’ शब्द दो शब्दों ‘Environ’ तथा ‘Ment’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है घेरना (Encircle) तथा चतुर्दिक (All around), अर्थात् चारों ओर से घेरना। यह मूल रूप से फ्रेंच भाषा के ‘Environer’ शब्द से बना है जिसका अभिप्राय समस्त पारिस्थितिकी अथवा समस्त बाह्य दशाएं होता है।

पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है- ‘परि’ ‘आवरण’, अर्थात् जिससे सम्पूर्ण जगत घिरा हुआ है। इस प्रकार पर्यावरण उस आवरण को कहेंगे जो सम्पूर्ण पृथ्वी (जलमण्डल, स्थलमण्डल, वायुमण्डल) तथा इनके विभिन्न घटकों को अपने से ढके हुए है। पर्यावरण की संकल्पना में वायु, स्थल, जल और पादप सम्मिलित हैं।

पर्यावरण की परिभाषा Definition Environment

पर्यावरण को परिभाषित करते हुए विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं-

पर्यावरण को परिभाषित करते हुए हर्सकोविट्स (Herskovites) लिखते हैं कि “पर्यावरण सम्पूर्ण बाह्य परिस्थितियों और उसका जीवधारियों पर पड़ने वाला प्रभाव है जो जैव जगत के विकास चक्र का नियामक है।"

प्रो. जे. स्मिथ (J. smith) के अनुसार, भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशाओं का योग, जो एक जीव द्वारा अनुभव किया जाता है। इसमें जलवायु, मृदा, जल, प्रकाश, निकटवर्ती वनस्पति, व्यक्तिगत तथा अन्य प्रजातियां सम्मिलित हैं।

डी. एच. डेविड (D. H. David) के अनुसार “पर्यावरण का अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर से घेरे हुए उन सभी भौतिक स्वरूपों से है, जिनमें न केवल वह रहता है। अपितु जिनका प्रभाव उसकी आदतों एवं क्रियाओं पर भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।”

ए. गाउडी (A. Goudie) ने अपनी पुस्तक The Nature of Environment में पृथ्वी के भौतिक घटकों को ही पर्यावरण का प्रतिनिधि माना है तथा उनके अनुसार पर्यावरण को प्रभावित करने में मानव एक महत्वपूर्ण कारक है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग की परिभाषा के अनुसार, “पर्यावरण चारों ओर की उन बाह्य दशाओं का सम्पूर्ण योग होता है, जिसके अन्दर एक जीव अथवा समुदाय रहता है, या कोई वस्तु उपस्थित करती है।"

दी यूनीवर्सल एनसाइक्लोपीडिया में पर्यावरण को परिभाषित करते हुए लिखा है कि “उन सभी दशाओं, संगठन एवं प्रभावों का समग्र जो किसी जीव या प्रजाति के उद्भव, विकास एवं मृत्यु को प्रभावित करती है, पर्यावरण कहलाती है।"

फिटिंग ने पर्यावरण के लिए लिखा है कि “जीवों के पारिस्थितिक कारकों का योग पर्यावरण है।“

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (Encyclopaedia Britanica) के अनुसार, “पर्यावरण उन सभी बाह्य प्रभावों का समूह है जो जीवों को भौतिक एवं जैविक शक्ति से प्रभावित करते रहते हैं तथा प्रत्येक जीव को आवृत किए रहते हैं।”

उपरोक्त सभी परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण अनेक तत्वों का, मुख्यतः प्राकृतिक तत्वों का समूह है जो जीव जगत को एकाकी तथा सामूहिक रूप से प्रभावित करता है।

मनुष्य हो या अन्य जीवजन्तु सभी पर्यावरण की उपज हैं, उनकी उत्पति, विकास, वर्तमान स्वरूप एवं भावी अस्तित्व सभी पर्यावरण की परिस्थिति पर ही निर्भर है। पर्यावरण के लिए कुछ विद्वान मिल्यू (Milieu) तो कुछ विद्वान हैबिटाट (Habitat) शब्द का प्रयोग करते हैं। इसी तरह प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानी प्राकृतिक पर्यावरण' तथा भूगोलविद् भौगोलिक पर्यावरण का भी प्रयोग करते हैं, परन्तु अधिक प्रचलित तथा मान्य मत के अनुसार मौलिक रूप से पर्यावरण का स्वरूप प्राकृतिक है अर्थात् प्राकृतिक तत्वों के प्रभाव एवं उपयोग से है। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पर्यावरण जन्म लेता है तथा उसी से ये नियन्त्रित एवं परिचालित होते हैं। अतः वर्तमान अध्ययन में प्राकृतिक पर्यावरण को ही आधार मानना उचित होगा, जिसमें अनेक तत्वों के साथ-साथ मानव स्वयं भी एक कारक के रूप में कार्य करता है।

पर्यावरण की संरचना Composition of Environment

पर्यावरण जैविक तथा अजैविक दो प्रकार का होता है इसलिए इसमें जैविक तथा अजैविक दोनों घटक शामिल किए जाते हैं। इसी आधार पर पर्यावरण की संरचना को निर्धारित किया गया है। पर्यावरण की यह आधारभूत संरचना इस प्रकार पर्यावरण के प्रमुख कारकों में विभक्त करके देखी जा सकती है-

  1. भौतिक पर्यावरण,
  2. जैविक पर्यावरण।

भौतिक पर्यावरण या अजैविक कारक

इसके अन्तर्गत हम भौतिक पर्यावरण को 3 श्रेणियों में वर्गीकृत करके देख सकते हैं :

  1. भौतिक पर्यावरण का ठोस रूप जैसे-स्थलमण्डल,
  2. भौतिक पर्यावरण का तरल रूप जैसे-जलमण्डल,
  3. भौतिक पर्यावरण का गैसीय रूप जैसे वायुमण्डल

इस तरह से भौतिक पर्यावरण स्वयं तीन प्रकार के पर्यावरणों से मिलकर बना होता है जिसे क्रमशः स्थलमण्डलीय पर्यावरण, जलमण्डलीय पर्यावरण तथा वायुमण्डलीय वातावरण कहते हैं। विभिन्न क्षेत्रीय मापकों को ध्यान में रखकर इन तीन पर्यावरण को कई लघु इकाइयों में वर्गीकृत किया जा सकता है। जैसे पर्वतीय पर्यावरण, मैदानी पर्यावरण, पठारी पर्यावरण आदि।

जैविक पर्यावरण Biotic Environment

पर्यावरण के जैविक घटक या कारक मिलकर जैविक पर्यावरण की रचना करते हैं। जैविक पर्यावरण के अन्तर्गत वनस्पति तथा जीवजन्तु आते हैं। इसमें मनुष्य भी शामिल है। इस आधार पर जैविक पर्यावरण को पुनः दो प्रकारों में विभक्त कर सकते हैं :

  1. वानस्पतिक पर्यावरण Floral environment
  2. जन्तु पर्यावरण Faunal Environment

पर्यावरण के प्रकार Types of Environment

भूगोल में पर्यावरण के अध्ययन के अनुसार इसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. प्राकृतिक या भौतिक पर्यावरण Natural or Physical Environment
  2. मानवीय या सांस्कृतिक पर्यावरण Human or Cultural Environment

प्राकृतिक या भौतिक पर्यावरण Natural or Physical Environment

प्राकृतिक पर्यावरण को भौतिक पर्यावरण (Physical Environment) भी कहते हैं। भौतिक पर्यावरण जैविक और अजैविक तत्वों का दृश्य और अदृश्य समूह है जो जीवमण्डल को परिवृत किए हुए है। प्राकृतिक पर्यावरण प्राकृतिक उपादानों, जैव एवं अजैव घटकों का समुच्चय होता है जो धरातल से लेकर आकाश तक व्याप्त रहता है। प्राकृतिक पर्यावरण में तीन तत्व समूह सम्मिलित होते हैं

  • भौतिक तत्व समूह - धरातल, जलवायु, मृदा, जल, वायु, खनिज आदि,
  • ऊर्जा तत्व समूहताप एवं प्रकाश,
  • जैव तत्व समूहवनस्पतियां एवं जीव-जन्तु।

इन तीनों तत्व समूहों से प्राकृतिक पर्यावरण का निर्माण होता है। ये तत्व लाखोंकरोड़ों वर्षों से अन्तप्रक्रिया करते चले आ रहे हैं। इनके परिवर्तित स्वरूप का पर्यावरण एवं अन्य जीवधारियों पर प्रभाव परिलक्षित होता है। यह परिवर्तन प्राकृतिक नियमों के अनुसार ही होता है।

भौतिक पर्यावरण से तात्पर्य उन सम्पूर्ण भौतिक शक्तियों (Forces), प्रक्रियाओं (Processes) और तत्वों (Elements) से लिया जाता है जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव मानव पर पड़ता है।

भौतिक पर्यावरण की शक्तियां (Forces)- इन शक्तियों के अन्तर्गत सौर ताप, पृथ्वी की दैनिक एवं वार्षिक परिभ्रमण की गतियां, गुरुत्वाकर्षण शक्ति, ज्वालामुखी क्रियाएं, भूपटल की गति तथा जीवन सम्बन्धी दृश्य सम्मिलित किए गए हैं। इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर अनेक प्रकार की क्रियाएं, प्रक्रियाएं एवं प्रतिक्रियाएं होती हैं, जिनसे वातावरण के तत्व उत्पन्न होते हैं और इन सबका प्रभाव मानव की क्रियाओं पर पडता है।

भौतिक पर्यावरण की प्रक्रियाएं (Processes)- प्रक्रियाओं में भूमि का अपक्षय, अपरदन अवसादीकरण, तापविकिरण एवं चालन, ताप वाहन, वायु एवं जल में गतियों का पैदा करना, जीव की जातियों का जन्म, मरण और विकास, आदि सम्मिलित किए जाते हैं। इन प्रक्रियाओं द्वारा भौतिक पर्यावरण में अनेक क्रियाएं उत्पन्न होती हैं जो मानव के क्रियाकलापों पर अपना प्रभाव डालती हैं।

भौतिक पर्यावरण के तत्व (Elements)- तत्वों के अन्तर्गत उन तथ्यों को सम्मिलित किया जाता है जो शक्तियों और प्रक्रियाओं के फलस्वरूप धरातल पर उत्पन्न होते हैं। इन तत्वों में 1. भाववाचक तत्व (Abstract elements), जैसे क्षेत्रीय विस्तार और आकार,  प्रादेशिक स्वरूप और आकार, प्राकृतिक स्थिति, भौगोलिक स्थिति और ज्यामितीय स्थिति, 2. भौतिक तत्व (Physical elements), जैसे मौसम और जलवायु, स्थलाकृति, (धरातल के रूप) मिट्टियां और चट्टानें, खनिज, धरातलीय , अधोभौमिक जल, महासागर और तटीय क्षेत्र और 3. जैविक तत्व (Biotic elemens), जैसे प्राकृतिक वनस्पति, जीवजन्तु और अणुजीव

उपरोक्त सभी घटक मिलकर मनुष्य के भौतिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। ये जीवन पर प्रभाव डालते हैं। इसे प्राथमिक(Primary) , प्राकृतिक (Natural) या भौतिक (Physical) पर्यावरण कहा जाता है। इन सबका अस्तित्व मनुष्यों के कार्यों से स्वतन्त्र है, क्योंकि इनका मनुष्य ने सृजन नहीं किया है, वरन् ये प्रकृति की देन हैं।

सांस्कृतिक अथवा मानवीय Cultural or Human Environment

उपरोक्त प्राथमिक पर्यावरण में मनुष्य स्वविकसित तकनीकी (Technology) की सहायता से संशोधन तथा परिवर्तन करता रहता है और उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप बना लेता है। उदाहरण के लिए, वह भूमि को जीतकर खेती करता है, जंगलों को साफ करता है, सड़कें, नहरें, रेलमार्ग, आदि बनाता है, पर्वतों को काट कर सुरंगें, आदि निकालता है, नयी बस्तियां बसाता है तथा भूगर्भ से खनिज सम्पति निकालकर अनेक उपकरण एवं अस्त्रशस्त्र, आदि बनाता है और प्राकृतिक संसाधनों का विभिन्न प्रकार से शोषण कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इन सबके फलस्वरूप वह एक नए पर्यावरण को जन्म देता है। इसे मानवीय,मानव निर्मित अथवा प्राविधिक (Human Man-made or Technological) पर्यावरण कहा जाता है। इन्हें मानव की पदार्थ संस्कृति (Material Culture) भी कहा जाता है। यही सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। इसके अन्तर्गत औजार, गहने, अधिवास, मानवीय क्रियाओं के सृजित रूप जैसे खेत, कृत्रिम चरागाह व उद्यान, पालतू पशु सम्पदा, उद्योग एवं विविध उद्यम, परिवहन और संचार के साधन (वायुयान, रेल, मोटर, रेडियो, तार, आदि) प्रेस आदि सम्मिलित किए जाते हैं। यहां एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इन पार्थिव पदार्थों का कोई उपयोग नहीं यदि इनके उपभोग करने की क्षमता मनुष्य में न हो। इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि मानव को जिस-जिस प्रकार की विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होगी वह उन्हीं पर शोध कर उन्हें खोजेगा। शारीरिक एवं मानसिक योग्यता का ज्ञान, इनके निर्माण का विज्ञान, ये भी मानव संस्कृति के ही भाग हैं। ये मानव की सांस्कृतिक विरासत (Cultural heritage) हैं।

सांस्कृतिक या मानवीय पर्यावरण के तथ्य Facts of Cultural or Human Environment

इस मानवीय या मानव निर्मित पर्यावरण में भी शक्तियां, प्रक्रियाएं एवं तत्व कार्य करते हैं।

  1. सांस्कृतिक शक्तियां Cultural Forces- शक्तियों के अन्तर्गत मानव स्वयं एक भौगोलिक घटक के रूप में, क्षेत्र की जनसंख्या, उसका वितरण एवं घनत्व, स्त्री पुरुषों का अनुपात, आयु, वर्ग, प्रजातीय रचना, शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक क्षमता और जनसंख्या में वृद्धि और उसके कारण सम्मिलित किए जाते हैं।
  2. सांस्कृतिक प्रक्रियाएं Cultural Processes- सांस्कृतिक प्रक्रियाओं में वे कार्य सम्मिलित किए जाते हैं जिसके द्वारा मानव और मानव समूह पर्यावरण से सामंजस्य स्थापित करते हैं, यथा पोषण, समूहीकरण, पुनः उत्पादन, प्रभुत्व स्थापना, प्रवास, पृथक्करण, अनुकूलन, विशिष्टीकरण और अनुक्रमण, आदि प्रक्रियाओं का निरन्तर आगे से आगे मानव समुदाय विकास करता रहता है।
  3. सांस्कृतिक तत्व Cultural Elements- व्हाइट और रैनर के अनुसार, सांस्कृतिक तत्वों के अन्तर्गत जीवन के तीन प्रतिरूप सम्मिलित किए जाते हैं- 1. सामाजिक नियन्त्रण के प्रतिरूप Patrern Social Control- लोकरीतियां, रीति-रिवाज, मान्यताएं एवं आदर्श, संस्थाएंसरकार, विवाहप्रथा, पुलिस, कानून, युद्ध, विद्यालय, कार्यालय, प्रेस, आदि। 2. क्रिया सम्बन्धी प्रतिरूप Activity Partern- मनुष्य के व्यवसाय, उद्योग, राजनीतिक एवं सैन्य संस्थाएँ, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक प्रयास, मनोरंजन तथा सौन्दर्य-वृद्धि सम्बन्धी प्रयास। 3. निर्माण प्रतिरूप अथवा सांस्कृतिक भूदृश्य Construction Pattern or Cultural Landscape- भूमि और उसका विभाजन, भूमि के विभिन्न दृश्य : नहरें, फसलें, पशुपालन, ग्रामीण बस्तियां एवं सम्बन्धी कृषि व्यवस्थाएं, नगरीय एवं अर्द्धनगरीय संस्थाएं, खदानें, कारखाने, डॉक्स, जैटी और बन्दरगाहों पर लगायी जाने वाली अन्य सुविधाएं, सड़कें एवं रेल मार्गों के प्रतिरूप, संरक्षित स्थान (वन, उद्यान, श्मशान, कब्रिस्तान, मनोरंजन के स्थल) आवासीय एवं अव्यवहृत बेकार भूमिक्षेत्र, सीमाएं, चुंगी चौकियां, सैन्य किले आदि।

भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत सम्पूर्ण प्रकृति के साम्राज्य की वे सभी शक्तियां, क्रियाएं तथा तत्व सम्मिलित होते हैं जिनका प्रभाव मानव, उसकी क्रियाओं, भोजन, वस्त्र, आदतों एवं क्षमता, आदि पर पड़ता है। दूसरी तरफ मानवीय अथवा सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत मानव को संचालित करने वाली और सामाजिक क्रियाओं को निर्देशित करने वाले तत्व सम्मिलित किए जाते हैं, जो उनके रहनसहन को एवं कार्यकुशलता को सुचारु बना देते हैं।

पर्यावरण के साधारणत: दो स्वरूप होते हैं- अनुकूल (Favourable) और प्रतिकूल (Unfavourable) भिन्न-भिन्न पर्यावरण भिन्न-भिन्न प्राणियों के लिए अनुकूल हुआ करते हैं। कभी-कभी एक ही पर्यावरण किसी प्राणी या समूह विशेष के लिए एक परिस्थिति में अनुकूल हो सकता है वही दूसरी स्थिति में अन्य जैविक समूह के लिए प्रतिकूल भी हो जाता है। अनुकूल पर्यावरण उसे कहते हैं, जो जीवधारी के अस्तित्व की रक्षा, विकास पुनरुत्पादन और उन्नति में सहायक होता है। इसके विपरीत, जो पर्यावरण जीवधारी के अस्तित्व की रक्षा विकास, पुनरुत्पादन और प्रगति में बाधक होता है, प्रतिकूल पर्यावरण कहा जाता है। जहां अनुकूल पर्यावरण मिलता है वहां जीवधारी को अपने विकास में प्रायः कोई कठिनाई नहीं पड़ती, किन्तु जब प्रतिकूल पर्यावरण में उसे रहना पड़ता है तो वह उसे अपने अनुरूप बनाने का प्रयास करता है। इस परिप्रेक्ष्य में भूगोलवेत्ता पर्यावरण और मानव के सम्बन्धों का अध्ययन करता है।

मानवपर्यावरण सम्बन्ध Man Environment Relationship

मानव प्रत्येक प्रकार के क्रियाकलापों के लिए पर्यावरण पर निर्भर है। मानव एक कलाकार के रूप में पर्यावरण द्वारा प्रदत्त रंगमंच (Stage) पर कार्य करता है। कहीं पर्यावरण उसे प्रभावित करता है तो कहीं वह उसके साथ अनुकूलन तथा परिवर्तन (Adaptation and Modification) करता है। इसे पर्यावरण समायोजन Adjustment) भी कहते हैं।

पर्यावरण का प्रभाव Efects of Environment

मानव भूगोल के सिद्धान्तों को पूर्ण रूप से समझने के लिए यह आवश्यक है कि मानव और उसके पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों को समझा जाए इसके लिए पर्यावरण के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

व्हाइट और रैनर ने भौगोलिक पर्यावरण के महत्व को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है-

“भौतिक वातावरण मानव के बड़े समूहों को स्पष्टतः प्रत्यक्ष रूप में और प्राथमिक तरीके से प्रभावित करता है। प्रत्येक समूह, जनजाति, राज्य, राष्ट्र और पृथ्वी के सभी साम्राज्य इसके द्वारा सीधे तौर पर सफलता के साथ निरन्तर रूप से प्रभावित होते हैं। मानव की कोई भी बड़ी महत्वपूर्ण क्रिया बिना इसकी सहायता के, बिना इसकी रुकावटों और निर्देशों के स्वतन्त्र नहीं है। प्राकृतिक पर्यावरण मानव समाज के लिए वही करता है जो सामाजिक पर्यावरण व्यक्तिगत मनुष्य के लिए।”

मानव भूगोल की जानी मानी विद्वान सैम्पल ने मानव पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों को चार श्रेणियों में विभक्त किया है-

i) सीधे भौतिक प्रभाव, ii) मांनसिक प्रभाव, iii) आर्थिक और सामाजिक प्रभाव, तथा iv) मानव की गतियों को प्रभावित करने वाले प्रभाव

  1. प्रत्यक्ष भौतिक प्रभाव- पर्यावरण के सभी तत्वों में जलवायु का प्रभाव सबसे अधिक महत्वपूर्ण है जो मानव को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। जलवायु का प्रभाव प्राकृतिक वनस्पति और मिट्टियों द्वारा मनुष्य पर पड़ता है। जलवायु का प्रभाव मनुष्य के कद, शरीर की बनावट, रंग, आदि पर पड़ता है। इसी प्रकार पर्यावरण मनुष्य की शारीरिक शक्ति को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है जिससे उसके शरीर का एक भाग दूसरे की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ और बलिष्ठ बन जाता है। सैम्पल ने उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया है कि “पर्वतीय भागों में मनुष्य के पैर बलिष्ट और हाथ कम बलिष्ठ होते हैं, जबकि नदियों वाले मैदानी भागों में जहाँ उसे हाथ से नाव चलानी पड़ती है, हाथ बलिष्ठ और पैर कम बलिष्ठ होते हैं। प्रतिकूल पर्यावरण में रहने पर आँखों और त्वचा पर भी प्रभाव पड़ता है। तुर्कमान लोगों की आँखें छोटी और पलकें भारी होती हैं, क्योंकि वे हमेशा मरुस्थलीय भागों में रहते हैं।”
  2. मानसिक प्रभाव- इस प्रकार के प्रभाव मनुष्यों के धर्म उनके साहित्य, भाषा, आचार-विचार में दिखायी देते हैं। मनुष्य के धार्मिक विचार उसके पर्यावरण की ही उपज हैं। भाषा पर भी पर्यावरण का प्रभाव रहता है।
  3. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव- किसी स्थान की भौगोलिक अवस्थाएँ ही इस बात का निर्धारण करती हैं कि वहाँ आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति सरलता से होगी अथवा कठिनाई से, वहाँ किस प्रकार के उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। इस प्रकार के प्रभाव ही मानव समाज के आकार को, निर्धारित करते हैं। जिन क्षेत्रों, द्वीपों या पर्वतीय भागों में आर्थिक संसाधन कम मात्रा में पाए जाते हैं, वहां मनुष्य भी छोटे समुदायों में पाए जाते हैं, क्योंकि उन क्षेत्रों में उनके लिए उपयुक्त पर्यावरण नहीं मिलता।
  4. मानव की गतियों को प्रभावित करने वाले प्रभाव- मानव समूह के आवास-प्रवास को भौतिक पर्यावरण के सभी तत्व विशिष्ट एवं अनेक प्रकार से प्रभावित करते हैं। इनके अन्तर्गत पहाड़ों, मरुस्थलों, दलदलों, समुद्रों, आदि का प्रभाव मानव के प्रवास पर पड़ता है। ये सभी उसके मार्ग का निर्धारण करते हैं, उसे सहयोग अथवा असहयोग देते हैं। उदाहरणार्थ, मानव ने नदी मार्गों का यातायात के साधनों के रूप में उपयोग किया, जिससे अनेक मानव जातियों ने दूर-दूर जाकर अपनी बस्तियां स्थापित कीं। पर्वत अवरोध उत्पन्न करते हैं। भारतवर्ष के उत्तर में हिमालय पर्वत ने मध्य एशिया से सम्पर्क को सदैव रोकने का प्रयास किया है।

भौतिक पर्यावरण के जितने भी तत्व या कारक हैं, उनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट एवं बहुमुखी प्रभाव मानव के कार्यकलाप, क्षमता के विकास एवं मानव सन्दर्भ में क्षेत्र के विकास पर पड़ता रहा है। जितनी अनुकूलता तत्वों के वितरण की होगी विकास, समृद्धि एवं मानवीय आकांक्षाएं उतनी शीघ्र पूरी होती जाएंगी। वातावरण के पूर्व वर्णित सभी तत्वों- स्थिति, स्थल स्वरूप एवं धरातल, जल संस्थान, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, प्राणी जगत, मिट्टियाँ एवं खनिजों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रभाव जलवायु एवं धरातल तत्वों का रहा है। इनकी प्रतिकूलता का शीघ्र प्रभाव मानव की क्षमता एवं अनिवार्यताओं पर तत्काल पड़ता है। यद्यपि अनेक दशाओं में अन्य कारक भी समान रूप से महत्वपूर्ण माने गए हैं। जैसे खनिज तेल भूमि पर व अपतटीय क्षेत्र में विपुल मात्रा में खोज का राष्ट्रों के अर्थतन्त्र पर वर्तमान में तत्काल प्रभाव पड़ता रहा है। यही स्थिति बहुमूल्य खनिजों की खोज में भी उत्तर मध्य युग में बनी रही। अन्य तत्वों के प्रभाव की भी यही वस्तुस्थिति है।

पर्यावरण से सामंजस्य या समायोजन Adjustment with Environment

अपने भौतिक पर्यावरण के साथ मानव का सामंजस्य अत्यन्त प्राचीनकाल से चला रहा है, जबकि वह पत्थर युग में था। इस युग में मनुष्य ने अपनी सुरक्षा के लिए घर बनाने, प्रकृति की वस्तुओं का भोजन के रूप में उपयोग करने, पत्थर को काट-छांट, घिसकर औजार बनाने, जंगली पशुओं को पालतू बनाने, जादू आदि पर विश्वास करने और सामूहिक रूप से सुरक्षा आदि करने के रूप में मनुष्य ने अपने सांस्कृतिक पर्यावरण को जन्म देने में योग दिया है तभी से मनुष्य भौतिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य करता रहा है, मनुष्य ने विज्ञान, तकनीकी ज्ञान और आर्थिक क्रियाओं में बड़े महत्वपूर्ण परिवर्तन करके अपने को भौतिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य करने की रीतियों में बड़ा प्रसार किया है। इस प्रकार सामंजस्यों को प्रधानत: तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है- आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक और राजनीतिक

1.आर्थिक समंजन Economic Adjustment- इस प्रकार का अनुकूलन समाज द्वारा कार्यप्रतिमानों के रूप में किया जाता है। मनुष्य कौन-सा कार्य करता है यह उसकी इच्छाओं, विचारों और उसकी कुशलता पर निर्भर करता है। मोटे तौर पर यह बात भौतिक पर्यावरण में मिलने वाली सम्पदा द्वारा प्रभावित होती है। आर्थिक समंजन मुख्यतः चार श्रेणियों में बाँटे जा सकते हैं-

  • उद्यम Extractive occupations- इसमें मछली पकड़ना, लकड़ी काटना, जाल बिछाकर पशुओं को पकड़ना तथा खानें खोदना सम्मिलित किया जाता है। इन कार्यों में प्रकृति से सीधे ही वस्तुएं प्राप्त की जाती हैं। इस प्रकार मनुष्य वस्तु उपयोगिता (Commodity Utility) उत्पन्न करता है।
  • उत्पादक उद्योग Genetic or Productive Industries- इसके अंतर्गत मनुष्य भूमि से उन वस्तुओं को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त करने का प्रयास करता है जो पहले से ही मौजदू हैं जैसे कृषि, पशुपालन तथा रेशम के कीड़े पालकर उनका उत्पादन प्राप्त करना।
  • निर्माण उद्योग Manufacturing Industries- इनके अन्तर्गत खदानों अथवा कृषि से प्राप्त वस्तुओं को पिघलाकर, साफ-सुथरा कर उनसे वस्तुएँ निर्मित की जाती हैं। इस प्रकार के उद्योग से स्वरूप उपयोगिता (Form utility) प्राप्त की जाती है।
  • वाणिज्यक क्रियाकलाप Commercial Activities- इनमें यातायात एकत्रीकरण, विनिमय एवं अर्थ प्रबन्धन की क्रियाएँ सम्मिलित की जाती हैं। इसके द्वारा स्थान और समय उपयोगिता (Place and Time ) प्राप्त की जाती है। इसके साथ साथ मनुष्य की अन्य व्यावसायिक सेवाएँ (शिक्षा, कानून, डाक्टरी, आदि, व्यक्तिगत सेवाएँ (घरेलू कार्य, सफाई का कार्य, आदि) भी सम्मिलित किए जाते हैं।

2. सामाजिक एवं सांस्कृतिक समंजन Social and Cultural Adjustment- मानव समाज अपने भौतिक पर्यावरण के साथ इस प्रकार का सामंजस्य भी स्थापित करता है। इसके अन्तर्गत जनसंख्या का घनत्व, भूमि पर स्वामित्व, सामाजिक वर्ग, परिवार, समाज-सम्बन्ध, आदि बातें सम्मिलित होती हैं। इसी प्रकार के समंजन में मनुष्य के व्यवहार एवं आदतें, उनका स्थायी जमाव व घुमक्कड़ जीवन, उसके वस्त्र, भोजन, घर, आचार-विचार, धार्मिक विश्वास एवं आस्थाएं, कला, आदि बातों का भी समावेश किया जाता है।

3. राजनीतिक समंजन Political Adjustment- मानव समाज अपने भौतिक पर्यावरण से नागरिक तथा राजनीतिक समंजन भी स्थापित करता है। इस क्रिया के अन्तर्गत स्थानीय, प्रान्तीय या राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, सैन्य नीतियां तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून आदि की व्यवस्था सम्मिलित होती हैं।

पर्यावरण में परिवर्तन Changes in Environment

यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ या पर्यावरण प्रगतिशील (Dynamic) है, जीवित है, स्थिर (static) नहीं है, अर्थात् उनमें सर्वदा परिवर्तन होता रहता है। नदी के किनारे आज जो हम कण देखते हैं कल वहाँ नहीं रहेगा। पेड़ की जिस पत्ती को आज हम हरी देखते हैं कल उसमें कुछ परिवर्तन हो जाएगा। इसी भांति जहां मरुस्थल देखते हैं वहां पर सौ या दो सौ वर्ष उपरान्त बड़े-बड़े हवाई अड़े बन सकते हैं जिनके चारों ओर पातालतोड़ कुओं से जल से हरे-भरे पेड़ शीतल सुन्दरता का आनन्द दे रहे हों। सौ वर्ष पहले ही कौन यह कह सकता था कि बीकानेर की मरुभूमि में नहर की सिंचाई से लहलहाते खेत बन जाएंगे और इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना रेगिस्तानी गंगा के रूप में पश्चिमी राजस्थान का कायाकल्प कर देगी।

प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण दोनों में ही परिवर्तन आता रहता है। यह प्रकृति का नियम है (Change is the law of Nature)। कुछ परिवर्तन अचानक और कुछ धीरे-धीरे आते हैं। इन परिवर्तनों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है-

  1. प्राकृतिक परिवर्तन Natural Changes- इसके अन्तर्गत भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़ आना, सूखा पड़ना, आंधी और तूफानों का आगमन, चक्रवात और आग लग जाना, आदि दैवी प्रकोप हैं। ऐसे परिवर्तनों पर मनुष्य का कोई नियन्त्रण नहीं है। अतः पहले से ही विनाश का अनुमान लगाना कठिन होता है।
  2. मानव द्वारा लाए गए परिवर्तन Man induced Changes- इसके अन्तर्गत, डेविस के अनुसार , जंगलों का काटना, आग लगाना, कृत्रिम विधि से सिंचाई के साधनों का विकास, उन्नत कृषि हेतु भूमि में रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाएं, अधिक पानी, आदि का उपयोग, पशु चराना, खदानें खोदना तथा पृथ्वी के गर्भ से बहुमूल्य खनिज प्राप्त करना, अज्ञात या अगम्य प्रदेशों में तेजी से यातायात का विकास कर वहाँ का चहुँमुखी विकास करना, आदि तथ्य सम्मिलित किए गए हैं। ऐसे व अन्य आगे के परिवर्तन भूतल पर मानव ही ला सकता है। दलदल को सुखाकर उपजाऊ मैदान बना देना, जंगलों को काटकर कृषि योग्य भूमियों में बदलना, पर्वतीय ढालों पर खेती करना, शुष्क भागों में नहरें बनाकर उन्हें लहलहाते खेत बना देना, आदि कार्य मानव की सफलता की कहानी कहते हैं। सभी का वातावरण के सन्तुलन से बहुत निकट से सम्बन्ध है। आज भूमि, जल एवं वायु प्रदूषण के विकराल स्वरूप का कारण भौतिक पदार्थों का अवैज्ञानिक उपयोग एवं विविध उद्योगों के घातक उत्पादों एवं उप उत्पादों के साथ जुड़ा हुआ है। ऐसा प्रभाव अनेक प्रकार से भौतिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव के रूप में भी स्पष्टतः दिखायी देता है।

शरलॉक के अनुसार, “भौतिक विश्व में परिवर्तन करने वाली शक्तियों में से जीवधारियों में मानव सबसे शक्तिशाली है। पशु चलने-फिरने तथा घासफूस खाने से, कीड़े-मकोड़े खाने और मिट्टी खोदने से कुछ मात्रा में परिवर्तन उत्पन्न कर देते हैं, किन्तु उनका कार्य मानव के कार्यों की तुलना में नगण्य है। मानव भी विनाशकारी शक्तियों की भांति काम करता है, वन प्रदेशों को साफ करना अथवा खदानें खोदकर भूमि में गड्ढे बना लेना- अन्तर केवल यही है कि उसकी क्रियाएँ सर्वव्यापी न होकर चुने हुए स्थानों पर ही होती हैं।”

पर्यावरण से अनुकूलन Adaptation with Environment

पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन से अथवा दूसरे पर्यावरण में अपने को उसके अनुसार बदल लेना उपयोजन या अनुकूलन कहलाता है। दूसरे शब्दों में पर्यावरण के परिवर्तनों का सामना करने के लिए शरीर में जो प्राकृतिक संशोधन होता है उसे ही समायोजन कहा जाता है। उदाहरण के लिए, अधिक गर्मी का सामना करने के लिए शरीर से जो पसीना छूटता है उससे शरीर ताप सहन करने की स्थिति में हो जाता है। मानव बाह्य पर्यावरण की उन परिस्थितियों से, जो उसके कार्यों में बाधा डालती हैं, उपयोजन करने का प्रयास करता है और यदि इस कार्य में उसे आशातीत सफलता नहीं मिलती तो वह उसके परिवर्तन करने में लग जाता है। यदि किसी क्षेत्र विशेष में कुछ समय के लिए कृषि कार्य न किया जाए तो अनुकूल परिस्थितियों में वहाँ घास या वनों की उत्पत्ति होना स्वाभाविक होगा। इसलिए मानव को अपने पर्यावरण से उपयोजन करने के लिए निरन्तर क्रियाशील रहना पड़ता है।

डॉ. टेलर के मतानुसार, “प्रकृति मानव के लिए एक प्रकार की योजना प्रस्तुत करती है। मानव उस योजना को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। यह योजनाएँ एक प्रकार से सुअवसरों के समान हैं जिन्हें मानव चाहे स्वीकार करे या ठुकरा दे, किन्तु मानव का हित इसी में है कि इन सुअवसरों से लाभ उठाए और अपने आपको पर्यावरण से उपयोजित कर ले”। साधारणतः अनुकूलन के निम्न भेद किए जा सकते हैं-

  1. भौतिक या शारीरिक अनुकूलन Physical, Genetic or sometic Adaptation- इस प्रकार का उपयोजन पूरी तरह प्राकृतिक नियमों के अधीन या अनिवार्य रूप से हुआ करता है, मानव की इच्छा-अनिच्छा अथवा प्रयत्नों का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्राकृतिक दशाएं और शक्तियां मानव पर स्पष्ट रूप से अपना प्रभाव डालती हैं। भूमध्यरेखीय वन प्रदेशों में तेज धूप के कारण मानव का रंग एकदम काला हो जाता है जबकि शीतप्रधान प्रदेशों में पीला या सफेद क्योंकि वहां सूर्य के प्रकाश की कमी रहती है। इसी प्रकार ताजी हवा से मनुष्य को उद्दीपन (stimulation) मिलता है। पहाड़ी भागों के निवासी इसी स्वच्छ वायु के कारण कभी भी फेफड़ों सम्बन्धी बीमारियों से ग्रसित नहीं रहते।
  2. साम्प्रदायिक (सामाजिक) अनुकूलन Communal Adaptation- जब मानव अपने अन्य साथियों की सहायता से पर्यावरण की प्रतिकूल अवस्थाओं को परिवर्तित करने का प्रयास करता है तो उसे साम्प्रदायिक (मानव समाज द्वारा) अनुकूलन कहा जाता है। इस अनुकूलन के फलस्वरूप प्रत्येक जीवधारी अपने निवासस्थान पर रह सकता है और उससे सम्बन्ध स्थापित कर लेता है।

पर्यावरण के चार स्तरीय क्षेत्र

सम्पूर्ण पर्यावरण चाहे वह भौतिक हो या सांस्कृतिक उसकी समग्रता का प्रभावी स्वरूप आगे वर्णित चार प्रधान अंग या क्षेत्रों में व्याप्त है। निम्न वृहद क्षेत्रों में क्षेत्रीय एवं अन्तक्षेत्रीय स्तर पर पारस्परिक अन्तःक्रियाएं होती रहती हैं। यह वृहद् क्षेत्र या मण्डल निम्न प्रकार से है-

स्थलमण्डल- भूतल, उसका स्वरूप, उसके स्वरूप में परिवर्तन लाने वाली आन्तरिक एवं बाह्य या समतल स्थापक शक्तियाँ इनकी गतिशील क्रियाओं का आपसी प्रभाव एवं इन सबका मानव पर विविध प्रकार से प्रभाव इसके अंग और उपांग हैं।

वायुमण्डल- यह बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र विभिन्न प्रकार की हल्की तथा भारी गैसों, धूलकणों, जलवाष्प, आदि का मिश्रण है। इसके अन्तर्गत सौर ताप, तापमान, वायु, आर्द्रता, वायुमण्डल के घटक, आदि पूर्णतः गतिशील एवं विशेष प्रभाव तत्व आते हैं। ये सभी जलवायु के माध्यम से पर्यावरण के शेष तीनों क्षेत्रों को पूर्णतः प्रभावित करते हैं। इनकी अन्तःक्रियाएं परस्पर व्यापी एवं एक-दूसरे की पूरक होती हैं। इन सबका अब तक मानव पर प्रभाव सार्वभौमिक माना जाता रहा है।

जलमण्डल- यह पर्यावरण का अप्रत्यक्ष किन्तु सर्वव्यापी व गुप्त प्रभावी एवं विशिष्ट क्षेत्र है। इसमें महासागर एवं अन्य जलसंस्थान, महासागर नितल व तल के जमाव, महासागरीय जल की गतियांधाराएँ, ज्वारभाटा, लहरें, महासागरों के तापमान, लवणता, एवं प्रवाल जीव उनमें से प्रत्येक का प्रभाव, आदि आते हैं। जल स्वयं गतिशील एवं अन्तःप्रभावी बना रहता है। इन्हीं के माध्यम से वाष्पीकरण तथा उसके फलस्वरूप वायु में नमी व संघनन होकर वर्षा होती है। अत: इन सब का जीवों के विकास एवं अजैव पृथ्वी के धरातल निर्माण, उसमें परिवर्तन एवं गतियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी पर जल ही जीवन का आधार (Basis of Life) है।

जैवमण्डल- यह पर्यावरण का महत्वपूर्ण क्षेत्र है क्योंकि उपर्युक्त तीनों क्षेत्रों का जिस प्रकार का अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जीवों का विकास भी उष्ण, अद्धोष्ण, शीतोष्ण व शीत जलवायु में विविध भूतल एवं जल उपलब्धता के अनुसार अवस्थान (Habitat) निर्धारित होगा एवं उसी के अनुसार जैव प्रकार या बायोमी (Biome) विकसित होगा। मानव भी ऐसे प्रभाव एवं उनकी क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं से पूर्णतः प्रभावित होता है। सम्पूर्ण वनस्पति व जन्तुजगत एवं मानव इसमें आते हैं।

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