खिलाफत और असहयोग आंदोलन Khilafat Movement And Non-Cooperation Movement

1919 से 1922 के मध्य अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध दो सशक्त जनआंदोलन चलाये गये। ये आांदोलन थे- खिलाफत एवं असहयोग आंदोलन हालांकि ये दोनों आन्दोलन पृथक-पृथक मुद्दों को लेकर प्रारम्भ हुये थे किन्तु दोनों ने ही संघर्ष के एक ही तरीके राजनीति से प्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध नहीं था। किन्तु इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को प्रोत्साहित करने में प्रमुख भूमिका निभायी।

पृष्ठभूमिः इन दोनों आंदोलनों की पृष्ठभूमि उन घटनाओं की श्रृंखला में निहित है, जो प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् अंग्रेजी शासन द्वारा भारतीय संदर्भ में उठाये गये कदमों के कारण घटित हुई थीं। इन आंदोलनों के लिये 1919 का वर्ष सबसे महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि इस विशेष वर्ष में सरकारी नीतियों एवं गतिविधियों से भारतीय समाज का लगभग हर वर्ग असंतुष्ट और रुष्ट हो गया। इस सार्वजनिक असंतुष्टि के लिये कई कारण उत्तरदायी थे, जिनका वर्णन निम्नानुसार है-

  1. प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् उत्पन्न हुई आर्थिक कठिनाइयों से जनता त्रस्त हो गयी। विश्वयुद्ध के कारण मंहगाई बहुत बढ़ गयी। कस्बों और नगरों में रहने वाले मध्यम एवं निम्न मध्यवर्ग के लोग दस्तकार, मजदूर सभी मंहगाई से परेशान हो गये। खाद्यानों की भारी कमी हो गयी। मुद्रास्फीति बढ़ने लगी, औद्योगिक उत्पादन कम हो गया तथा लोग करों के बोझ से दब गये। समाज का लगभग हर वर्ग आर्थिक परेशानियों से जूझने लगा। इससे लोगों में ब्रिटिश विरोधी भावनायें जागृत हुई। सूखे, महामारी और प्लेग से भी हजारों लोग मारे गये।
  2. रौलेट एक्ट, पंजाब में मार्शल लॉ का आरोपण तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी घटनाओं ने विदेशी शासकों के क्रूर एवं असभ्य रवैये को उजागर कर दिया।
  3. पंजाब में ज्यादतियों के संबंध में हंटर कमीशन की सिफारिशों ने सबकी आंखें खोल दीं। उधर ब्रिटिश संसद विशेषकर ‘हाउस आफ लार्डस' में जनरल डायर के कृत्यों को उचित ठहराया गया तथा ‘मार्निग पोस्ट’ ने डायर के लिये 30 हजार पाउंड की धनराशि एकत्रित की। ये सारी गतिविधियां अंग्रेजी शासन का पर्दाफाश करने के लिये पर्याप्त थीं।
  4. 1919 के माटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों का वास्तविक मकसद भी द्वैध शासन प्रणाली लागू करना था न कि जनता को राहत पहुंचाना। इन सुधारों से स्वशासन की मांग कर रहे राष्ट्रवादियों को अत्यन्त निराशा हुई।

विश्वयुद्ध के पश्चात् हुई कई अन्य घटनाओं ने भी हिन्दू-मुस्लिम राजनीतिक एकीकरण के लिये एक व्यापक पृष्ठभूमि तैयार की-

  1. लखनऊ समझौता (1916)- इससे कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में सहयोग बढ़ा।
  2. रौलेट एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन में समाज के अन्य वर्गों के साथ ही हिन्दू तथा मुसलमान भी एक-दूसरे के करीब आ गये।
  3. मौलिक राष्ट्रवादी मुसलमान जैसे- मोहम्मद अली, अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खान एवं हसन इमाम इत्यादि स्कूल के रुढ़िवादी विचारों से मुक्त होकर ज्यादा प्रभावशाली हो गये। जिसके कारण मुस्लिम लीग पर अलीगढ़ स्कूल का प्रभाव कम होने लगा। युवा राष्ट्रवादियों ने भी उग्रवादी राष्ट्रवाद की वकालत की तथा राष्ट्रवादी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने पर बल दिया। वे साम्राज्य विरोधी भावनाओं से गहरे प्रभावित थे तथा साम्राज्यवादी दासता को समाप्त करना चाहते थे।

इन्हीं सब गतिविधियों के परिदृश्य में खिलाफत का जन्म हुआ जिसके साथ ही ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के पटल पर उभरा।

खिलाफत का मुद्दा

खिलाफत के मुद्दे ने मौलिक राष्ट्रवादी रुझान के उदय की प्रक्रिया को, मुसलमानों की युवा पीढ़ी तथा उन मुस्लिम शोधार्थियों के मध्य सुलभ बना दिया, जिनमें धीरे-धीरे ब्रिटिश विरोधी भावनायें जागृत हो रही थीं। प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत तुर्की के प्रति अंग्रेजों के रवैये से भारतीय मुसलमान अत्यन्त उतेजित हो गये। न केवल भारतीय मुसलमान, अपितु सम्पूर्ण मुस्लिम जगत तुर्की के खलीफा को अपना धार्मिक प्रमुख मानता था, ऐसे में स्वाभाविक था कि मुसलमानों की सहानुभूति तुर्की के साथ थी। प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने ब्रिटेन के विरुद्ध जर्मनी तथा आस्ट्रिया का साथ दिया था। अतः युद्ध की समाप्ति के उपरांत ब्रिटेन ने तुर्की के प्रति कठोर रवैया अपनाया। तुर्की को विभाजित कर दिया गया तथा खलीफा को पद से हटा दिया गया। ब्रिटेन के इस कदम से पूरे विश्व के मुसलमानों में रोष की लहर दौड़ गयी। भारत में भी मुसलमानों ने ब्रिटेन के इस कदम की तीव्र आलोचना की तथा अंग्रेजों के सम्मुख निम्न मांगे रखीं-

  1. मुसलमानों के धार्मिक स्थलों पर खलीफा के प्रभुत्व को पुर्नस्थापित किया जाये,
  2. खलीफा को, प्रदेशों की पुर्नव्यवस्था कर अधिक भू-क्षेत्र प्रदान किया जाये।

1919 के प्रारम्भ में अली बंधुओं- मोहम्मद अली तथा शौकत अली, मौलाना आजाद, अजमल खान तथा हसरत मोहानी के नेतृत्व में ‘खिलाफत कमेटी' का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य तुर्की के प्रति ब्रिटेन के रवैये को बदलने के लिये ब्रिटेन पर दबाव डालना था। इस प्रकार देशव्यापी प्रदर्शन के लिये एक व्यापक पृष्ठभूमि तैयार हो गयी।

खिलाफत का विकास

असहयोग कार्यक्रम: कुछ समय तक खिलाफत के नेता, इस आंदोलन के पक्ष में सभाओं, धरनों एवं याचिकाओं तक ही सीमित रहे। किन्तु बाद में यह मांग जोर पकड़ने लगी कि अंग्रेजी शासन के विरोध में सशक्त प्रदर्शन किये जायें तथा अंग्रेजों के साथ हर प्रकार से असहयोग की अवधारणा का पालन किया जाये। इस प्रकार खिलाफत का रुख धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगा। नवम्बर 1919 में खिलाफत का अखिल भारतीय सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में अंग्रेजी वस्तुओं के बहिष्कार की मांग की गयी। साथ ही खिलाफत के नेताओं ने यह भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि युद्धोपरांत संधि की शर्ते, जब तक तुर्की के अनुकूल नहीं बनायी जायेंगी तब तक वे सरकार के साथ किसी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे। गांधीजी ने, जो कि अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी के अध्यक्ष थे, इस मुद्दे को भारतीयों में एकता स्थापित करने तथा सरकार के विरुद्ध असहयोग आंदोलन घोषित करने के एक उपयुक्त मंच के रूप में देखा।

खिलाफत के प्रश्न पर कांग्रेस का रवैया

यह बात बिल्कुल स्पष्ट थी कि खिलाफत आन्दोलन की सफलता के लिए कांग्रेस का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। हालांकि गांधीजी खिलाफत के प्रति पूर्ण समर्थित थे तथा इस मुद्दे को लेकर सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह तथा असहयोग आंदोलन प्रारम्भ करना चाहते थे, किन्तु कांग्रेस में इस मुद्दे को लेकर सर्वसम्मति का अभाव था। बाल गंगाधर तिलक ने धार्मिक मुद्दों पर मुस्लिम नेताओं के साथ संधि करने का विरोश किया, साथ ही वे ‘सत्याग्रह' की राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किये जाने के प्रति भी आशंकित थे।

गांधीजी ने तिलक को सत्याग्रह की विशिष्टताओं से परिचित कराने के लिये अथक प्रयास किया तथा इसकी खूबियों के संबंध में उनकी सभी शंकाओं को दूर कर दिया। इसके साथ उन्होंने खिलाफत के मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय से संधि करने का औचित्य भी तिलक को समझाया। कुछ अन्य राज्यों में भी गांधीजी के असहयोग कार्यक्रम का विरोध किया गया। यद्यपि बाद में कांग्रेस इस मुद्दे पर झुक गयी तथा उसने गांधीजी के राजनैतिक कार्यक्रम के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान कर दी। कांग्रेस द्वारा खिलाफत के मुद्दे पर लचीला रुख अपनाने तथा गांधीजी के असहयोग कार्यक्रम को समर्थन प्रदान के कई कारण थे

यह महसूस किया गया कि हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने तथा मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा में लाने का यह स्वर्णिम अवसर है। इस विदेशी शासन की उपस्थिति को महसूस किया तथा अपनी दुर्दशा के लिये उसे उत्तरदायी मानते हुये अपने अधिकारों के लिये संघर्ष की प्रेरणा ली।

संवैधानिक तरीके से संघर्ष जारी रखने पर कांग्रेस का विश्वास धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। विशेष रूप से पंजाब की घटनाओं के संबंध में हंटर कमीशन की भेदभावपूर्ण व दमनकारी सिफारिशों से सरकार के प्रति उसका मोहभंग हो गया था।

कांग्रेस इस बात से भली-भांति परिचित थी कि भारतीय अपने असंतोष की अभिव्यक्ति के लिये उचित अवसर की तलाश में थे।

कांग्रेस का मुस्लिम लीग का समर्थन

राजनैतिक प्रश्न के मुद्दे पर आंदोलन चलाने के लिये मुस्लिम लीग ने भी कांग्रेस को पूर्ण समर्थन देने का निश्चय किया। फरवरी 1920- 1920 के प्रारम्भ में हिन्दू और मुसलमानों के एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने वायसराय से मुलाकात की तथा उनसे खिलाफत के प्रश्न को हल करने की मांग की, किन्तु इस मिशन से कोई लाभ नहीं हुआ। फरवरी 1920 में गांधीजी ने घोषणा की कि पंजाब का मुद्दा गलत है। अतः सरकार अमृतसर हत्याकांड के लिये खेद प्रकट करे तथा पंजाब में हुयी ज्यादतियों का निराकरण करे। तुर्की के प्रति अपने व्यवहार को नर्म करे तथा भारतीयों को संतुष्ट करने के लिये कोई नवीन योजना प्रस्तुत करे। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी की सरकार अगर इन मांगों को स्वीकार नहीं करेगी तो वे असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ कर देंगे।

मई 1920 - तुर्की के साथ मई 1920 में सेब्रीज की संधि की गयी। इस संधि के द्वारा तुर्की का विभाजन कर दिया गया।

जून 1920- में केंद्रीय खिलाफत समिति का अधिवेशन इलाहाबाद में हुआ। इस अधिवेशन में स्कूलों, कालेजों तथा न्यायालयों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया गया तथा गाँधीजि को आन्दोलन का नेतृत्व करने का दायित्व सौंपा गया।

31 अगस्त 1920- खिलाफत समिति ने औपचारिक तौर पर असहयोग आंदोलन की शुरुआत की (दुर्भाग्यवश 1 अगस्त 1920 को बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया)।

सितम्बर 1920 में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन कलकत्ता में आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पंजाब एवं खिलाफत के मुद्दे को हल किये जाने तथा स्वराज्य की स्थापना होने तक असहयोग कार्यक्रम चलाने की स्वीकृति प्रदान की। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने निम्न कार्यक्रम तय किये-

सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार।

न्यायालयों का बहिष्कार तथा पंचायतों के माध्यम से न्याय का कार्य।

विधान परिषदों का बहिष्कार- यद्यपि इस मुद्दे पर कांग्रेस के नेताओं में मतभेद थे तथा वे इस कार्यक्रम को असहयोग कार्यक्रम में सम्मिलित किये जाने का विरोध कर रहे थे। विरोधियों में सबसे प्रमुख नाम सी.आर. दास का था। कुछ ही दिनों (नवम्बर 1920 में) बाद विधान परिषदों के चुनाव होने वाले थे। लेकिन बहिष्कार के विचार से असहमति रखने वाले नेताओं ने भी कांग्रेस के अनुशासन का पालन किया और चुनावों का बहिष्कार किया। अधिकांश मतदाताओं ने भी इन चुनावों में भाग नहीं लिया।

विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा इसके स्थान पर खादी के उपयोग की बढ़ावा। चरखा कातने को भी प्रोत्साहन दिया गया।

सरकारी उपाधियों तथा अवैतनिक पदों का परित्याग, सरकारी सेवाओं का परित्याग, सरकारी करों का भुगतान न करना, सरकारी तथा अर्ध-सरकारी उत्सवों का बहिष्कार तथा सैनिक, मजदूर व क्लर्को का मैसोपोटामिया में कार्य करने के लिये न जाना।

सम्पूर्ण आंदोलन के दौरान कार्यकर्ताओं ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को प्रोत्साहित करने तथा अस्पृश्यता को दूर करने का सराहनीय प्रयास किया। पूरे कार्यक्रम में अहिंसा को सर्वोपरि रखा गया। दिसम्बर 1920 में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में हुआ। इस अधिवेशन में-

  1. असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम का अनुमोदन कर दिया गया।
  2. कांग्रेस के सिद्धांत में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ- कांग्रेस ने संवैधानिक तरीके से स्वशासन प्राप्ति के अपने लक्ष्य के स्थान पर शांतिपूर्ण एवं न्यायोचित तरीके से स्वराज्य प्राप्ति को अपना लक्ष्य घोषित किया। इस प्रकार कांग्रेस ने संवैधानिक दायरे से बाहर जन संघर्ष की अवधारणा को स्वीकार किया।
  3. कुछ महत्वपूर्ण संगठनात्मक परिवर्तन भी किये गये- अब कांग्रेस के रोजमर्रा के क्रियाकलापों को देखने के लिये 15 सदस्यीय कार्यकारिणी समिति गठित की गयी। स्थानीय स्तर पर कार्यक्रमों के वास्तविक क्रियान्वयन के लिये भाषायी आधार पर प्रदेश कांग्रेस कमेटियों का गठन किया गया। गांवों और कस्बों में भी कांग्रेस समितियों का गठन किया गया, सदस्यता फीस चार आना साल कर दी गयी।
  4. गांधीजी ने घोषणा की कि यदि पूरी तन्मयता से असहयोग आंदोलन चलाया गया तो एक वर्ष के भीतर स्वराज्य का लक्ष्य प्राप्त हो जायेगा। समय मोहम्मद अली जिन्ना, एनी बेसेन्ट, जी.एस. कापर्दे एवं बी.सी. पाल ने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि वे संवैधानिक एवं न्यायपूर्ण ढंग से संघर्ष चलाये जाने के पक्षधर थे। जबकि सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने 'इंडियन नेशनल लिबरल फेडरेशन' का गठन कर लिया तथा इसके पश्चात् राष्ट्रीय राजनीति में उनका योगदान नाममात्र का रह गया।

कांग्रेस द्वारा असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम का अनुमोदन करने तथा खिलाफत कमेटी द्वारा इसे पूर्ण समर्थन दिये जाने की घोषणा से इसमें नयी ऊर्जा का संचार हो गया। इसके पश्चात् वर्ष 1921 और 1922 में पूरे देश में इसे अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली।

आंदोलन का प्रसार

गांधीजी ने खिलाफत नेता, अली बंधुओं के साथ पूरे कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श किया। लगभग 90 हजार छात्रों ने सरकारी स्कूल और कालेजों को छोड़ दिया तथा राष्ट्रीय स्कूल और कालेजों में भर्ती हो गये। उस समय देश में 800 राष्ट्रीय स्कूल और कालेज थे।

शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार में पश्चिम बंगाल अग्रणी रहा। कलकत्ता के विद्यार्थियों ने राज्यव्यापी हड़ताल का आयोजन किया। उनकी मांग थी कि स्कूल के प्रबंधक, सरकार से अपना नाता तोड़ लें। पूरे देश में आचार्य नरेन्द्र देव, सी.आर. दास, लाला लाजपत राय, जाकिर हुसैन तथा सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में विभिन्न राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गयी। सुभाष चन्द्र बोस ‘नेशनल कालेज कलकत्ता' के प्रधानाचार्य बन गये। जामिया मिलिया, काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। पंजाब, बम्बई, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, बिहार तथा असम में भी इस कार्यक्रम में अमल किया गया।

देश के कई प्रख्यात वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। इनमें मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सी.आर. दास, सी. राजगोपालाचारी, सैफुद्दीन किचलू, वल्लभभाई पटेल, आसफ अली, टी. प्रकाशम और राजेन्द्र प्रसाद प्रमुख थे। विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक रूप से होली जलाई गयी तथा थोड़े ही समय में विदेशी कपड़ों का आयात घटकर आधा रह गया। विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरने भी दिये गये। विदेशी शराब की दुकानों तथा ताड़ी की दुकानों पर भी धरने आयोजित किये गये। महात्मा गांधी ने कैसर-ए-हिन्द का पदक लौटा दिया। कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं को कोष इकट्टा करने का आदेश दिया। ‘तिलक स्वराज्य फंड' अपने लक्ष्य से भी आगे निकल गया और उसने एक करोड़ रुपये से ज्यादा धन एकत्रित किया गया। चरखे और खादी का खूब प्रचार हुआ। कांग्रेस की स्वयंसेवी सेनायें समानांतर पुलिस की तरह कार्य करने लगीं।

जुलाई 1921 में कराची में खिलाफत आंदोलन में अली बंधुओं ने घोषणा की कि किसी भी मुसलमान का सेना में रहना धर्म के खिलाफ है। अतः सभी मुसलमानों को सेना से त्यागपत्र दे देना चाहिये। इसके कारण सितम्बर में अली बंधुओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। 4 अक्टूबर को गांधीजी ने कांग्रेस के 47 वरिष्ठ नेताओं के साथ एक बयान जारी कर अली बंधुओं के बयान की पुष्टि की तथा सभी भारतीय नागरिकों और सैनिकों से उपनिवेशी शासन से सभी प्रकार के संबंध तोड़ लेने का आह्वान किया। दूसरे दिन कांग्रेस कार्यकारिणी ने भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया तथा स्थानीय कांग्रेस समितियों को भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित करने की कहा गया।

इसके पश्चात् कांग्रेस ने स्थानीय कांग्रेस समितियों को यह इजाजत दे दी कि जब भी उन्हें लगे कि जनता कानून अवज्ञा के लिये तैयार है, वे आंदोलन प्रारंभ कर सकती हैं। इस समय मिदनापुर (बंगाल) तथा गुंटूर (आंध्र) के चिराला-पिराला तथा पेडानंदीपाडू तालुका में यूनियन बोर्ड टेक्सेज के खिलाफ कर अदा न करने का आंदोलन पहले से ही चला रहा था।

असम में चाय बागान के मजदूरों, स्टीमर पर काम करने वाले मजदूरों तथा असम-बंगाल रेलवे के कर्मचारियों ने भी हड़ताल कर दी। बंगाल के एक राष्ट्रवादी नेता जे.एम. सेनगुप्ता ने इस दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

17 नवम्बर 1921 में ‘प्रिंस आफ वेल्स' के भारत दौरे के विरोध में विभिन्न स्थानों पर हड़तालों एवं प्रदर्शनों का आयोजन किया गया। इसके बाद पूरे बम्बई समेत कई स्थानों पर हिंसक वारदातें तथा पुलिस के साथ झड़पें हुई। असहयोग आंदोलन, धीरे-धीरे प्रभावी होता जा रहा था। कई स्थानीय आंदोलनों ने इसमें और ऊर्जा भर दी। इनमें अवध किसान आंदोलन (उत्तर प्रदेश), एका आंदोलन (उत्तर प्रदेश) मोपला विद्रोह (मालाबार) तथा पंजाब से महंतों के निष्कासन की मांग को लेकर चलाया गया सिखों का आंदोलन महत्वपूर्ण थे।

सरकार की प्रतिक्रिया

मई 1921 में गांधीजी तथा भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड रीडिंग के मध्य वार्ता आयोजित की गयी। इस वार्ता में रीडिंग ने सरकार की ओर से गांधीजी से मांग की कि वे अली बंधुओं से अपने उस भाषण को वापस लेने का आग्रह करें जिसके कारण व्यापक पैमाने पर हिंसा हो रही थी। गांधीजी ने महसूस किया कि सरकार उनके एवं खिलाफत नेताओं के मध्य दरार पैदा करने की कोशिश कर रही है। अतः उन्होंने सरकार की मांग को ठुकरा दिया। इसके पश्चात् दिसम्बर में सरकार ने आंदोलनकारियों के विरुद्ध दमनात्मक कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। स्वयंसेवी संगठनों को अवैध घोषित कर दिया गया, सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया, प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया तथा गांधीजी समेत अनेक नेता गिरफ्तार कर लिये गये।

आंदोलन का अंतिम चरण

उधर गांधीजी पर राष्ट्रीय स्तर पर सविनय अवज्ञा आदोलन छेड़ने के लिये दबाव पड़ने लगा। दिसम्बर 1921 में कांग्रेस का अधिवेशन अहमदाबाद में आयोजित किया गया। (इस अधिवेशन के अध्यक्ष हालांकि सी.आर. दास थे, किन्तु उनके जेल में होने के कारण हकीम अजमल खान को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया) इस अधिवेशन में कांग्रेस ने गांधीजी को अवज्ञा का लक्ष्य, समय तथा भावी रणनीति तय करने का पूर्ण अधिकार दे दिया। उधर सरकार के रुख में कोई परिवर्तन नजर नहीं आ रहा शा। जनवरी 1922 में सर्वदलीय सम्मेलन की अपील तथा गांधीजी द्वारा वायसराय को लिखे गये पत्र का भी सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

1 फरवरी 1922 को गांधीजी ने घोषणा की कि यदि सरकार- राजनीतिक बदियों को रिहा कर नागरिक स्वतंत्रता बहाल नहीं करेगी तथा प्रेस से नियंत्रण नहीं हटायेगी तो वे देशव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने के लिये बाध्य हो जायेंगे।

यह आंदोलन सूरत के बारदोली तालुका से प्रारम्भ होने वाला था। किन्तु इस आंदोलन के प्रारम्भ होने के पूर्व ही चौरी-चौरा की घटना हो गयी तथा सम्पूर्ण परिदृश्य ही बदल गया।

चौरी-चौरा का

5 फरवरी 1922 को गोरखपुर जिले (उ.प्र.) के चौरी-चौरा नामक एक छोटे से गांव में हुई एक घटना में इस गांव का नाम भारतीय इतिह्रास के पन्नों में सदैव के लिये दर्ज करा दिया। यह घटना इतनी महत्वपूर्ण थी कि गांधीजी का बहुप्रतीक्षित सविनय अवज्ञा आंदोलन भी 6 साल के लिये स्थगित हो गया। पुलिस ने यहां स्वयंसेवक दलों के कुछ नेताओं को बुरी तरह पीटा, क्योंकि ये लोग शराब की बिक्री एवं खाद्यान्न के मूल्यों में हुई वृद्धि का विरोध करने हेतु प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे थे। इसके परिणामस्वरूप प्रदर्शनकारियों के एक जत्थे ने पुलिस पर हमला कर दिया। पुलिस ने गोली चलाई। पुलिस की गोलीबारी से सारे लोग उतेजित हो गये और पुलिस पर आक्रमण कर दिया। सिपाही भागकर थाने में घुस गये तो भीड़ ने थाने में भी आग लगा दी। जो सिपाही भागने के प्रयास में बाहर आये उन्हें भीड़ ने मार डाला और पुनः आग में फेंक दिया। इस हिंसक घटना में 22 पुलिसकर्मी मारे गये। गांधीजी इस घटना की खबर से अत्यन्त दुःखी हुये तथा उन्होंने तुरन्त आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी।

फरवरी 1922 में बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। इस बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें ऐसी सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी गयी, जिनसे कानून का उल्लंघन होता हो। साथ ही प्रस्ताव में कई रचनात्मक कार्यों को प्रारम्भ करने की घोषणा भी की गयी। इनमें खादी की लोकप्रिय बनाना, राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना, शराबबंदी के समर्थन में अभियान, अस्पृश्यता उन्मूलन हेतु अभियान तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता को बल देने जैसे कार्यक्रम शामिल थे। अनेक राष्ट्रवादी नेताओं यथा-सी.आर. दास, मोतीलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस तथा जवाहरलाल नेहरू इत्यादि ने गांधीजी के आंदोलन वापस लेने के निर्णय से अपनी असहमति प्रकट की।

मार्च 1922 में गांधीजी को गिरफ्तार कर 6 वर्ष के लिये जेल भेज दिया गया। गांधीजी ने इस अवसर पर एक ऐतिहासिक भाषण में कहा कि ‘मैं यहां इसलिये आया हूं क्योंकि मुझे यह अहसास हुआ कि कानून के उल्लंघन एवं विचारपूर्वक हिंसा के लिये मैं प्रसन्न होकर यहां सजा पा सकता हूं, और मुझे लगा कि इस अवसर पर एक सच्चे नागरिक का यही प्रथम कर्तव्य है’।

गांधीजी द्वारा आंदोलन वापस लेने के कारण

गांधीजी ने महसूस किया कि भारतीयों ने अभी अहिंसा के सिद्धांत को अच्छी तरह से नहीं सीखा है या पूर्ण रूप से उसे वे नहीं समझ सके हैं। उन्हें लगा कि आंदोलन की बागडोर उनके हाथों से निकलकर हिंसक हाथों में जाने वाली है। उनका मानना था कि हिंसक आंदोलन को सरकार द्वारा राज्य के हितों की रक्षा के बहाने आसानी से कुचला जा सकता है तथा इसके पीछे सरकार यह तर्क दे सकती है कि हिंसा को दबाने के लिये हथियारों का सहारा लेना उसकी विवशता थी। गांधीजी को आशंका थी कि इस तरह की कार्रवाइयों से अहिंसक असहयोग आंदोलन की पूरी रणनीति विफल हो जायेगी। गांधीजी के अहिंसक आंदोलन की रणनीति यह थी कि शांतिपूर्ण आंदोलन के विरुद्ध यदि उपनिवेशी सरकार दमन का सहारा लेगी तो भावनात्मक तौर पर भारतीय इसके विरुद्ध हो जायेंगे तथा सरकार का वास्तविक चेहरा अनावृत हो जायेगा।

आंदोलन धीरे-धीरे उबाऊ या थकानेवाला बन रहा था। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि सरकार किसी प्रकार से समझौतावादी रुख अपनाने के लिये तैयार नहीं थी। इन परिस्थितियों में इतने व्यापक स्तर पर चल रहे आंदोलन को बहुत ज्यादा नहीं खींचा जा सकता था। इस आंदोलन का मुख्य मुद्दा खिलाफत भी कुछ समय बाद अप्रासंगिक हो। गया। क्योंकि नवम्बर 1922 में तुर्की की जनता ने मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया तथा सुल्तान के राजनैतिक अधिकार छीन लिये गये। खलीफा का पद समाप्त कर तुर्की में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना कर दी गयी। सम्पूर्ण तुर्की में यूरोप की तर्ज पर विधिक व्यवस्था की स्थापना की गयी तथा महिलाओं को व्यापक अधिकार प्रदान किये गये। शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा आधुनिक उद्योगों एवं कृषि को प्रोत्साहित किया गया। 1924 में खलीफा का पद पूर्णरुपेण समाप्त कर दिया गया।

खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन का मूल्यांकन

इस आंदोलन ने शहरी मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में सम्मिलित किया, किन्तु कुछ अर्थों में इसने राष्ट्रीय राजनीति का साम्प्रदायीकरण भी किया। मुसलमानों की भागीदारी ने इस आंदोलन को जनआंदोलन का स्वरूप दिया, किन्तु बाद के वर्षों में जब साम्प्रदायिकता ने जोर पकड़ा तो राष्ट्रीय आंदोलन में साम्प्रदायिक सौहार्द का यह चरित्र बरकरार न रह सका। आंदोलन के नेता मुसलमानों की धार्मिक तथा राजनीतिक चेतना को धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक चेतना के रूप में विकसित करने में भी असफल रहे।

असहयोग आंदोलन ने पहली बार पूरे राष्ट्र की जनता को एक सूत्र में बाध दिया। आंदोलन से सिद्ध हो गया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कुछ चुनिंदा लोगों की ही नहीं, अपितु पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है। आंदोलन ने देश के कोने-कोने में अपना प्रभाव डाला तथा कोई जगह ऐसी नहीं बची, जो आंदोलन के प्रभाव से अछूती रह गयी हो। आंदोलन में समाज के हर वर्ग यथा- कृषक, शहरी, पुरुष, महिला इत्यादि सभी ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस आंदोलन ने देश की जनता को आधुनिक राजनीति से परिचित कराया तथा उनमें स्वतंत्रता की भूख जगायी। आंदोलन ने सिद्ध कर दिया कि भारत के लोग राजनीतिक संघर्ष प्रारम्भ कर सकते हैं तथा गुलामी की दासता से मुक्ति पाने हेतु राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक संघर्ष कर सकता है। इससे अंग्रेजों की यह भ्रांत धारणा भी टूट गयी कि भारतीयों में चेतना का अभाव है तथा दासता की त्रासदी को वे अपने भाग्य की नियति मानते हैं। उपनिवेशी शासन दो मिथ्या अवधारणाओं पर आधारित था- पहला, यह कि विदेशी शासन भारतीयों के हित में है तथा दूसरा, यह कि वह अजेय है तथा उसे कोई परास्त नहीं कर सकता। प्रथम मिथक को नरमपंथी राष्ट्रवादियों ने सरकार की आर्थिक शोषण की प्रवृति को उजागर कर पहले ही तोड़ दिया था तथा दूसरे मिथक को इस आंदोलन ने ‘सत्याग्रह’ के द्वारा कड़ी चुनौती दी तथा इसकी जड़ों को हिलाकर रख दिया। इस प्रकार आंदोलन के पश्चात् भारतीयों का साम्राज्यवादी शासन से भय जाता रहा तथा वे स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रति पूर्णरूप से लालायित हो गये।

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