भारतीय खाद्य निगम Food Corporation of India - FCI

देश में खाद्यान्नों के न्यायपूर्ण वितरण एवं उनके मूल्यों में स्थायित्व लाने के उद्देश्य से भारतीय खाद्य निगम की स्थापना 1965 में की गई थी। अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भारतीय खाद्य निगम सरकार के लिए खाद्यान्नों की खरीद करता है तथा खाद्यान्न का बफर स्टॉक बनाता है। निगम इस प्रकार से स्टॉक किए गए खाद्यान्न को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत उचित मूल्य की दुकानों पर विक्रय के लिए उपलब्ध कराता है। निगम खाद्यान्नों के विदेशी व्यापार में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। सरकार की ओर से विदेशों में खाद्यान्न का क्रय-विक्रय करना निगम का महत्वपूर्ण कार्य है। इनके अतिरिक्त कृषि फसलों व तकनीकों के बारे में अनुसंधान करना व खाद्यान्नों के भंडारण क्षमता में वृद्धि करना भी निगम के कार्यों में सम्मिलित है।

निगम का संगठन

भारतीय खाद्य निगम का एक मुख्यालय एवं पांच क्षेत्रीय कार्यालय हैं। इसमें एक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एक अतिरिक्त सचिव एवं वित्त सलाहकार, एक संयुक्त सचिव (भंडारण) एवं छह सदस्य होते हैं।

निगम के उद्देश्य एवं दायित्व

भारतीय खाद्य निगम की स्थापना खाद्य निगम अधिनियम, 1964 के तहत खाद्य नीति के निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए की गई-

  • किसानों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी मूल्य समर्थन
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत् देशभर में खाद्यान्नों का वितरण
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए खाद्यान्नों के प्रचालन तथा बफर स्टॉक के संतोषजनक स्तर को बनाए रखना
  • राष्ट्र सेवा के अपने 45 वर्षों के दौरान, भारतीय खाद्य निगम ने आपदा प्रबंधन उन्मुखी खाद्य व्यवस्था को स्थिर सुरक्षा प्रणाली में सफलतापूर्वक रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
  • किसानों को लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना
  • उचित मूल्यों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना, विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों को
  • खाद्य सुरक्षा के उपाय के तौर पर बफर स्टॉक बनाए रखना
  • मूल्य स्थिरिता के लिए बाजार में हस्तक्षेप करना

भारतीय खाद्य निगम का निष्पादन

खाद्यान्न की अधिप्राप्ति मूल्य सुनिश्चित कराना और इसके साथ-साथ समाज के कमजोर वर्ग को किफायती मूल्यों पर खाद्यान्न की उपलब्धता भी सुनिश्चित करना है। इस प्रकार प्रभावशाली/बाजार हस्तक्षेप से मूल्य नियंत्रित रहते हैं जिससे देश की समग्र खाद्य सुरक्षा में अभिवृद्धि, होती है।

भारतीय खाद्य निगम, भारत सरकार की केन्द्रीय एजेंसी है, जो कि अन्य राज्य एजेंसियों के साथ मिलकर मूल्य समर्थन योजना के अधीन गेहूं, धन तथा मोटे अनाज की अधिप्राप्ति करता है तथा संविधिक लेवी योजना के अधीन चावल की अधिप्राप्ति करता है। मूल्य समर्थन के अंतर्गत अधिप्राप्ति मुख्यतः किसानों को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के लिए की जाती है ताकि वे बेहतर फसल उत्पादन के लिए प्रोत्साहित हो सकें।

प्रत्येक रबी/खरीफ फसल मौसम के दौरान, फसल की कटाई से पूर्व, कृषि लागत और मूल्य आयोग सीएसीपी की सिफारिशों के आधार पर, भारत सरकार अधिप्राप्ति के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा करती है जो कि अन्य घटकों के साथ-साथ विभिन्न कृषि निवेश की लागत तथा किसानों को उनकी फसल का यथोचित मार्जिन देने पर भी विचार करती है।

खाद्यान्न अधिप्राप्ति को सुगम बनाने के लिए, भारतीय खाद्य निगम तथा अन्य राज्य एजेंसियां राज्य सरकार के परामर्श से विभिन्न मण्डियों तथा प्रमख केंद्रों पर बड़ी संख्या में खरीद केंद्र स्थापित करती हैं। केंद्रों की संख्या तथा उनके स्थान निर्धारण का निर्णय विभिन्न मानदंडों के आधार पर राज्य सरकारों द्वारा लिया जाता है ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रचालनों को अधिकतम स्तर तक बढ़ाया जा सके। इस प्रकार के व्यापक तथा प्रभावशाली मूल्य समर्थन प्रचालनों के परिणामस्वरूप समय के साथ-साथ किसानों की आय में वृद्धि हुई है तथा उन्नत पैदावार के लिए कृषि क्षेत्र में उच्च निवेश को प्रोत्साहन भी मिला है।

भारत सरकार के विनिर्देशनों के अधीन आने वाले सभी प्रकार के भण्डार जो खरीद केंद्रों पर लाए जाते हैं, वे नियत समर्थन मूल्य पर खरीद लिए जाते हैं। यदि किसानों को अन्य खरीददारों जैसे कि व्यापारियों/मिलर्स आदि से समर्थन मूल्य से बेहतर कीमत प्राप्त होती हैं तो वे अपनी फसल उन्हें बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। भारतीय खाद्य निगम को अपनी फसल समर्थन मूल्य से कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर ना होना पड़े।

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