ई-गवर्नेंस e-Governance

ई-गवर्नेंस: अनुप्रयोगमॉडलसफलताएंसीमाएं और संभावनाएं

ई-गवर्नेंस से अभिप्राय सरकार द्वारा सेवाओं एवं सूचनाओं को जनता द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले वैद्युत साधनों (electronic means) का प्रयोग कर जन-साधारण को उपलब्ध कराए जाने से है। इस प्रकार के सूचना प्रदाता साधन सूचना-प्रौद्योगिकी (information technology-IT) के रूप में जाने जाते हैं। सूचना-प्रौद्योगिकी के प्रयोग से सरकार को जनता एवं अन्य अभिकरणों को सूचनाओं के प्रसार हेतु प्रक्रिया को दक्ष, त्वरित एवं पारदर्शी बनाने तथा प्रशासनिक गतिविधियों के निष्पादन में सुविधा रहती है।

प्रशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का समन्वित प्रयोग करना ई-गवर्नेंस का पर्याय है। लोक प्रशासन में इस प्रकार का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा कुछ कम्प्यूटरों को लोकल एरिया नेटवर्क से जोड़कर किया गया था। एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट एडमिनिस्ट्रेशन नेटवर्क नामक यह परियोजना ही विस्तारित होकर वल्र्ड वाइड वेब (w.w.w.) का रूप ले चुकी है। अमेरिका में दिसम्बर, 2002 में पारित ई-शासन अधिनियम-2002 के माध्यम से सूचना प्रौद्योगिकी एवं जनता से लोक सेवाओं का एकीकरण हो चुका है। देश-विदेश के अधिसंख्य सरकारी विभागों, अभिकरणों तथा संगठनों की अपनी इंटरनेट वेबसाइटें खुल गई हैं। इन वेबसाइटों के माध्यम से सूचना सरकारी संगठन तुलनात्मक रूप से अधिक पारदर्शी, संवेदनशील और जनोन्मुख सिद्ध हो सकते हैं। जैसाकि वर्तमान युग में सूचना आर्थिक विकास की कुंजी है इसलिए पूरी व्यवस्था सूचना के चारों ओर घूम रही है। वास्तव में ई-शासन एक विस्तृत संकल्पना है जो मात्र शासकीय व्यवस्था से संबंध नहीं रखती अपितु इसमें राजनितिक, सामाजिक सांस्कृतिक, आर्थिक, तकनीकी, प्रशासनिक तथा अन्य आयाम भी शामिल हैं। यदि संकीर्ण अर्थ में देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर एवं सूचना विज्ञान के क्षेत्र में विकसित हुई युक्तियों का प्रशासन में प्रयोग करना ही ई-गवर्नेस है जबकि इसके विपरीत विस्तृत दृष्टिकोण में इसका अर्थ किसी भी संगठन, समाज या तंत्र के विविध पक्षों को नियंत्रित, विकसित, पोषित एवं समन्वित रखने के क्रम में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना ई-गवर्नेंस है। यह ई-नागरिक व्यवस्था का व्यापक प्रसार है।

बीसवीं सदी के प्रमुख चिन्तक एल्विन टाफलर ने कहा कि- मानव सभ्यता को दो प्रमुख क्रांतियों ने प्रभावित किया है। पहली क्रांति के तहत् 10,000 वर्ष पूर्व हुई कृषि क्रांति ने मानव के खानाबदोश जीवन को सुस्थिर आधार देते हुए सामाजिक-आर्थिक विकास को गति दिखाई तो दूसरी क्रांति 17वीं सदी की औद्योगिक क्रांति थी, जिसने मानव को भौतिकवादी तथा आधुनिक जीवन दिया। उन्होंने तीसरी क्रांति के रूप में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति की कल्पना की थी जो आज हमारे सामने प्रवर्तित है।

भारत सरकार ने निकट भविष्य में सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महाशक्ति बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। देश में अधिकांश विदेशी कम्पिनियों के लिए सस्ती प्रोग्रामिंग (cheap programming) किए जाने हेतु कार्यशालाओं के अस्तित्व से परिवर्तन आरम्भ हो चुके हैं। यहां प्रश्न यह उठता है कि, इस नए स्तर, जिसका भारत की जनता का एक बड़ा भाग आदी है, का क्या प्रभाव पड़ेगा, विशेषत: उन पर जो कि घरेलू अर्थव्यवस्था में प्रवासित हैं। शहरों में, साइबर कैफे (cyber cafes) का फैलता तंत्र बड़ी संख्या में मध्यवर्गीय लोगों को सुविधा उपलब्ध कराता है, जो कम्प्यूटर को वहन नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालयों के मध्य सामंजस्य एवं दूर शिक्षा के रूप में सीखने के नवीन अवसर भी सूचना-प्रौद्योगिकी के कारण ही उपलब्ध हैं।

तथापि, सूचना क्रांति का भारत के ग्रामीण निर्धनों पर काफी अल्प प्रभाव पड़ा है। जन-साधारण के लिए सूचना-प्रौद्योगिकी पर कार्य समूह (Working Group on Information Technology for Masses) नामक रिपोर्ट में यह व्यक्त किया गया की, सूचना-प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित करने वाले प्रयास भारतीय समाज में सूचना-प्रौद्योगिकी आधारित सेवाओं की सुविधा प्राप्तवर्ग एवं इस सुविधा से वंचित वर्ग के मध्य नए विभाजन को जन्म दे सकते हैं। यह एक आंगुलिक (digital) विभाजन होगा, जो पहले से ही विद्यमान विषमताओं को प्रतिवलित एवं तीव्र करेगा। इसी कारण से, सरकार ने नवीन सूचना-प्रौद्योगिकी के लाभों को निर्धनता रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाली 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या तक प्रसारित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

सूचना-प्रौद्योगिकी को जनसाधारण तक पहुँचाने हेतु सरकार द्वारा किए जाने वाले कार्य काफी कम हैं, किंतु ये कार्य राज्य एवं स्थानीय का विस्तार करने हेतु, विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रों में, भूमिका को प्रोत्साहित करने को उत्प्रेरणा एवं स्वीकृति प्रदान करते हैं। अनेक सृजनात्मक परियोजनाएं शुरू किए जाने के पश्चात् भी यह स्पष्ट नहीं है कि वे स्थानीय जनता की अत्यंत अनिवार्य आवश्यकताओं को प्रत्यक्षतः कहां तक पूर्ण कर सकी हैं। इन प्रयोगात्मक एवं विकीर्ण (scattered) परियोजनाओं का सावधानीपूर्वक अंतर-अनुशासनात्मक विश्लेषण करके उनके प्रभावों का निर्धारण कर पाने में समय लगेगा।

ई-गवर्नेस की श्रेणियां

भारत एवं विश्व के कई देशों में ई-गवर्नेस कई रूपों में प्रवर्तित हैं। स्थूल रूप से ई-गवर्नेस संबंधी परियोजनाओं को सेवा प्रदान करने की दृष्टि से पांच श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-

  1. जी.टू.जी. (सरकार से सरकार तक): जब सरकार के किसी विभाग का दूसरे किसी विभाग से ई-गवर्नेंस के माध्यम से संपर्क होता है तो यह श्रेणी गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट कहलाती है। जैसे खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय, खाद्यान्नों सम्बन्धी आवश्यकताओं की सूचना कृषि मंत्रालय को भेजे या वित्त मंत्रालय अन्य मंत्रालयों को वित्तीय सूचना उपलब्ध कराए इत्यादि।
  2. जी.टू.सी. (सरकार से जनता तक): सरकार एवं नागरिकों के बीच पास्परिक व्यवहार गवर्नमेंट टू सिटीजन श्रेणी में आता है जैसे आयकर विवरणी जमा कराना, विद्युत् एवं जल सम्बन्धी शिकायतें करना इत्यादि।
  3. जी.टू.बी. (सरकार से व्यवसाय तक): गवर्नमेंट टू बिजनेस श्रेणी के अंतर्गत सरकार व्यापार जगत से संपर्क कर लेन-देन करती है, जैसे ऑनलाइन ट्रेडिंग तथा सीमा एवं उत्पाद शुल्क संबंधी प्रकरण इत्यादि।
  4. जी.टू.ई. (सरकार से कर्मचारी तक): इसमें सरकार अपने कर्मचारियों (गवर्नमेंट टू इम्पलॉयी) से संप्रेषण करती है।
  5. सी.टू.सी. (नागरिक से नागरिक तक): सिटीजन टू सिटीजन श्रेणी में नागरिकों का पारस्परिक सम्पक होता है।

इन उपरोक्त श्रेणियों का विकास कर प्रशासन का उपसर्ग ''- दक्षता (एफिशिएंसी), सशक्तिकरण (एम्पावरमेंट), प्रभावशीलता (इफेक्टिवनेस), आर्थिक एवं सामाजिक विकास (इकॉनोमिक एण्ड सोशल डेवलपमेंट), संवर्द्धित सेवा (एनहांस्ड सर्विस) जैसे तत्वों को हासिल करने का प्रयास करता है।

ई-गवर्नेस की विशेषताएं

  • इसमें प्रशासनिक नेतृत्व एवं प्रौद्योगिकी का एकीकरण हो जाता है।
  • सरकारी विभागों या अभिकरणों से संबंधित सूचनाएं एवं सेवाएं इण्टरानेट एवं इंटरनेट पर उपलब्ध होना एवं स्वयं सरकार द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी की आधुनिक तकनीकों का प्रशासनिक कृत्यों में प्रयोग करना, ई-गवर्नेस का व्यावहारिक स्वरूप है।
  • ई-शासन की अवधारणा मूल रूप से बेहतर सरकार की मान्यता को पल्लवित करती है जिसके तहत म्नौकर्शाही का छोटा आकार, प्रशासन में सच्चरित्रता, लोक सेवाओं के प्रति जवाबदेही, जनता में प्रशासन के प्रति विश्वसनीयता जगाना तथा प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता लाना इत्यादि शामिल हैं।
  • यह प्रशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का संपूर्ण आत्मसात् कारण है और इसमें ई-गवर्नेस शामिल है।
  • यह अभिशासन की स्थापना की एक पद्धति है।
  • इस व्यवस्था से कागजी कार्यवाही में कमी आती है तथा विलंब और बाबू राज पर रोक लगती है।
  • ई-गवर्नेस द्वारा टेलीकांफ्रेंस संभव हुआ है जिससे प्रशासन में दक्षता आई है।
  • इसमें एक ही कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होती और निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक कार्यक्रमों के रूप में प्रोग्राम विकसित कर दिया जाता है।
  • ई-गवर्नेस, लोक प्रशासन में स्वचालन की अवधारणा तथा प्रयासों का परिष्कृत एवं विस्तार स्वरूप है।

ई-गवर्नेंस के लाभ

ई-गवर्नेंस नागरिकों एवं व्यवसाय के लिए सुगम एवं लागत हितैषी है। इसके माध्यम से बिना समय, ऊर्जा एवं पैसा गवांए बेहद अद्यनूतन सूचना प्राप्त हो जाती है। ई-शासन के लाभों में शामिल हैं- दक्षता, बेहतर सेवाएं, लोक सेवाओं तक बेहतर पहुंच और अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही।

  • सरकारी विभागों की संगठनात्मक, कार्यात्मक एवं प्रक्रियात्मक सूचनाएं
  • विकासपरक एवं सामाजिक कल्याण से संबंधित योजनाओं का विवरण
  • आदेश पत्रों की उपलब्धता एवं भरे हुए पत्रों की स्वीकार्यता
  • पंजीकरण सुविधा
  • दस्तावेजों की प्रतिलिपियां
  • ऑनलाइन मण्डी, नीलामी तथा बिल जमा सुविधा
  • अपराधियों, भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों तथा करदाताओं से सम्बंधित विवरण
  • शिकायत पंजीकरण तथा निस्तारण
  • प्रबोधन, नियंत्रण तथा मूल्यांकन की नियमित एवं निर्धारित प्रक्रियाएं
  • कागजी कार्रवाई में कमी आती है और बाबू राज पर अंकुश लगता है।
  • अधिकारियों के व्यक्तिगत दौरों, निरीक्षण, पर्यवेक्षण तथा प्रत्यक्ष नियंत्रण का स्थान दूर बैठ वार्तालाप ने ले लिया है।
  • नियंत्रण का क्षेत्र व्यापक हो गया है।
  • एक ही प्रकृति के कार्य को बार-बार करने की बजाय निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक कार्यक्रमों के रूप में विकसित कर दिया जाता है।

ई-गवर्नेस के जोखिम एवं आलोचना

ई-गवर्नेंस के क्रियान्वयन एवं निर्माण में कई चिंताएं एवं सबल कारक अंतर्निहित हैं।

  1. अत्यधिक निगरानी: सरकार एवं इसके नागरिकों के बीच बढ़ता संपर्क दोनों तरीके से कार्य कर सकता है। एक बार ई-गवर्नमेंट विकसित होना शुरू हो जाती है और बेहद परिष्कृत बन जाती है, तो नागरिकों को व्यापक पैमाने पर सरकार के साथ इलेक्ट्रॉनिक रूप से संपर्क करने के लिए बाध्य किया जाएगा। सम्भावना है की इससे नागरिकों की निजता भंग होगी। सरकार एवं नागरिकों के बीच इलेक्ट्रॉनिक रूप से अत्यधिक सूचनाओं का आदान-प्रदान निरंकुश व्यवस्था को पल्लवित कर सकता है। सरकार अपने नागरिकों की असीमित सूचना को प्राप्त कर सकती है और इस प्रकार नागरिक की निजता पूरी तरह से समाप्त हो सकती है।
  2. लागत: ई-गवर्नेस में इससे सम्बद्ध प्रौद्योगिकी के विकास एवं क्रियान्वयन में अत्यधिक धन व्यय होता है।
  3. सभी की पहुंच में न होना: ई-गवर्नेस से तात्पर्य लगाया जाता है कि सरकार की सूचना एवं सेवाओं तक सभी नागरिकों की पहुंच हो सकती है और जो एक लोकतंत्र के लिए अच्छा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है की सभी नागरिक स्वतः सूचना एवं सेवाओं को प्राप्त करने की स्थिति में हैं।
  4. तकनीकी उपकरणों की मुश्किल प्राप्ति: ई-गवर्नेस में कंप्यूटर, बेतार, संजाल, सीसीटीवी, ट्रेकिंग तंत्र, टीवी और रेडियो जैसे उपकरणों का प्रयोग शामिल होता है। विकासशील देशों में इस प्रकार तकनीकियों को अपनाना एक समस्या हो सकती है।
  5. पारदर्शिता एवं जवाबदेही का असत्य बोध: ऑनलाइन सरकारी पारदर्शिता द्विअर्थी प्रतीत होती है क्योंकि इसे स्वयं सरकार नियंत्रित करती है। सूचनाओं को इंटरनेट साइट से लोगों के लिए रखना या हटाना सरकार द्वारा किया जाता है। उदाहरणार्थ, न्यूयार्क शहर में 11 सितम्बर, 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने अपनी सरकारी वेबसाइट से राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अधिकतर सूचनाएं हटा दी।

ई-गवर्नेसनीति-निर्माण एवं सार्वजनिक तंत्र: सरकार द्वारा नीति-निर्माण, नागरिक सहभागिता एवं लोक कार्य काफी समय से जटिल प्रक्रिया रही है। सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली परम्परागत नीति-निर्माण प्रक्रिया है:

  1. नागरिकों द्वारा निर्वाचनों एवं करों के भुगतान के मध्य प्रासंगिक आगत (occasional input) उपलब्ध कराया जाता है।
  2. शासकीय अवसंरचना में शक्ति का केंद्रण राजनीतिक नेताओं के हाथो में निहित रहता जो कि विस्तृत नीतिगत प्राथमिकताएं निर्धारित करते हैं तथा इन प्राथमिकताओं और विद्यमान कार्यक्रमों एवं वैधानिक आवश्यकताओं के आधार पर संसाधनों का आवंटन करते हैं।
  3. प्रत्यक्षत: सरकार तथा अन्य सार्वजनिक निधिबद्ध (publicly funded) संगठनों के द्वारा लोक कार्य नीतिगत कार्य सूची एवं कानून के क्रियान्वयन का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अधिकाल से ही, नागरिक आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं में परिवर्तन को पहचानने में नेताओं के समक्ष नौकरशाही एक बड़ी बाधा है। निर्वाचनों के अतिरिक्त नागरिक आगत (citizen input) के विषय में जान पाना थोड़ा कठिन होता है। बेहतर संवाद व्यवस्था की अक्षमता से बहुधा नागरिकों, नेताओं एवं लोक कार्यों का क्रियान्वयन करने वालों के मध्य वियोजन (disconnects) उत्पन्न होता है।

अपने एक-मार्गीय (one-way) प्रसारण को द्धि-मार्गीय (two way) बनाने से शासन प्रक्रिया अधिक दक्षता से जनता की समस्याएं सुनने एवं उन पर प्रतिक्रिया कर पाने में और अधिक दक्ष हो सकेगी।

सार्वजनिक तंत्र

सार्वजनिक तंत्र (public network) एक नवीन संकल्पना है। यह संकल्पना प्रत्यक्ष एवं विभाजित ऑनलाइन स्टेकहोल्डर के माध्यम से स्थापित सार्वजानिक नीतियों के लक्ष्यों एवं कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्वयन हेतु आईसीटी के प्रयोग हेतु प्रयुक्त की जाने वाली रणनीतियों को इंगित करती है।

ई-लोकतंत्र यदि सरकार में शासन के भीतर निवेश (input) का प्रतिनिधित्व करता है तो सार्वजनिक तंत्र उसी अथवा उसी प्रकार के ऑनलाइन उपकरणों के अनुप्रयोग द्वारा सहभागी निर्गत (participative output) का प्रतिनिधित्व करता है। सार्वजनिक तंत्र एक चयनात्मक अवधारणा है, जो कि पूर्व निर्धारित, सरकारी नीतियों को सम्भालने हेतु द्वि-मार्गीय ऑनलाइन सूचनाओं के आदान-प्रदान का प्रयोग करती है।

ई-लोकतंत्र

एक व्यावहारिक परिभाषा के अनुसार, ई-लोकतंत्र (e-democracy) वर्तमान सूचना युग में प्रतिदिन के लोकतांत्रिक शासकीय प्रतिनिधित्व को बनाए रखने एवं उसके रूपांतरण में सहायता हेतु आवश्यक है। सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तथा रणनीतियों का स्थानीय संचार, राज्य/क्षेत्रों, राष्ट्रों एवं वैश्विक स्तर की राजनीतिक प्रक्रिया के भीतर लोकतांत्रिक क्षेत्रों (democratic sectors) द्वारा प्रयोग किया जाना ही ई-लोकतंत्र है।

साथ ही सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षण से शक्तिशाली बनाना और उत्पादकता व् रचनात्मकता के लिए पुरस्कृत करना, नागरिकों को क्लाइंट के रूप में देखना तथा सरकार में और अधिक पारदर्शिता तथा दायित्वशीलता बढ़ाने के लिए पहल करना भी इसके दायरे में आते हैं। इसके अतिरिक्त, सूचना युग ने मताधिकार संपन्न एवं गैर-मताधिकार वाले गरीब तबकों के बीच अवसरों तक पहुँच कायम करने को लेकर बनी खाई की और गहरा बना दिया है। सु-शासन केवल सूचना और संचार तकनीकी द्वारा प्रस्तुत प्रभावी तरीकों को आत्मार्पित किए जाने तक ही सिमित नहीं है, अपितु सभी नागरिकों को इस तकनीकी तक पहुँच प्राप्त हो, अवसर तक पहुँच कयन होना विकास का एक महत्वपूर्ण वाहक माना गया है।

ई-गवर्नमेंट की व्यापक अवधारणा भी ई-लोकतंत्र के समान है। ई-गवर्नमेंट का अर्थ सरकारी अभिकरणों द्वारा सूचना प्रौद्योगिकियों का उपयोग है, जिनमे नागरिकों, व्यवसायों और सरकार के अन्य अंगों के साथ संबंधों को परिवर्तित करने की क्षमता है। ये प्रौद्योगिकियां विविध प्रकार के लक्ष्यों को पूरा कर सकती हैं। नागरिकों को सरकारी सेवाओं की की बेहतर डिलीवरी, व्यवसाय और उद्योग के साथ बेहतर आपसी संपर्क, सूचना तक अभिगम प्रदान कर नागरिक का सशक्तीकरण अथवा अधिक कुशल सरकारी प्रबंधन। उभरती सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों के कारण सेवा केन्द्रों को ग्राहकों के निकट रखना संभव है। ऐसे केन्द्रों में सरकारी एजेंसी में बिना प्रभारी के किओस्क, ग्राहक के निकट अवस्थित सेवा किओस्क या घर अथवा कार्यालय में पर्सनल कम्प्यूटर का उपयोग शामिल हो सकते हैं। ई-गवर्नमेंट का उद्देश्य सरकार और नागरिकों, सरकार और व्यवसायिक उद्यमों के बीच आपसी संपर्क और अंतर-अभिकरण संबंधों को अधिक मैत्रीपूर्ण, सुविधाजनक, पारदर्शी और कम खर्चीला बनाना है।

इस प्रकार, ई-लोकतंत्र समाज के सभी वर्गों के द्वारा राज्य के अभिशासन में भाग ले सकने की क्षमता के माध्यम से लोकतंत्र की विकास की दिशा में भी सूचना और संचार प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समग्र रूप में, ई-लोकतंत्र पारदर्शिता, उत्तरदायित्व की भावना एवं सहभागिता बढ़ाने की प्रक्रिया है।

निम्नलिखित लोकतांत्रिक कर्ताओं (democratic actors) लोकतांत्रिक क्षेत्रों के अंतर्गत सम्मिलित किया जा सकता है-

  1. सरकारें (governments)
  2. निर्वाचित अधिकारी (elected officials)
  3. मीडिया (एवं सभी बड़े ऑनलाइन पोर्टल) [media (and major online portals)]
  4. राजनितिक दल एवं हित समूह (political parties and interest groups)
  5. लोक समाज संगठन (civil society organisations)
  6. अंतर्राष्ट्रीय सरकारी संगठन (international governmental organisations)
  7. नागरिक/मतदाता (citizens/voters)

शासन में ई-लोकतंत्र के लक्ष्य: लोकतंत्र एवं प्रभावी शासन को प्रोत्साहित करने हेतु शासन में ई-लोकतंत्र के प्रमुख लक्ष्य निम्नलिखित हैं:

  1. सरकार द्वारा निर्णयन (decisions) में सुधार।
  2. सरकार में नागरिकों के विश्वास को बढ़ाना।
  3. सरकार की उत्तरदायित्वता एवं पारदर्शिता में वृद्धि करना।
  4. जन-इच्छा को सूचना युग में समायोजित करने की क्षमता।
  5. गैर-सरकारी संगठनों, व्यापार, एवं सार्वजानिक चुनौतियों से लड़ने हेतु नए मार्गों की खोज में रुचि रखने वाले नागरिकों सहित पणधारिता (stakeholders) में प्रभावी समामेलन।

ई-पंचायत

भारत में पंचायती राज के माध्यम से लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण किया गया है। यह शासन का प्रमुख कार्यान्वयन निकाय होता है, जिस पर पूरी विकासात्मक योजना की सफलता निर्भर करती है। इसलिए शासन की इस निम्न इकाई में उच्च स्तरीय सुधार की आवश्यकता है। इस संदर्भ में ई-पंचायत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके लिए पंचायत से संबंधित सभी मामलों, नियमों, सरकारी योजनाओं से संबंधित सभी सूचनाओं आदि का कम्प्यूटर द्वारा संग्रहण कर उनका सहज लाभ आम आदमी तक पहुंचाया जा सकता है।

दरअसल ई-पंचायत से अर्थ इलेक्ट्रॉनिक पंचायत से है। इसके अंतर्गत सुचना और संचार की आधुनिक तकनीक का उपयोग कर पंचायत, को कम्प्यूटरीकृत किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पंचायत-स्तर शासन प्रबंधन में गुणात्मक और मात्रात्मक सुधार करना है। ई-पंचायत के माध्यम से बेहद तेजी से और कम समय में सूचना का प्रसार होता है जिसका लाभ ग्रामीण जीवन में हो रही प्रगति में मिल सकेगा। जहां ई-पंचायत का प्रारंभ हो गया है वहां ग्रामीण क्षेत्रों के शासन प्रबंधन में महत्वपूर्ण सुधार देखा गया है, जो पंचायत के सुधार और अर्थव्यवस्था को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है इससे पंचायत स्तर पर पारदर्शिता, शांति, सुरक्षा एवं समानता लाने में मदद मिल रही है। उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार महिलाओं के प्रवेश ने पंचायत स्तर पर पुरुष वर्ग के आधिपत्य को कमजोर किया है, ठीक उसी प्रकार इस स्तर पर कम्प्यूटर एवं इंटरनेट का प्रवेश सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाने का कार्य करेगा।

वर्तमान में पंचायत की राज्य संचित निधि से व्यय राशि आवंटित की जाती है, लेकिन इसकी सही जानकारी आम लोगों तक नहीं पहुंच पाती। ई-पंचायत के माध्यम से वित्तीय अपारदर्शिता को समाप्त किया जा सकता है। इसका सकारात्मक परिणाम लोगों के प्रति व्यक्ति आय में देखने को मिलेगा। ई-पंचायत तकनीक द्वारा लोगों में राजनीतिक अधिकार के प्रयोग की शिक्षा से सामाजिक जागरूकता आएगी, जिससे लोगों में नागरिक गुणों का विकास होगा,जनता और शासक में एक-दूसरे की परेशानियों को समझने की भावना उत्पन्न होगी, जिससे परस्पर सहयोग का विचार उत्पन्न होगा। यह सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए बहुत बड़ी क्रांति होगी। ई-पंचायत के माध्यम से भूमि संबंधी दस्तावेजों, नक्शों एवं सरकारी कानूनों और आदेशों की किसानों को सहज प्राप्ति कराई जा सकती है, जिससे लोगों को समान रूप से आर्थिक लाभ एवं न्याय मिल सके।

ई-पंचायत की सफल बनाने के लिए जरूरी कदम
  • पंचायत स्तर पर बुनियादी सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करना।
  • प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर एक ग्राम सेवक तथा सह-सूचना अधिकारी की नियुक्ति करना।
  • कम्प्यूटर एवं इंटरनेट से संबंधित ज्ञान द्वारा जन चेतना व्यापक करना।
  • ग्राम पंचायत से संबंधित सभी सूचनाओं का संग्रहण एवं निर्देशन करना।
  • कम्प्यूटर; इंटरनेट के प्रयोग और उपयोग से संबंधित जानकारी और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

लोगों में सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना के अधिकार के प्रति भरोसा बढ़ा है। पंचायत की किसानों एवं जनता को कम्प्यूटर की स्क्रीन पर ही अनेक प्रकार की जानकारी प्राप्त कराई जा सकती है। एटीएम से रुपया निकालना, बसों एवं रेलों में आरक्षण की स्थिति जानना एवं टिकट प्राप्त करना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ई-पंचायत के द्वारा कोई भी व्यक्ति कृषि सम्बन्धी जानकारी एवं मौसम सम्बन्धी जानकारी हासिल कर सकता है और उस सूचना के अनुसार कार्यवाही की जा सकती है। ई-मेल के द्वारा जनता अपनी शिकायत सरकार से कर सकती है और समाधान तथा जानकारियां प्राप्त कर सकती हैं। ई-पंचायत सरकार द्वारा पंचायत को पिछड़े युग से सूचना युग तक पहुंचाने के लिए किया जाने वाला प्रयास है। आज सूचना प्रौद्योगिकी का योगदान बढ़ता जा रहा है और ऐसे परिदृश्य में पंचायत को इससे जोड़ना अत्यावश्यक है। इस प्रकार ई-पंचायत के माध्यम से प्रभावी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बहाल कर सुशासन भी स्थापित किया जा सकता है।

भारत में ई-गवर्नेस

भारत में सुशासन के प्रयास में सूचना क्रांति ने एक शक्तिशाली उपकरण का कार्य किया है। ज्ञातव्य है कि भारत सूचना प्रौद्योगिकी क्षमता में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ई-प्रशासन, ई-शिक्षा, ई-व्यापार, ई-वाणिज्य, ई-मेडिसिन आदि ऐसे कई क्षेत्र है जहाँ सुचना प्रौद्योगिकी की प्रभावशाली भूमिका में महत्वपूर्ण प्रगति देखी जा सकती है।

ई-गवर्नेंस के अंतर्गत सरकारी सेवाएं एवं सूचनाएं पहुँचाने में विभिन्न इलैक्ट्रॉनिक विधियों एवं उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। ई-प्रशासन के माध्यम से शासन को सरल, नागरिकोन्मुख, पारदर्शी, जवाबदेह एवं त्वरित बनाया जा सकता है।

वर्ष 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध से राष्ट्रीय एवं राज्य सरकारें उत्साहपूर्वक सुचना और संचार प्रौद्योगिकी प्रणाली को अपनाती चली आ रही हैं, जिसमे खास तौर पर इन्टरनेट सहित वेब आधारित तकनीकी भी है। भारत सरकार के प्रमुख विकास स्तंभों में सूचना-प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000, जिसके द्वारा इलेक्ट्रॉनिक संवाद की वैधता प्रदान की गई और इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए कार्य प्रथाओं का नियमन किया गया और सुचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (इसके द्वारा जनसंस्थानों की सूचना की मांग करने वाले नागरिकों की जानकारी देने के लिए उत्तरदायी ठहराया गया) शामिल हैं।

ई-गवर्नेस के उद्देश्य

  • सरकार के निर्णयों में सुधार
  • सरकार में लोगों के विश्वास में वृद्धि करना
  • सरकार की जवाबदेही एवं पारदर्शिता बढ़ाना
  • सूचना युग में नागरिकों की इच्छाओं की सुव्यवस्था की योग्यता प्राप्त करना
  • नाइ चुनौतियों का सामना करने में गैर-सरकारी संगठनों, व्यवसायियों एवं इच्छुक नागरिकों को प्रभावी रूप से शामिल करना।

ई-गवर्नेस की उपयोगिता

  • ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोग भी देश-विदेश के घटनाक्रम से भली-भांति परिचित हो सकेंगे।
  • इसके माध्यम से योजनाओं एवं दस्तावेजों का सुव्यवस्थित रख-रखाव संभव हो सकेगा।
  • सूचना का अधिकार एवं ई-प्रशासन मिलकर देश के विकास में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकेंगे।
  • विभिन्न योजनाओं/परियोजनाओं की जानकारी एक आम आदमी तक इंटरनेट के माध्यम से पहुंचायी जा सकती है ताकि वे उसके बारे में जान सकें एवं लाभान्वित हो सकें।
  • ज्ञान-आधारित भारत के निर्माण में ई-गवर्नेस एक महत्वपूर्ण कारक है।
  • सूचनाएं सीधे सम्बद्ध व्यक्ति तक पहुंच सकेंगी और बिचौलियों की भूमिका खत्म हो सकेगी जो शोषण का एक कारक है।

सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के समावेशन में शामिल प्रयासों और देश में ई-गवर्नेस संबंधी कार्यक्रम देश के प्रशासनिक परिवर्तन प्रयासों के व्यापक ढांचे के भीतर तैयार किए जाने चाहिए। इस संबंध में भारत में द्वितीय प्रशासनिक आयोग (2005) की नियुक्ति की गई। आयोग नियुक्त करने में, भारत सरकार ने लोक प्रशासन व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए एक विस्तृत रूपरेखा तैयार करने की आवश्यकता बतायी। आयोग की सरकार के सभी स्तरों पर देश के लिए पहलकारी, अनुक्रियाशील, जवाबदेह, सतत् और कुशल प्रशासन उपलब्ध कराने के लिएउपायों का सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। भारत के सन्दर्भ में एक बात बेहद महत्वपूर्ण है कि द्वितीय प्रशासनिक आयोग अन्य बातों के साथ-साथ-

  1. नागरिक केंद्रित प्रशासन और,
  2. ई-गवर्नेस को बढ़ावा देने के उपायों की भी जिम्मेदारी दी गई है।

इस प्रकार ई-गवर्नेस को सूचना एवं प्रौद्योगिकी के समावेशन के माध्यम से एक प्रकार के एक-कालिक परिवर्तन के रूप में अनुदार नहीं माना गया है। यह बेहद तर्कसंगत एवं औचित्यपूर्ण है की सुचना एवं संचार प्रद्योगिकी के समावेशन को व्यापक और सर्वंगी सरकारी सुधार का एक अभिन्न अंग बना दिया गया है।

ई-गवर्नेस का प्रगति झरोखा

  • बिहार में जानकारी परियोजना के तहत् वर्ष 2007 में 6820 कॉल आयीं जो 2008 में बढ़कर 15,780 ही गयीं।
  • राजस्थान में अपना खाता नाम से ई-गवर्नेस परियोजना के तहत् 11 लाख अधिकार-पत्र एवं 21 लाख खाते खोले गए।
  • संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने 25 सूत्रीय योजनाओं में आगामी तीन वर्षों में सभी पंचायतों में ई-शासक व्यवस्था एवं सूचनाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए सार्वजानिक डाटा नीति का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • महाराष्ट्र, गुजरात एवं हरियाणा में भू-लेख साफ्ट नामक परियोजना प्रारंभ की गई है।
  • नेशनल सिक्योरिटीज लिमिटेड ने अखिल भारतीय स्तर पर ई-गवर्नेस सोल्यूशन को अपनाया है जिससे कारोबार में वृद्धि एवं लागत में कमी आयी है।

इलेक्ट्रॉनिक सेवा प्रदायन विधेयक-2011

ई-गवर्नेस की दिशा में मजबूत पहल करते हुए सरकार ने 27 दिसंबर, 2011 को लोक सभा में इलेक्ट्रॉनिक सेवा प्रदायन विधेयक-2011 पेश किया। इसने उनके लिए आशा बढ़ाईहै जो लम्बे समय से शासन व्यवस्था को तकनीकी शक्ति से उन्नत करने और ऐसे तंत्र की मांग कर रहे थे जिससे लोक सेवाओं का प्रदायन हो।

  • सरकारी सेवाएं प्रदान करने और लोगों को उनके घर पर ही इलेक्ट्रॉनिक रूप से बिना किसी अधिकारी के शोषण के सेवा प्रदान करने की व्यवस्था विधेयक में की गई है।
  • केंद्र एवं राज्य सरकारों, विभागों की सेवाओं की एक ऐसी सूची जारी करनी होगी जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक रूप से 180 दिनों के भीतर उपलब्ध कराया जाएगा और पांच वर्ष के भीतर सेवाओं को शुरू कर दिया जाएगा। क्योंकि ऐसी सेवाओं के प्रदायन की समय-सीमा निश्चित होती है, जिम्मेदार अधिकारियों पर 20,000 रुपए तक का जुर्माना आरोपित किया जा सकेगा।
  • फॉर्म एवं आवेदन पत्रों की प्राप्ति, लाइसेंस जारी करना या अनुमति, परमिट, सर्टिफिकेट, प्रतिबंध या अनुमोदन और धन की प्राप्ति एवं भुगतान, सभी इंटरनेट के माध्यम से किया जा सकेगा।
  • बिल लोक प्राधिकारियों से अपेक्षा करता है कि इलेक्ट्रॉनिक रूप से सभी लोक सेवाओं का प्रदायन अधिकतम आठ वर्षों में पूरा कर लिया जाएगा। इस अपेक्षा के दो अपवाद होंगे- (क) ऐसी सेवाएं जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक रूप से मुहैया नहीं कराया जा सकता; और (ख) ऐसी सेवाएं जिन्हें आयोगों के साथ परामर्श करके लोक प्राधिकरणों ने निर्णय लिया हो कि उन्हें इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रदान नहीं करना है।
  • बिल सरकारी विभागों की निगरानी एवं प्रतिनिधियों की सुनवाई के लिए केन्द्रीय एवं राज्य इलेक्ट्रॉनिक सेवा प्रदायन आयोग की स्थापना करता है।
  • लोक प्रधाकारियों को शिकायत निपटान के लिए एक तंत्र की व्यवस्था करनी होगी। शिकायत की जा सकती है- (क) सेवाओं का इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रदायन न होना; या (ख) प्रदान की गई इलेक्ट्रॉनिक सेवा में कमी होना। प्रथम मामले में, आयोग के समक्ष तंत्र की व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिनिधित्व रखा जा सकता है।
  • केंद्रीय और राज्य आयोग द्वारा दोषी अधिकारी पर अधिकतम 5,000 रुपए का जुर्माना आरोपित किया जा सकता है।
  • प्रदान की गई इलेक्ट्रॉनिक सूचना को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भंडारित किया जा सकता है, हालांकि, बिल ऐसी सूचना के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं करता।
  • इस बिल के अंतर्गत शिकायत निपटान तंत्र सिटीजन चार्टर बिल, 2011 के तहत शिकायत निपटान तंत्र को व्याप्त कर सकता है। इसके अतिरिक्त, कुछ राज्यों ने इलेक्ट्रॉनिक सेवा प्रदायन पर स्वयं के कानून लागू किए हैं।
  • बिल प्रावधान करता है की सरकार द्वारा नियुक्त आयुक्त की नियुक्ति को किसी भी प्रकार से प्रश्नगत नहीं किया जा सकेगा।
  • स्थायी समिति की सिफारिशों में शामिल हैं: (क) इलेक्ट्रॉनिक रूप से सेवा प्रदायन के साथ-साथ मैनुअली तौर पर भी सेवा प्रदायन की आवश्यकता है; और (ख) इसकी अवसंरचनात्मक लागत को केंद्र द्वारा वहन किया जाएगा।

भारत में ई-गवर्नेस की चुनौतियां

सरकार में सूचना और संचारतकनीक का आरंभ और उसका क्रियान्वयन कई चुनौतियों से घिरा हुआ है। ये चुनौतियां ई-सरकार के कारण सरकारी संगठनों के बीच बढ़ती हुई अंतःनिर्भरता तथा अंतः संगठनात्मक नेटवर्को के उभरने से पैदा हुई है।

1. तकनीकी चुनौतियां: इसके अंतर्गत साझा आंकड़ों की परिभाषा, संचालनात्मक कार्य-प्रक्रियाएं, तकनीकी मानक एवं प्रोटोकॉल्स, सूचना गुणवत्ता, सुरक्षा, आदान-प्रदान एवं नियंत्रण, साझी सुविधाओं की लागत, तथा वस्तु पहचान एवं संख्या इत्यादि शामिल हैं। इसके बाद ई-सरकार को रूपांतरित करने के मामले पर ध्यान दिया गया है ताकि उसे ग्राहक केंद्रित और नागरिक केंद्रित बनाया जा सके। वन स्टॉप शॉप्स पोर्टल का विकास करना जो नागरिकों को व्यापक सेवाएं दे सकें। इसके लिए वेबसाइटों पर विषय-वस्तुओं का इस प्रकार प्रबंधन किया जाना शामिल है की उनमें अधिकारों, कर्तव्यों, प्रक्रियाओं, संपर्कों, अक्सर पूछे जाने जाने वाले प्रश्नों एवं फीडबैक, लेन-देन की पहचान और प्रमाणीकरण इत्यादि के लिए प्रणाली का विकास तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी पहलें निहित हो।

2. संगठनात्मक चुनौतियां: पुनः संगठन की प्रक्रिया एक चुनौती प्रस्तुत करती है, जैसे नियंत्रण समाप्त होना, स्वामित्व की भावना की कमी, तकनीकी विशेषज्ञों में दूरदृष्टि का अभाव तथा सामाजिक समस्याओं को समझने में अक्षमता तथा जड़ता। सुस्पष्ट भूमिकाओं और दायित्वों के निर्वहन, शक्ति के क्षैतिज एवं आनुलाम्बिक विभाजन, तथा पदानुक्रमित संरचना के साथ-साथ सरकार की अफसरशाही संरचना की सूचना और संचार तकनीक के अनुप्रयोगों से इसकी स्थिरता एवं लोचहीनता के कारण-अधिक तालमेल नहीं बैठ पाता और न ही उससे अच्छी तरह अंतःसंबंध ही कायम हो पाता है।

3. संरचनात्मक चुनौतियां: ई-गवर्नमेंट की संस्थात्मक चुनौतियों का जन्म मानसिक, क़ानूनी एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों से होता है। मानसिक बाधाओं का जन्म विवेकाधिकार एवं अधिकारियों की शक्ति में कमी-खास तौर पर गली-मोहल्लों के स्तर पर तथा इस बात की परिकल्पना से होता है कि सूचना और संचार प्रौद्योगिकी ने उनके सारे कार्य दायित्व अपना लिए हैं। सरकार में सूचना और संचार प्रविधि अनुप्रयोगों के समक्ष कड़ी क़ानूनी बाधाओं की शुरुआत सूचनाओं की साझेदारी से हो सकती है जिसके कारण सीमा रेखाएं अस्पष्ट हो सकती हैं, प्रामाणिक सूचना का अभाव हो सकता है तथा दायित्वशीलता का बंधन शिथिल पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, भारत में ई-गवर्नमेंट के दायरे में शासन की नई आवश्यकताओं को शामिल करने के लिए देश की वैधानिक व्यवस्था में संशोधन किए जाने की आवश्यकता हो सकती है। जोखिम से बचने एवं नई सूझ-बूझ की कमी जैसी सांस्कृतिक बाधाएं सरकार के दायरे में सूचना और संचार तकनीकी के आत्मार्पण को हतोत्साहित कर सकती हैं।

भारत में ई-गवर्नेस की प्रमुख पहलें

राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना: लोक सेवा प्रदायन की प्रभावशीलता, पारदर्शिता एवं विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए 1990 के आरंभिक दशक में केंद्रीय प्रशासनिक सुधार समिति ने राज्य और नागरिकों के बीच एक इंटरफेस के रूप में ई-गवर्नेस के उपयोग की सिफारिश की। वर्ष 2003 के मध्य में, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग तथा प्रशासनिक सुधार एवं जन शिकायत विभाग द्वारा संकल्पित राष्ट्रीय ई-गवर्नेस योजना का उद्देश्य है नागरिकों और व्यवसायों को डी जाने वाली विभिन्न लोक सेवाओं की डिलीवरी में गति, विश्वसनीयता, सुगमता एवं पारदर्शिता बढ़ाना राष्ट्रीय ई-गवर्नेस केंद्रित नियोजन एवं विकेंद्रीकृत कार्यान्वयन के तरीके पर आधारित है। इसमें ई-गवर्नेंस की पहल के सफल कार्यान्वयन के प्रमुख घटकों के रूप में प्रक्रिया के पुनःअभियंत्रण तथा परिवर्तन प्रबंधन पर जोर दिया गया हे राष्ट्रीय ई-गवर्नेस का उद्देश्य विभिन्न राज्यों एवं लाइन विभागों द्वारा उठाए गए ई-गवर्नेस संबंधी सभी कदमों के लिए एक संपर्क सूत्र के रूप में काम करना है। सामान्य सेवा वितरण केंद्रों के माध्यम से अपने स्थानीय प्रदेश में आम लोगों की सभी सरकारी सेवाएं प्राप्य हो सकें तथा आम आदमी की आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तर्कसंगत मूल्यों पर ऐसी सेवाओं की कुशलता, पारदर्शिता, विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लक्ष्य को लेकर राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना मई, 2006 में कार्यान्वयन के लिए अनुमोदित की गई।

राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना को लागू करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी विभाग स्टेट वाइड एरिया नेटवर्क (स्वान), स्टेट डाटा सेंटर (एसडीसी), कॉमन सर्विसेज सेंटर (सीएससी) तथा नेशनल सर्विस डिलीवरी गेटवे। स्टेट सर्विस डिलीवरी गेटवे जैसे परियोजनाओं के माध्यम से सामान्य तथा समर्थित अवसंरचना का निर्माण कर रहा है।

अक्षय: यह केरल राज्य का एक महत्वाकांक्षी ई-साक्षरता अभियान है जिसके अंतर्गत मलप्पुरम जिले में अक्षय ई-केंद्र स्थापित किए गए तथा केरल के सभी जिलों में 6,000 से भी अधिक ई-केंद्र हैं। इन केंद्रों द्वारा प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को ई-साक्षरता दी जाती है और वे प्रत्येक गाँव में सूचना और संचार तकनीक के संवितरण नोड एवं आईटीईएस के प्रदायन बिंदु के रूप में काम करते हैं। सभी अक्षय ई-केंद्र इंटरनेट से जुड़े हैं और केंद्रीकृत ऑपरेटिंग सेंटर से उनका नेटवर्क स्थापित है।

समुदाय सूचना केंद्र

आठ पूर्वोत्तर राज्यों में 2002 से समुदाय सुचना केंद्र कार्यरत हैं और वे सब अत्याधुनिक अधोसंरचनाओं से सुस्सजित हैं, जिनमे एक सर्वर, 5 क्लाइंट system, एक वी-सैट, लेजर प्रिंटर, एक डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर, मॉडेम, लैन, हब, टीवी, वेबकैम और दो यूपीएस शामिल हैं। सामान्यतः ये केंद्र लोगों को इंटरनेट एक्सेस, ई-मेल, प्रिंटिंग, दाता एंट्री और वर्ल्ड प्रोसेसिंग जैसी सुविधाएं देने तथा स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण प्रदान करने का काम करते हैं। अपने रोजमर्रा के खचों को पूरा करने के लिए ज्यादातर सीआईसी प्रदान की गई सेवाओं के बदले में उपयोगकर्ताओं से मामूली शुल्क लेते हैं।

भूमि: कर्नाटक राज्य में संचालित, भूमि नामक भू-सूचना प्रणाली परियोजना देश में विद्यमान सर्वश्रेष्ठ राजस्व प्रबंधन सूचना और संचार टेक्नोलॉजी प्रोजेक्टों में से एक है। इसे 1998 में भूमि रिकार्डों को कम्प्यूटरीकृत करने के बाद एक वृहद प्रयास के रूप में शुरू किया गया था ताकि टाइटिल डीड (हकनामा) को अधिक सुरक्षित बनाया जा सके तथा अक्सर उभरने वाले भ्रष्टाचार के मामले खत्म किए जा सकें।

कार्ड (सीएआरडी): आंध्र प्रदेश में कम्प्यूटर समर्थित पंजीकरण विभाग प्रशासन (सीएआरडी) को इस प्रकार तैयार किया गया है कि वह समस्त पंजीकरण सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक प्रदायन शुरू करके पारंपरिक पंजीकरण प्रणाली को प्रभावित करने वाली विसंगतियों को दूर कर सके। कार्ड का आरंभ पंजीकरण प्रणाली को सुगम एवं पारदर्शी बनाने, गति, क्षमता, स्थिरता एवं विश्वसनीयता लाने एवं नागरिक इंटरफेस में ठोस सुधार लाने इत्यादि उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया गया। पंजीकरण संबंधी लेन-देन का काम इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किया जाता है और सभी सम्बंधित दस्तावेजों, ऋणभर, प्रमाणपत्रों एवं कृषि सम्पदा से संबंधित प्रमाणित प्रतिलिपियों को जब और जैसे जरूरत पड़ने पर निकाला जा सकता है।

डेयरी सूचना प्रणाली कियोस्क

गुजरात के अहमदाबाद के भारतीय प्रबंधन संस्थान के ई-शासन केंद्र ने डेयरी सूचना प्रणाली कियोस्क (डीआईएसके) आरंभ किया है। इसमें दो बुनियादी घटक हैं- एक तरीका जो कि ग्रामीण दुग्ध संग्रह सोसायटी पर कार्यरत होता है जिसमें इंटरनेट कनेक्शन दिया जा सकता है, और दूसरा जिला स्तर पर संचालित एक पोर्टल है जो की सभी सदस्यों के बीच स्थानान्तरण और सुचना सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करता है। आकाशगंगा नामक सॉफ्टवेयर में तेजी से दुग्ध संग्रहण करने तथा डेयरी किसानों को जल्दी से भुगतान देने की सक्षमता जैसी विशेषताएं हैं।

कंप्यूटर कियोस्क प्रोजेक्ट

कंप्यूटर के प्रति जागरूकता बढ़ने के लिए सन् 2000 से दिल्ली सरकार ने शहरी गरीबों को लक्षित करके एक अनोखी परियोजना शुरू की। कम्प्यूटर आधारित शिक्षा मॉडयूलों का प्रयोग करने के बाद विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों में बच्चों के ग्रेड काफी बढ़ गए हैं। समुदाय फिलहाल दिल्ली सरकार के लिए विषय वस्तु विकास एवं मल्टीमीडिया आधारित स्व-गतिमान शैक्षणिक संसाधनों के लिए कार्यरत है।

सामुदायिक ज्ञान केंद्र परियोजना

सामुदायिक ज्ञान केंद्र अजीम प्रेमजी फाउंडेशन और कर्नाटक राज्य सरकार के बीच एक संयुक्त उपक्रम है जिसे वर्ष 2001 में शुरू किया गया। प्रत्येक सामुदायिक ज्ञान केंद्र के लिए राज्य सरकार हार्डवेयर एवं अन्य सम्बंधित खर्चे वहां करती है और फाउंडेशन का काम हैं सामुदायिक ज्ञान केंद्र का प्रबंधन करने वाले यंग इंडिया फेलोज के प्रबंधन और प्रशिक्षण की देखभाल करना। प्रत्येक सामुदायिक ज्ञान केंद्र स्कूल में एक अलग कमरे में स्थापित है जिसमें पांच से लेकर आठ कम्प्यूटर होते हैं। सामुदायिक ज्ञान केंद्र का प्रयोग स्कूल अवधि के दौरान कक्षा में प्राप्त ज्ञान में वृद्धि करना है। सभी की जरूरतों को पूरा करने के लिए निर्देश सभी भारतीय भाषाओं में मल्टीमीडिया मोड में दिया जाता है।

ई-सेवा

इलेक्ट्रॉनिक सेवा (ई-सेवा) भुगतान की बुनियादी सेवाओं के लिए हैदराबाद-सिकंदराबाद युगल शहरों में प्रारंभ किया गया था। वर्तमान में ये ई-सेवा केंद्र पूरे आंध्र प्रदेश में फैल गए हैं। इन केंद्रों के माध्यम से नागरिक अपनी उपयोगिता सेवाओं के बिल चुका सकते हैं, व्यापार लाइसेंस हासिल कर सकते हैं, और सरकारी मामलों में लेन-देन का कम कर सकते हैं। प्रमाण-पत्र एवं भू-रिकॉर्ड जारी करने जैसी व्यक्तिपरक सेवाओं एवं ऑनलाइन मंडी मूल्य सूची, टेलि कृषि, स्व-सहायता समूह के कॉमन एकाउंट जैसी सेवाओं को भी ई-सेवा पर ऑनलाइन करने के प्रयास जारी हैं।

महिती शक्ति

महिती शक्ति एक एकल-खिड्रकी वाली सूचना और संचार प्रौद्योगिकी सेवा है जिसके माध्यम से नागरिक सरकार के कामकाज सम्बन्धी सभी पहलुओं, विभिन्न लाभ योजनाओं और राशनकार्ड पाने से लेकर वृद्धावस्था पेंशन तक की स्वीकृति पाने जैसी सेवाओं से जुड़ी सूचनाएं हासिल कर सकते हैं। जो कोई भी इसका लाभ उठाना चाहता है उसे अपने निकटतम निर्धारित एसटीडी/आईएसडी कियोस्क तक जाना होगा, इन्फोकियोस्क के मालिक को आवश्यक दस्तावेज देने होंगे और वंचित फॉर्म ऑनलाइन भरना होगा, जिसके लिए एक मामूली शुल्क लिया जाएगा।

फ्रेंड्स

केरल में बिजली और पानी, राजस्व कर, लाइसेंस शुल्क, मोटरवाहन शुल्क, मोटरवाहन टैक्स, विश्विद्यालय फ़ीस इत्यादि सेवाओं के भुगतान सुविधाजनक ढंग से फ्रेंडस केंद्रों पर किए जा सकते हैं।

हेडस्टार्ट

इस योजना के माध्यम से मध्य प्रदेश राज्य के 6000 जनशिक्षा केंद्रों के सभी छात्रों को कम्प्यूटर सक्षम शिक्षा एवं बुनियादी कम्प्यूटर ज्ञान प्रदान किया जाता है। मध्य प्रदेश में 6500 जन शिक्षा केंद्र हैं जो 48 जिलों के माध्यमिक स्कूल भवनों में स्थित हैं। हेडस्टार्ट जनशिक्षा केंद्र को उस माध्यमिक स्कूल के बच्चों को जिसमें यह जनशिक्षा केंद्र स्थित है, कम्प्यूटर समर्थित शिक्षा देने, तथा प्राथमिक स्कूल के बच्चों को सरल प्रदर्शनों एवं रोमांचक खेल के माध्यम से कम्प्यूटर से परिचित कराने में समर्थ मीडिया यूनिट के रूप में पदस्थ करता है।

दृष्टि

ग्रामीण सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के अंतर्गत, दृष्टि ने विभिन्न राज्यों में 90 इंटरनेट कियोस्क की स्थापना की है जिनके माध्यम से सरकारी जानकारियां और बाजार भाव उपलब्ध कराए जाते हैं।

ज्ञानदूत

यह एक कम लागत वाली, स्व-संधारित एवं समुदाय के स्वामित्व वाली ग्रामीण इंट्रानेट प्रणाली है जो कि मध्य प्रदेश राज्य के जिलों में ग्रामीण समुदायों की विशिष्ट जरूरतों को पूरा करती है। इन सूचनालयों से कृषि सम्बन्धी जानकारी, बाज़ार सम्बन्धी जानकारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिलाओं से संबंधित विषय, तथा जिला प्रशासन द्वारा भू-स्वामित्व, सकारात्मक कदम एवं गरीबी उन्मूलन से जुड़ी सेवाओं का लाभ लिया जा सकता है।

लोक मित्र

हिमाचल प्रदेश में संचालित लोक मित्र परियोजना द्वारा एक शिकायत निवारण प्रणाली के अतिरिक्त खली पदों, निविदाओं, बाज़ार भाव, वैवाहिक सेवाओं, ग्राम-ई मेल इत्यादि सूचनात्मक सेवाएं प्रदान की जाती हैं।

ग्राम संपर्क

संसाधन, बुनियादी सुविधाओं, सरकारी कार्यक्रमों के हितग्राहियों एवं जन शिकायत के संदर्भ में ग्राम संपर्क मध्य प्रदेश सरकार की एक सुचना और संचार प्रौद्योगिकी पहल है।

वाराना वायर्ड ग्राम परियोजना

इस परियोजना के तहत् महाराष्ट्र की वाराना नदी के आस-पास 70 गांव आते हैं और इसके अंतर्गत कृषि, औषधि एवं शिक्षा के क्षेत्र में सूचना सेवाओं के लिए कियोस्कों का एक नेटवर्क जोड़ा गया है।

टप्पल कार्यक्रम

आंध्र प्रदेश राज्य के सभी सरकारी विभागों की जोड़ने वाले एक ऑनलाइन टप्पल कार्यक्रम शुरू किया गया। यह जिला स्तर पर केंद्रीय रूप से संकलित एवं एकल ऑरेकल डाटाबेस पर सुव्यवस्थित रिकार्डों एवं ट्रांजैक्शन प्रक्रिया के विवरणों तक पहुंच कायम करता है।

विलेज नॉलेज सेंटर

केवीसी एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन द्वारा दक्षिण भारत के गांवों में खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं आजीविका सुनिश्चित करने हेतु स्थापित किए गए हैं।

लोकतंत्र में लोक सेवाओं की भूमिका

वर्तमान विश्व में अधिकतर राज्य लोक कल्याणकारी हैं जिन्हें प्रशासकीय राज्य के तौर पर भी जाना जाता है और जो लोक सेवाओं पर अत्यधिक निर्भर हैं। राजनीतिक स्तर पर जनसाधारण की सहभागिता सुनिश्चित करने, सामाजिक चेतना में अभिवृद्धि करने, विकास की गति को तेजी प्रदान करने तथा आधुनिकता का परिवेश तैयार करने में लोक सेवाओं की निर्णायक भूमिका है। इस प्रकार आधुनिक कल्याणकारी शासन व्यवस्थाओं में लोक सेवाओं एक महत्वपूर्ण निकाय हैं जो सम्पूर्ण विकास तंत्र का मुख्य आधार भी हैं।

राज्य की मुख्य गतिविधियों को जनसाधारण में संचालित करने एवं प्रत्येक व्यक्ति तक विविध सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए लोक सेवाओं की आवश्यकता प्राचीनकाल से ही अनुभव की जाती रही है। मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ ही राजतंत्रात्मक व्यवस्थाओं में लोक सेवाएं प्रारम्भ हो गई थीं। लोक सेवाओं को वर्तमान में राज्य तथा संविधान के माध्यम से गठित कर विशिष्ट दायित्वों के अनुरूप ढाला जाता है। ये लोक सेवाएं राजनीतिक सत्ता की नीतियों एवं कार्यक्रमों को न केवल निष्पादित करती हैं अपितु राजनीतिक सत्ता को आवश्यक सूचना तथा परामर्श भी उपलब्ध करवाती हैं।

20वीं शताब्दी में मार्क्सवादीवादी प्रभाव के कारण विश्व के अधिकांश देशों में क्रमशः कल्याणकारी राज्य की धारणा को स्वीकार किया गया जिसके परिणामस्वरूप राज्य के सामाजिक एवं आर्थिक महत्व के कार्यों में इजाफा हुआ। इन बदली परिस्थितियों में नौकरशाही की अवधारणा एवं व्यवस्था में परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस हुई। संकुचित दृष्टिकोण के स्थान पर व्यापक दृष्टि की आवश्यकता हुई। लोगों से जुड़ने के कारण प्रशासन की निरकुंश व्यवस्था विकास प्रशासन में बदल गई।

गौरतलब है कि 1990 के दशक से वैश्वीकरण, उदारीकरण एवं निजीकरण की संकल्पनाओं के अस्तित्व में आने एवं उनके कार्यशील होने के परिणामस्वरूप नव-उदारवादी राज्य सामने आया है। अब राज्य सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में नियामक की भूमिका में नहीं अपितु रेफरी की भूमिका में है। बाजारीकरण की तीव्रता के कारण राज्य को भी गला काट प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है। सूचना का अधिकार एवं सूचना तकनीकी दोनों ने नौकरशाही की भूमिका में परिवर्तन जरूरी बना दिया है। सूचना तकनीक के प्रयोग से प्रशासनिक कार्य प्रणाली को अधिक सक्षम और प्रभावी बनाया जा सकता है, वहीं सूचना के अधिकार के तहत नौकरशाही में, पारदर्शिता, खुलेपन, उत्तरदायित्व एवं संवेदनशीलता ग्रहण करने की मांग बढ़ रही है।

उल्लेखनीय है कि भारत में अभी भी आर्थिक एवं सामाजिक विषमताएं बड़े पैमाने पर हैं एवं बहुत बड़ी जनसंख्या अभी भी गरीबी एवं विपन्नता में जी रही है इसलिए नव-उदारवादी व्यवस्था में भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में नौकरशाही की नियामक स्थिति बनी हुई है।

आधुनिक युग में सभी सरकारों का एकमेव प्रमुख कार्य लोक कल्याण ही है। स्पष्ट है कि वर्तमान शासन व्यवस्थाओं में राज्य के कंधों पर जनकल्याण तथा सुरक्षा के गुरुत्तर दायित्व हैं जिनकी क्रियान्विति का माध्यम लोक सेवाएं ही हैं। लोक सेवाओं में विपुल, योग्य तथा निपुण कार्मिकों की सहायता से ही शासन की नीतियों, योजनाओं तथा कार्यक्रमों की व्यावहारिक स्तर पर क्रियान्विति संभव हो पाती है। लोक सेवाओं के माध्यम से ही पिछड़े वर्गों, बंधुआ मजदूरों तथा असहाय व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाती है।

वर्तमान प्रशासन की विकास प्रशासन के रूप में इसलिए वर्णित किया जाता है कि देश के समस्त नागरिकों का समग्र विकासलोकप्रशासन के प्रयासों से ही सम्भव है। कृषि एवं आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने वाले समस्त उद्योगों का विकास, मशीनीकरण, संसाधनों का समुचित दोहन, आयात निर्यात में संतुलन, उत्पादन तथा आय में वृद्धि और जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सहायक कारकों को प्रगतिशील बनाए रखने हेतु लोक सेवकों की भूमिका सर्वविदित है।

शासन की नीतियों एवं कार्यक्रमों के निरूपण में मंत्री को सूचना एवं परामर्श उपलब्ध करवाने का दायित्व लोक सेवक का होता है क्योंकि वह प्रशासन के कार्यों में कुशल और विशेषज्ञ होता है। राजनीतिक गतिविधियों में कार्यरत मंत्रियों के पास न तो इतना समय होता है कि वे प्रशासनिक कार्यों में गंभीरतापूर्वक रुचि ले सकें और न ही वे इतने कुशल होते हैं कि प्रशासन की प्रत्येक गतिविधियों को सूक्ष्मता से समझ सकें, अतः लोक सेवकों को ही जनकल्याण के कार्य निष्पादित करने पड़ते हैं।

भारत सहित अधिकांश विकासशील देश सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं से ओत-प्रोत हैं। भारत में भाषावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद तथा सांप्रदायिकता की सामाजिक समस्याएं विद्यमान हैं। इन समस्याओं की तीव्रता कम करने में लोक सेवकों की दोहरी भूमिका है। एक तो लोक सेवाएं तटस्थता तथा समानता के आधार पर कार्य करती हैं दूसरी इन सेवाओं की प्रकृति एवं कार्यक्षेत्र राष्ट्रीय स्तर का है। लोक सेवाओं की यह प्रकृति लोक सेवाओं में संकीर्णता त्यागकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाने में सहायता करती है। लोक सेवाओं में सभी जाति, वगों, भाषाओं, क्षेत्रों तथा सम्प्रदायों के कार्मिक कार्य करते हैं जो राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं।

शासकीय कार्यों की सम्पूर्ति के निमित्त विशाल संख्या में विशिष्ट योग्यताधारी लोक सेवकों की आवश्यकता होती है। कल्याणकारी राज्य के दायित्व भी चहुंमुखी हैं अतः लोक सेवकों के माध्यम से सरकार जनकल्याण के कार्य निष्पादित करवा सकती है। राजनीतिक स्तर पर जनसाधारण की सहभागिता सुनिश्चित करने, सामाजिक चेतना में अभिवृद्धि करने, विकास की गति को तेजी प्रदान करने तथा आधुनिक परिवेश तैयार करने में लोक सेवकों की निर्णायक भूमिका है।

सर्वप्रथम नौकरशाही तंत्र में मौजूद दोषों या कमियों का परिमार्जन आवश्यक है जो उसके दिन-प्रतिदिन के कार्यों एवं क्षमता को प्रभावित करता है। नौकरशाही की राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कराना अत्यंत आवश्यक है। नौकरशाही को विवेकपूर्ण ढंग से परामर्श देने तथा नीतियों को क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए। यह तभी व्याप्त भ्रष्टाचार के मामलों का परीक्षण भी करेगी तथा सभी स्तरों पर प्रशासनिक कामकाज के सहज संचालन को आरंभ करेगी। दूसरे, हमारे देश एवं देशवासियों के प्रति नौकरशाही के दृष्टिकोण एवं उपागम को व्यापक अथों में बदलने की आवश्यकता है।

नागरिक सेवाओं के नियमों एवं उत्तरदायित्वों को निर्धारित करना अति आवश्यक है। उदाहरण के लिए, किसी स्थान पर लोक सेवक की नियुक्ति की अवधि को निश्चित किया जा सकता है ताकि उस अवधि के समाप्त होने से पहले ही लोक सेवक का स्थानांतरण होने पर, उसे हटाने के सही-सही कारणों के बारे में पूछा जा सके। विशेषतः मंत्रिमंडल सचिव एवं राज्यों के मुख्य सचिव जैसे शीर्ष पदों के लिए सीमित कार्यकाल अनिवार्य है क्योंकि ये वरिष्ठ अधिकारी शासक दल एवं नौकरशाही के बीच तटस्थता पूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वर्तमान में लोक सेवकों द्वारा सरकार में अधिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही की मांग की जा रही है ताकि राजनीतिज्ञ लोक सेवकों को अपने अधीन लेन के लिए धन एवं बाहुबल का प्रयोग करने के बारे में पुनर्विचार कर सकें। संवर्ग आवंटन, कार्य निष्पादन सम्बन्धी सूचनाएं तथा किसी अधिकारी के निर्णय से जुड़ी फाइलों तक पहुंच, आदि ऐसे विषय हैं, जिनमे अधिक खुलेपन की जरुरत है। नौकरशाही की सबसे मुख्य समस्या यह है कि उनके पास अपनी शिकायतों एवं असहमतियों को प्रकट करने का कोई उपयुक्त तंत्र उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में मत विभिन्नताओं का कोई लाभदायक उपयोग नहीं हो पाता तथा वे दिमाग में भरी रहने को विवश होती हैं। इस संदर्भ में नियमों एवं विनियमों को परिष्कृत रूप देने की आवश्यकता है। नौकरशाहों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे प्रशासनिक निर्णयों के तकधिार को जनसंचार माध्यमों के द्वारा सुस्पष्ट कर सकें। हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मामलों में ऐसे अधिकार को प्रतिबंधित किया जा सकता है। किसी मामले में नौकरशाहों की सलाह को निरस्त करने की स्थिति में उन्हें इस संबंध में फाइल पर लिखित आदेश प्राप्त करने की अनुमति होनी चाहिए।

सामान्यज्ञों एवं विशेषज्ञों के बीच मौजूद विवाद तथा अन्य दूसरी समस्याओं को भी अतिशीघ्र निपटाने के प्रयास किये जाने चाहिए।

राजनीतिज्ञों का संरक्षण ही अधिकारियों को दण्डात्मक कार्यवाही से भय मुक्त बना देता है। कड़े कानूनों का निर्माण तथा उन्हें लागु करके ऐसे नौकरशाहों को दण्ड देना, जो अपने पद का दुरुपयोग करते हैं तथा भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करते हैं, आज की मूल आवश्यकता है| अंत में, राजनीतिज्ञों को भी सर्वप्रथम स्वयं में सुधार करना होगा। जहां भी भ्रष्ट राजनीतिज्ञ मौजूद होंगे, वहां नौकरशाहों को उनके पद चिन्हों पर चलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

व्यापक अर्थों में हमारे नौकरशाहों की वर्तमान समाजार्थिक पर्यावरण तथा जन-सामान्य की आवश्यकताओं व इच्छाओं के प्रति संवेदनशील एवं विश्वासजनक रवैया अपनाना होगा। उनमें उभरते बदलावों तथा अप्रत्याशित घटनाक्रमों से निपटने हेतु एक दृष्टितथा प्रेरणा का होना आवश्यक है। उन्हें नीति-नियोजन के क्षेत्र में शोधपरकता की महत्व देना होगा। नौकरशाही में व्यापक अनुकूलनशीलता होनी चाहिए। ताकि वह स्वतंत्र तथा लोचपूर्ण तरीके से अपनी गलतियों में प्रभावी सुधार कर सके और पुराने नियमों व संरचनात्मक ढांचों को परे रखकर नवीन संस्थात्मक प्रणालियों के साथ उभर क्र आ सकें।

अति विविधता वाले भारत में नौकरशाही का स्वरूप आज की तुलना में अधिक प्रतिनिध्यात्मक होना चाहिए। इसके लिए भर्ती की योजना में परिवर्तन करके यह सुनिश्चित करना होगा कि अभिजात्य वर्ग के अलावा जन-सामान्य स्तर से आये अधिकाधिक लोग प्रशासन तंत्र को संचालित करने में भागीदार बन सकें। वर्तमान में अधिकांश लोक सेवक जन-सामान्य के प्रति उदासीन दृष्टिकोण रखते हैं। इस प्रकार के दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत है क्योंकि स्वतंत्र भारत में नौकरशाही का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र का समाजार्थिक विकास करना है। नौकरशाही को ऐसे उपागमों को अपनाना चाहिए, जिनसे अधिकाधिक लोग विकास प्रक्रिया में भागीदार बन सकें।

वैश्वीकरण के युग में, राज्य की भूमिका में परिवर्तन हुआ है। संचार तकनीक में तीव्र उन्नयन के चलते वैश्वीकरण में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। तकनीक के इस तीव्र विकास के कारण हम वैश्विक समुदाय की बात करते हैं। अतः वर्तमान में, बेहतर एवं दुरुस्त प्रशासन के लिए तकनीकी का इस्तेमाल अपरिहार्य है और लोक प्रशासन में प्रौद्योगिकी का प्रयोग इसे पारदर्शी एवं जिम्मेदार बनाता है। अतः अब समय आ चुका है कि लोक सेवाओं को प्रविधि उन्मुख बनाया जाए।

अब राज्य का विशेष जोर सामाजिक क्षेत्र पर है और होना चाहिए। इसके लिए राज्य की शासन के प्रति अपने उपागम को बदलना होगा। भागीदारी की युक्ति अपनानी होगी। लोक सेवाओं को मात्र सरकार कर सकती है के नजरिए से बाहर निकलकर लोगों की भागीदारी वाली सरकार कर सकती है के विचार को अपनाना होगा।

भारतीय राजव्यवस्था में हमने एकदलीय शासन से केंद्र एवं राज्य दोनों स्तरों पर गठबंधन सरकारों तक का सफर तय किया है। विभिन्न सत्ताधीन दल नीतियों को अपने निहित स्वार्थों के लिए परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं जो विवादस्पद हो सकता है। इन विभिन्न विवादों के अतिरिक्त ऐसे विवाद हैं-अंतर्राज्यीय जल विवाद, भाषा विवाद, धार्मिक विवाद इत्यादि, जिन्हें राजनीतिकशासक सुलझा नहीं सकते। ऐसी स्थितियों में देश की एकता के लिए इन समस्याओं के समाधान की मुख्य जिम्मेदारी लोक सेवाओं पर आ जाती है। लोक सेवाओं को इस प्रकार प्रशिक्षित एवं विकसित करना होगा जिससे वे इन परिस्थितियों में एक सौहार्दपूर्ण समाधान खोज सकें।

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