Notice: Function _load_textdomain_just_in_time was called incorrectly. Translation loading for the colormag domain was triggered too early. This is usually an indicator for some code in the plugin or theme running too early. Translations should be loaded at the init action or later. Please see Debugging in WordPress for more information. (This message was added in version 6.7.0.) in /home/vivace/public_html/wp-includes/functions.php on line 6131
आचार्य विनोबा भावे Vinoba Bhave – Vivace Panorama

आचार्य विनोबा भावे Vinoba Bhave

(1895-1982), भारतीय समाज सुधारक, महात्मा गांधी के शिष्य

विनायक नरहरि भावे या आचार्य विनोबा भावे महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण थे, जो बचपन से ही गणित और विज्ञानं जैसे विषयों में अत्यंत प्रतिभाशाली थे, एवं उन्हें कई भाषाओँ में महारत हासिल थी| 20 वर्ष की उम्र में वे वाराणसी आ गए, जहाँ उन्होंने संस्कृत और अध्यात्म का अध्ययन किया, परन्तु राष्ट्रीय मामलों में उनकी रूचि बनी रही| जब उन्होंने महात्मा गाँधी के बारे में सुना तो उन्होंने साबरमती आश्रम में शामिल होने का मन बना लिया, जहाँ उनका स्वागत हुआ| इसके तुरंत बाद, गांधी ने उनसे एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने के लिए कहा। जमनालाल बजाज, वर्धा के एक अमीर मारवाड़ी व्यवसायी थे, वह गांधी के आंदोलन में शामिल हुए थे और उन्होंने वर्धा में साबरमती आश्रम की एक शाखा स्थापित करने के लिए गाँधी से अनुरोध किया था| गांधी ने भावे को वर्धा भेजा, जहां 1921 में उन्होंने बहुत ही अनुशासित ढंग से एक आश्रम की स्थापना की। 1923 में भावे और बजाज नागपुर राष्ट्रीय ध्वज सत्याग्रह में शामिल हुए, जिस कारण दोनों को जेल जाना पड़ा| कुछ महीनो बाद जब भावे रिहा हुए तो उन्होंने नागपुर में एक नए आश्रम की स्थापना की जिसे वे सेवाग्राम कहा करते थे| वहां उन्होंने ‘महाराष्ट्र धर्म’ मासिक का संपादन भी शुरू किया।

1928 में जब गाँधी इस आश्रम में आये तो वे बहुत प्रभावित हुए| 1930 में गाँधी ने नमक सत्याग्रह के लिए साबरमती आश्रम छोड़ दिया, और कसम खाई थी कि जब तक भारत को स्वतंत्रता हासिल नहीं हो जाती है तब तक वे आश्रम नहीं लौटेंगे, और गाँधी जेल से रिहा होने के बाद वर्धा में भावे के आश्रम में रहे| भावे 1932 में बजाज के साथ पुनः गिरफ्तार हुए, और उन दोनों में धुलिया जेल में कुछ समय साथ बिताया| बजाज संस्कृत नहीं जानते थे, उन्होंने भावे से भागवत गीता का मराठी में अनुवाद करने के लिए कहा और भावे ने गीता का मराठी में अनुवाद किया| बजाज ने बाद में इसे प्रकाशित कराया, जो बहुत प्रसिद्द हुआ| जब गाँधी ने 1940 में अपना सत्याग्रह आन्दोलन शुरू किया, तो उन्होंने सबसे पहले विनोबा भावे से सार्वजनिक विरोध से कानून तोड़ने के लिए कहा| तब गाँधी ने कहा था कि भावे शांतिवादियों (pacifists) के प्रतिनिधि के रूप में कानून तोड़ रहे है| इस प्रकार भावे पहले सत्याग्रही बने|

भूदान आंदोलन The Bhoodan Movement

भावे एक बहुत ही शांत और अनुशासित व्यक्ति थे, जिन्होंने कभी भी एक राजनेता के रूप में प्रसिद्धि हासिल नहीं की| गाँधी की हत्या के बाद जब उन्होंने अपने अभियान की शुरुआत की तो इससे पता चल गया कि वे महात्मा गाँधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी हैं| भावे ने 1951 में भूदान आन्दोलन की शुरुआत करके भूस्वामियों से उनकी जमीन का एक पाँचवाँ हिस्सा दान करने का अनुरोध किया| इस आन्दोलन के लिए विनोबा भावे ने भारतवर्ष में 45,000 किमी. की यात्रा नंगे पैर की| अप्रैल १९५१ में उन्हें पहली जमीन तेलंगाना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में दान में मिली थी। उन्होंने दान में प्राप्त की बहुत सारी जमीन गरीबों में बाँट दी| भूदान आन्दोलन 1956 में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा, उसके बाद यह धीमा पड़ने लगा| भावे ने बाद में इसे ग्रामदान और जीवनदान आन्दोलन में बदल दिया| ग्रामदान आन्दोलन में एक गाँव की सारी जमीन पर किसी का अधिकार नहीं होता था, बल्कि यह सारे गाँव की जमीन होती थी| जीवनदान उन स्वयंसेवकों को कहा गया जिन्होंने इस आन्दोलन के लिए अपना योगदान और समर्पण दिया| भारत के समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पहले जीवनदानी बने|

विनोबा भावे को 1958 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए पहला अंतरराष्ट्रीय रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला था। नवंबर 1982 में विनोबा भावे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्होंने भोजन और दवा नहीं लेने का निर्णय किया। उनका 15 नवंबर 1982 को निधन हो गया। भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से 1983 में मरणोपरांत सम्मानित किया।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *