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प्रान्तीय राजवंश: कामरूप और आसाम Provincial Dynasty: Kamrup and Assam – Vivace Panorama

प्रान्तीय राजवंश: कामरूप और आसाम Provincial Dynasty: Kamrup and Assam

तेरहवीं सदी के प्रारम्भ में बंगाल के मुसलमानों के आगमन के समय ब्रह्मपुत्र की घाटी बहुसंख्यक स्वतंत्र राज्यों में विभक्त थी, जो एक-दूसरे के साथ लड़ते रहते थे। चुटिया (मिश्रित बोडो-शान वंश की एक जाति) राजाओं का एक वंश सुबनसिरी एवं दिसंग नदियों के पूर्व के प्रदेश पर शासन करता था। दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व का एक लम्बा संकीर्ण खंड कुछ बोडो जातियों के नियंत्रण में था और पश्चिम में एक कछाड़ी राज्य था, जो ब्रह्मपुत्र के दक्षिण तथा नवगाँव जिले के आरपार शायद आधी दूर तक फैला हुआ था। उत्तरी तट पर चुटियों के तथा दक्षिणी तट पर कछाड़ियों के पश्चिम भुइया नामक कुछ छोटे सरदारों के राज्य थे। एकदम पश्चिम में कामरूप का राज्य था, जिसकी पश्चिमी सीमा पर करतोया नदी थी तथा पूर्वी सीमा इसके अमित्र पड़ोसियों की स्थिति के अनुसार बदलती रहती थी। यह कामत के राज्य के नाम से प्रसिद्ध था। महान् शान जाति का अहोम नामक एक वर्ग तेहरवीं सदी के प्रारम्भ में ब्रह्मपुत्र की घाटी के इतिहास में एक नये तत्त्व के रूप में उपस्थित हुआ। इसने कामत राजा के पूर्वी प्रसार को रोक दिया। इसके पश्चिमी पडोसी बंगाल के मुलसमान सुल्तानों ने इसके प्रदेशों पर कई आक्रमण किये, जिनके परिणाम भिन्न-भिन्न हुए।

पंद्रहवीं सदी के प्रारम्भ में कामत में खेनों ने एक प्रबल राजतंत्रात्मक राज्य स्थापित किया। उनकी राजधानी कूचबिहार से कुछ मील दक्षिण कामतापुर में थी। खेनों ने कामत पर लगभग पचहत्तर वर्षों तक राज्य किया। उनके अन्तिम शासक नीलाम्बर को अलाउद्दीन हुसैन शाह ने लगभग 1498 ई. में हरा दिया। कुछ समय की गड़बड़ी के बाद मंगोल वंशीय कोच जाति के विश्वसिंह ने 1515 ई. के लगभग एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। उस राजा की राजधानी कोचबिहार (आधुनिक कूचबिहार) में हुई। इस वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक विश्वसिंह का पुत्र एवं उत्तराधिकारी नर नारायण था। उसके शासनकाल में कामत के राज्य की समृद्धि बढ़ी तथा यह अपनी शक्ति की चरम सीमा पर पहुँच गया। पर 1581 ई. में वह संकोश नदी के पूर्व का अपने राज्य का भाग अपने भतीजे रघुदेव को देने को विवश हुआ। इस प्रकार कोच राज्य दो प्रतिद्वन्द्वी राज्यों में विभक्त हो गया। मुसलमान इन राज्यों को कोचबिहार एवं कोच हाजी कहते थे। उनके कलह के कारण अहोमों एवं मुसलमानों ने हस्तक्षेप किया और 1639 ई. में पश्चिमी तथा पूर्वी राज्य क्रमश: मुसलमानों तथा अहोमों के प्रभुत्व में जा पड़े।

शान जाति के एक वर्ग अहोमों ने, जो आसाम में लगभग 1215 ई. में आये थे, धीरे-धीरे अपनी स्थिति को दृढ़ किया तथा एक शक्तिशाली राजतंत्रय राज्य की स्थापना की, जो छ: सदियों तक कायम रहा। जिस युग पर हम प्रकाश डाल रहे हैं उसमें उन्होंने कामरूप के राजाओं एवं बंगाल के सुल्तानों के पूर्वी प्रसार को रोका। मुसलमानों द्वारा कामरूप के अधीन किये जाने के बाद ही अहोमों का राज्य मुस्लिम आक्रमणों के आगे झुका। इस प्रकार बंगाल का अलाउद्दीन हुसैन शाह सेना लेकर आसाम पर चढ़ दौड़ा, जब इस पर (आसाम पर) सुहेन्फा राज कर रहा था। मुस्लिम सेना की प्रारम्भिक सफलता के बावजूद इस आक्रमण का विनाशकारी अंत हुआ। तीस वर्षों से अधिक तक अहोमों तथा मुस्लिमों के बीच संघर्ष नहीं हुआ। इसका दूसरा पहलू तब आरम्भ हुआ, जब बंगाल के कुछ स्थानीय नायकों ने आसाम पर आक्रमण कर दिये। परन्तु उनके प्रयास भी सितम्बर, 1533 ई. तक असफल हो गये। इस प्रकार बंगाल के मुस्लिमों का आसाम जीतने के प्रयास सोलहवीं सदी की चौथी दशाब्दी तक असफल हो गये। इस काल के बाद का आसाम का इतिहास उचित स्थान पर दिया जायेगा।

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