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मुग़ल प्रशासन कला एवं संस्कृति Mughal Administration, Art and Culture – Vivace Panorama

मुग़ल प्रशासन कला एवं संस्कृति Mughal Administration, Art and Culture

मुगल प्रशासन

  • मुगल प्रशासन सैन्य शक्ति पर आधारित एक केंद्रीकृत व्यवस्था थी।
  • मुगलोँ ने एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना की जिस पर खलीफा जैसी किसी विदेशी सत्ता का कोई अंकुश नहीँ था।
  • मुगल कालीन राजत्व के सिद्धांत की स्पष्ट व्याख्या अबुल फजल ने आईन-ए-अकबरी मेँ की है।
  • मुग़ल सम्राट सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति तथा सर्वोच्च नयायाधीश था। वास्तव मेँ साम्राज्य की सारी शक्तियाँ सम्राट मेँ निहित होती थी।
  • केंद्रीय प्रशासन के चार प्रमुख स्तंभोँ – वजीर, मीर बख्शी, खान-ए-सामा औरर रुद्र-उस-सुदूर थे।
  • वजीर राजस्वविभाग तथा बादशाह का प्रधानमंत्री होता था। सम्राट की अनुपस्थिति मेँ वह शासन के साधारण कार्योँ को बादशाह की और से देखता था।
  • मीर बख्शी – यह सैन्य प्रशासन की देखभाल, मनसब दारों का प्रधान, सैनिकोँ की भर्ती, हथियारोँ तथा अनुशासन का प्रभारी होता था।
  • खान-ए-सामा – राजमहल तथा कारखानो के अधिकारी होता था।
  • रुद्र-उस-सुदूर – यह धार्मिक मामलोँ का अधिकारी था। दान विभाग भी उसी के अंतर्गत था। रुद्र-उस-सुदूर को ‘शेख-उस-इस्लाम’ कहा जाता था।

केंद्रीय प्रशासन के अन्य अधिकारी

  • काजी-उल-कुजात – न्यायिक मामलोँ का अधिकारी था।
  • मीर आतिश – यह शाही तोपखाने का प्रधान था।
  • मुहतसिब – प्रजा के नैतिक चरित्र की देखभाल करने के लिए नियुक्त अधिकारी।
  • दरोगा-ए डाक चौकी – राजकीय डाक तथा गुप्तचर विभाग का प्रधान था।
  • मीर-बहर – नौसेना का प्रधान था।
  • मीर अदल – यह न्याय विभाग का महत्वपूर्ण अधिकारी था।
  • हरकारा – ये जासूस एवं संदेशवाहक दोनो होते थे।

प्रांतीय प्रशासन

  • मुग़ल साम्राज्य को सूबों (प्रान्तों) मेँ सूबों को सरकारोँ (जिलो) मेँ, सरकारोँ को परगनोँ (महलोँ) मेँ तथा परगनोँ को गावों मेँ बाटा गया था।
  • अकबर के समय सूबेदार होता था, जिसे सिपहसालार या नाजिम भी का कहा जाता था।
  • दीवान सूबे प्रधान वित्त एवं राजस्व अधिकारी होता था।
  • बख्शी का मुख्य कार्य सूबे की सेना की देखभाल करना था।
  • प्रांतीय रुद्र न्याय के साथ-साथ प्रजा की नैतिक चरित्र एवं इस्लाम धर्म के कानूनों की पालन की व्यवस्था करता था।
  • कोतवाल सूबे की राजधानी तथा बड़े-बड़े नगरो मेँ कानून एवं व्यवस्था की देखभाल करता था।

सरकार या जिले का प्रशासन

  • मुग़ल साम्राज्य मेँ अथवा जिलों मेँ फौजदार, कोतवाल, आमिल, और काजी प्रमुख अधिकारी थे।
  • मुगल काल मेँ सरकार या जिले का प्रधान फौजदार था। इसका मुख्य कार्य जिले मेँ कानून व्यवस्था बनाए रखना तथा प्रजा को सुरक्षा प्रदान करना था।
  • खजानदार जिले का मुख्य खजांची होता था। इसका मुख्य कार्य राजकीय खजाने को सुरक्षा प्रदान करना था।
  • आमलगुजार या आमिल जिले का वित्त एवं राजस्व का प्रधान अधिकारी था। काजी-ए-सरकार न्याय से संबंधित कार्य देखता था।

परगने का प्रशासन

  • सरकार परगनों में बंटी होती थी। परगने के प्रमुख अधिकारियोँ मेँ शिकदार, आमिल, फोतदार, कानूनगो और कारकून शामिल थे।
  • शिकदार परगने का प्रधान अधिकारी था। परगने की शांति व्यवस्था और राजस्व वसूलना इसके प्रमुख कार्यों मेँ शामिल था।
  • आमिल परगने का प्रधान अधिकारी था। किसानो से लगान वसूलना इसका प्रमुख कार्य था।
  • फोतदार परगने का खंजाची था।
  • कानूनगो परगने के पटवारियोँ का प्रधान था। यह लगान, भूमि और कृषि से संबंधित कागजातों को संभालता था।
  • कारकून लिपिक का कार्य देखता था।

ग्रामप्रशासन

  • मुगल काल मेँ ग्राम प्रशासन एक स्वायत्त संस्था से संचालित होता था। प्रशासन का उत्तरदायित्व प्रत्यक्षतः मुगल अधिकारियोँ के अधीन नहीँ था।
  • ग्राम प्रधान गांव का प्रमुख अधिकारी था, जिसे ‘खुत’ और ‘मुकद्दमा चौधरी’ कहा जाता था।
  • गांव में वित्त राजस्व और लगान से संबंधित अधिकारियों को पटवारी कहा जाता था। इन्हें राजस्व का एक प्रतिशत दस्तूरी के रुप मेँ दिया जाता था।

मुगल कालीन अर्थव्यवस्था


  • मुग़ल साम्राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भूराजस्व था।
  • मुगल कालीन समस्त भूमि को तीन भागोँ मेँ विभक्त किया गया था – 1. खालसा भूमि 2. जागीर भूमि, तथा 3. मदद-ए-माशा।
  • खालसा भूमि प्रत्यक्ष रुप से शासन के अधीन थी। इससे प्राप्त आय शाही कोष मेँ जमा होती थी।
  • साम्राज्य की अधिकांश भूमि जागीर भूमि थी क्योंकि यह राज्य के प्रमुख अधिकारियोँ को वेतन के बदले मेँ दी जाती थी।
  • मदद-ए-माश को मिल्क भी कहा जाता था इस प्रकार की भूमि अनुदान मेँ दी जाती थी इस तरह की भूमि से आय प्राप्त नहीँ होती थी।
  • मुगल काल मेँ राजस्व का निर्धारण की चार प्रमुख प्रणालियां प्रचलित थीं – 1. जब्ती या दहसाला प्रणाली 2. बंटाई या गल्ला बक्शी 3. कनकूत 4. नस्क।
  • दहसाला प्रणाली 1580 में राजा टोडरमल द्वारा शुरु की गई थी।
  • कनकूत प्रथा के अनुसार लगान का निर्धारण भूमि की उपज के अनुमान के आधार पर किया जाता था।
  • कनकूत प्रणाली के अंतर्गत भू-राजस्व अनाज मेँ निर्धारित होता था जबकी भक्ति प्रणाली के तहत नकद रुप मेँ।
  • नस्क प्रणाली मेँ भूमि के माप के बिना लगान निर्धारित किया जाता था।
  • खेती के विस्तार एवं बेहतरी के लिए राज्य की ओर से ‘तकावी’ नामक ऋण भी दिया जाता था।
  • भू राजस्व के अलावा जजिया और जकात नामक कर भी लिए जाते थे।
  • मुगल काल मेँ गेहूँ, चावल, बाजरा, दाल आदि प्रमुख खाद्यान्न उपजाए जाते थे।
  • नील की खेती भी की जाती थी, जिसका व्यापारिक महत्व था।
  • उद्योग धंधोँ मेँ सूती वस्त्र उद्योग उन्नत अवस्था मेँ था।
  • रेशम उद्योग के प्रमुख केंद्र आगरा, लाहौर, दिल्ली, ढाका और बंगाल थे।
  • भारत मेँ निर्मित कपड़ों को ‘केलिफो’ कहा जाता था।
  • मुगल काल मेँ निर्मित मुख्य वस्तु नील, शोरा, अफीम एवं सूती वस्त्र थे, जबकि मुख्य आयात सोना, चांदी, घोड़ा. कच्चा रेशम आदि थे।
  • समुद्री व्यापार मेँ लगे मुस्लिम व्यापारियों मेँ ‘खोजा’ और ‘बोहरा’ प्रमुख थे।
  • हीरा गोलकुंडा और छोटानागपुर की खानों से प्राप्त होता था। विश्वप्रसिद्ध कोहिनूर हीरा गोलकुंडा की खान से प्राप्त हुआ था।
  • मुगल कालीन चमड़ा उद्योग भी उन्नत अवस्था मेँ था।

मनसबदारी व्यवस्था

  • मुग़ल साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मनसबदारी व्यवस्था थी।
  • मनसबदारी व्यवस्था मुगल सैनिक व्यवस्था की आधार थी। यह व्यवस्था मंगोलोँ की दशमलव प्रणाली पर आधारित थी।
  • मनसबदारी व्यवस्था का आरंभ 1577 ईस्वी मेँ अकबर ने किया था।
  • इस व्यवस्था मेँ दशमलव प्रणाली के आधार पर अधिकारियो के पदों का विभाजन किया जाता था।
  • ‘मनसब’ की पदवी या पद संज्ञा नहीँ थी, वरन् यह किसी अमीर की स्थिति का बोध कराती थी।
  • ‘जात’ शब्द से व्यक्ति के वेतन तथा पद की स्थिति का बोध होता था, जबकि ‘सवार’ शब्द घुड़सवार दस्ते की संख्या का बोध कराता था।
  • सैनिक तथा नागरिक दोनो को मनसब प्रदान किया जाता था। यह पैत्रिक नहीँ था।
  • मनसबदारों को नगर अथवा जागीर के रुप मेँ वेतन मिलता था। उन्हें भूमि पर नहीँ बल्कि सिर्फ उस क्षेत्र के राजस्व पर अधिकार मिलता था।
  • 10 से 5000 तक के मनसब दिए जाते थे। 5000 के ऊपर के मनसब शहजादों तथा राजवंश के लोगोँ के लिए सुरक्षित होते थे।
  • औरंगजेब के समय मेँ मनसबदारो की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि उन्हें देने के लिए जागीर नहीँ बची।
  • प्रारंभ मेँ मनसबदारोँ को दोस्त 240 रुपए वार्षिक प्रति सवार मिलता था किंतु जहाँगीर के काल मेँ यह राशि घटाकर 200 रुपए वार्षिक कर दी गई।
  • अकबर के काल मेँ यह नियम था कि किसी भी मनसबदार का ‘सवार’ पद उसके ‘जात’ पद से अधिक नहीँ हो सकता है।
  • जहाँगीर ने ऐसी प्रथा चलाई, जिसमे बिना ‘जात’ पद बढ़ाये मनसबदारों को अधिक सेना रखने को कहा जाता था। इस प्रथा को ‘दुह-आस्था’ अथवा ‘सिंह-आस्था’ कहा जाता था।

मुगल कालीन समाज

  • मुगल कालीन समाज दो वर्गो मेँ विभक्त था – धनी या अमीर वर्ग तथा जनसाधारण वर्ग, जिसमें किसान, दस्तकार और मजदूर शामिल थे।
  • उच्च वर्ग के लोग अधिकतर मनसबदार, जागीरदार एवं जमींदार होते थे।
  • मुगलकाल मेँ कुलीन स्त्रियोँ की सम्मानजनक स्थिति थी। समाज मेँ विधवा विवाह, पर्दा प्रथा, बाल विवाह आदि का निषेध था।
  • दहेज प्रथा, सती प्रथा आदि समाजिक कुरीतियाँ प्रचलित थीं।
  • भूमिहीन किसानोँ तथा श्रमिकोँ की सामाजिक स्थिति अत्यंत दयनीय थीं।
  • समाज सामंतवादी संस्था के समान दिखता था जिसके शीर्ष पर बादशाह था।
  • विधवा विवाह महाराष्ट्र के गौड़ ब्राह्मणों तथा पंजाब एवं यमुना घाटी के जाटो मेँ प्रचलित था।
  • बादशाहोँ तथा राज्य के बड़े-बड़े सरदारोँ के हरम मेँ हजारोँ स्त्रियाँ रखैलो और दासियोँ के रुप मेँ रहती थीं।
  • मुगल बादशाहों मेँ एक ओरंगजेब ही था, जो अपनी पत्नी के प्रति समर्पित था।

मुगल कालीन कला एवँ संस्कृति

  • कला एवँ संस्कृति के कारण मुगल काल इतिहास में प्रसिद्द है। मुगल काल की बहुमुखी सांस्कृतिक गतिविधियाँ के कारण इसे भारतीय इतिहास का ‘द्वितीय क्लासिक’ युग कहा जाता है।
  • मुगल स्थापत्य कला का इतिहास बाबर से आरंभ होता है, लेकिन मुगल स्थापत्य शैली आरंभ स्पष्ट रूप से अकबर के काल मेँ परिलक्षित होता है।
  • मुग़लकालीन स्थापत्य की मुख्य विशेषता ‘पित्रादुरा शैली’ का प्रयोग है, जिसमें संगमरमर पर हीरे एवं जवाहरातोँ की जड़ावत की जाती थी।
  • शाहजहाँ के काल मेँ स्थापत्य कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। इस काल मेँ संगमरमर का सर्वाधिक प्रयोग हुआ। ताजमहल संगमरमर के प्रयोग का जीवन्त नमूना है।
  • अकबर के काल मेँ चित्रकला को प्रोत्साहन मिला।
  • मीर सईद अली, बब्दुसमद, दसवंत और बसावन अकबर काल के प्रमुख चित्रकार थे। जहाँगीर के दरबार मेँ फारसी चित्रकार आगा रेजा, अब्दुल हसन और उस्ताद मंसूर थे।
  • मुग़ल चित्रकला की महत्पूर्ण कलाकृति ‘हमजान-मद’ या दास्तान-ए-अमीर-हमजा है।
  • मंसूर की महत्वपूर्ण कृतियां साइबेरिया का बिल सारस तथा बंगाल का एक पुरुष है।
  • अकबर ने संगीत तथा संगीतकारोँ को काफी प्रश्रय दिया। अबुल फजल के अनुसार अकबर के दरबार मेँ 66 गायक थे।
  • अकबर के दरबार मेँ तानसेन सबसे महत्वपूर्ण संगीतज्ञ था, जिसे अकबर ने ‘कंठामरण विलास’ की उपाधि प्रदान की थी। मुगल शासको ने साहित्य और साहित्यकारोँ को संरक्षण प्रदान किया था।
  • अकबर ने महाभारत का फ़ारसी मेँ अनुवाद करवाया, जिसे ‘रजमनामा’ के नाम से जाना जाता है। अकबर के काल मेँ ही कुरान का पहली बार अनुवाद हुआ।
  • हुमायूँनामा की रचना हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने की थी।
  • अकबरनामा की रचना अबुल फजल द्वारा की गई थी।
  • तुजुक-ए-जहांगीरी (जहाँगीर की आत्मकथा) स्वयं जहाँगीर ने लिखी है।
  • शाहजंहानामा दो हैं, जिनकी रचना मोहम्मद सलीह और इनायत खान ने की थी।
मुग़ल कालीन प्रमुख इमारतें
इमारत निर्माता स्थान
जामा मस्जिद इल्तुतमिश दिल्ली
सुल्तानगढ़ी इल्तुतमिश दिल्ली
अतारकिन का दरवाजा इल्तुतमिश दिल्ली
लाल महल बलबन दिल्ली
जमात खाना मस्जिद अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली
अलाई दरवाजा अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली
हजार सितून महल अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली
तुगलकाबाद गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली
जहांपना नगर मुहम्मद तुगलक दिल्ली
मोठ की मस्जिद मियां भुंवा दिल्ली
हुमायूं का मकबरा हाजी महल दिल्ली
पंच महल अकबर आगरा
लाहौरी दरवाजा शाहजहाँ दिल्ली
अकबर का मकबरा जहांगीर सिकंदरा (आगरा)

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