विद्युत Electricity

स्थिर-विद्युतकी Static Electricity

लगभग 600 ईसा पूर्व (BC) में, यूनान के दार्शनिक थेल्स (Thales) ने देखा कि जब अम्बर (Amber) को बिल्ली की खाल से रगड़ा जाता है, तो उसमें कागज के छोटे-छोटे टुकड़े आदि को आकर्षित करने का गुण आ जाता है। यद्यपि इस छोटे से प्रयोग का स्वयं कोई विशेष महत्व नहीं था, परन्तु वास्तव में यही प्रयोग आधुनिक विद्युत् युग का जन्मदाता माना जा सकता है।

थेल्स के दो हजार वर्ष बाद तक इस खोज की तरफ किसी का ध्यान आकृष्ट नहीं हुआ। 16वीं शताब्दी में गैलीलियो के समकालीन डॉ० गिलबर्ट ने, जो उन दिनों इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ के घरेलू चिकित्सक थे, प्रमाणित किया कि अम्बर एवं बिल्ली के खाल की भाँति बहुत-सी अन्य वस्तुएँ-उदाहरणार्थ, काँच और रेशम तथा लाख और फलानेल-जब आपस में रगड़े जाते हैं, तो उनमें भी छोटे-छोटे पदार्थों को आकर्षित करने का गुण आ जाता है।

घर्षण से प्राप्त इस प्रकार की विद्युत् को घर्षण-विद्युत् (frictional electricity) कहा जाता है। इसे स्थिर विद्युत् (static electricity) भी कहा जाता है, बशर्ते पदार्थों को रगड़ने से उन पर उत्पन्न आवेश वहीं पर स्थिर रहे जहाँ वे रगड़ से उत्पन्न होते हैं।

अतः स्थिर-विद्युतिकी भौतिक विज्ञान की वह शाखा है, जिसकी विषय-वस्तु वैसे आवेशित पदार्थों के गुणों का अध्ययन है, जिन पर विद्युत् आवेश स्थिर रहते हैं।


आवेशों के प्रकार Kinds of Charges

जब घर्षण से विद्युत् उत्पन्न की जाती है, तो जिसमें वस्तु रगड़ी जाती है और जो वस्तु रगड़ी जाती है दोनों ही में समान परिमाण में विद्युत् आवेश (Electric charge) उत्पन्न होते हैं, लेकिन दोनों वस्तुओं पर उत्पन्न आवेशों की प्रकृति एक दूसरे के विपरीत होती है। एक वस्तु पर के आवेश को ऋण आवेश (Negative charge) तथा दूसरी वस्तु पर के आवेश को धन आवेश (Positive charge) कहते हैं। आवेशों के लिए ऋणात्मक एवं धनात्मक पदों का प्रयोग सर्वप्रथम बेंजामिन फ्रेंकलिन (Benjamin Franklin) ने किया था। बेंजामिन फ्रेंकलिन के अनुसार (i) काँच को रेशम से रगड़ने पर काँच पर उत्पन्न विद्युत् को धनात्मक विद्युत् कहा गया और (ii) एबोनाइट, या लाख की छड़ को फलानेल या रोएँदार खाल- इन दोनों में से किसी से रगड़ने पर उन पर उत्पन्न विद्युत् को ऋणात्मक विद्युत् कहा गया। घर्षण के कारण दोनों प्रकार की विद्युत् बराबर परिमाण में एक ही साथ उत्पन्न होती है।


नीचे के सारणी में कुछ वस्तुएँ इस ढंग से सजायी गयी हैं कि यदि किसी वस्तु को, किसी दूसरी वस्तु से रगड़कर विद्युत् उत्पन्न की जाय, तो सारणी में जो पहले (पूर्ववर्ती) है, उसमें धन आवेश तथा जो बाद में (उत्तरवर्ती) है, उसमें ऋण आवेश उत्पन्न होता है-

1. रोंआं 2. फलानेल 3. चपड़ा 4. मोम 5. कांच
6. कागज़ 7. रेशम 8. मानव शरीर 9. लकड़ी 10. धातु
11. रबर 12. रेजिन 13. अम्बर 14. गंधक 15. एबोनाइट

उदाहरण- यदि काँच (5) को रेशम (7) के साथ रगड़ा जाय तो काँच में धन आवेश उत्पन्न होता है, लेकिन यदि काँच (5) को रोआं (1) से रगड़ा जाय तो काँच में ऋण आवेश उत् पन्न होगा (उपर्युक्त सारणी के नियमानुसार)।

सजातीय आवेशों (like charges) में प्रतिकर्षण (Repulsion) होता है अर्थात्, धन आवेशित वस्तुएँ एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करती हैं और ऋण आवेशित वस्तुएँ भी एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करती हैं। विजातीय आवेशों (unlike charges) में आकर्षण (Attraction) होता है अर्थात् एक धन आवेशित वस्तु और एक ऋण आवेशित वस्तु में आकर्षण होता है।

घर्षण का सिद्धान्त (Principle of Electricity): घर्षण के कारण उत्पन्न आवेशों की घटना को समझाने के लिए भिन्न-भिन्न वैज्ञानिकों ने समय-समय पर अनेक सुझाव दिए हैं। वर्तमान में आधुनिक इलेक्ट्रॉन सिद्धान्त (Modern Electron Theory) सर्वमान्य है।


आधुनिक इलेक्ट्रॉन सिद्धान्त Modern Electron Theory

इस सिद्धान्त का विकास थॉमसन (Thomson), रदरफोर्ड (Rutherford), नील्स बोर (Niels Bohr) आदि वैज्ञानिकों के कारण हुआ है। इस सिद्धान्त के अनुसार जब दो वस्तुएँ आपस में रगड़ी जाती हैं, तो उनमें से एक वस्तु के परमाणुओं की बाहरी कक्षा से भ्रमणशील इलेक्ट्रॉन निकलकर दूसरी वस्तु के परमाणुओं में चले जाते हैं। इससे पहली वस्तु के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की कमी तथा दूसरी वस्तु के परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन की वृद्धि हो जाती है। अतः पहली वस्तु धन आवेशित (positively charged) एवं दूसरी वस्तु ऋण आवेशित (negatively charged) हो जाती है।


विद्युत् क्षेत्र Electric Field

किसी जगह विद्युत् से आविष्ट वस्तु अगर रहती है, तो उसका प्रभाव उसके चारों ओर सीमित क्षेत्र पर पड़ता है। इसी क्षेत्र को विद्युत् क्षेत्र कहते हैं। सिद्धान्ततः यह क्षेत्र अनन्त दूरी तक फैला हुआ होना चाहिए, परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं पाया जाता है।

विद्युत् बल रेखा Electric Lines of Force

विद्युत् बल रेखा वह पथ है, जिस पर एक स्वतंत्र धन आवेश चलता है या चलने की प्रवृति रखता है। अतः विद्युत् बल रेखा वह वक्र है, जिसके किसी भी बिन्दु पर खींची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर विद्युत् क्षेत्र की दिशा बताती है। ये बल रेखाएँ केवल एक समतल में न होकर माध्यम में प्रत्येक दिशा में होती है।

चालक Conductor

जिन पदार्थों से होकर आवेश का प्रवाह सरलता से होता है, उन्हें चालक कहते है। लगभग सभी धातुएँ अम्ल, क्षार, लवणों के जलीय विलयन, मानव शरीर आदि विद्युत् चालक पदार्थ के उदाहरण हैं। चाँदी सबसे अच्छा चालक होता है।

अचालक Non-Conductor

जिन पदार्थों से होकर आवेश का प्रवाह नहीं होता है, उन्हें अचालक कहते हैं। लकड़ी, रबर, कागज, अभ्रक, शुद्ध आसुत जल आदि अचालक पदार्थों के उदाहरण हैं ।

अर्द्धचालक Semi-Conductor

कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं, जिनकी विद्युत् चालकता चालक एवं अचालक पदार्थों के बीच होती है, उन्हें अर्द्धचालक कहते हैं। सिलिकन, जर्मेनियम, कार्बन, सेलेनियम आदि अर्द्धचालक के उदाहरण हैं।

ताप बढ़ाने पर चालक पदार्थों का विद्युत् प्रतिरोध (electrical resistance) बढ़ता है तथा उसकी विद्युत् चालकता (electrical conductivity) घटती है, जबकि अर्द्धचालक पदार्थों की विद्युत् चालकता ताप के बढ़ाने पर बढ़ती है तथा ताप के घटाने पर घटती हैं। परम शून्य ताप पर अर्द्धचालक पदार्थ आदर्श अचालक की भाँति व्यवहार करता है। अर्द्धचालक पदार्थों में अशुद्धियाँ मिलाने पर भी उसकी विद्युत् चालकता बढ़ जाती है।

चालक, अचालक एवं अर्द्धचालक पदार्थों की व्याख्या इलेक्ट्रॉनिक सिद्धान्त के अनुसार की जा सकती है। चालक पदार्थों में कुछ मुक्त इलेक्ट्रॉन (free electrons) होते हैं, जिससे उनमें विद्युत् चालन की क्रिया सरलता से होती है। अचालक पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति होने के कारण इनसे होकर विद्युत का चालन नहीं होता है। अर्द्धचालकों में सामान्य अवस्था में मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं, लेकिन विशेष परिस्थितियों जैसे उच्च ताप या अशुद्धियाँ मिलाने पर मुक्त इलेक्ट्रॉन प्राप्त किए जा सकते हैं।


आवेश का पृष्ठ घनत्व Surface Density of Charge

चालक के इकाई क्षेत्रफल पर स्थित आवेश की मात्रा को उस आवेश का पृष्ठ घनत्व कहते हैं।

पृष्ठ घनत्व = आवेश / क्षेत्रफल

चालक का पृष्ठ घनत्व चालक के आकार एवं चालक के समीप स्थित अन्य चालक या विद्युत्रोधी पदार्थों पर निर्भर करता है। पृष्ठ घनत्व सबसे अधिक नुकीले भाग पर होता है क्योंकि नुकीले भाग का क्षेत्रफल सबसे कम होता है। जब वायु के कण किसी नुकीले आवेशित चालक के सम्पर्क में आते हैं, तो वे आवेशित हो जाते हैं तथा प्रतिकर्षित होकर दूर चले जाते हैं। उनका स्थान लेने के लिए वायु के नए कण आते हैं। यही क्रिया बार-बार चलती रहती है। इस प्रकार वायु के कणों द्वारा आवेश बाहर ले जाने की घटना को संवहन विसर्जन (Convention Discharge) एवं इस संवहन धारा को विद्युत् पवन (Electric Wind) कहते हैं।

विद्युत् बल के नियम या कूलम्ब का नियम Laws of Electric Force or Coulomb’s Law

दो समान आवेशों के बीच प्रतिकर्षण और दो असमान आवेशों के बीच आकर्षण का बल कार्य करता है। यह बल दोनों आवेशों के परिमाण, उनके बीच की दूरी तथा उनके बीच के माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करता है। कृलम्ब ने अपने प्रयोगों के आधार पर दो आवेशों के बीच कार्य करने वाले बल के लिए दो नियम प्रतिपादित किए-

(i) दो आवेशों के बीच आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण का बल उनके आवेशों के गुणनफल का अनुक्रमानुपाती (directly proportional) होता है।

(ii) दो आवेशों के बीच आकर्षण या विकर्षण का बल आवेशों के बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती (Inversely Proportional) होता है। यह नियम व्युत्क्रम-वर्ग-नियम (Inverse Square Law) कहलाता है।

जब निर्वात् में 1 मीटर की दूरी पर रहकर दो समान और बराबर आवेशों के बीच 9 × 109 न्यूटन प्रतिकर्षण का बल कार्य करता है, तो उनमें से प्रत्येक को एकांक आवेश कहते हैं। आवेश का मात्रक कूलम्ब है। अगर किसी चालक से होकर एक एम्पियर की धारा प्रवाहित होती है, तो एक सेकण्ड में प्रवाहित आवेश के परिमाण को एक कूलम्ब कहते हैं।

किसी चालक में से एक एम्पियर की धारा प्रवाहित होने का तात्पर्य यह है कि चालक के अनुप्रस्थ परिच्छेद में से प्रति सेकण्ड 6.25 × 1018 इलेक्ट्रॉन गुजर रहे हैं।

कूलम्ब के नियम के महत्व Importance of Coulomb’s Law

कूलम्ब के नियम की सहायता से-

(i) किसी परमाणु के नाभिक तथा इलेक्ट्रॉनों के बीच कार्यकारी बल,

(ii) परमाणुओं को परस्पर बाँधकर अणु बनाने वाले बल तथा

(iii) परमाणु अथवा अणुओं को परस्पर बाँधकर ठोस अथवा द्रव बनाने वाले बलों को समझा जा सकता है।

दो आवेशित वस्तुओं के बीच कार्यकारी विद्युत् बल की तुलना गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) से की जा सकती है। ये दोनों बल एक ही जैसे नियमों के अनुसार तथा निर्वात् में भी कार्य करते हैं। परन्तु इनमें मुख्य अन्तर यह है कि गुरुत्वाकर्षण बल केवल आकर्षण बल ही होता है, जबकि विद्युत् बल आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण दोनों प्रकार के होते हैं। इससे इस तथ्य की भी पुष्टि होती है कि द्रव्यमान केवल एक प्रकार का होता है, जबकि आवेश दो प्रकार के होते हैं।

कूलम्ब का नियम बहुत अधिक दूरियों से लेकर बहुत छोटी दूरियों (10-14 मी०) तक के लिए सत्य है। इससे कम दूरियों पर जो बल कार्य करता है, उसे नाभिकीय बल (Nuclear force) कहते हैं। इस बल का मान विद्युत् बल से बहुत अधिक होता है। यह कणों के आवेशों पर निर्भर नहीं करता है। यह परमाणु में न्यूट्रॉनों और प्रोटॉनों को नाभिक में बद्ध किए रहता है।


विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता Intensity of Electric Field

विद्युतीय क्षेत्र के किसी बिन्दु पर स्थित एकांक धन आवेश पर कार्य करने वाले बल को उस बिन्दु पर विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता कहते है।

विद्युत् तीव्रता का मात्रक वोल्ट प्रति मीटर (vm-1) या न्यूटन/कूलम्ब है। यह एक सदिश राशि है। साधारणतः विद्युत् क्षेत्र की तीव्रता को विद्युत् क्षेत्र भी कहते है।

खोखले चालक के भीतरी भाग में विद्युतीय क्षेत्र: किसी खोखले चालक के भीतर विद्युत् क्षेत्र शून्य होता है। यदि ऐसे चालक को आवेशित किया जाय, तो सम्पूर्ण आवेश उसके बाहरी पृष्ठ पर ही रहता है। अतः खोखला गोला एक विद्युत् परिरक्षक (electrostatic shield) का कार्य करता है। यही कारण है कि कार से यात्रा करते समय यदि तेज वर्षा होने लगे और बिजली गिरने की संभावना हो, तो सुरक्षा का उपाय यही है कि कार की खिड़कियाँ पूर्णतः बन्द करके अन्दर ही बैठे रहा जाए। यदि बिजली कार पर ही गिरती है, तो भी कोई हानि नहीं होगी। विद्युत् आवेश कार के बाहरी सतह पर ही रहेगा।


विद्युत् विभव Electric Potential

एकांक धन आवेश को अनन्त से विद्युत् क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में जो कार्य करना पड़ता है, उसे विद्युत् विभव कहते है।

विद्युत् विभव का SI मात्रक जूल प्रति कूलम्ब होता है, जिसे वोल्ट भी कहते हैं। विभव का मात्रक वोल्ट इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलसेन्ड्रो वोल्टा (AIlessandro volta) के सम्मान में रखा गया है। विभव एक अदिश राशि है।

शून्य विभव Zero Potential

किसी भौतिक राशि को नापने के लिए प्रायः पैमाना तथा निर्देश-बिन्दु लिया जाता है, जिसका पठन शून्य माना जाता है। विद्युतीय विभव को नापने के लिए निर्देश बिन्दु के रूप में पृथ्वी के विभव को शून्य माना जाता है। पृथ्वी एक विशाल चालक है। इसमें थोड़ा आवेश देने से या इसमें से थोड़ा आवेश निकाल लेने से इसके विभव में कोई अन्तर नहीं होता है, यानी पृथ्वी का विभव हमेशा शून्य रहता है।

बोल्ट (volt): यदि 1 कूलम्ब धनात्मक आवेश को अनन्त से विद्युत् क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में 1 जूल कार्य करना पड़े, तो बिन्दु का विद्युत् विभव 1 वोल्ट कहलाता है।

विभवान्तर Potential Difference

एक कूलम्ब धनात्मक आवेश को विद्युत् क्षेत्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किए गए कार्य को उन बिन्दुओं के मध्य विभवान्तर कहते हैं। विभवान्तर का मात्रक भी वोल्ट होता है तथा यह भी एक अदिश राशि है।

किसी खोखले चालक के भीतरी भाग का विभव: जब किसी खोखले चालक पर आवेश दिया जाता है, तो यह आवेश चालक के बाहरी पृष्ठ पर चला आता है। भीतरी पृष्ठ पर आवेश नहीं रहता है, लेकिन चालक के खोखले भाग का विभव शून्य नहीं होता है। वास्तव में इस भाग के प्रत्येक बिन्दु का विभव समान होता है और चालक के विभव के बराबर होता है।


विद्युत्-धारिता Electric Capacity

किसी चालक पर जितना आवेश देने से उसके विभव में एकांक वृद्धि होती है, उतने ही आवेश को उस चालक की धारिता कहते हैं। अगर q कूलम्ब आवेश देने से किसी चालक के विभव में v वोल्ट वृद्धि होती है, तो चालक की धारिता, [latex]C=\frac { q }{ V }[/latex] होती है। धारिता का SI मात्रक फैराडे (Faradey-F) होता है। अगर किसी चालक में एक कूलम्ब आवेश देने से उसका विभव एक वोल्ट बढ़ जाता है, तो उस चालक की धारिता एक फैराड होती है। फैराड एक बहुत बड़ा मात्रक है। इसीलिए प्रयोग हेतु माइक्रो फैराडे (μF) यानी 10-6 फैराडे मात्रक का प्रयोग किया जाता है। किसी चालक की धारिता निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है-

(i) चालक के पृष्ठ क्षेत्रफल पर: चालक का पृष्ठ अधिक होने से उसकी धारिता अधिक और कम होने से उसकी धारिता कम होती है।

(ii) चालक के चारों ओर के माध्यम पर: अगर हवा या निर्वात् में किसी चालक का विभव v है, तो ϵ विद्युतूशीलता वाले माध्यम में धिरे रहने पर उसका विभव [latex] \frac { V }{ \epsilon  }[/latex] हो जाता है। अतः किसी चालक की धारिता अपने चारों ओर के माध्यम पर निर्भर करता है।

(iii) आस-पास में अन्य चालकों की उपस्थिति पर: किसी चालक के समीप दूसरा चालक के रहने से प्रेरण होता है, जिससे पहले चालक का विभव घट जाता है और उसकी धारिता बढ़ जाती है, अगर समीप लाया गया चालक भू-सम्पर्कित (earth connected) तो पहले चालक की धारिता और बढ़ जाती है।

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