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औरंगजेब की दक्कन नीति Aurangzeb’s Deccan Policy – Vivace Panorama

औरंगजेब की दक्कन नीति Aurangzeb’s Deccan Policy

राज्यकाल के प्रथमार्द्ध पूर्वार्द्ध में औरंगजेब का ध्यान उत्तर के मामलों में उलझा हुआ था तथा दक्कन सूबेदारों पर छोड़ा हुआ था। ह्रासोन्मुख दक्षिणी सल्तनतें अब तक अपने ऊपर किये गये आघातों से पूर्णत: नहीं उबर सकी थी। उनसे लाभ उठाकर मराठों का उत्थान हो गया। मुगल-साम्राज्य के लिए चुनौती के रूप में मराठों के उत्थान से दक्कन की राजनैतिक परिस्थिति उलझ गई, जिसका पूरा महत्व बादशाह पहले नहीं समझ सका। उसके राज्य-काल के पहले चौबीस वर्षों में दक्कन में उसके सूबेदार इन सल्तनतों अथवा मराठों के विरुद्ध कोई निश्चित सफलता नहीं प्राप्त कर सके थे।

1680 ई. में शिवाजी की मृत्यु से दक्कन में बादशाह की स्थिति किसी भी तरह नहीं सुधरी थी, यद्यपि औरंगजेब अपनी प्रभुता को दृढ़ करने में कृतसंकल्प था। विद्रोही शाहजादा अकबर के मराठा राजा शम्भूजी के पास जाने तथा दोनों के बीच संधि हो जाने से उसकी दक्कन-नीति में पूर्ण परिवर्तन आ गया। उसने अब साम्राज्य के हित के विरुद्ध उपस्थित इस संकट को रोकने के लिए स्वंय सेना लेकर जाने की आवश्यकता का अनुभव किया और जून, 1681 ई. में मेवाड़ के साथ झटपट संधि कर ली।

8 सितम्बर, 1681 ई. को दक्कन के लिए अजमेर से प्रस्थान कर वह 23 नवम्बर, 1681 ई. को बुरहानपुर तथा 1 अप्रैल, 1682 ई. को अहमदनगर पहुँचा। वह यह नहीं सोच सका कि नियति उसे दक्षिण में उसकी तथा उसके साम्राज्य की कब्रें खोदने के लिए घसीट कर ले जा रही है। पहले चार वर्ष शाहजादा अकबर को पकड़ने की असफल चेष्टाओं तथा मराठों के विरुद्ध विनाशकारी आक्रमणों में व्यतीत हो गये। मराठों के कुछ दुर्ग शाही दल द्वारा जीत लिये गये। किन्तु हट्टे-कट्टे लोग, जिन्हें शिवाजी ने नयी अभिलाषाओं से प्रेरित किया था, पूर्णत: दबाये नहीं जा सके।

इसके बाद अवनतिग्रस्त सल्तनतों की विजय की ओर बादशाह का ध्यान आकृष्ट हुआ। दक्कन की शिया सल्तनतों के प्रति शाहजहाँ की तरह औरंगजेब का रुख भी अंशत: साम्राज्य के हित तथा अंशत: धार्मिक विचारों से प्रभावित था। बीजापुर ने गुटबन्दियों एवं मराठों के उत्कर्ष से दुर्बल हो जाने के कारण आक्रमणकारियों की अधीनता स्वीकार कर ली। नगर का मुग़लों द्वारा अन्तिम घेरा 11 अप्रैल, 1685 ई. को आरम्भ हुआ तथा बादशाह स्वयं वहाँ जुलाई 1687 ई. में पहुँचा। घिरी हुई सेना ने वीरता से सामना किया। परन्तु भोजन की सामग्री के अभाव तथा दुर्मिक्ष के कारण अनगिनत मनुष्यों एवं घोड़ों की मृत्यु से थककर उन्होंने सितम्बर, 1686 ई. में आत्म-समर्पण कर दिया। अन्तिम आदिल शाही सुल्तान सिकन्दर ने बादशाह के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया तथा यूसुफ आदिल शाह के द्वारा स्थापित राजवंश की इतिश्री हो गयी।

इसके बाद गोलकुंडा के कुतुबुशाही राज्य की बारी आयी। फरवरी, 1687 ई. के प्रारम्भ में औरंगजेब स्वयं गोलकुंडा के समक्ष उपस्थित हुआ तथा कुछ दिनों के अन्दर मुग़ल फौज ने स्थानीय गढ़ पर घेरा डाल दिया। परन्तु उस किले में पर्याप्त भोजन एवं युद्ध-सामग्री संचित थी, जिससे घिरे हुए व्यक्ति लगभग आठ महीनों तक वीरतापूर्वक डटे रह सके। इसके बावजूद उन्हें कोई निश्चित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। बल्कि दुर्मिक्ष एवं महामारी से उन्हें क्लेश ही हुआ तथा अपने शत्रुओं के प्रतिशोध के कार्य से उन्हें भारी हानियाँ हुई। फिर भी औरंगजेब पूरी धुन के साथ डटा रहा तथा उसने और सेना इकट्ठी की। अब्दुल्ला पनी नामक एक अफ़गान सिपाही था, जो उस समय गोलकुंडा के सुल्तान अबुल हसन के यहाँ नौकरी करता था। बादशाह ने उसे घूस दे दी। फलत: उसने किले का प्रमुख द्वार खोलकर मुग़लों को इसमें प्रवेश करने दिया। परन्तु अब्दुर्रज्जाक लारी नामक गोलकुंडा के एक स्वामिभक्त सरदार ने बादशाह द्वारा दिये गये रुपये-पैसे के प्रलोभनों पर लात मारी। वह अकेला लड़ता रहा और सत्तर घाव जाने के बाद ही कहीं उसका लड़ना बंद हुआ। मुग़लों ने उसकी कर उसे स्वस्थ किया तथा उसने अन्त में बादशाह के अधीन एक उच्च पद स्वीकार किया। अबुल हसन को पचास हजार रुपये वार्षिक पेंशन देकर अपने अन्तिम दिन व्यतीत करने की दौलताबाद के किले में भेज दिया गया। गोलकुंडा को मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया गया (सितम्बर, 1687 ई.)।

अपनी दक्कन-नीति के दो उद्देश्यों में एक की प्राप्ति कर लेने के पश्चात् अर्थात् दक्कन की हासोन्मुख सल्तनतों को मिला लेने के बाद, औरंगजेब दूसरे उद्देश्य की ओर मुड़ा, अर्थात नवोदित मराठा शक्ति का दमन करने में संलग्न हुआ। पहले उसके प्रयास सफल हुए। शम्भूजी 11 मार्च, 1889 ईं को फांसी पर चढ़ा दिया गे। उसकी राजधानी रायगढ़ जित ली गयी। यद्यपि उसका भाई राजाराम बच निकला, पर उसके छोटे लड़के शाहू के सहित उसका शेष परिवार बन्दी बना लिया गया। बादशाह ने दक्षिण में अपने प्रभुत्व का विस्तार किया तथा तंजोर एवं त्रिचिनापल्ली के हिन्दू राज्यों पर कर लगाया।

इस प्रकार 1690 ई. तक औरंगजेब अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया तथा काबुल से लेकर चटगाँव और कश्मीर से लेकर कावेरी तक फैले हुए लगभग सम्पूर्ण भारत का परम स्वामी बन गया। ऐसा प्रतीत होता था कि औरंगजेब ने अब सब कुछ प्राप्त कर लिया है; परन्तु वास्तव में वह सब कुछ खो चुका था। यह उसकी इतिश्री का श्रीगणेश था। अब उसके जीवन का सबसे दु:खपूर्ण एवं आशाशून्य अध्याय खुला। मुग़ल साम्राज्य इतना विस्तृत हो गया था कि एक व्यक्ति द्वारा अथवा एक केन्द्र से उस पर शासन करना सम्भव नहीं था। उसके शत्रु सब ओर खड़े हो गये। वह उन्हें पराजित कर सकता था, पर सदा के लिए उन्हें नष्ट नहीं कर सकता था।….उत्तरी तथा मध्य भारत के बहुत-से स्थानों में अराजकता फैल गयी। सुदूर दक्कन में बैठे बूढ़े बादशाह का हिन्दुस्तान के अपने अफूसरों पर सारा नियंत्रण जाता रहा। शासन शिथिल एवं भ्रष्टाचारपूर्ण हो गया। नायक एवं जमींदार स्थानीय अधिकारियों की उपेक्षा कर अपनी प्रभुता स्थापित करने लगे। देश में उन्होंने हलचल मचा दी। विशेष रूप से आगरा प्रान्त में अव्यवस्था पुरानी हो चुकी थी। शाही संरक्षण के हट जाने से कला एवं विद्या की अवनति होने लगी। एक भी भवन, सुन्दर लिखावट वाली पांडुलिपि अथवा उत्तम चित्र औरंगजेब के राज्य-काल का स्मरण नहीं दिलाते। दक्कन के अंतहीन युद्ध के कारण उसका कोष रिक्त हो गया। सरकार दिवालिया हो गयी। वेतन बाकी रहने के कारण सैनिक भूख से मरने लगे तथा उन्होंने बलवा कर दिया। उसके राज्य-काल के अन्तिम वर्षों में बंगाल का राजस्व, जो योग्य दीवान मुर्शिद कुली खाँ नियमित रूप से भेजता था, बादशाह के परिवार अथवा उसकी सेना का एकमात्र सहारा बन गया था तथा इसके आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती थी। दक्कन के फोड़े ने औरंगजेब को नेस्तनाबूद कर दिया। बादशाह मराठों को अधीन करने अथवा उनके देश को जीतने में असफल रहा। 1691 ई. तक मराठों की स्थिति में सुधार हुआ और वे मुगलों के विरुद्ध राष्ट्रीय प्रतिरोध का युद्ध फिर करने लगे। पहले यह युद्ध राजाराम तथा कुछ अन्य योग्य मराठा नायकों के अधीन चलाया गया। 1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् उसकी वीर विधवा ताराबाई ने अपने हाथों में इसकी बागडोर ले ली।


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