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सिन्धु घाटी सभ्यता Indus Valley Civilization – Vivace Panorama

सिन्धु घाटी सभ्यता Indus Valley Civilization

विश्व का कौन-सा कोना सर्वप्रथम सभ्यता की प्रथम किरण से प्रकाशित हुआ था, इसका कोई ज्ञान दुर्भाग्यवश प्राप्त नहीं है। हाँ, इतना अवश्य ज्ञात हो। सका है कि सभी सभ्यताएँ नदी घाटियों में ही उदित हुई। भारत में भी सिन्धु नदी की घाटी में एक सभ्यता का जन्म हुआ जिसका ज्ञान हमें लम्बे समय तक नहीं रहा। सिन्धु सभ्यता आद्य-ऐतिहासिक काल की सभ्यता थी। आद्य-ऐतिहासिक काल इसे इसलिए कहा जाता है क्योंकि सिन्धु लिपि को अब तक नहीं पढ़ा जा सका है। यह आश्चर्यजनक सांस्कृतिक उपलब्धियों का प्रतिनिधित्व करता है। यह पुरातन तथा आधुनिक भारतीय सभ्यता के कुछ महत्त्वपूर्ण आयामों के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। इस सभ्यता का अभिज्ञान पुरातत्त्व विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण देन है। इस सभ्यता की खोज ने भारतीय सभ्यता के इतिहास को ही बदल दिया है। आर्यों के साहित्यिक वेदों से ही पहली बार हमें भारत के सामाजिक एवं धार्मिक विचारों तथा आर्थिक और राजनैतिक अवस्थाओं का विस्तृत परिचय मिला। फलत: यह अवश्यंभावी था कि व्यावहारिक दृष्टि से भारत का इतिहास इस काल से प्रारम्भ किया जाये और भारतीय संस्कृति की रूपरेखा का आरम्भ आर्य सभ्यता से हो। किन्तु, 1922-23 ई. में होने वाली एक खोज के परिणामस्वरूप इस धारणा में परिवर्तन हुआ। इस धारणा के परिवर्तन का कारण था सिन्धु क्षेत्र में होने वाले उत्खननों के फलस्वरूप एक अत्यन्त पुरातन सभ्यता की खोज। सिन्धु घाटी की सभ्यता इसी खोज का प्रतिफल है।

कालनिर्धारण

एच. हेरास ने नक्षत्रीय आधार पर इसकी उत्पत्ति का काल 6000 ई.पू. माना है। मेसोपोटामिया में 2350 ई.पू. का सरगॉन का अभिलेख मिला है, उसके आधार पर इसकी समयावधि 3250-2750 ई.पू. मानी गयी है। जॉन मार्शल ने 3250-2750 ई.पू. में इसका काल निर्धारित किया है जबकि अर्नेस्ट मैके ने 2800-2500 ई.पू. को इसका काल माना है। माधोस्वरूप वत्स ने 3500-2700 ई.पू. और सी.जे. गैड ने 2300-1750 ई.पू. इसका काल माना है। माटींसर व्हीलर 2500-1500 ई.पू. को इस सभ्यता का काल मानते हैं जबकि फेयर सर्विस 2000-1500 ई.पू. को। रेडियो कार्बन पद्धति के अनुसार, इसका समय 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. माना गया है। इस संदर्भ में ऐसा माना जाता है कि इसका काल लगभग 2600 ई.पू. एवं 1900 ई.पू. के बीच निर्धारण किया जा सकता है।

नामकरण

इसके लिए कई नाम प्रचलित हैं, यथा, सिन्धु घाटी की सभ्यता, सिन्धु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता और हाल में इसके लिए सिन्धु-सरस्वती सम्पदा जैसे नामकरण पर बल दिया जाने लगा है किन्तु हड़प्पा सभ्यता नाम अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि पुरातात्विक उत्खनन के पश्चात् किसी सभ्यता का नामकरण प्रथम उत्खनित स्थल के आधार पर किया जाता रहा है।

पुरातात्विक स्रोत

हमें पुरातात्विक स्रोत से ही मुख्यतः इस सभ्यता का अभिज्ञान प्राप्त होता है क्योंकि इस सभ्यता के बारे में कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है। मुहर, टेरीकोटा फिगर्स (मृण्मूर्तियाँ), चक्र की आकृति, महल और खण्डहर, मेसोपोटामिया से प्राप्त बेलनाकार मुहर, लोथल से प्राप्त एक छोटी बेलनाकार मुहर, 2350 ई.पू. की मेसोपोटामिया की मुहर, मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक वाट और लोथल से प्राप्त हाथी दाँत के माप का पैमाना आदि स्रोत उल्लेखनीय हैं।


उद्भव

इस सभ्यता के उद्भव पर विद्वानों में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्वानों ने प्रारम्भ में इसकी उत्पत्ति पश्चिमी एशिया (मेसोपोटामिया) में ढूंढ़ने का प्रयास किया, जबकि कुछ पुराविदों ने इसका उद्गम ईरान-बलूची-सिंध संस्कृतियों से माना है। अर्वाचीन भारतीय पुराविदों ने भारत की ग्रामीण संस्कृतियों में इसका स्रोत ढूंढने का प्रयास किया है। संस्कृति का विकास मेसोपोटामिया में कालक्रम की दृष्टि से हड़प्पा संस्कृति से पहले हुआ था। इसलिए विद्वानों का इसके प्रभाव से प्रभावित होना स्वाभाविक है, पर विद्वानों में इस पर पर्याप्त मतभेद है। इस सभ्यता का विकास मेसोपोटामिया के प्रभाव से हुआ, इस विचार के प्रवर्तक हैं- मॉर्टीमर व्हीलर, गॉर्डन चाइल्ड, लियोनार्ड बूली, डी.डी. कौशांबी, क्रेमर। इनमें कौशांबी का तो यहाँ तक कहना है कि मिश्र, मेसोपोटामिया और सिंधु सभ्यता के जनक एक ही मूल के व्यक्ति थे जबकि क्रेमर के अनुसार लगभग 2400 ई.पू. में मेसोपोटामिया से लोग आए और उन्होंने यहाँ की परिस्थिति के अनुकूल अपनी संस्कृति में परिवर्तन कर सिंधु सभ्यता का निर्माण किया। परन्तु, इसके विपक्ष में भी मत व्यक्त किया जा सकता है। इसके विपक्ष में कहना है कि मेसोपोटामिया में स्पष्ट रूप से पुरोहितों का शासन था, सिन्धु सभ्यता में यह स्पष्ट नहीं है। मेसोपोटामिया की लिपि कीलनुमा लिपि है; जबकि सिन्धु सभ्यता के लोग चित्रलेखात्मक लिपि का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त सिंधु सभ्यता में बड़े पैमाने पर पक्की ईंटों का प्रयोग हुआ है; जबकि मेसोपोटामिया में यह बात स्पष्ट नहीं है। इसके अतिरिक्त एक दूसरी विचारधारा भी है जिसका कहना है कि इस सभ्यता की उत्पत्ति ईरानी-बलूची ग्रामीण संस्कृति से हुई है। इसके प्रतिपादक ब्रिजेट एवं रेमण्ड आॉलचिन, फेयरसर्विस, रोमिला थापर का मानना है कि बलूची-ईरानी संस्कृति का भारतीयकरण होता रहा। फेयर सर्विस के अनुसार-धर्म इस संस्कृति का प्रमुख आधार था जिसके कारण इस संस्कृति के नागरीकरण की दिशा में तीव्र विकास हुआ। एक तीसरी विचारधारा भी इस सभ्यता को लेकर है जो मानती है कि देशी प्रभाव (सोथी-संस्कृति) से इस सभ्यता की उत्पति हुई है। अमलानन्द घोष, धर्मपाल अग्रवाल, ब्रिजेट एवं रेमण्ड आॉलचिन भी इसी मत के प्रतिपादक हैं। कुछ विद्वान् सिन्धु घाटी की सभ्यता का विकास भारत की धरती पर मानते हैं। राजस्थान के कुछ भागों से प्राक्-हड़प्पाकालीन मृदभांड प्राप्त हुए हैं। 1953 ई. में सर्वप्रथम अमलानन्द घोष ने बीकानेर क्षेत्र में सोथी संस्कृति की खोज की। धर्मपाल अग्रवाल, ब्रिजेट एवं रेमण्ड ऑलचिन आदि विद्वानों ने यह धारणा प्रकट की है कि सिंधु सभ्यता का प्रारंभिक आधार सोथी संस्कृति में ही खोजा जा सकता है। सिन्धु सभ्यता धर्मपाल अग्रवाल के अनुसार, ग्रामीण सोथी संस्कृति का ही नागरिक रूप है। चार्ल्स मेसन नामक इतिहासकार ने 1826 ई. में हड़प्पा नामक गाँव का दौरा किया। 1872 ई. में कनिंघम महोदय ने इस प्रदेश का दौरा किया। तीसरी सहस्राब्दी ई.पू. के, पूर्व के मध्य बहुत से छोटे-छोटे गाँव बलूचिस्तान एवं अफगानिस्तान में बस गए। बलूचिस्तान में किली गुल मोहम्मद और अफगानिस्तान में मुंडीगाक और बलूचिस्तान के मेहरगढ़ नामक स्थान पर 5000 ई.पू. के लगभग का कृषि का साक्ष्य प्राप्त होता है।

विस्तार

प्रारम्भ में विद्वानों की यह धारणा थी कि यह सभ्यता सिन्धु घाटी तक सीमित है, किन्तु यह तथ्य अब असंगत हो गया है। प्रारम्भ में माना गया था कि हड़प्पा सभ्यता पश्चिम में काठियावाड़ से प्रारम्भ होकर पूर्व में मकरान तक फैली हुई थी जिसके भग्नावशेष सर्वप्रथम मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा दो प्रधान नगरों से प्राप्त हुए थे। किन्तु कुछ समय बाद चालीस से अधिक बस्तियों के अवशेष उत्खनन से प्राप्त हुए जो इस सभ्यता के व्यापक प्रसार को इंगित करते हैं। आलचिन ने सैन्धव सभ्यता के 70 स्थलों का उल्लेख किया था। जम्मू में मांडा और पंजाब में रोपड़ सिंध सभ्यता की उत्तरी सीमा के सूचक है, और बड़गाँव, मनपुर एवं आलमगीरपुर इसका पूर्वीय स्थल है। दक्षिण में गुजरात क्षेत्र में लोथल, रंगपुर, रोजड़ी, प्रभासपट्टन तथा नर्मदा-ताप्ती नदियों के तट पर भगतराव, मालवण, मेघम, तेलोद में सैन्धव अवशेष पाए गए हैं। सिंधु संस्कृति का पश्चिमी स्थल पाकिस्तान से सतुकांगेडोर (सुतकगेन्दर) ईरान की सीमा से 40 कि.मी. पूर्व एवं अरब सागर से लगभग 50 कि.मी. उत्तर की ओर स्थित है। हाल ही में, कच्छ में एक नवीन स्थल से सैन्धव सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। उत्तरी बलूचिस्तान में डाबरकोट और मेहरगढ़ महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। रामायण-महाभारत में विवेचित परिचक्रा नगरी पूर्व की ओर बरेली के पास कुछ समय पूर्व प्रकाश में आई है, यहाँ सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। अत: इस सभ्यता का विस्तार पूर्व में बरेली तक हो जाता है। इस सभ्यता के प्रमुख स्थल पाकिस्तान के अंग बन गये थे। भारतीय पुरातत्ववेत्ताओं ने इसे एक चुनौती पूर्ण तथ्य माना एवं सम्पूर्ण भारत में व्यापक सर्वेक्षण किया गया। परिणामत: राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि में सिन्धु सभ्यता से जुड़े अनेक स्थलों को खोज निकाला। राजस्थान में कालीबंगा (गंगानगर जिला) प्रमुख स्थल है जहाँ बी.बी. लाल व बी.के. थापर के उत्खननों से बहुत सी महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हुई है। इस प्रकार आधुनिक उत्खननों से यह सिद्ध हो जाता है कि यह सभ्यता अत्यन्त सुविस्तृत सभ्यता थी। इस सभ्यता की उत्तरी सीमा पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित रहमान ढेरी तथा दक्षिणी सीमा गुजरात प्रान्त में स्थित भोगत्तार हैं। ये दोनों स्थल एक दूसरे से 1400 कि.मी. की दूरी पर हैं। इसी प्रकार पूरब में इसकी सीमा आलमगीरपुर (मेरठ) से सबसे पश्चिम में स्थित सुत्कागेन-डोर नामक स्थल की दूरी लगभग 1600 कि.मी. है।

सिंधु सभ्यता के विकास के चरण

नवपाषाण काल (5500-3500 ई.पू.)- इस काल में बलूचिस्तान और सिंधु के मैदानी भागों में स्थित मेहरगढ़ और किली गुल मुहम्मद जैसी बस्तियाँ उभरीं। खेती की शुरूआत हुई, स्थायी गाँव बसे।

पूर्व हड़प्पा काल (35002600 ई.पू.)- ताँबा, चाक एवं हल का प्रयोग हुआ। अन्नागारों का निर्माण हुआ। ऊंची-ऊँची दीवारें बनीं। सुदूर व्यापार की शुरूआत हुई।

पूर्ण विकसित हड़प्पा युग (2600-1800 ई.पू.)- सम्पूर्ण विकसित क्षेत्र 12,99,600 वर्ग कि.मी. था। यह पूरब से पश्चिम 1600 कि.मी. एवं उत्तर से दक्षिण 1400 कि.मी. था। हड़प्पा सभ्यता से संबद्ध लगभग 1400 स्थल प्रकाश में आए हैं। इनमें लगभग 6 अथवा 7 स्थलों को नगर का दर्जा दिया जाता हैं। उत्तरी क्षेत्र जम्मू में मांडा, दक्षिण में दैमाबाद, पश्चिम में सुत्कागेडोर और 3 पूरब में आलमगीरपुर इसकी सीमा है। इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान और भारत के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, उ.प्र. सीमांत, बहावलपुर, राजस्थान, हरियाणा, गंगा-यमुना में दोआब, जम्मू, गुजरात और उत्तरी अफगानिस्तान से प्राप्त हुए हैं।

  1. सिंध- मोहनजोदड़ो चांहुदड़ो, जुडेरजोदड़ो, आमरी, कोटदीजी, अलीमुराद।
  2. पंजाब- हड़प्पा, रोपड, बारा, संघोल।
  3. हरियाणा- राखीगढ़ी, मिताथल, बनवाली।
  4. राजस्थान- कालीबंगा।
  5. जम्मू- मांडा।
  6. गंगा-यमुना, दोआब- आलमगीरपुर, हुलास।
  7. गुजरात- देशलपुर, सुरकोटड़ा, धौलावीरा (कच्छ प्रदेश) काठियावाड्-रंगपुर, रोजदी, लोथल, मालवण (सूरत) भगवतरव।
  8. बलूचिस्तान- सुत्कागेडोर, सुतकाकोह, बालाकोट, डाबरकोट, राणां घुंड।
  9. बहावलपुर- कुडवालाथेर।
  10. अफगानिस्तान- शोर्तुघई।
  11. उ. प्र. सीमाप्रांत।
  12. गोमल घाटी- रहमान ढेरी।

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