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केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण Central Electricity Authority – CEA – Vivace Panorama

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण Central Electricity Authority – CEA

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (के.वि.प्रा.) विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 70 द्वारा प्रतिस्थापित निरसित विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम, 1948 की धारा(1) के अधीन मूल रूप से गठित एक संविधिक संगठन है। इसकी स्थापना वर्ष 1951 में अंशकालिक निकाय के रूप में की गई थी और वर्ष 1975 में इसे पूर्णकालिक निकाय बनाया गया।

संगठन

  • धारा-70 के अंतर्गत प्राधिकरण में 14 सदस्यसे अधिक नहीं होंगे (इसमें अध्यक्ष भी शामिल है) जिसमें से केंद्र सरकार द्वारा चयनित 8 सदस्य पूर्णकालिक होंगे।
  • केंद्र सरकार किसी व्यक्ति को, जो प्राधिकरण का सदस्य चुने जाने के लिए अर्ह है, प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर सकती है या एक पूर्णकालिक सदस्य की प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में पदनामित कर सकती है।
  • प्राधिकरण के सदस्यों को योग्य, समन्वित एवं अभियांत्रिकी, वित्त, वाणिज्य, अर्थशास्त्र या औद्योगिकीय मामलों से सम्बद्ध कठिनाइयों से निपटने का अनुभव एवं क्षमता रखने वाले व्यक्तियों में से चुना जाएगा, और कम से कम एक सदस्य को निम्न प्रत्येक श्रेणियों में से चुना जाएगा, नामत-
  1. अभिकल्प, विनिर्माण, संचालन एवंस्टेशन सृजन का प्रबंधन में विशेषज्ञता के साथ अभियांत्रिकी
  2. विद्युत पारेषण एवं वितरण की विशेषज्ञता सहित अभियांत्रिकी
  3. विद्युत के क्षेत्र में अनुप्रयोगात्मक अनुसंधान
  4. अनुप्रयोगात्मक अर्थशास्त्र, लेखकन, वाणिज्य या वित्त
  • प्राधिकरण का अध्यक्ष एवं सभी सदस्य केंद्र सरकार के प्रसादपर्यंत पद पर बने रहेंगे।
  • अध्यक्ष प्राधिकरण का मुख्य कार्यकारी होगा।
  • प्राधिकरण का मुख्यालय दिल्ली में होगा।

सभी तकनीकी एवं आर्थिक मामलों में, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ऊर्जा मंत्रालय की सहायता करता है। इस प्राधिकरण का अध्यक्ष भारत सरकार का सचिव भी होता है और अन्य 6 पूर्णकालिक सदस्य भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव भी होते हैं। इन्हें सदस्य (थर्मल), सदस्य (हाइड्रो), सदस्य (आर्थिक एवं वाणिज्य), सदस्य (ऊर्जा तंत्र), सदस्य (नियोजन) एवं सदस्य (ग्रिड संचालन एवं वितरण) के तौर पर पदनामित किया जाता है।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के कार्य एवं कर्तव्य विद्युत् अधिनियम, 2003 की धारा 73 के अधीन वर्णित है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण को अधिनियम की धाराओं 3, 7, 8, 53, 55 और 177 के अधीन भी कई अन्य कार्यों का निर्वहन करना होता है।

प्राधिकरण के कृत्य एवं कर्तव्य

  • अल्पावधिक और संदर्शी योजना तैयार करना और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के हित में सहायक होने के लिए संसाधनों के इष्टतम उपयोग हेतु योजना एजेंसियों के कार्यकलापों का समन्वय करना तथा उपभोक्ताओं को राष्ट्रीय विद्युत् नीति से संबंधित मामलों पर केन्द्रीय सरकार को सुझाव देना, विद्युत प्रणाली के विकास के लिए विश्वसनीय और वहनीय विद्युत प्रदान करना।
  • विद्युतीय संयंत्रों, विद्युत लाइनों और ग्रिड से संपर्क के निर्माण के लिए तकनीकी मानक निर्दिष्ट करना
  • विद्युतीय संयंत्रों और विद्युत लाइनों के निर्माण, प्रचालन और अनुरक्षण के लिए सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं निर्दिष्ट करना
  • पारेषण लाइनों के प्रचालन और अनुरक्षण के लिए ग्रिड मानक निर्दिष्ट करना के लिए शर्ते निर्दिष्ट करना
  • विद्युत प्रणाली सुधारने और वृद्धि करने के लिए स्कीमों और परियोजनाओं को समय पर पूरा करने को बढ़ावा देना और सहायता करना
  • विद्युत उद्योग में संलग्न व्यक्तियों की कुशलता बढ़ाने के लिए उपायों का संवर्द्धन करना
  • ऐसे किसी विषय, जिस पर सुझाव मांगा जाता है, पर केंद्रीय सरकार को सुझाव देना अथवा किसी विषय पर उस सरकार को सिफारिशें करना। अगर प्राधिकरण की राय में सिफारिशें विद्युत के उत्पादन, पारेषण, व्यापार, वितरण और उपयोग सुधारने में सहायता करेंगी।
  • विद्युत के उत्पादन, पारेषण, व्यापार, वितरण और उपयोग से सम्बंधित रिकॉर्ड और आंकड़े एकत्रित करना तथा लागत, क्षमता प्रतिस्पर्द्धात्मकता और ऐसे ही मामलों से संबंधित अध्ययन करना
  • अधिनियम के अधीन प्राप्त सूचना को समय-समय पर सार्वजनिक करना और रिपोर्ट तथा जांच के प्रकाशन की व्यवस्था करना
  • विद्युत के उत्पादन, पारेषण, वितरण और व्यापार को प्रभावित करने वाले विषयों में अनुसंधान का संवर्द्धन करना
  • विद्युत का उत्पादन करने अथवा पारेषण करने अथवा वितरण करने के प्रयोजनार्थ कोई जांच करना अथवा कराना
  • ऐसे विषयों पर किसी राज्य सरकार, लाइसेंसधारियों अथवा उत्पादक कंपनियों को सुझाव देना, जो उन्हें एक सुधरे हुए तरीके से विद्युत प्रणाली को अपने स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन रखते हुए प्रचालित और अनुरक्षित करने में समर्थ बनाएगा और जहां आवश्यक हो दूसरी विद्युत प्रणाली का स्वामित्व अथवा नियंत्रण रखने वाली किसी अन्य सरकार, लाइसेंसधारी या उत्पादक कंपनी के साथ समन्वय करना
  • विद्युत के उत्पादन, पारेषण और वितरण से संबंधित सभी तकनीकी विषयों पर उपयुक्त सरकार और उपयुक्त आयोग को सुझाव देना
  • इस अधिनियम के अधीन प्रदान किए जाने वाले ऐसे अन्य कायों का निर्वहन

विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण

विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण सांविधिक निकाय है जिसे नियम्कीय आयोग और अधिनिर्णय अधिकारी के आदेशों के विरुद्ध मामलों की सुनवाई के उद्देश्य हेतु गठित किया गया। इसका गठन केंद्र सरकार द्वारा विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 110 के तहत् 7 अप्रैल, 2004 को किया गया। इसका मुख्यालय दिल्ली में है। गौरतलब है कि विद्युत अधिनियम 2003 के प्रावधान 10 जून, 2003 से प्रभावी हो गए हैं। बिजली अधिनियम, 2003 के लागू होने से भारतीय बिजली अधिनियम, 1910, बिजली (आपूर्ति) अधिनियर्म, 1948 तथा बिजली नियामक आयोग अधिनियम, 1988 निरस्त हो गए हैं। बिजली अधिनियम 2003 जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर समस्त भारत एवं संघ राज्य क्षेत्रों पर लागू होगा।


विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा-110 के अंतर्गत विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण पूरे भारत में अधिनिर्णय अधिकारी या केंद्रीय विनियामक आयोगों या राज्य विनियामक आयोगों/न्यायिक अधिकरणों या संयुक्त आयोगों के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई हेतु स्थापित किए जाएंगे।

न्यायाधिकरण को विद्युत अधिनियम की धारा-121 के तहत् सुनवाई का वास्तविक अधिकार-क्षेत्र सौंपा गया है और सभी आयोगों को उनके संविधिक कृत्यों के निर्वहन हेतु निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है।

विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण में एक अध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होंगे।

प्रत्येक न्यायपीठ (बेंच) का गठन अध्यक्ष द्वारा किया जाएगा जिसमें कम से कम एक विधि विशेषज्ञ सदस्य और एक तकनीकी सदस्य होगा।

अपीलीय न्यायाधिकरण की शक्तियां एवं कृत्य

  • न्यायाधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं द्वारा सीमित नहीं होगा अपितु प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होगा और इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के तहत् होगा। न्यायाधिकरण को अपनी प्रक्रियाओं को नियमित करने की शक्ति होगी।
  • न्यायाधिकरण इस अधिनियम (विद्युत अधिनियम, 2003) के अधीन अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेगा।
  • इसे कोई अन्य मामला केंद्र सरकार द्वारा सौंपा जा सकता है।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा जारी किया गया कोई आदेश दीवानी न्यायालय की डिक्री के समान होगा और इस उद्देश्य हेतु अपीलीय न्यायाधिकरण को एक दीवानी न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी।
  • उपधारा-(3) में किसी बात के होते हुए भी, अपीलीय न्यायाधिकरण स्थानीय अधिकार क्षेत्र वाले दीवानी न्यायालय को अपने आदेश को हस्तांतरित कर सकेगा और वह दीवानी न्यायालय इस आदेश को इस प्रकार कार्यान्वित करेगा जैसाकि यह उसके द्वारा जारी डिक्री हो।
  • अपीलीय न्यायाधिकरण के सम्मुख सभी कार्रवाइयां भारतीय पैनल कोड के अर्थों के तहत् न्यायिक प्रक्रियाएं मानी जाएंगी और अपीलीय न्यायाधिकरण को अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा-345 और 346 के उद्देश्य हेतु दीवानी न्यायालय समझा जाएगा।
  • कोई व्यक्ति जो अपीलीय न्यायाधिकरण के किसी निर्णय से सहमत नहीं है, अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा उसे दिए गए निर्णय या आदेश के 60 दिनों के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकेगा।

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