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कोशिका – एक सूक्ष्म रासायनिक फैक्ट्री The Cell – A Microscopic Chemical Factory – Vivace Panorama

कोशिका – एक सूक्ष्म रासायनिक फैक्ट्री The Cell – A Microscopic Chemical Factory

श्लाइडेन (Matthias Schleiden) एवं श्वान (Theodor Schwan) के कोशामत (Cell Theory, 1838) के अनुसार, प्रत्येक जीव-शरीर का सजीव पदार्थ अर्थात जिन द्रव्य (Protoplasm) की एक या अनेक कोशारुपी इकाइयों और इनके उत्पादों (cell-products) का बना होता है। अतः उपापचय (metabolism) का क्रियाक्षेत्र इन कोशिकाओं इन कोशिकाओं का कोशाद्रव्य (cytoplasm) ही होता है और यही जैव शक्ति या उर्जा बनती है\ इस प्रकार कोशाएं शरीर की रचनात्मक ही नहीं, वरन क्रियात्मक इकाइयां (structural and physical units) भी होती हैं।

निरंतर सक्रीय उपापचय के कारन ही प्रत्येक कोशा की उपमा एक सूक्ष्म रासायनिक फैक्ट्री से देते हैं, जिसमे जैव शक्ति या जीवन (Life) का उत्पादन होता है। इस फैक्ट्री में निरंतर खपने वाला कच्चा माल (Raw Meterial) होता है। भोजन से लिए गए पोषक पदार्थ (nutrients) तथा वायु या जल से ली गयो ऑक्सीजन (O2) और इनमें बन्ने वाले निरर्थक उपजत पदार्थ (by products) होते हैं- कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), जल एवं नाइट्रोजन युक्त पदार्थ।

अपनी अविरल क्रियाशीलता के अनुकूल, कोशिका एक ऐसे खुले रासायनिक तंत्र (open chemical system) के रूप में होती है, जो अपने चारों ओर के वातावरण से ही निरंतर रासायनिक लेन-देन करके अपना उपापचय (Metabolism) चलाती है। इसी वातावरण से कोशिका पोषक पदार्थ और ऑक्सीजन (O2) ग्रहण करती है तथा इसी में कार्बन डाइऑक्साइड, जल एवं नाइट्रोजन युक उपजत पदार्थों का विसर्जन करती है। स्पष्ट है कि कोशिकाओं के चरों ओर का यह वातावरण आवश्यक रूप से एक ऐसा जलीय तरल होना चाहिए, जिसमें उपर्युक्त विविध पदार्थ घुले रहते हों। यही कारन है कि निम्न श्रेणीओं के जंतु (प्रोटोजोआ, स्पंज, निडेरिया आदि) जल के वासी होते हैं। उद्विकास (evolution) में जब बहुकोशिकीय जंतुओं में जब शरीर बड़ा और जटिल होने लगा, टो इन्होंने इस बहरी जलीय वातावरण को शरीर में बंद करके इसे शरीर का अन्तः वातावरण बना लिया। शरीर की प्रत्येक के बाहर यही तरल होता है। इसलिए इसे वाह्यकोशीय द्रव्य (extracellular or interstitial fluid-E.C.F.) कहते हैं। अनुमानतः एक व्यस्क मानव शरीर का 56% भाग तरल होता है, जिसका दो तिहाई कोशिकाओं के बाहर वाह्य कोशीय द्रव्य के रूप में होता है, क्योंकि मेटाज़ोआ का जैव विकास प्रारंभ में प्रीकैम्ब्रियन सागर (Precambrian ocean) में हुआ, इनके वाह्यकोशीय द्रव्य का रासायनिक संयोजन भी लगभग वैसा ही था जैसा कि इस सागर के जल का था।

रुधिर एवं लसिका तंत्र (lymphatic system) रासायनिक लें-देन के लिए वाह्य कोशीय द्रव्य का पूर्ण शरीर में संवहन करते और इसे बहरी वातावरण से भी जोड़ते हैं। इसलिए रुधिर एवं लसिका का रासायनिक संयोजन भी लहभग वाह्य कोशीय द्रव के समान ही होता है। बस इनमें प्रोटीन की मात्र अधिक होती है। वाह्यकोशीय द्रव में सोडियम आयनों (Na+) का तथा कोशाद्रव्य में पोटैशियम (K+) अयनों की अधिक मात्रा रहती है।

वाह्यकोशीय द्रव के विपरीत, कोशों के स्वयं के भीतरी वातावरण, अर्थात अन्तःकोशीय द्रव या कोशा द्रव (Cytoplasm) रासायनिक संयोजन मेँ प्रोटीन्स और पोटैशियम फास्फेट की मात्रा सर्वाधिक होती है। इनके अतिरिक्त इनमे मैग्नीशियम के फास्फेट्स एवं सल्फेट्स भी होते हैं, परन्तु सोडियम लावन बहुत कम होते हैं और बाहरी कैल्सियम बिलकुल नहीं होता है। कोशों के भीतरी और बाहरी वातावरणों के रासायनिक संयोजन में उपर्युक्त महत्वपूर्ण अंतर होते हुए भी ये समवलीय (Isotonic) तरल होते हैं, अर्थात इनमे घोलक (solvent-जल) और घुले हुए पदार्थों (solutes) की अनुपातिक मात्रा समान होती है। ऐसी अवस्था को परासरणी संतुलन कहा जाता है (osmotic equilibrium) कहते हैं।

प्रत्येक कोशिका के चारों ओर एक अत्यधिक महीन कोशिका कला (cell membrane) का आवरण होता है। अतः कोशा के कोशाद्रव्य और वाह्यकोशीय द्रव्य के बीच रासायनिक लेन-देन कोशिकाकला के आर-पार ही होता है।

इस प्रकार कोशिका एक पृथक रचनात्मक इकाई बनाये रखने के अतिरिक्त, कोशिकाकला इसके रासायनिक लेन-देन को इसके उपापचय के अनुकूल नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण कार्य भी करती है।


सोडियम पोटैशियम पम्प Sodium-Potassium Pump

सोडियम पोटैशियम पम्प कोशिकाओं के चेष्ट परिवहन (Active Transport) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। वाह्य कोशीय द्रव में सोडियम आयनों का (Na+) का तथा कोशा द्रव्य में पोटैशियम आयनों (K+) की अधिकता रहती है। कोशिका कला (cell membrane)  इन दोनों प्रकार के अयनों के लिए पारगम्य (permeable)  होती है, कुछ सोडियम आयन बाहर से कोशों में घुसते रहते हैं और कुछ पोटैशियम आयन कोशों से बाहर निकलते रहते हैं। अतः वाह्य कोशीय द्रव और कोशा द्रव में आयनों का प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने के किए कोशाओं को, विसरण के सिद्धांत के विपरीत सोडियम आयनों को बाहर निकालना और पोटैशियम आयनों को बाहर से ग्रहण करते रहना पड़ता है। इसी को कोशों का सोडियम-पोटैशियम पम्प कहते हैं। यह कोशा कला में उपस्थित सोडियम-पोटैशियम एटपेस (Na+ K+ Atpase enzyme) नामक एंजाइम की सहायता से क्रियाशील रहता है। इस एंजाइम में एक ऐसा बंधक (Binding) भाग होता है, जो सोडियम आयनों को बाहर की ओर तथा पोटैशियम आयनों को भीतर की ओर ले जाता है। बाहर की ओर आने पर यह सोडियम आयनों के तीन आयनों को बांध लेता है, फिर भीतर की ओर जाने पर यह सोडियम के इन 3 आयनों का परित्याग करता है और बदले पोटैशियम के 2 आयनों को बंधता है जिसे कोशा द्रव्य में छोड़ देता है, और फिर बदले में सोडियम के 3 आयनों को बांध लेता है। इस प्रक्रिया में ए.टी.पी (ATP, Adenosine triphosphate) के रूप में, कोशाओं की उर्जा का व्यय होता है।

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