साइमन कमीशन Simon Commission

The Indian Statutory Commission or Simon Commission - 1919

वर्ष 1919 के एक्ट को पारित करते समय ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की थी कि वह दस वर्ष पश्चात् पुनः इन सुधारों की समीक्षा करेगी। किन्तु नवंबर 1927 में ही उसने आयोग की नियुक्ति की घोषणा कर दी, जिसका नाम भारतीय विधिक आयोग था। सर जॉन साइमन इसके अध्यक्ष तथा सभी सातों सदस्य श्वेत थे। कालांतर में सर जॉन साइमन के कारण इसे ‘साइमन आयोग' के नाम से ही जाना जाने लगा। इस आयोग को वर्तमान सरकारी व्यवस्था, शिक्षा के प्रसार तथा प्रतिनिधि संस्थाओं के अध्ययन के पश्चात यह रिपोर्ट देनी थी कि भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना कहां तक लाजिमी है तथा भारत इसके लिये कहां तक तैयार है। यद्यपि संवैधानिक सुधारों के संबंध में ब्रिटिश सरकार द्वारा अगला कदम 1929 में उठाया जाना था, किन्तु ब्रिटेन की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी कंजरवेटिव पार्टी, विपक्षी लेबर पार्टी से भयभीत थी तथा ब्रिटेन के सर्वाधिक बहुमूल्य उपनिवेश के भविष्य के प्रश्न को संभवतः सत्तारूढ़ होने वाली लेबर पार्टी के लिये नहीं छोड़ना चाहती थी। कंजरवेटिव या रूढ़िवादी दल के तत्कालीन सेक्रेटरी आफ स्टेट लार्ड बिरकनहेड का मानना था कि भारत के लोग, संवैधानिक सुधारों हेतु एक सुनिश्चित योजना बनाने में सक्षम हैं। फलतः इसीलिये उन्होंने साइमन कमीशन की नियुक्ति की।

साइमन कमीशन ने जो संस्तुतियां प्रस्तुत दी, (उन्हें 1930 में प्रकाशित किया गया।) उनमें सुझाव दिया गया था कि-

  1. प्रांतीय क्षेत्रों में कानून तथा व्यवस्था सहित सभी क्षेत्रों में उत्तरदायी सरकार-गठित की जाये।
  2. केंद्रीय विधान मण्डल का मण्डलों द्वारा अप्रत्यक्ष तरीके से चुने जायें।
  3. केंद्र में उत्तरदायी सरकार का गठन न किया जाये क्योंकि इसके लिये अभी उचित समय नहीं आया है।

भारत में साइमन कमीशन के विरुद्ध त्वरित तथा तीव्र जनारोष पैदा हो गया। भारतीय जनारोष का प्रमुख कारण किसी भी भारतीय को कमीशन का सदस्य न बनाया जाना तथा भारत में स्वशासन के संबंध में निर्णय, विदेशियों द्वारा किया  जाना था। चूंकि भारतवासी यह समझते थे कि भारत का संविधान भारतीयों को ही बनाना चाहिए, अतः कमीशन में किसी भी भारतीय सदस्य को न लिये जाने से उन्होंने यह अनुमान लगाया की अंग्रेज, भारतीयों को स्वशासन क्र योग्य नहीं समझते हैं।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन (दिसम्बर 1927) में एम.ए. अंसारी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘प्रत्येक स्तर एवं प्रत्येक स्वरूप' में साइमन कमीशन के बहिष्कार का निर्णय किया। इस बीच नेहरू के प्रयासों से अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित हो गया। किसान-मजदूर पार्टी, लिबरल फेडरेशन, हिन्दू मह्रासभा तथा मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के साथ मिलकर कमीशन के बहिष्कार की नीति अपनायी। जनकि पंजाब में संघवादियों (unionists) तथा दक्षिण भारत में जस्टिस पार्टी ने कमीशन का बहिष्कार न करने का निर्णय किया।

जन प्रतिक्रियाः 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन बंबई पहुंचा। इसके बंबई पहुंचते ही देश के सभी प्रमुख नगरों में हड़तालों एवं जुलूसों का आयोजन किया गया। जहां कहीं भी कमीशन गया, उसका स्वागत काले झंडों तथा ‘साइमन गो बैक' के नारों से किया गया। केंद्रीय विधानसभा ने भी साइमन का स्वागत करने से इंकार कर दिया।

साइमन कमीशन के विरुद्ध जनारोष का सबसे प्रमुख तथ्य यह था कि इसमें बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया तथा पहली बार राजनीतिक भागेदारी का अनुभव प्राप्त किया। युवाओं ने कमीशन के विरुद्ध किये जा रहे विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय भूमिका निभायी तथा उसे क्रांतिकारी स्वरूप प्रदान किया। युवाओं की समितियां एवं सभायें विभिन्न स्थानों पर सक्रिय रहीं। इसी चरण में जवाहर लाल नेहरू एवं सुभाषचंद्र बोस प्रमुख युवा राष्ट्रवादियों के रूप में उभरे। इन दोनों युवा राष्ट्रवादियों ने विभिन्न स्थानों पर सभाओं को संबोधित किया। युवाओं में विरोध प्रदर्शन की चेतना उभरने से मौलिक समजवादी विचारों के अंकुरण एवं विकास को उर्वर भूमि प्राप्त हुई जिसका प्रभाव पंजाब नौजवान सभा, मजदूर एवं किसान दल तथा हिन्दुस्तानी सेवा समिति (कर्नाटक) जैसे संगठनों में परिलक्षित हुआ।

पुलिस का दमनः पुलिस ने साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शनकारियों पर दमन का चक्र चलाया तथा कई स्थानों पर उसने लाठियां बरसायीं। यहां तक कि उसने वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं बख्शा। जवाहरलाल नेहरू तथा जी.बी. पंत को लखनऊ में बुरी तरह पीटा गया। लाहौर में प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय पर तो लाठियों के संघातिक प्रहार किये गये कि वे बुरी तरह जख्मी हो गये तथा 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गयी।

साइमन कमीशन की नियुक्ति का प्रभावः भारतीय राजनीति में साइमन कमीशन की नियुक्ति के प्रभाव को मुख्य दो रूपों में देखा जा सकता है-

  1. इसने मौलिक राष्ट्रवादी ताकतों को, जो पूर्ण स्वराज्य के साथ समाजवादी आधार पर सामाजिक-आर्थिक सुधारों की मांग कर रहीं थीं, और उत्तेजित कर दिया।
  2. इसने लार्ड बिरकनहैड की इस चुनौती को कि भारतीय सर्वसम्मत संविधान का निर्माण करके दिखाएं, मुहंतोड़ जवाब दिया। इससे, भारतीयों की इस अवसर पर असाधारण एकता प्रदर्शित हुई।

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