रेडियोसक्रियता Radioactivity

प्रकृति में पाये जाने वाले वे तत्व जो स्वतः विखंडित होकर कुछ अदृश्य किरणों का उत्सर्जन करते रहते हैं, रेडियोसक्रिय तत्व कहलाते हैं तथा यह घटना रेडियोसक्रियता कहलाती है। रेडियोसक्रिय तत्वों से निकलने वाली अदृश्य किरणें रेडियोसक्रिय किरणे कहलाती हैं ।

रेडियोसक्रियता की खोज (Discovery of Radioactivity): 1896 ई. में फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बेकरेल (Henery Becquerel) ने सर्वप्रथम रेडियोसक्रियता का पता लगाया। हेनरी बेकरेल ने पाया कि यूरेनियम तथा यूरेनियम लवणों से कुछ अदृश्य किरणे स्वतः उत्सर्जित होते हैं। प्रारम्भ में इन अदृश्य किरणों को बेकरेल किरणे (Becquerel Rays) कहा गया। 1898 ई० में मैडम क्यूरी (Madam Curie) तथा उनके पति पियरे क्यूरी (Pierre Curie) ने यह सुझाव दिया कि यूरेनियम और इसके यौगिकों से बेकरेल किरणों का निकलना एक परमाणुजनित क्रिया (Atomic Phenomenon) है और यह विशिष्ट गुण यूरेनियम की रासायनिक स्थिति या भौतिक अवस्था पर निर्भर नहीं करता है। 1898 ई० में ही मैडम क्यूरी एवं स्मीइट (schimidt) ने अन्य रेडियोसक्रिय पदार्थों की खोज के क्रम में बतलाया कि थोरियम धातु के तत्व में भी रेडियोसक्रियता पायी जाती है। 1902 ई० में मैडम क्यूरी तथा उनके पति पियरे क्यूरी ने पता लगाया कि यूरेनियम के खनिज पिच ब्लैंड (Pitch Blende) में यूरेनियम की अपेक्षा लगभग चार गुनी अधिक रेडियोसक्रियता उपलब्धता होती है। इससे स्पष्ट हुआ कि पिच ब्लैंड में यूरेनियम से भी अधिक रेडियोसक्रिय तत्व उपस्थित है। इस अनुमान के आधार पर इस वैज्ञानिक दम्पति ने अपने कठिन और जोखिम भरे अनुसंधान के फलस्वरूप 1903 ई० में पिच ब्लैंड से रेडियम (Radium) नामक एक अत्यंत रेडियोसक्रिय तत्व की खोज की। आज लगभग 40 प्राकृतिक रेडियोसक्रिय समस्थानिक एवं अनेक रेडियोसक्रिय तत्व ज्ञात हैं।

रेडियोसक्रियता के प्रकार: किसी तत्व के रेडियोसक्रिय परिवर्तन में परमाणु के नाभिक का विखंडन होता है। इसका कारण यह है कि रेडियोसक्रिय तत्वों के परमाणु अस्थायी होते हैं। ऐसे परमाणु के नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या अत्यधिक होती है।

रेडियोसक्रियता दो प्रकार की होती है- प्राकृतिक रेडियोसक्रियता तथा कृत्रिम रेडियोसक्रियता।

प्राकृतिक रेडियोसक्रियता (Natural Radioactivity): रेडियोसक्रिय तत्वों के परमाणु के नाभिक स्वतः विखंडित होकर अन्य तत्वों के परमाणुओं में परिवर्तित होते रहते हैं। यह क्रिया स्वाभाविक रूप से चलती रहती है तथा इसमें रेडियोसक्रिय किरणों का उत्सर्जन होता है, इसे प्राकृतिक रेडियोसक्रियता कहते हैं। उदाहरण के लिए- यूरेनियम, रेडियम, थोरियम आदि तत्वों का विखंडन स्वयं होता रहता है। अतः इन तत्वों में पायी जाने वाली रेडियोसक्रियता प्राकृतिक रेडियोसक्रियता कहलाती है।

92U23890Th234 91Pa23492U234 → ..............

कृत्रिम रेडियोसक्रियता (Artificial Radioactivity): कृत्रिम रेडियोसक्रियता वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई तत्व कृत्रिम तरीके से किसी ज्ञात तत्व के रेडियोसक्रिय समस्थानिक में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया में उस तत्व पर तीव्र वेग वाले कणों (प्रोट्रॉन, ड्यूट्रॉन, अल्फा कण आदि) से प्रहार किया जाता है। उदाहरण के लिए- मैग्नीशियम, जो एक स्थायी तत्व है, पर अल्फा कणों (2He4) से प्रहार करने पर एक अस्थायी और रेडियोसक्रिय तत्व सिलिकन (14Si27) बनता है तथा न्यूट्रॉन (0n1) मुक्त होता है, फिर यह 14Si27 स्वतः परिवर्तित होकर स्थायी ऐलुमिनियम में बदल जाता है।


12Mg24 (स्थायी) + 2He414Si27 (अस्थायी) + 0n113Al27 + +1e0 (पॉजीट्रॉन)

रेडियोसक्रिय किरणे (Radioactive Rays): रेडियोसक्रिय पदार्थों से निकलने वाली अदृश्य किरणों को रेडियोसक्रिय किरणे (Radioactive Rays) कहते हैं। रेडियोसक्रिय पदार्थों से निकलने वाली इन किरणों को रदरफोर्ड ने 1902 ई० में चुम्बकीय तथा विद्युत् क्षेत्र से प्रवाहित करके पाया कि कुछ किरणे विद्युत् क्षेत्र के ऋण ध्रुव की ओर और कुछ किरणें विद्युत् क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं तथा अन्य किरणों पर चुम्बकीय एवं विद्युत् क्षेत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और ये सीधे गमन करती हुई निकल जाती हैं। रदरफोर्ड ने इन किरणों को क्रमशः अल्फा-किरण (α-rays), बीटा किरण (β-rays) तथा गामा-किरण (γ-rays), कहा।

रेडियोसक्रिय किरणों के गुण

(a) अल्फा (α) किरणों के गुण

  1. ये किरणे अति सूक्ष्म धन आवेशित कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत् क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणे विद्युत् क्षेत्र के ऋण ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।
  2. प्रयोग के आधार पर यह पाया गया है कि α-कण वस्तुतः द्विआवेशयुक्त हीलियम आयन (He++) हैं। इनकी मात्रा हाइड्रोजन परमाणु की मात्रा से चार गुनी अधिक होती है।
  3. ये कण अत्यंत तीव्र वेग से रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से बाहर निकलते हैं। इसका वेग प्रकाश के वेग का लगभग 1/10 भाग होता है।
  4. इन कणों का द्रव्यमान अधिक होने के कारण इनकी गतिज ऊर्जा अधिक होती है।
  5. इन किरणों को किसी गैस से होकर प्रवाहित करने पर ये आयनित कर देती हैं।
  6. अधिक द्रव्यमान होने के कारण इन किरणों की वेधन क्षमता (penetrating power) कम होती है। 0.1 मिमी० मोटी ऐलुमिनियम की एक पतर इन्हें रोक सकती है।
  7. ये किरणे फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं तथा जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लैटिनोसायनाइड में स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) उत्पन्न करती है।
  8. ये किरणे जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट कर देती हैं।

(b) बीटा (β) किरणों के गुण

  1. ये किरणे ऋण आवेशयुक्त अत्यंत सूक्ष्म कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत् क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणे विद्युत् क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।
  2. इन कणों के लिए आवेश और द्रव्यमान का अनुपात e/m कैथोड किरणों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के समान होता है। अतः ये किरणे इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह हैं।
  3. इन किरणों का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान का 1/1840 होता है।
  4. इन कणों का वेग प्रकाश के वेग का लगभग 9/10 वाँ भाग होता है अर्थात् इनका वेग α-कण के वेग का नौ गुना होता है।
  5. इनकी गतिज ऊर्जा α-कणों से बहुत कम होती है, क्योंकि इनका द्रव्यमान कम होता है।
  6. कम गतिज ऊर्जा के कारण इनकी आयनन क्षमता α-कणों की अपेक्षा कम होती है।
  7. उच्च वेग और कम द्रव्यमान होने के कारण इनकी भेदन क्षमता (Penetrating Power) α-कणों से 100 गुनी अधिक होती है। इनको रोकने के लिए 0.01 मीटर मोटी ऐलुमिनियम की चादर आवश्यक होती है।
  8. ये किरणे फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं तथा जिंक सल्फाइड एवं बेरियम प्लेटिनोसायनाइड में स्फुरदीप्ति उत्पन्न करती है।
  9. इनकी गतिज ऊर्जा कम होने के कारण इन किरणों में जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लैटिनोसायनाइड जैसे लवणों में स्फुरदीप्ति उत्पन्न करने की क्षमता नहीं के बराबर होती है।
  10. किसी विद्युत् क्षेत्र से होकर गुजरने पर ये धन-ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं, किन्तु α-किरणों की अपेक्षा इनका विचलन अधिक होता है।
  11. इन किरणों में जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट करने की क्षमता होती है।

(c) गामा (γ) किरणों के गुण

  1. ये किरणे विद्युततः उदासीन होती हैं। इस कारण विद्युत् क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणे विचलित नहीं होती हैं।
  2. ये किरणे अति लघु तरंगदैर्घ्य वाली विद्युत् चुम्बकीय तरंग है। ये किरणें कणों की नहीं बनी होती हैं।
  3. इनका वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर होता है।
  4. इनकी मात्रा शून्य होती है। अतः गामा किरणे अद्रव्य (Non Material) प्रकृति वाली होती है।
  5. अति उच्च वेग से गतिशील होने के कारण गामा किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating Power) α और β किरणों की तुलना में सबसे अधिक होती है।
  6. इन किरणों का द्रव्यमान नहीं के बराबर होने के कारण इनका फोटोग्राफिक प्लेट एवं जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लैटिनोसायनाइड पर प्रभाव बहुत कम पड़ता है।
  7. इन किरणों में जीव-कोशिकाओं को नष्ट करने की शक्ति होती है।
  8. गतिज ऊर्जा का मान बहुत कम होने के कारण इन किरणों में गैसों को आयनित करने की क्षमता बहुत कम होती है।

रेडियोसक्रिय विखंडन (Radioactive Disintegration): रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से रेडियोसक्रिय तत्वों के स्वतः उत्सर्जन की प्रक्रिया को रेडियोसक्रिय विखंडन या रेडियो सक्रिय क्षय (Radioactive Decay) कहा जाता है। चूँकि यह क्रिया स्वाभाविक रूप से स्वतः होती है, अतः इसे प्राकृतिक विखण्डन (Natural Disintegration) भी कहते हैं। इस क्रिया में α, β और γ किरणों का उत्सर्जन होता है।

1913 ई. में सॉडी (Soddy), फॉजान्स (Fajans) तथा रदरफोर्ड (Rutherford) ने रेडियोसक्रिय विखंडन से संबंधित सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार-

  1. रेडियोसक्रिय तत्वों के परमाणु अस्थायी होते हैं, जो स्वतः विखंडित होकर नये तत्वों में परिवर्तित होते रहते हैं।
  2. α-कण और β-कण रेडियोसक्रिय तत्व के परमाणु के नाभिक से उत्पन्न होते हैं।
  3. रेडियोसक्रिय परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं-

(a) α-परिवर्तन: α-कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को α-परिवर्तन कहते हैं।

(b) β-परिवर्तन: β-कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को p-परिवर्तन कहते हैं।

किसी परमाणु के नाभिक में से एक α-कण के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु का द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 कम हो जाता है और परमाणु संख्या 2 कम हो जाती है।

      (रेडियम) 88Ra226  \xrightarrow [ ]{ -\alpha }  86Rn224 (रेडॉन)

इसी प्रकार, किसी परमाणु के नाभिक में से एक β-कण के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु का द्रव्यमान वही रहता है, जो मूल परमाणु का है, लेकिन परमाणु संख्या में 1 की वृद्धि हो जाती है।

(रेडियम) 88Ra228  \xrightarrow [ ]{ -\beta }  89Ac228 (रेडॉन)

90Th234  \xrightarrow [ ]{ -\beta }  91Pa224

किसी परमाणु के नाभिक में से एक α-कण तथा दो β-कणों के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु की परमाणु संख्या वही रहती है जो मूल परमाणु की है, लेकिन इसका परमाणु द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 इकाई कम हो जाता है। अर्थात् मूल परमाणु और नए परमाणु दोनों एक दूसरे के समस्थानिक (Isotopes) होते हैं।

किसी रेडियोसक्रिय तत्व परमाणु के नाभिक से एक α-कण के उत्सर्जन से प्राप्त होने वाले नये तत्व का आधुनिक आवर्त सारणी में स्थान जनक तत्व के स्थान से दो समूह बायीं ओर चला जाता है, वहीं β कण के उत्सर्जन से प्राप्त होने वाले नए तत्व का आधुनिक आवर्त सारणी में स्थान जनक तत्व के स्थान से एक समूह दायीं ओर चला जाता है। इस नियम को ही समूह विस्थापन का नियम (Group Displacement Law) कहते हैं।

अर्द्धआयु काल (Half Life Period): वह समयांतराल जिसमें किसी रेडियोसक्रिय तत्व में उपस्थित परमाणुओं की संख्या विखंडित होकर प्रारंभिक संख्या की आधी हो जाती है, उस तत्व की अर्द्धआयु काल कहलाता है। दूसरे शब्दों में, किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ की सक्रियता उसकी प्रारंभिक सक्रियता से ठीक आधी हो जाने में जितना समय लगता है, उसे उस पदार्थ की अर्द्धआयु (Half Life) कहते हैं। रेडियोसक्रिय पदार्थ की अर्द्धआयु कुछ सेकण्डों से लेकर लाखों वर्षों तक हो सकती है। उदाहरण के लिए, पोलोनियम के एक समस्थानिक (84Po214) की अर्द्धआयु 10-4 सेकण्ड होती है, जबकि यूरेनियम के समस्थानिक की अर्द्धआयु 4.5 × 109 वर्ष होती है। रेडियोसक्रिय पदार्थ की अर्द्धआयु को किसी भी परिवर्तन द्वारा बदला नहीं जा सकता है, यह हमेशा एकसमान रहता है। किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ की अर्द्धआयु उसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है।

किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ की अर्द्धआयु काल (t1/2) का इसके विखंडन स्थिरांक (λ) के साथ निम्नलिखित संबंध होता है-

{ t }_{ 1/2 }\quad =\quad \frac { 0.693 }{ \lambda }

औसत आयु (Average Life): विखंडन स्थिरांक के व्युत्क्रम। की रेडियोसक्रिय पदार्थ की औसत आयु कहते हैं। अर्थात्, औसत आयु,

 (T)=\frac { 1 }{ \lambda }

औसत आयु तथा अर्द्धआयु में संबंध:

औसत आयु = अर्द्ध आयु / 0.693

रेडियोसक्रियता की इकाई (Unit of Radioactivity): रेडियोसक्रियता की इकाई को क्यूरी (Curie) कहते हैं। किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ का वह परिमाण जिसमें प्रति सेकण्ड 3.70 × 1010 विखंडन होते हैं, क्यूरी कहलाता है।

अर्थात् एक क्यूरी = 3.70 × 1010 विखंडन प्रति सेकण्ड

रेडियो आइसोटोप डेटिंग (Radio Isotope Dating): किसी रेडियोसक्रिय समस्थानिक की मात्रा का किसी पत्थर के नमूने, काष्ठ या जैव अवशेष में मापन करके उनके आयु का निर्धारण करना रेडियो आइसोटोप डेटिंग (Radioisotope dating) कहलाता है।

कार्बन डेटिंग (Carbon Dating) रेडियो आइसोटोप डेटिंग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। कार्बन डेटिंग के द्वारा जीवाश्मों, मृत पेड़-पौधों आदि की आयु का अंकन किया जाता है। निर्जीव वस्तुओं जैसे-पृथ्वी, पुरानी चट्टानों आदि की आयु ज्ञात करने के लिए यूरेनियम का प्रयोग किया जाता है। इसे यूरेनियम द्वारा आयु अंकन (Dating by Uranium) कहते हैं। अधिक पुरानी चट्टानों के लिए पोटैशियम-ऑर्गन डेटिंग विधि भी अधिक उपयुक्त सिद्ध हुई है। मृत पेड़-पौधों और जानवरों का आयु निर्धारण उनमें 6C14 और 6C12 का अनुपात ज्ञात करके किया जाता है।

रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता (Applications of Radio isotopes): वर्तमान समय में रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता काफी बढ़ गई है एवं इनका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है। रेडियोसक्रिय समस्थानिकों के कुछ प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं-

  1. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग मृत पेड़-पौधों, जानवरों तथा पत्थर के पुराने नमूने की आयु ज्ञात करने में किया जाता है। इस विधि को रेडियो आइसोटोप डेटिंग कहते हैं।
  2. रेडियो समस्थानिकों का उपयोग औषधियों में ट्रेसर (Tracer) के रूप में किया जाता है। इस विधि द्वारा मानव शरीर में किसी प्रकार के ट्यूमर का पता लगाया जाता है।
  3. जमीन के अंदर बिछाई गई जल पाइप नालियों, गैस पाइप नालियों तथा तेल पाइप नालियों में किसी प्रकार के छेद या रिसाव का पता लगाने के लिए रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग होता है।
  4. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग पौधों में उर्वरकों की क्रिया जानने में किया जाता है।
  5. रासायनिक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि निधरिण में रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है।
  6. कैंसर जैसे अनेक रोगों से ग्रस्त कोशिकाओं (Cells) को नष्ट करने में रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ, कोबाल्ट के समस्थानिक 27Co60 का उपयोग कैसर के इलाज में तथा मस्तिष्क में विकसित होने वाली ट्यूमर (Tumor) को नष्ट करने में किया जाता है ।
  7. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग पाचन तंत्र का अध्ययन करने में भी किया जाता है।
  8. रेडियोसक्रिय सोडयम का उपयोग रुधिर परिसंचरण तंत्र में उत्पन्न किसी प्रकार के विकार को ज्ञात करने में किया जाता है।
  9. रेडियोसक्रिय आयोडीन का उपयोग थायरॉइड ग्रंथि में उत्पन्न विकार ज्ञात करने में किया जाता है।
  10. रेडियोसक्रिय फॉस्फोरस का उपयोग अस्थि रोगों के इलाज में होता है।
  11. रेडियोसक्रिय सोडियम के द्वारा शरीर में रक्त प्रवाह का वेग मापा जाता है।
  12. रेडियोसक्रिय लोहा का उपयोग एनीमिया (अरक्तता) रोग ज्ञात करने में होता है।
  13. रेडियोसक्रिय यूरेनियम (92U238) का उपयोग पृथ्वी की आयु निर्धारण में किया जाता है।
  14. कम क्रियाशील रेडियोसक्रिय किरणों का उपयोग अनाज, फल, सब्जियों आदि के रोगाणुनाशन (Disinfection) में किया जाता है।

नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy): किसी रेडियोसक्रिय तत्व के नाभिक में होने वाले परिवर्तनों के दौरान नाभिक के द्रव्यमान में होने वाली क्षति का उर्जा में परिवर्तन के परिणामस्वरूप प्राप्त ऊर्जा की विपुल राशि नाभिकीय ऊर्जा कहलाती है।

नाभिकीय ऊर्जा के दो स्रोत हैं-

  1. नाभिकीय विखण्डन: वह नाभिकीय अभिक्रिया जिसके फलस्वरूप एक भारी नाभिक विखंडित होकर दो हल्के नाभिकों में परिवर्तित हो जाता है तथा ऊर्जा की एक विशाल राशि विमुक्त होती है, नाभिकीय विखण्डन कहलाती हैं।

1939 ई. में जर्मन वैज्ञानिक ऑटोहान (Otto Hahn) स्ट्रॉसमान (Strassmann) ने बताया कि 92U235 के नाभिक पर मंद वेग वाले न्यूट्रॉन से प्रहार करने पर यूरेनियम का नाभिक टूटकर 56Ba141 तथा 36Kr92 में बदल जाता है। इस प्रक्रिया में तीन अन्य न्यूट्रॉन भी उत्पन्न होते हैं तथा ऊर्जा की एक विशाल राशि विमुक्त होती है।

92U235 + 0n1 56Ba141 + 30n1 + उर्जा

नाभिकीय विखंडन प्रक्रिया में नाभिक के द्रव्यमान में कुछ क्षति होती है। द्रव्यमान की यह क्षति आइन्सटीन के समीकरण E = mc2 (E = ऊर्जा, rn द्रव्यमान में क्षति, C = प्रकाश का वेग) के अनुसार ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया में उत्सर्जित न्यूट्रॉनों में से कुछ न्यूट्रॉन अन्य यूरेनियम नाभिकों पर प्रहार करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रारम्भिक प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। इस प्रकार एक श्रृंखला प्रक्रिया (Chain Process) प्रारंभ हो जाती है और ऊर्जा की अपार राशि विमुक्त होती है। परमाणु बम (Atom Bomb) के विस्फोट में यही श्रृंखला प्रक्रिया तेजी से होती है। इस प्रक्रिया को नाभिकीय रिएक्टरों (Nuclear Reactor) में नियंत्रित ढंग से सम्पन्न कराकर प्राप्त ऊर्जा का उपयोग शांतिपूर्ण एवं रचनात्मक कार्यों में किया जाता है।

  1. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion): वह नाभिकीय अभिक्रिया जिसके फलस्वरूप दी हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी और स्थायी नाभिक का निर्माण करते हैं, नाभिकीय संलयन कहलाती है।

नाभिकीय संलयन प्रक्रिया में द्रव्यमान की सदैव क्षति होती है, जो आइन्सटीन समीकरण E = mc2 के अनुसार ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। यही कारण है कि इस प्रक्रिया में अपार ऊर्जा विमुक्त होती है, साथ ही इस प्रक्रिया के प्रारंभ हो जाने पर इसमें विमुक्त ऊर्जा इस प्रक्रिया को जारी रखने के लिए पर्याप्त होती है। चूंकि नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया अति उच्च ताप (लगभग 10 लाख डिग्री सेल्सियस) पर होती है, इस कारण इसे ऊष्मा नाभिकीय अभिक्रिया (Thermo Nuclear Reaction) कहा जाता है। सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊष्मा एवं प्रकाश ऊर्जा का कारण यही ऊष्मा नाभिकीय अभिक्रिया है। हाइड्रोजन बम (Hydrogen Bomb) जिसकी संहारिक क्षमता परमाणु बम से कई गुना ज्यादा होती है, के निर्माण में नाभिकीय संलयन का सिद्धांत निहित है।

उदाहरण-

1H2 + 1H32He4+ 0n1 + ऊर्जा

यह अभिक्रिया लगभग 10-6 सेकण्ड में समाप्त हो जाती है। इस क्रिया में उत्पन्न न्यूट्रॉन पुनः प्लूटोनियम या यूरेनियम पर प्रहार कर उसे विखंडित करते हैं। इसी कारण हाइड्रोजन बम की संहारिक क्षमता परमाणु बम की तुलना में कई गुना अधिक होती है।

नाभिकीय ऊर्जा की उपयोगिताएँ: नाभिकीय ऊर्जा की कुछ प्रमुख उपयोगिताएँ निम्नलिखित हैं-

(i) नाभिकीय रिएक्टरों में यूरेनियम (92U235) के परमाणुओं को मंद न्यूट्रॉनों द्वारा विखंडन के परिणामस्वरूप मुक्त ऊष्मा ऊर्जा की विपुल राशि से जल को भाप में बदलकर टरबाइन (Turbines) चलाये जाते हैं, जिससे विद्युत् ऊर्जा उत्पन्न होती है।

(ii) नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग वायुयान, जहाज, पनडुब्बी आदि चलाने में किया जाता है।

(iii) रॉकेट उड़ाने में भी नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है।

(iv) सूर्य एवं अन्य तारों से प्राप्त ऊष्मा एवं प्रकाश ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संलयन अभिक्रियाएँ हैं, जो वहाँ लगातार चलती रहती हैं।

व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण नाभिकीय संलयन से प्राप्त अपार ऊर्जा का मानवोपयोगी कायों में उपयोग की तकनीक अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी है।

परमाणु रिएक्टर (Atomic Reactor): वह संयंत्र जिसमें नाभिकीय ऊर्जा को ऊष्मा ऊर्जा में परिवर्तित कर विद्युत् ऊर्जा प्राप्त की जाती है, परमाणु रिएक्टर या नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor) कहलाता है, इसमें होने वाली विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित (Controlled) रहती है।

परमाणु रिएक्टर के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं

  1. कोर (Core)
  2. मंदक (Moderator)
  3. शीतलक (Coolant) तथा
  4. परिरक्षण (Shielding)

नाभिकीय रिएक्टरों में मंदक के रूप में भारी जल (D2O) तथा ग्रेफाइट का प्रयोग किया जाता है, जबकि शीतलक के रूप में सोडियम और पोटैशियम के द्रवित मिश्रधातु का उपयोग होता है। जब ग्रेफाइट का उपयोग मंदक के रूप में होता है, तब रिएक्टर को परमाणु पाइल (Atomic Pile) कहते हैं, किन्तु भारी जल का मंदक के रूप में उपयोग होने पर वह स्वीमिंग पुल रिएक्टर (swimming Pool Reactor) कहलाता है। नाभिकीय रिएक्टर में यूरेनियम या प्लूटोनियम का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है, जबकि कैडमियम छड़ का उपयोग नियत्रंक छड़ के रूप में होता है। विश्व का सबसे पहला नाभिकीय रिएक्टर इटली के वैज्ञानिक प्रोफेसर एनरिको फर्मी (Enrico Ferrni) के निर्देशन में शिकागो विश्वविद्यालय में बनाया गया था।

नाभिकीय रिएक्टर के उपयोग

(i) नाभिकीय रिएक्टर से प्राप्त नाभिकीय ऊर्जा की विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित करके विद्युत् उत्पादन के लिए विद्युत् गृह बनाये जाते हैं।

(ii) नाभिकीय रिएक्टर में अनेक प्रकार के रेडियो समस्थानिक उत्पन्न होते हैं, जिनका उपयोग चिकित्सा-विज्ञान, कृषि, रोगों के उपचार, उद्योग-धन्धों आदि में किये जाते हैं।

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