त्रिपुरी के कलचुरी Kalchuri of Tripuri

जैजाकभुक्ति के चन्देलों के राज्य के दक्षिण में आ जबलपुर के निकट कलचुरि राजपूतों का राज्य था। अपने को कलचुरि लीग हैह्य वंश का क्षत्रिय बतलाते हैं। गुर्जर प्रतिहारों और बदामी के चालुक्यों के उत्ता ने के पूर्व बुन्देल्क्हंस से लेकर गुजराज और नासिक, तर्क, विशेषकर नर्मदा की उपरली घाटी में, कलचुरी लोग सबसे अधिक शक्तिशाली थे परन्तु हुर्जर-प्रतिहारों और चालुक्यों की शक्ति के उदय से कलचुरियों का प्रभाव दहल (वर्तमान जबलपुर के निकट तक सीमित रह गया। अब कलचुरी राज्य की राजधानी त्रिपुरी हो गई। इसलिए उनको चेदि, दहल अथवा त्रिपुरी के कलचुरि कहा जाने लगा। कलचुरि की एक शाखा गोरखपुर में भी स्थापित हुई थी।

कोक्कल-प्रथम (875-925)- कोक्कल-प्रथम कलचुरि वंश का संस्थापक तथा प्रथम ऐतिहासिक शासक था जिसने राष्ट्रकूटों और चन्देलों के साथ विवाह-सम्बन्ध स्थापित किये। प्रतिहारों के साथ कोक्कल-प्रथम का मैत्री-सम्बन्ध था। इस प्रकार उसने अपने समय के शक्तिशाली राज्यों के साथ मित्रता और विवाह द्वारा अपनी शक्ति भी सुदृढ़ की। कोक्कल-प्रथम अपने समय के प्रसिद्ध योद्धाओं और विजेताओं में से एक था। कलचुरि अभिलेखों में कोक्कल को अनेक विजयों का गौरव प्रदान किया गया है, परन्तु जैसा कि पीछे कहा जा चुका हम इस युग के अभिलेखों में उल्लिखित सभी बातों को ऐतिहासिक सत्य रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। अतएव कलचुरि अभिलेखों के आधार पर कोक्कल को अपने समय का सबसे महान् विजेता नहीं कहा जा सकता। फिर भी इस बात में सन्देह नहीं कि कोक्कल पराक्रमी एवं साहसी विजेता था और उसने अपनी विजयों द्वारा एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की।

एक अभिलेख से पता चलता है कि कोक्कल-प्रथम ने अपने राष्ट्रकूट जामाता को वेंगी के विनयादित्य-तृतीय (पूर्व चालुक्यराज) के विरुद्ध आश्रय तथा सहायता प्रदान की। एक अन्य अभिलेख से यह ध्वनित होता है कि कोक्कल ने भोज-प्रथम को सुरक्षा प्रदान कर, प्रतिहार नरेश महीपाल से शत्रुता कर ली, परन्तु भोज-प्रथम उसका मित्र हो गया। कोक्कल को अभिलेखों में सारी पृथ्वी का विजेता तथा अपने समकालीन नरेशों का कोषहर्ता कहा गया है जो स्पष्टतया प्रशस्तिमात्र है। अपने शासन-काल के अन्तिम समय में कोक्कल ने उत्तरी कोंकण पर आक्रमण किया और पूर्वी चालुक्यों तथा प्रतिहारों के विरुद्ध राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण-द्वितीय को सहायता प्रदान की। कोक्कल ने अपनी विजयों के द्वारा जिस राज्य की स्थापना की, उसमें उसकी मृत्यु के शीघ्र बाद ही विघटन के तत्व उत्पन्न हो गये जिससे कलचुरियों की शक्ति क्षीण होने लगी। परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में गांगेयदेव की अधीनता में कलचुरियों को भारत की सबसे महान् राजनैतिक शक्ति होने का गौरव प्राप्त हो गया।

कोक्कल प्रथम के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र शंकरगण सिंहासन पर बैठा। शंकरगण के उपरान्त क्रमश: युवराज प्रथम, लक्ष्मणराज, युवराज द्वितीय तथा कोक्कल द्वितीय कलचुरि राज्य के शासक हुए। कोक्कल द्वितीय को गुजरात के चालुक्य नरेश चामुण्डिराज को पराजित करने का श्रेय है। उसने कुन्तल नरेश सत्याश्रय और गौड नरेश महिपाल को पराजित किया। कोक्कल द्वितीय के बाद गांगेयदेव कलचुरि राज्य का राज्याधिपति बना।

गांगेयदेव- गांगेयदेव लगभग 1019 ई. में त्रिपुरी के राजसिंहासन पर बैठा। गांगेयदेव को अपने सैन्य-प्रयत्नों में विफलता भी प्राप्त हुई किन्तु उसने कई विजयें प्राप्त की और अपने राज्य का विस्तार करने में काफी अंश तक सफलता प्राप्त की। उसके अभिलेखों के अतिरंजनापूर्ण विवरणों को न स्वीकार करने पर भी, यह माना गया है कि गांगेयदेव ने कीर देश अथवा कांगड़ा घाटी तक उत्तर भारत में आक्रमण किये और पूर्व में बनारस तथा प्रयाग तक अपने राज्य की सीमा को बढ़ाया। प्रयाग और वाराणसी से और आगे वह पूर्व में बढ़ा। अपनी सेना लेकर वह सफलतापूर्वक पूर्वी समुद्र तट तक पहुँच गया और उड़ीसा को विजित किया। अपनी इन विजयों के कारण उसने विक्रमादित्य का विरुद धारण किया। उसने पालों के बल की अवहेलना करते हुए अंग पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में उसे सफलता प्राप्त हुई। यह सम्भव है कि गांगेयदेव ने कुछ समय तक मिथिला या उत्तरी बिहार पर भी अपना अधिकार जमाये रखा था।

डॉ. मजूमदार का कहना है कि गांगेयदेव ने मुसलमानों की शक्ति से लोहा लिया। उसकी यह गर्वोक्ति कि उसने कीर प्रदेश तक धावा बोला था, यह ध्वनित करता है कि उसने मुसलमानों की शक्ति को चुनौती दी क्योंकि कीर प्रदेश मुसलमानों के अधीनस्थ पंजाब का एक भाग था। गांगेयदेव की मृत्यु प्रयाग में हुई थी। उसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नियाँ उसके साथ चिता में जल कर भस्म हो गई। गांगेयदेव का शासन-काल पूर्ण रूप से निश्चित नहीं किया जा सकता। परन्तु यह अनुमान किया जाता है कि 1019 ई. में वह सिंहासन पर बैठा और 1040 ई. में उसकी मृत्यु हुई।

गांगेयदेव ही अपने वंश में ऐसा सम्राट् था जिसने अपने नाम के सिक्के चलवाये। उसके सिक्कों पर उसके नाम के साथ-साथ लक्ष्मी की आकृति भी खुदी हुई है। गांगेयदेव के सिक्के सोने, चाँदी और ताँबे, तीनों प्रकार के थे। वह शिवोपासक था और उसने शिवजी का एक भव्य मन्दिर बनवाया था।

लक्ष्मीकर्ण- गांगेयदेव के उपरान्त उसका प्रतापी पुत्र लक्ष्मीकर्ण अथवा कर्णराज सिंहासन पर बैठा। वह अपने पिता की भांति एक वीर सैनिक और सहस्रों युद्धों का विजेता था। उसने काफी विस्तृत और महत्त्वपूर्ण विजयों द्वारा कलचुरि शक्ति का विकास किया। कल्याणी और अन्हिलवाड के शासकों से सहायता प्राप्त कर कर्ण ने परमार राजा भोज को परास्त कर दिया। उसने चन्देलों और पालों पर विजय प्राप्त की। उसके अभिलेख बंगाल और उत्तर प्रदेश में पाये गये हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि इन भागों पर उसका अधिकार था। कर्ण का राज्य गुजरात से लेकर बंगाल और गंगा से महानदी तक फैला हुआ था। उसने कलिंगापति की उपाधि ली।

कर्ण की विजयों के कारण उसे भारतीय इतिहास के सबसे महान् विजेताओं में एक कहा गया है। प्रसिद्ध विजेता नैपोलियन के साथ उसकी तुलना की गई है। परन्तु यह न भूलना चाहिए कि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में कर्ण को कई पराजयें सहनी पड़ी थीं। पालों, चन्देलों, परमारों और सोलंकियों, सभी ने उसको हराया। अतएव कर्ण की प्रारम्भिक विजयों का कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ सका। उसकी विजयों ने उसके गौरव को तो बढ़ाया किन्तु उसकी राज्य-सीमा में कोई विस्तार नहीं किया। 1072 ई. में कर्ण ने अपने पुत्र के लिए सिंहासन त्याग दिया।

यशकर्ण- यश कर्ण सन सन 1703 के लगभग त्रिपुरी के सिंहासन पर बैठा। उसने वेंगी राज्य और उत्तरी बिहार तक धावे बोले। उसके पिता के अंतिम दिनों में उसके राज्य की स्थिति काफी डावांडोल हो गयी थी और इसी डावांडोल स्थिति में उसने राज्सिनासन पर पैर धारा था। परन्तु अपने राज्य की इस गड़बड़ स्थिति का विचार न करते हुए यशकर्ण ने अपने पिता और पितामह की भांति सैन्य-विजय क्रम जारी रखा। पहले तो उसे कुछ सफलता मिली, लेकिन शीघ्र ही उसका राज्य स्वयं अनेक आक्रमणों का केंद्र बिंदु बन गया। उसके पिता और पितामह की आक्रमणात्मक साम्राज्यवादी नीति से जिन राज्यों को क्षति पहुंची थी, वे सब प्रतिकार लेने का विचार करने लगे। दक्कन के चालुक्यों ने उसके राज्य पर हमला बोल दिया और अपने हमले में वे सफल भी रहे। गहड़वालों के उदय ने गंगा के मैदान में उसकी स्थिति पर विपरीत प्रभाव डाला। चंदेलों ने भी उसकी शक्ति को सफलतापूर्वक खुली चुनौती डी। परमारों ने यश कर्ण की राजधानी को खूब लूटा-खसोटा। इन सब पराजयों ने उसकी शक्ति को झकझोर दिया। उसके हाथों से प्रयाग और वाराणसी के नगर निकल गए और उसके वंश का गौरव श्रीहत हो गया।

यशःकर्ण के उत्तराधिकारी और कलचुरी वंश का पतन- यशः कर्ण के उपरांत उसका पुत्र गया कर्ण सिंहासनारूढ़ हुआ किन्तु वह अपने पिता के शासन काल में प्रारंभ होने वाली अपने वंश की राजनैतिक अवनति को वह रोक न सका। उसके शासन-काल में रत्नपुरी की कलचुरि शाखा दक्षिण कौशल में स्वतन्त्र हो गई। गयाकर्ण ने मालवा-नरेश उदयादित्य की पौत्री से विवाह किया था। इसका नाम अल्हनादेवी था। गयाकर्ण की मृत्यु के बाद, अल्हनादेवी ने भेरघाट में वैद्यनाथ के मन्दिर और मठ का पुनर्निर्माण कराया। गयाकर्ण का अद्वितीय पुत्र जयसिंह कुछ प्रतापी था। उसने कुछ अंश तक अपने वंश के गौरव को पुनः प्रतिष्ठापित करने में सफलता प्राप्त की। उसने सोलंकी नरेश कुमारपाल को पराजित किया। जयसिंह की मृत्यु 1175 और 1180 के मध्य किसी समय हुई। उसका पुत्र विजयसिंह कोक्कल-प्रथम के वंश का अन्तिम नरेश था जिसने त्रिपुरी पर राज्य किया। विजयसिंह को 1196 और 1200 के बीच में जैतुगि-प्रथम ने, जो देवगिरि के यादववंश का नरेश था, मार डाला और त्रिपुरी के कलचुरि वंश का उन्मूलन कर दिया।

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