भारतीय संविधान की विशेषताएं Features of the Indian Constitution

भारत का संविधान अनेक दृष्टियों से एक अनुपम संविधान है। भारतीय संविधान में अनेक ऐसे विशिष्ट लक्षण हैं, जो इसे विश्व के अन्य संविधानों से पृथक् पहचान प्रदान करते हैं।

संविधान के प्रमुख या स्पष्ट दिखाई देने वाले लक्षण संविधान की वे विशेष बातें होती हैं जिनसे उसकी अन्य संविधानों से भिन्नता प्रकट होती हैं। उल्लेखनीय है कि प्रमुख लक्षण का अर्थ आधारिक लक्षण नहीं होता। आधारिक लक्षण, संविधान के वे उपबंध हैं जिनका संशोधन नहीं किया जा सकता, या जिन्हें नष्ट नहीं किया जा सकता, या जिन पर प्रहार नहीं किया जा सकता । आधारिक लक्षणों का संशोधन नहीं किया जा सकता यह सिद्धांत केशवानंद भारती में प्रतिपादित किया गया था और इसका अनुसरण इसके पश्चात् अनेक मामलों में किया गया।

भारतीय संविधान की रूपरेखा

लिखित एवं विशाल

संविधान भारतीय संविधान का निर्माण एक विशेष संविधान सभा के द्वारा किया गया है और इस संविधान की अधिकांश बातें लिखित रूप में है। इस दृष्टिकोण से भारतीय संविधान, अमेरिकी संविधान के समतुल्य है। जबकि ब्रिटेन और इजरायल का संविधान अलिखित है। भारतीय संविधान केवल एक संविधान नहीं है वरन् देश की संवैधानिक और प्रशासनिक पद्धति के महत्वपूर्ण पहलुओं से संबंधित एक विस्तृत वैज्ञानिक संहिता भी है। इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान विश्व का सर्वाधिक व्यापक संविधान है।

भारत के मूल संविधान में कुल 395 अनुच्छेद थे जो 22भागों में विभाजित थे और इसमें 8 अनुसूचियां थीं। (इनमें पश्चात्वर्ती संशोधनों द्वारा वृद्धि की गई) बहुत-से उपबंधों का निरसन करने के पश्चात् भी इसमें (वर्ष 2013 तक) 444 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं। 1950-1993 के बीच की अवधि में बहुत से अनुच्छेदों का लोप कर दिया गया है। संविधान में 64 अनुच्छेद और 4 अनुसूचियां जोड़ी गई हैं अर्थात् अनुच्छेद 31क-31ग, 35क, 39क, 48क,48क, 51क, 131क, 134क, 189क, 144क,224क, 233क, 239क, 239कक, 239कख, 239ख, 243, 243क से 243 चछ तक, 244क, 257क, 258क, 290क, 300क, 312क, 323क, 323ख, 350क, 350ख, 361ख, 361क, 368क, 371क - 371झ, 372क, 378क, 349क; जबकि अमेरिका के संविधान में केवल 7, कनाडा के संविधान में 147, आस्ट्रेलिया के संविधान में 128 और दक्षिण अफ्रीका के संविधान में 253 अनुच्छेद ही हैं। संविधान के इतने विशाल होने के अनेक कारण हैं।

  1. इसमें राज्य के प्रशासन से संबंधित उपबंध है। अमेरिकी संविधान इससे भिन्न है। वहां राज्यों ने अपने-अपने संविधान अलग से बनाए। हमारे संविधान में कनाडा का अनुसरण किया गया। हमारे संविधान में संघ और सभी राज्यों के संविधान हैं - जम्मू-कश्मीर को छोड़कर। जम्मू-कश्मीर को अपना संविधान बनाने की अनुमति दी गई। संविधान के उपबंध भी जम्मू-कश्मीर राज्य पर स्वतः लागू नहीं किए गए। वहां संविधान के उपबंध अनुच्छेद 370 के अधीन धीरे-धीरे लागू किए गए। इनमें से कुछ उपांतरित रूप में लागू किए गए।
  2. संविधान में प्रशासनिक मामलों के बारे में विस्तार से उपबंध हैं। संविधान निर्माताओं की इच्छा थी कि यह एक विस्तारवान दस्तावेज हो और उनके सामने भारत शासन अधिनियम 1935 का दृष्टांत था। उसमें न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, निर्वाचन आयोग आदि के बारे में विस्तृत उपबंध रखे गए थे। डॉ. अंबेडकर ने इन प्रशासनिक बातों को सम्मिलित किए जाने की इस आधार पर उचित ठहराया था कि दुर्भाव से काम करने वाले व्यक्ति संविधान को छद्म रूप से भ्रष्ट न कर सकें।
  3. भारत शासन अधिनियम, 1935 के अधिकांश उपबंध यथावत् अंगीकार कर लिए गए। 1935 का अधिनियम एक बहुत लंबा दस्तावेज था। उसे आदर्श मानकर उसका बहुत बड़ा भाग संविधान में समाविष्ट कर लिया गया। इससे संविधान की लंबाई बढ़ना स्वाभाविक था।

डॉ. अंबेडकर ने ऐसा करने के पक्ष में यह तर्क दिया था कि, भारत के लोग विद्यमान प्रणाली से परिचित हैं।

  1. भारत की विशालता और समस्याओं की विविधता के कारण जन्मी समस्याओं का समाधान खोजना आवश्यक था। भारत की इन विशिष्ट समस्याओं के लिए जो उपबंध बनाए गए, उनके उदाहरण हैं - भाग 16, जो अनुसूचित जाति और जनजाति तथा पिछड़े वर्ग से संबंधित है। भाग 17, जो राजभाषा के बारे में है। पांचवीं और छठी अनुसूचियां जो अनुसूचित क्षेत्र और जनजातियों से संबंधित हैं।
  2. संविधान के प्रारंभ होने के पश्चात् नागालैंड, असम, मणिपुर, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम आदि की प्रादेशिक मांगों को देखते हुए बाद के वर्षों में अनु. 371क से लेकर 371झ अन्तर्विष्ट किए गए।

संसदीय प्रभुता तथा न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय

ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में संसद को सर्वोच्च तथा प्रभुतासम्पन्न माना गया है। इसकी शक्तियों पर सिद्धांत के रूप में कोई अवरोध नहीं है, क्योंकि वहां पर कोई लिखित संविधान नहीं है। किंतु अमेरिकी प्रणाली में, उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च है क्योंकि उसे न्यायिक पुनरीक्षण तथा संविधान के निर्वचन की शक्ति प्रदान की गई है। भारतीय संविधान की एक विशेषता यह है कि संविधान में ब्रिटेन की संसदीय प्रभुसत्ता तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की न्यायिक सर्वोच्चता के मध्य का मार्ग अपनाया गया है। ब्रिटेन में व्यवस्थापिका सर्वोच्च है और ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा निर्मित कानून को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके विपरीत अमरीका के संविधान में न्यायपालिका की सर्वोच्चता के सिद्धांत को अपनाया गया है, जिसके तात्पर्य है की न्यायालय संविधान का रक्षक और अभिभावक है। किंतु भारतीय संसद तथा उच्चतम न्यायालय, दोनों अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च हैं। जहां उच्चतम न्यायालय संसद द्वारा पारित किसी कानून को संविधान का उल्लंघन करने वाला बताकर संसद के अधिकार से बाहर, अवैध और अमान्य घोषित कर सकता है, वहीँ संसद के कतिपय प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए संविधान के अधिकांश भागों में संशोधन कर सकती है।

संसदीय शासन प्रणाली

भारत का संविधान भारत के लिए संसदीय प्रणाली की शासन व्यवस्था का प्रावधान करता है। हालांकि भारत एक गणराज्य है और उसका अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है किंतु यह मान्यता है कि अमरीकी राष्ट्रपति के विपरीत भारतीय राष्ट्रपति कार्यपालिका का केवल नाममात्र का या संवैधानिक अध्यक्ष होता है। वह यथार्थ राजनीतिक कार्यपालिका यानि मंत्रिपरिषद की सहायता तथा उसके परामर्श से ही कार्य करता है। भारत के लोगों की 1919 और 1935 के भारतीय शासन अधिनियमों के अंतर्गत संसदीय शासन का अनुभव था और फिर अध्यक्षीय शासन प्रणाली में इस बात का भी डर था कि कहीं कार्यपालिका अपनी निश्चित पदावधि के कारण निरंकुश न हो जाए। अतः संविधान सभा ने विचार-विमर्श करके यह निर्णय लिया कि भारत के लिए अमरीका के समान अध्यक्षीय शासन प्रणाली के स्थान पर ब्रिटिश मॉडल की संसदीय शासन प्रणाली अपनाना उपयुक्त रहेगा। संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी रहती है तथा उसका विश्वास खो देने पर कायम नहीं रह सकती।

किंतु यह कहना समीचीन नहीं होगा कि भारत में ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को पूर्णरूपेण अपना लिया गया है। दोनों में अनेक मूलभूत भिन्नताएं हैं। उदाहरण के लिए- ब्रिटेन का संविधान एकात्मक है, जबकि भारतीय संविधान अधिकांशतः संघीय है। वहां वंशानुगत राजा वाला राजतंत्र है, जबकि भारत निर्वाचित राष्ट्रपति वाला गणराज्य है। ब्रिटेन के विपरीत, भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है। इसलिए भारत की संसद प्रभुत्वसंपन्न नहीं है तथा इसके द्वारा पारित विधान का न्यायिक पुनरीक्षण हो सकता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 74(1) यह निर्दिष्ट करता है कि कार्य संचालन में राष्ट्रपति की सहायता करने तथा उसे परामर्श देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद होगी तथा राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के परामर्श से ही कार्य करेगा।

नम्यता एवं अनम्यता का समन्वय

संशोधन की कठिन या सरल प्रक्रिया के आधार पर संविधानों की नम्य अथवा अनम्य कहा जा सकता है। संघीय संविधानों की संशोधन प्रक्रिया कठिन होती है, इसलिए उन्हें सामान्यतया अनम्य श्रेणी में रखा जाता है। अनुच्छेद 368 के अनुसार कुछ विषयों में संशोधन के लिए संसद के समस्त सदस्यों के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के अतिरिक्त कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों का अनुसमर्थन भी आवश्यक है, जैसे-राष्ट्रपति के निर्वाचन की विधि, संघ और इकाइयों के बीच शक्ति विभाजन, राज्यों के संसद में प्रतिनिधि, आदि। संशोधन की उपर्युक्त प्रणाली निश्चित रूप से कठोर है, लेकिन कुछ विषयों में संसद के साधारण बहुमत से ही संशोधन हो जाता है। उदाहरणस्वरूप- नवीन राज्यों के निर्माण, वर्तमान राज्यों के पुनर्गठन और भारतीय नागरिकता संबंधी प्रावधानों में परिवर्तन आदि कार्य संसद साधारण बहुमत से कर सकती है।

इस प्रकार भारतीय संविधान नम्यता एवं अनम्यता का अद्भुत सम्मिश्रण है। भारतीय संविधान न तो ब्रिटिश संविधान की भांति नम्य है और न ही अमेरिकी संविधान की भांति अत्यधिक अनम्य। पिछले 50 वर्षों के दौरान संविधान में 100 संशोधन किये जा चुके हैं जो कि संविधान की पर्याप्त लोचशीलता को स्पष्ट करते हैं।

विश्व के प्रमुख संविधानों का प्रभाव

संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण से पूर्व विश्व के प्रमुख संविधानों का विश्लेषण किया और उनकी अच्छाइयों की संविधान में समाविष्ट किया। भारतीय संविधान अधिकांशतः ब्रिटिश संविधान से प्रभावित है। प्रभावित होना स्वाभाविक भी है क्योंकि भारतीय जनता को लगभग दो सौ-वर्षों तक ब्रिटिश प्रणाली के अनुभवों से गुजरना पड़ा। ब्रिटिश संविधान से संसदीय शासन प्रणाली, संसदीय प्रक्रिया, संसदीय विशेषाधिकार, विधि निर्माण प्रणाली और एकल नागरिकता को संविधान में समाविष्ट किया गया है। भारतीय संविधान अमेरिकी संविधान से भी कम प्रभावित नहीं है क्योंकि अमेरिकी संविधान के कई मुख्य तत्वों को भारतीय संविधान में स्थान दिया गया है, जैसे- न्यायिक पुनर्विलोकन, मौलिक अधिकार, राष्ट्राध्यक्ष का निर्वाचन, संघात्मक शासन-व्यवस्था, सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया। संविधान में नीति-निदेशक तत्वों का विचार आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा सदस्यों का मनोनयन और राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रणाली भी आयरिश संविधान से प्रेरित है।

संघीय शासन प्रणाली कनाडा के संविधान से ली गयी है। गणतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला फ्रांसीसी संविधान के आधार स्तंभ पर रखी गयी है, जबकि आपातकालीन उपबंध जर्मन संविधान से उद्धृत हैं। मूल संविधान में तो केवल मौलिक अधिकारों की ही व्यवस्था की गई थी, लेकिन 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 के द्वारा मूल संविधान में एक नया भाग 4क जोड़ दिया गया है और उसमे नागरिकों के मूल कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। रूसी संविधान मूल कर्तव्यों का प्रेरणा स्रोत है। संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को दक्षिण अफ्रीका के संविधान से समाविष्ट किया गया है।

भारतीय संविधान पर विश्व के संविधानों का प्रभाव
लक्षण देश
विधि का शासन, संसदीय शासन, एकल नागरिकता, विधि-निर्माण प्रक्रिया ब्रिटेन
संघ तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन, राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां, अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की रक्षा, उच्चतम न्यायालय के निचले स्तर के न्यायालयों पर नियंत्रण, केंद्रीय शासन का राज्य के शासन में हस्तक्षेप, व्यवस्थापिका के दो सदन। 1935 का भारत सरकार अधिनियम
संविधान के सभी सामाजिक नीतियों के संदर्भ में निदेशक तत्वों का उपबंध। स्विट्ज़रलैंड
प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका, न्यायिक पुनरीक्षण, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पदमुक्ति, राष्ट्रपति कार्यपालिका का प्रमुख और उप-प्रधानमंत्री उच्च सदन का पदेन अधिकारी संयुक्त राज्य अमेरिका
मौलिक कर्तव्य, प्रस्तावना में न्यायिक आदर्श भूतपूर्व सोवियत संघ
राज्य के नीति निदेशक तत्व, राष्ट्रपति का निर्वाचन, उच्च सदन में सदस्यों का नामांकन आयरलैंड
गणतंत्र व्यवस्था, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व का सिद्धांत फ़्रांस
सशक्त केंद्र के साथ संघीय व्यवस्था, शक्तियों का वितरण तथा अवशिष्ट शक्तियों का केंद्र की हस्तांतरण, राज्यों में राज्यपाल की केंद्र द्वारा नियुक्ति कनाडा
समवर्ती सूची, व्यापार एवं वाणिज्य संबंधी प्रावधान आस्ट्रेलिया
आपातकालीन उपबंध जर्मनी (वाइमर संविधान) और 1985 का भारत सरकार अधिनियम
संविधान संशोधन प्रावधान, उच्च सदन के सदस्यों का निर्वाचन दक्षिण अफ्रीका
विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया जापान

 

ऐकिकता की ओर उन्मुख परिसंघ प्रणाली

भारत के संविधान की सबसे महत्वूर्ण उपलब्धि यह है की उसने परिसंघ प्रणाली को ऐकिक सरकार का बल प्रदान किया । सामान्यतः सरकार परिसंघ प्रणाली की है किन्तु संविधान परिसंघ को ऐकिक राज्य में परिवर्तित होने के लिए समर्थ बनाता है। एक ही संविधान में परिसंघ और ऐकिक प्रणालियों का यह संयोजन विश्व में अनूठा है।

देशी रियासतों का विलय

नए संविधान का एक विशेष लक्षण यह है कि 552देशी रियासतें संविधान के अधीन शेष भारत में विलीन हो गई। वह समस्या जो भारत शासन अधिनियम, 1935 के रचयिताओं से हल नहीं हो रही थी और जिसके कारण परिसंघ योजना सफल नहीं हो सकी, उसे संविधान के निर्माताओं ने सफलतापूर्वक हल कर दिया।

ब्रिटिश सम्राट के अधीन देशी रियासतों की परिस्थिति

भारत शासन अधिनियम, 1935 में समाप्त होने वाले सांविधानिक सुधारों के समय भारत के नाम से ज्ञात भौगोलिक इकाई दो भागों में विभाजित हो गई, ब्रिटिश भारत और देशी रियासतें। ब्रिटिश भारत में 9 गवर्नरों के प्रांत थे और भारत सरकार द्वारा शासित कुछ क्षेत्र थे। देशी रियासतों में लगभग 600 रियासतें थीं जो अधिकतर शासकों या स्वामियों के व्यक्तिगत शासन के अधीन थीं। सभी देशी रियासतें एक समान नहीं थीं। उनमें से कुछ रियासतें आनुवंशिक प्रमुखों के शासन के अधीन थीं जिनकी राजनैतिक प्रास्थिति मुसलमानों के आक्रमण के पहले से चली आई थी। कुछ दूसरी रियासतें (जिनकी संख्या लगभग 300 थी) शासकों द्वारा दी गई संपदा या जागीर के रूप में थी जो सेवा के लिए था अन्यथा पारितोषिक के रूप में विशेष व्यक्तियों या कुटुम्बों को दी गई थीं। ब्रिटिश भारत से ये रियासतें जिस एक बात में भिन्न थीं वह यह थी कि देशी रियासतों को ब्रिटिश सम्राट द्वारा अपने अधीन नहीं किया गया था। अतएव ब्रिटिश भारत सम्राट के प्रत्यक्ष शासन के अधीन था। यह शासन सम्राट के प्रतिनिधि द्वारा और संसद के कानूनों और ब्रिटेन के विधान मंडल के अधिनियमों के अनुसार चलाया जाता था। देशी रियासतें प्रमुखों और राजाओं के व्यक्तिगत शासन के अधीन चल रही थीं। सम्राट का इन पर अधिराजत्व था। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी से प्राधिकार लेने पर सम्राट ने भारत के समस्त राज्यक्षेत्र पर अधिराजत्व ग्रहण किया था।

परमोच्च शक्ति के अनुषंग

सम्राट द्वारा अधिराजत्वग्रहण करने के पश्चात् उनके और देशी रियासतों के बीच संबंधों का वर्णन करने के लिए परमोच्चता पद का प्रयोग किया जाने लगा। सम्राट और देशी रियासतों के बीच अनेक प्रकार के वचनबंध थे। इन वचनबंधों का एक सामान्य लक्षण यह था कि देशी रियासतें अपने आंतरिक प्रशासन के लिए उत्तरदायी थी और सम्राट उनके विदेशी संबंधों और प्रतिरक्षा के लिए जिम्मेदार थे। देशी रियासतों का कोई अंतरराष्ट्रीय जीवन नहीं था और विदेशी प्रयोजनों के लिए उनकी वही स्थिति थी जो ब्रिटिश भारत की थी। आंतरिक मामलों में ब्रिटिश सम्राट की नीति सामान्यतः शासकों के शासन में हस्तक्षेप न करने की थी, लेकिन कुशासन या कुप्रशासन के मामले में सम्राट हस्तक्षेप करता था।

इन सबके होते हुए भी देशी रियासतों के शासकों के कुछ व्यक्तिगत अधिकार और विशेषाधिकार थे और वे सामान्यतः अपना व्यक्तिगत प्रशासन चलाते थे जिस पर पड़ोसी ब्रिटिश भारत के राज्यक्षेत्रों की राजनीतिक और सांविधानिक हलचलों का प्रभाव नहीं होता था।

भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा प्रस्तावित परिसंघ योजना में देशी रियासतों का स्थान

भारत शासन अधिनियम, 1935 में सम्पूर्ण भारत के लिए परिसंघ संरचना की कल्पना की गई थी जिसमें देशी रियासतें गवर्नरों के प्रांतों के साथ इकाई के रूप में सम्मिलित होती; किन्तु, अधिनियम के निर्माताओं ने देशी रियासतों को प्रांतों से दो तात्विक बातों में भिन्न रखा और अंततोगत्वा इसी विभेद के कारण योजना विफल हो गई। विभिन्नता दो बातों में थी- (क) प्रांतों का परिसंघ में अधिमिलन अनिवार्य स्वयंमेव होने वाला था किन्तु देशी रियासतों की दशा में वह स्वैच्छिक और राज्यों के शासन के विकल्प पर आधारित था। (ख) प्रांतों की दशाओं में प्रांतों पर परिसंघ का प्राधिकार (कार्यपालक और विधायी) अधिनियम द्वारा बनाए गए सम्पूर्ण परिसंघ क्षेत्र पर था।

देशी रियासतों का प्रस्तावित परिसंघ में विलय नहीं हुआ और 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ होने पर अधिनियम के इस भाग को अंतिम रूप से छोड़ दिया गया।

मंत्रिमंडलीय मिशन के प्रस्ताव

मंत्रिमंडलीय मिशन ने यह अवधारणा की कि देशी रियासतें भारत के नए विकास में सहयोग देने के लिए तत्पर होंगी। अतएव उन्होंने यह सिफारिश की कि भारत का एक संघ होना चाहिए, जिसमें ब्रिटिश भारत और देशी रियासतें दोनों हों और जो केवल विदेश कार्य, प्रतिरक्षा और संचार का कार्य करेगा।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अधीन परमोच्चता की समाप्ति

जब भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया गया तो उस अधिनियम की धारा 7(1)ख में यह घोषित किया गया कि सम्राट का अधिराजत्व समाप्त हो गया है। यद्यपि ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया और देशी रियासतों ने अपनी वही स्थिति पुनः प्राप्त कर ली जो सम्राट द्वारा अधिराजत्व ग्रहण करने के पहले थी किन्तु अधिकतर राज्यों ने यह अनुभव किया कि उनके लिए शेष भारत से पृथक् या स्वाधीन रहकर अपना अस्तित्व बनाए रखना संभव नहीं है और यह उनके अपने हित में है कि वे भारत और पाकिस्तान नामक दो डोमिनियनों में से किसी एक में अपने आपको विलीन कर लें।

भारत डोमिनियन की भौगोलिक सीमाओं के भीतर राज्यों में से हैदराबाद, कश्मीर, बहावलपुर, जूनागढ़ और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत की रियासतों को छोड़कर (चित्राल, कुलरा दीर, स्वात और अरब) सभी रियासतें (जिनकी संख्या 552 थीं) 15 अगस्त, 1947 से पहले भारत डोमिनियन में अधिमिलन कर चुकी थीं अर्थात् नियत दिन के पहले। अधिमिलन के पश्चात् राज्यों के बारे में भारत सरकार की समस्या दो प्रकार की थी-

  1. देशी रियासतों को समुचित आकार की प्रशासनिक इकाई का रूप देना, और;
  2. उन्हें भारत की सांविधानिक संरचना में यथोचित स्थान देना।

पहले उद्देश्य की पूर्ति के लिए समेकन की एक तीन चरण वाली प्रक्रिया अपनाई गई-

एकीकरण और विलय: 216 रियासतें उन प्रांतों में सम्मिलित कर दी गई, जिनके वे भौगोलिक रूप से निकट थीं। इन विलीन रियासतों को संविधान की पहली अनुसूची के भाग 'ख' के राज्यों के राज्यक्षेत्र में सम्मिलित किया गया। विलय की यह प्रक्रिया ओडीशा और छत्तीसगढ़ के तत्कालीन ओडीशा प्रांत में 1 जनवरी, 1948 को विलय से प्रारंभ हुई और जनवरी 1950 में पश्चिमी बंगाल राज्य में कूच बिहार के विलय से समाप्त हुई।

61 रियासतों को केंद्र शासित प्रदेश में परिवर्तित किया गया और उन्हें संविधान की पहली अनुसूची के भाग ‘ग' में सम्मिलित किया गया। एकीकरण का यह तरीका उन मामलों में अपनाया गया, जिनमें प्रशासनिक, सामरिक या अन्य विशेष कारणों से केंद्र का नियंत्रण आवश्यक समझा गया।

एकीकरण का तीसरा तरीका था, देशी रियासतों के समूहों को नई जीवनक्षम इकाइयों में समेकित करना। इन्हें राज्य-संघ नाम दिया गया। इस प्रकार बनाया गया पहला संघ सौराष्ट्र संघ था, जिसमें काठियावाड़ और कुछ अन्य रियासतें मिल गई थीं। अंतिम संघ था- त्रावणकोर- कोचीन संघ, जो 1 जुलाई, 1949 को बना। इस प्रकार 275 रियासतें सम्मिलित करके 5 संघ बनाए गए, मध्य भारत, पटियाला और पूर्वी पंजाब संघ, राजस्थान, सौराष्ट्र और त्रावणकोर-कोचीन। पहली अनुसूची के भाग 'ख' के राज्यों में सम्मिलित किया गया। भाग ‘ख' में सम्मिलित अन्य तीन राज्य थे- हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर और मैसूर। हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर की स्थिति इन सबसे विशेष थी।

1947 में भारत डोमिनियन में अधिमिलन के समय राज्यों ने केवल तीन विषयों के लिए अधिमिलन किया था अर्थात् प्रतिरक्षा, विदेश कार्य व संचार। संघ की रचना के बाद और राजनैतिक घटनाओं के परिणामस्वरूप शासकों को यह लगा कि भारत संघ से और घनिष्ठ संबंध होने चाहिए। सभी संघों के राजप्रमुखों ने और मैसूर के महाराजा ने पुनरीक्षित विलय-विलेखों पर हस्ताक्षर किए, जिनके द्वारा सभी रियासतें संघ सूची और समवर्ती विधायी सूची में सम्मिलित सभी विषयों की बाबत भारत डोमिनियन में विलीन हो गई।

उल्लेखनीय है कि पांचों संघों के राज प्रमुखों ने तथा हैदराबाद, मैसूर और जम्मू-कश्मीर के शासकों ने उद्घोषणा द्वारा भारत के संविधान की अंगीकार किया।

साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के बिना सार्वजनिक मताधिकार

लिंग, सम्पति, कराधान आदि की किसी अर्हता के बिना सार्वजनिक मताधिकार को स्वीकार करना (अनुच्छेद 326) भारत के लिए एक साहसिक प्रयोग है। भारत में मताधिकार इंग्लैंड या अमेरिका की अपेक्षा अधिक व्यापक है। संविधान की उद्देशिका में हमने यह घोषणा की है कि भारत के लोग इस संविधान को अंगीकृत और आत्मार्पित करते हैं। इसके पीछे यह संकल्पना है कि जनता प्रभुत्वसम्पन्न है। यह संकल्पना खोखली हो जायेगी यदि उन समस्त लोगों को जो अधिकार का प्रयोग करने में समर्थ हैं, मताधिकार न दिया जाए। मताधिकार के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र निर्वाचन तंत्र की स्थापना की गई है।

संविधान के निर्माताओं की इस बात के लिए भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व को समाप्त कर दिया। इसी कारण भारत का दुःखद रक्तस्नात विभाजन हुआ। नए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया था। यह आरक्षण भी अस्थायी अवधि के लिए था।

वयस्कता की आयु पहले 21 वर्ष थी, परंतु 1989 में 61वें संविधान संशोधन द्वारा यह आयु सीमा घटाकर 18 वर्ष कर दी गई है।

अनेक संशोधनों द्वारा अनुपूरित और 42वें, 43वें और 44वें संशोधन द्वारा 1976-78 में पुनः निर्मित

1949 के संविधान के कुछ मूल लक्षण 1996 तक किए गए 78 संशोधनों द्वारा पर्याप्त रूप से उपांतरित कर दिए गए हैं। इसमें 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 ने (1977-78 में 43वें और 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा उपांतरित) संविधान को महत्वपूर्ण बातों में व्यवहारतः पुनः निर्मित किया है। संविधान का 73वां संशोधन अप्रैल 1993 में लागू हुआ। इसके द्वारा पंचायतों की स्थापना और उनके लिए निर्वाचन से संबंधित 16 अनुच्छेद जोड़े गए। ये सब एक नए भाग (भाग 9) में हैं।

धर्मनिरपेक्ष राज्य

संविधान में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा यह है कि पंथ, जाति या सम्प्रदाय के आधार पर किसी भी पंथानुयायी से कोई भेद-भाव नहीं किया जाएगा।

किसी भी धर्म को राजधर्म नहीं मन जाएगा, न ही उसे कोई संरक्षण अथवा प्राथमिकता दी जाएगी। 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़कर इस परिप्रेक्ष्य में स्थिति स्पष्ट कर दी गई है।

धर्मनिरपेक्ष राज्य का तात्पर्य यह है कि राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान होंगे तथा राज्य के द्वारा विभिन्न धर्मावलम्बियों में भेदभाव नहीं किया जाएगा। धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी भी धर्म का विरोधी नहीं होता और न ही धर्म के प्रति उदासीन ही रहता है, बल्कि उसके द्वारा धार्मिक मामलों में तटस्थता की नीति को अपनाया जाता है।

समाजवादी राज्य भारतीय संविधान में प्रशासन के सामाजिक सिद्धांत को अप्रत्यक्ष रूप से महत्व दिया गया है। राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत पूर्ण रूप से प्रमाणित समाजवादी व्यवस्था का संस्थापन तो नहीं करते मगर संविधान में समाजवादी उद्देश्य निश्चित रूप से अंकित है। हालांकि 1976 में पारित 42वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द जोड़ दिया गया है, जो संविधान के मूल स्वरूप में नहीं था।

जिस राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति की अपेक्षा संपूर्ण समाज को विकास का समान अवसर प्रदान किया जाता है, उसे समाजवाद कहा जाता है। इसका उद्देश्य संपूर्ण समाज में आर्थिक, राजनीतिक और आधिकारिक दृष्टि से समानता स्थापित करना होता है। हालांकि भारतीय संविधान पूर्ण रूप से न समाजवादी व्यवस्था पर जोर देता है और न ही पूंजीवादी प्रवृत्तियों को प्रश्रय देता है। यह दोनों के स्वरूपों के मध्य का मार्ग अपनाता है।

स्वतंत्र न्यायपालिका

भारत के संविधान में एक स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है। उसे न्यायिक पुनरीक्षण की शक्तियां प्रदान की गई हैं। उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय एक ही एकीकृत न्यायिक संरचना के अंग हैं और उनका अधिकार क्षेत्र सभी विधियों अर्थात संघ, राज्य सिविल, दांडिक या संवैधानिक विधियों पर होता है। अमेरिका की तरह, हमारे देश में पृथक् संघीय तथा राज्य न्यायालय प्रणालियां नहीं हैं। संपूर्ण न्यायपालिका न्यायालयों का श्रेणीबढ संगठन है। उच्चतम न्यायालय का निर्णय देश की सर्वोपरि विधि होती है। इसके अतिरिक्त, संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता नितांत आवश्यक हो जाती है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता हेतु संविधान में अनेक विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं, यथा- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों केन्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होना, न्यायाधीशों को पद की सुरक्षा प्राप्त होना, न्यायाधीशों के कार्यकाल में उनके वेतन में कमी न हो सकना और न्यायाधीशों के आचरण पर व्यवस्थापिका द्वारा विचार न करना आदि।

इस प्रकार न्यायपालिका स्वतंत्र है और स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् से वर्तमान समय तक भारतीय न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता का अनेक बार परिचय दे चुकी है।

नागरिकता

भारतीय संविधान द्वैध शासन प्रणाली को स्वीकार करता है, पर वह द्वैध नागरिकता प्रदान नहीं करता। संविधान में समस्त देश के लिए समान रूप से एक ही नागरिकता की व्यवस्था की गई है। संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य संघ राज्यों में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था है, लेकिन भारतीय संविधान के निर्माताओं का विचार था कि दोहरी नागरिकता भारत की एकता को बनाए रखने में बाधक सिद्ध हो सकती है।

अतः संविधान-निर्माताओं द्वारा संघ-राज्य की स्थापना करते हुए भी दोहरी नागरिकता को नहीं वरन् एकल नागरिकता के आदर्श को ही अपनाया गया। इस व्यवस्था से स्वतंत्र संचरण ही नहीं, बल्कि समस्त क्षेत्र में सम्पति अर्जित करने तथा इच्छानुसार किसी भी स्थान पर निवास करने का अधिकार भी भारत के प्रत्येक नागरिक को मिल गया है। इस एकल नागरिकता का यह भी तात्पर्य है कि कोई भी भारतवासी किसी भी निर्वाचन क्षेत्र से संसद के लिए चुनाव लड़ सकता है।

राज्य के नीति-निदेशक तत्व

आयरलैंड के संविधान से प्रेरित होकर तैयार किए गए राज्य नीति के निदेशक तत्व हमारे संविधान की एक अनोखी विशेषता हैं। भारतीय संविधान के चौथे अध्याय में शासन संचालन के लिए मूलभूत सिद्धांतों का वर्णन किया गया है। नीति-निदेशक तत्वों की प्रकृति के संबंध में संविधान के 37वें अनुच्छेद में कहा गया है कि- नीति-निदेशक तत्वों को किसी न्यायालय द्वारा बाध्यता नहीं दी जा सकेगी किंतु फिर भी ये तत्वदेश के शासन में मूलभूत हैं। इस प्रकार निदेशक तत्वों को वैधानिक शक्ति तो प्राप्त नहीं है, लेकिन इन्हें राजनीतिक शक्ति अवश्य प्राप्त है। श्री जी.एन.जोशी के अनुसार, ये तत्व आधुनिक प्रजातंत्र के लिए व्यापक राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।

लोकप्रिय प्रभुसत्ता

भारतीय संविधान लोकप्रिय प्रभुता पर आधारित संविधान है अर्थात् यह शक्ति भारतीय जनता को ही प्रदान की गई है। संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि, हम भारत के लोग.दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के द्वारा यह घोषित किया गया कि 15 अगस्त, 1947 से भारत ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं रहा। ब्रिटिश सरकार और संसद का भारत के प्रशासन के लिए उत्तरदायित्व समाप्त कर दिया गया और भारत एक प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र बन गया। इस प्रकार, भारत का संविधान ब्रिटिश संसद की देन नहीं है, वरन भारत के लोगों ने एक प्रभुता सम्पन्न संविधान सभा में समवेत अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसे स्वीकार किया है। भारतीय संविधान में अंतिम शक्ति जनता को प्रदान की गई है अर्थात् प्रभुसत्ता जनता में निहित है किसी व्यक्ति विशेष में नहीं। प्रभुता सम्पन्न का तात्पर्य यह है की अंतरराष्ट्रीय संधि या समझौते को स्वीकार करने या न करने के लिए बाध्य नहीं होता।

लोकतंत्रात्मक गणराज्य

संविधान द्वारा भारत में एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना की गई है। लोकतंत्रात्मक शब्द का अभिप्राय यह है कि सरकार की शक्ति का स्रोत जनता में निहित है, क्योंकि लोकतंत्रात्मक सरकार जनता की, जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित होती है। सरकार की स्थापना जनता के द्वारा प्रदत्त वयस्क मताधिकार द्वारा करती है। गणराज्य से तात्पर्य ऐसे राज्य से हैं, जहां शासनाध्यक्ष वंशानुगतन होकर जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। ब्रिटेन जैसे विश्व के कुछ ऐसे लोकतंत्रात्मक राज्य हैं, जहां राज्य का प्रधान वंशानुगत होता है, लेकिन भारत एक लोकतंत्रात्मक राज्य होने के साथ-साथ एक गणराज्य भी है।

भारत को राष्ट्रमंडल की सदस्यता भी प्रदान की गई है। राष्ट्रमंडल की सदस्यता के कारण अनेक व्यक्तियों का मत है कि राष्ट्रमंडल के सदस्य राज्यों द्वारा ब्रिटिश सम्राट को अपने प्रधान के रूप में स्वीकार करने का प्रावधान है, अतः भारत के गणतंत्र होने पर संदेह किया जाता है। वास्तव में, भारत राज्य की प्रभुत्व-सम्पन्नता या उसका गणतंत्रात्मक स्वरूप राष्ट्रमंडल की सदस्यता से अप्रभावित है। श्री एम. रामास्वामी के अनुसार, सम्राट् राष्ट्रमंडल का प्रधान अवश्य है, किंतु यह प्रधान पद केवल औपचारिक है और इसका संवैधानिक महत्व प्रायः बिल्कुल नहीं हैं। इस प्रकार राष्ट्रमंडल का सदस्य होते हुए भी भारत संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।

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