आपदा प्रबंधन Disaster Management

आपदा का अर्थ है, अचानक होने वाली एक विध्वंसकारी घटना जिससे व्यापक भौतिक क्षति होती है, जान-माल का नुकसान होता है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी तीसरी रिपोर्ट में आपदा के लिए डिसास्टर के स्थान पर क्राइसिस शब्द प्रयुक्त किया है। यह वह प्रतिकूल स्थिति है जो मानवीय, भौतिक, पर्यावरणीय एवं सामाजिक कार्यकरण को व्यापक तौर पर प्रभावित करती है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में- आपदा से तात्पर्य किसी क्षेत्र में हुएउस विध्वंस, अनिष्ट, विपत्ति या बेहद गंभीर घटना से है जो प्राकृतिक या मानवजनित कारणों से या दुर्घटनावश या लापरवाही से घटित होती है और जिसमें बहुत बड़ी मात्रा में मानव जीवन की हानि होती है या मानव पीड़ित होता है या संपत्ति को हानि पहुंचती है या पर्यावरण का भारी क्षरण होता है। यह घटना प्रायः प्रभावित क्षेत्र के समुदाय की सामना करने की क्षमता से अधिक भयावह होती है।

उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा पहचानी गई प्रमुख आपदाएं हैं-

  1. जल एवं जलवायु से जुड़ी आपदाएं, चक्रवात, बवण्डर एवं तूफान, ओलावृष्टि, बादल फटना, लू व शीतलहर, हिमस्खलन, सूखा, समुद्ररक्षण, मेघगर्जन व बिजली का कड़कना;
  2. भूमि संबंधी आपदाएं, भूस्खलन एवं कीचड़ का बहाव, भूकंप, बांध का टूटना, खदान में आग;
  3. दुर्घटना संबंधी आपदाएं, जंगलों में आग लगना, शहरों में आग लगना, खदानों में पानी भरना, तेल का फैलाव, प्रमुख इमारतों का ढहना, एक साथ कई बम विस्फोट, बिजली से आग लगना, हवाई, सड़क एवं रेल दुर्घटनाएं,
  4. जैविक आपदाएं, महामारियां, कीटों का हमला, पशुओं की महामारियां, जहरीला भोजन;
  5. रासायनिक, औद्योगिक एवं परमाणु संबंधी आपदाएं, रासायनिक गैस का रिसाव, परमाणु बम गिरना।

इनके अतिरिक्त नागरिक संघर्ष, सांप्रदायिक एवं जातीय हिंसा, आदि भी आज प्रमुख आपदाएं हैं।

आधुनिक युग का भीषणतम तूफान वर्ष 1201 में मिस्र एवं सीरिया में आया था जिसमें 10 लाख लोग मारे गए थे। इसके पश्चात् सन् 1556 में चीन में आए भूकंप में 8.50 लाख व्यक्ति काल-कवलित हो गए। भारत का ज्ञात, भीषणतम भूकंप सन् 1737 में कलकत्ता में आया था जिसमें 3 लाख हताहत हुए। रूस, चीन, सीरिया, मिस्र, ईरान, जापान, जावा, इटली, मोरक्को, तुर्की, मेक्सिको, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, यूनान, इण्डोनेशिया तथा कोलम्बिया इत्यादि भूकंप के प्रति सर्वाधिक नाजुक क्षेत्र हैं। हिमालय क्षेत्र बेहद संवेदनशील है क्योंकि इस क्षेत्र की पृथ्वी की भीतरी चट्टानें निरंतर उत्तर की ओर खिसक रही हैं। विश्वभर में 10 ऐसे खतरनाक ज्वालामुखी हैं जो बड़े क्षेत्र को तबाह कर सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय-आपदा शमन रणनीति (यूएनआईएसडीआर) के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के मामले में चीन के बाद दूसरा स्थान भारत का है। भारत में आपदाओं की रूपरेखा मुख्यतः भू-जलवायु स्थितियों और स्थालाकृतियों की विशेषताओं से निर्धारित होती है और उनमें जो अंतनिर्हित कमजोरियां होती हैं उन्हीं के फलस्वरूप विभिन्न तीव्रता की आपदाएं वार्षिक रूप से घटित होती रहती हैं। आवृति, प्रभाव और अनिश्चितताओं के लिहाज से जलवायु-प्रेरित आपदाओं का स्थान सबसे ऊपर है।

भारत के भू-भाग का लगभग 59 प्रतिशत भूकंप की संभावना वाला क्षेत्र है। हिमालय और उसके आसपास के क्षेत्र, पूर्वोत्तर, गुजरात के कुछ क्षेत्र और अंडमान निकोबार द्वीप समूह भूकंपीय दृष्टि से सबसे सक्रिय क्षेत्र हैं।

भारत में राज्यों में आपदाओं के जोखिम की विस्तृत रूपरेखा को दर्शाने वाला केवल एक ही दस्तावेज है वल्नरेविलिटी एटलस जिसे भवन निर्माण सामग्री एवं प्रौद्योगिकी संवर्द्धन केंद्र में तैयार किया है। बीएमटीपीसी द्वारा 1997 में प्रकाशित इस एटलस का नया संस्करण 2006 में तैयार किया गया था और उसमें विभिन्न आपदाओं से संबंधित ताजा जानकारियां दी गई थीं।

गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और बिहार मानव जीवन क्षति, पशुधन, मकानों और फसलों की क्षति के मामले में शीर्ष 10 राज्यों में आते हैं। आध्र प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में आपदाओं से सर्वाधिक क्षति मवेशियों की होती है। मानव जीवन की सबसे अधिक क्षति उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में होती है। मकानों और फसलों की क्षति भी इन्हीं चार राज्यों में सर्वाधिक होती है। यद्यपि जोखिम के कारणों का सही-सही पता तो उनके और विश्लेषण से ही चल सकेगा, लेकिन यह कहा जा सकता है कि उपर्युक्त राज्य उच्च जोखिम वाली श्रेणी के अंतर्गत आते हैं और उन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

आपदाएं भारत में व्यापक नुकसान और विघटन का कारण रही हैं जहाँ सुखा, बाढ़ समुद्री तूफान और भूकंप जैसी प्राकृतिक विपदाएं तथा कभी-कभी भीपाल में गैस रिसने जैसी मानव निर्मित त्रासदियां बारम्बार कहर ढहाती हैं। कुछ आपदाएं जैसे 1984 की भोपाल गैस दुर्घटना, 1995 में सूरत में प्लेग का प्रकोप और 1998 में ड्राप्सी महामारी स्पष्ट रूप से मानवकृत आपदाएं कही जा सकती हैं। एशिया में 1993-1997 के दौरान कई तीव्र भूकंप आएजहां जान-माल के नुकसान का अनुपात अधिक था। सन् 1999 में ओडीशा में आया महाचक्रवात, सन् 2001 में गुजरात में आया भूकंप क्षति एवं विनाश की गंभीरता के संदर्भ में विगत् सदी के अंतिम दशक की सर्वाधिक विनाशकारी विपति थी। 26 दिसंबर, 2004 को भारत के तटीय क्षेत्रों में भूकंप आया जिससे सुनामी लहरें उत्पन्न हुई और जिनसे आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु राज्यों के तटवर्ती क्षेत्र तथा पुदुचेरी एवं अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह संघ क्षेत्र प्रभावित हुए। इससे व्यापक जान-माल की क्षति हुई। उल्लेखनीय है कि सुनामी आपदा का अनुभव देश में पहली बार हुआ।

16 जून, 2013 को उत्तराखंड में बादल फटने से आई विध्वंसकारी बाढ़ एवं भू-स्खलन ने बड़ी मात्रा में जान-माल का नुकसान किया। इस विध्वंसकारी प्राकृतिक आपदा में हजारों लोग काल-कवालित हुए एवं लाखों बेघर हो गए। इस आपदा ने एक बार फिर हमारी आपदा से निपटने एवं उसके प्रबंधन पर प्रश्नचिंह खड़ा कर दिया है।

भारत में बड़े पैमाने पर और तीव्र शहरीकरण हो रहा है और यह शहरीकरण जोखिम को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा रहा है। जान-माल को उस समय अधिक खतरा पैदा हो जाता है जब ख़राब निर्माण और रखरखाव वाले आधारभूत ढांचे के उच्च घनत्व वाले क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा-पर्यावरण ह्रास, आग,बाढ़ एवं भूकंप आते हैं। भारत के पर्वतीय क्षेत्र हमारे देश का विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र का जहां विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं वाले कई प्रकार के जातीय समूह रहते हैं और सभी प्रमुख प्राकृतिक आपदाएं इसी क्षेत्र में आती हैं। जिससे लोगों का सामाजिक-आर्थिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है तथा लोगों की दुर्दशा होती है। प्राकृतिक आपदाएं, समुद्री तूफान एवं उनके साथ आने वाली चक्रवाती लहरें नियमित रूप से तटवर्ती इलाकों में आती हैं और विपत्ति लाती हैं, लेकिन इन विपदाओं से होने वाला नुकसान हाल में काफी व्यापक हुआ है, जिसका मुख्य कारण तटवर्ती इलाकों में आबादी का बढ़ता दबाव है। खतरनाक क्षेत्रों में बसने की इस प्रवृत्ति तथा आने वाले दशकों में अनुमानित जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र तल के बढ़ने से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन क्षेत्रों में भविष्य में आपदाओं की संख्या में बढ़ोतरी होगी।


आपदा प्रबंधन में शामिल तत्व

आपदा प्रबंधन वह प्रक्रिया है जो आपदा के पूर्व की समस्त तैयारियों, चेतावनी, पहचान, प्रशासन, बचाव रहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण तथा आपदा से बचने के लिए अपनायी जाने वाली तत्पर अनुक्रियाशीलता इत्यादि के उपायों को इंगित करती है। आपदा प्रबंधन की खास विशेषताएं अग्रलिखित हैं-

  • आपदा प्रबंधन आपदा आने की चेतावनी से लेकर उसके पश्चात्, पुनर्वास, पुनर्निर्माण एवं भविष्य के लिए आपदा रोकथाम एवं बचाव इत्यादि कृत्यों तक विस्तारित है।
  • यह संपूर्ण लोक प्रशासन की एक ऐसी विशेषीकृत शाखा है जो प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न आपदाओं के नीति नियोजन, नियंत्रण, समन्वय, रहत, बचाव एवं पुनर्वास इत्यादि का अध्ययन करती है।
  • आपदा प्रबंधन एक जटिल तथा बहुआयामी प्रक्रिया है अर्थात् केंद्र, राज्य एवं स्थानीय शासन के साथ-साथ बहुत सारे विभाग, संस्थाएं एवं समुदाय इसमें अपना योगदान देते हैं।
  • यह प्राथमिक रूप से सरकारी दायित्व को इंगित करता है किंतु सामुदायिक एवं निजी सहयोग के बिना यह कार्य अधूरा है।
  • आपदाएं सार्वभौमिक एवं सर्वकालिक घटनाएं हैं इसलिए आपदा प्रबंधन का कार्य भी अंतरराष्ट्रीय समन्वय से जुड़ा हुआ है।

इसके अतिरिक्त आपदा प्रबंधन के कई आयाम हैं जिनके तहत जोखिम विश्लेषण, चेतावनी एवं वैकल्पिक व्यवस्था, बचाव एवं राहत कार्य, बहुउद्देशीय निर्णयन, पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण, इत्यादि आते हैं।


वैधानिक एवं संस्थात्मक रूपरेखा

भारत में आपदा प्रबंधन का कार्य परम्परागत रूप से राज्य सरकार, सामाजिक संस्थाओं, स्वैच्छिक संगठनों तथा अंतर्राष्ट्रीय अभिकरणों द्वारा केंद्र सरकार के सहयोग से किया जाता रहा है। आपदा प्रबंधन की दिशा में ठोस एवं व्यापक नीति एवं कानून बनाने के प्रयास 21वीं सदी से ही शुरू होने लगे हैं। मुख्यतः कृषि, भू-राजस्व, गृह एवं सिंचाई विभागों से सम्बद्ध रहा यह कार्य स्वाभाविक रूप से बहुआयामी एवं जटिल है। भारत में स्वतंत्रता के समय से ही केंद्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष तथा राज्यों में मुख्यमंत्री राहत कोष बने हुए हैं जिनमें आपदा के दौरान सहायता राशि दी जाती रही है। बड़ी गंभीर आपदाओं की राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाता है।

बाढ़, भूकंप, समुद्री तूफान, आदि को आने से नहीं रोका जा सकता है, क्योंकि वे उस प्राकृतिक पर्यावरण का हिस्सा हैं जिसमें हम रहते हैं, लेकिन हम यह कर सकते हैं की लोगों और उनकी संपत्ति के लिए जहां तक संभव हो सके इन प्राकृतिक आपदाओं के असर को हानिरहित बनाने के लिए समाज के विभिन्न स्तरों पर एहतियाती उपाय करें। खतरे अपरिहार्य हो सकते हैं, लेकिन आपदाओं को रोका जा सकता है। आपदा प्रबंधन विषय के बारे में संविधान की 7वीं अनुसूची की तीन सूचियों में कोई विवरण नहीं है। प्राकृतिक आपदा के मामले में बचाव, राहत एवं पुनर्वास की मूल जिम्मेदारी सम्बद्ध राज्य सरकारों की है तथा केंद्र सरकार की भूमिका भौतिक एवं वित्तीय संसाधनों की कमी को पूरा करने तथा चेतावनी, परिवहन एवं अनाज की अंतर्राष्ट्रीय आवाजाही आदि जैसे अनुपूरक उपाय करने वाले सहयोगी की होती है। विगत् दो दशकों के दौरान आई आपदाओं के विभिन्न वैज्ञानिक, इंजीनियरिंग, सामाजिक और वित्तीय प्रक्रियाओं को समाहित करते हुए बहुआयामी, बहुविषयक और बहुक्षेत्रक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। आतंकवाद के आंतरिक सुरक्षा के लिए एक प्रमुख खतरे के तौर पर उभरकर सामने आने से मानव निर्मित आपदा से प्रभावी ओर पेशेवर तरीके से निपटने के लिए तैयार रहने की अत्यधिक आवश्यकता महसूस की गई।

सरकार ने आपदा प्रबंधन दृष्टिकोण में परिवर्तन किया है। राहत-केन्द्रित दृष्टिकोण के स्थान पर समग्र दृष्टिकोण अपनाया गया है जिसमें आपदा प्रबंधन के समस्त पहलुओं को आच्छादित करते हुए रोकथाम, न्यूनीकरण, तैयारी, कार्यवाही रहत और पुनर्वास को सम्मिलित किया गया है। नवीन दृष्टिकोण इस विश्वास से निकलकर आया है कि प्रक्रिया में आपदा के न्यूनीकरण के लिए प्रबंध न किए जाएं। इस दृष्टिकोण की अन्य प्रमुख बात यह भी है कि आपदा न्यूनीकरण के लिए विकास के सभी पहलुओं को शामिल करते हुए एक बहु-विषयक प्रक्रिया तैयार करनी होगी। अभिमुखीकरण में परिवर्तन के अनुसार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संरचना (एनडीएमएफ) तैयार की गई है और इसे राज्य/संघ शासित क्षेत्र सरकारों के साथ बांटा गया है ताकि वे अपनी-अपनी योजनाओं को राष्ट्रीय योजना के व्यापक दिशा-निर्देशों के अनुसार संशोधित और अद्यतन कर सकें। राष्ट्रीय योजना में संस्थागततंत्रों, न्यूनीकरण, रोकथाम उपायों, विधि एवं नीति संरचना, तैयारी और कार्यवाही पूर्व चेतावनी प्रणाली, मानव संसाधन विकास और क्षमता निर्माण को शामिल किया गया है।


केंद्रीय विधि

देश में आपदाओं का मुकाबला करने, उनमें कमी लाने तथा पीड़ित व्यक्तियों का पुनर्वास करने के लिए वंचित संस्थात्मक तंत्र तैयार करने के लिए आपदा प्रबंधन विधेयक की 28 नवम्बर, 2005 को राज्य सभा तथा 12 दिसम्बर, 2005 को लोकसभा से स्वीकृति मिली। 23 दिसम्बर, 2005 से यह कानून प्रवर्तित हो गया। इस अधिनियम में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय प्रबंधन प्राधिकरण, मुख्यमंत्रियों की अध्यक्षता में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा जिला न्यायाधीशों की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण स्थापित करने का प्रावधान है। इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के अनुसार सम्बंधित मंत्रालयों और विभागों द्वारा विभागवार योजनाएं तैयार करने का भी प्रावधान है। इसमें आपातकालीन कार्यवाही के लिए राष्ट्रीय आपदा कार्यवाही बल तथा प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के गठन की भी व्यवस्था है। अधिनियम में राष्ट्रीय आपदा कार्यवाही निधि तथा राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण निधि और राज्य तथा जिला स्तरों पर इसी तरह की निधियों के गठन का भी प्रावधान शामिल है। इसमें पंचायती राज संस्थानों और नगरपालिकाओं जैसे शहरी स्थानीय निकायों सहित स्थानीय निकायों की विशिष्ट भूमिका निर्धारित की गई है।


राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण

कानून का अधिनियम होने तक सरकार ने 30 मई, 2005 को प्रधानमंत्री को अध्यक्ष के रूप में लेकर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का गठन किया। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 लागू होने के बाद अधिनियम के उपबंधों के अनुरूप 27 सितंबर, 2006 को एनडीएमए का गठन किया गया जिसमें 9 सदस्य हैं जिनमें से एक सदस्य को उपाध्यक्ष के रूप में पदनामित किया गया है। प्राधिकरण को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में यथापरिकल्पित कार्य सौंपे गए हैं-

  • आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं तथा दिशा-निर्देश निर्धारित करना;
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना तथा भारत सरकार के मंत्रालयों/विभागों द्वारा तैयार योजनाओं का अनुमोदन करना;
  • राज्य योजना निर्मित करने के लिए राज्य प्राधिकरणों के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करना;
  • आपदाओं की रोकथाम अथवा उनकी विकास योजनाओं तथा परियोजनाओं में इसके प्रभावों को कम-से-कम करने के उद्देश्य से उपायों सरकार के मंत्रालयों/विभागों द्वारा पालन किए जाने के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करना;
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के कार्यकरण हेतु स्थूल नीतियों एवं दिशा-निर्देश का निर्धारण करना;
  • प्रशमन के उद्देश्य से निधियों के प्रावधान की अनुशंसा करना;
  • आपदा प्रबंधन के लिए नीतियों और योजनाओं के प्रवर्तन और कार्यान्वयन का समन्वय करना;
  • बड़ी आपदाओं से प्रभावित दूसरे देशों को वैसी सहायता प्रदान करना जैसी केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाएं;
  • न्यूनीकरण के प्रयोजनार्थ निधियों के प्रावधान की सिफारिश करने तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संसथान की कार्यप्रणाली के लिए व्यापक नीतियां और दिशा-निर्देश निर्धारित करना।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अध्यक्ष को धारा-6(3) के अंतर्गत यह शक्ति दी गई है कि आपातकाल की स्थिति में वह उपर्युक्त सभी या कुछ कार्य स्वयं निर्धारित कर सकेगा किंतु उनका प्राधिकरण द्वारा कार्योत्तर अनुसमर्थन अनिवार्य होगा।

परामर्शकारी समिति

आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा-7 यह प्रावधान करती है कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एक सलाहकार समिति नियुक्ति कर सकता है जिसमें विभिन्न पहलुओं पर सिफारिश करने के लिए आपदा प्रबंधन के क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल होंगे। इसकी सहायता केंद्र सरकार द्वारा गठित की जाने वाली राष्ट्रीय कार्यकारी समिति द्वारा की जाएगी।

राष्ट्रीय कार्यकारी समिति

राष्ट्रीय कार्यकारी समिति, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और केंद्र सरकार की सभी योजनाओं और कार्यक्रमों के लिए कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करेगी।

आपदा जोखिम प्रबंधन कार्यक्रम

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम, यूएसआईडी, यूरोपियन यूनियन और कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की सहायता से बहु-जोखिम संभावित 17 राज्यों में 169 जिलों में आपदा जोखिम प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य, स्थानीय स्वशासित संस्थानों और समुदायों की भागीदारी से दीर्घावधि उपाय करना है। कार्यक्रम चलाने वाले राज्यों को राज्य, जिला और खंडस्तरीय आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार करने में सहायता दी जा रही है। पंचायती राज संस्थानों, और ग्रामीण स्वयंसेवक को शामिल करके बनाए गए आपदा प्रबंधन दलों द्वारा ग्रामीण स्तरीय आपदा प्रबंधन योजना विकसित की जा रही है और उन्हें तैयारी और कार्यवाही सम्बन्धी कार्यों जैसे खोज एवं बचाव, प्राथमिक चिकित्सा, राहत समन्वय, शरण स्थल प्रबंधन योजना इत्यादि में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत ईओसी के लिए उपकरणों की व्यवस्था ऑपरेशन केंद्रों का गठन भी किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, बड़ी संख्या में स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं तथा अन्य भागीदारों को भी इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।

राहत मापदण्डों हेतु दिशा-निर्देश

अधिनियम में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की यह दायित्व दिया गया है कि (धारा-12) वह आपदा प्रभावित व्यक्तियों को दी जाने वाली राहत के न्यूनतम मापदण्डों के क्रम में निर्देश दे। आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा-13 यह प्रावधान करती है कि उच्च क्षमता वाली आपदाओं के समय राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण पीड़ितों के प्रवर्तित ऋणों पुनर्भुगतान क्रम में राहत या विशेष छूट पर नए ऋणों की स्वीकृति की अनुशंसा कर सकता है।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण

आपदा प्रबंधन अधिनियम (धारा-14) सुनिश्चित करता है कि राज्य सरकार सरकारी राजपत्र में अध्यादेश जारी करके एक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन करेगी।

जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण

राज्य सरकार (अधिनियम की धारा-25 के तहत्) राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्रत्येक जिले में एक जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन करेगी। जिन जिलों में जिला परिषद् है, वहां जिला प्रमुख ही सह-अध्यक्ष होगा। अधिनियम में प्रावधान है कि राज्य सरकार अतिरिक्त जिला कलक्टर स्तर के अधिकारी को जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करेगी।

तैयारी उपाय

जनजागरूकता एवं प्रचार सामग्री

समग्र आपदा जोखिम प्रबंधन रणनीति के एक भाग के रूप में जागरूकता पैदा करने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया गया है। आकाशवाणी, दूरदर्शन, और प्रिंट मीडिया की सहायता लेकर जागरूकता का दायरा विस्तृत किया जा रहा है।

राष्ट्रीय आपदा कार्यवाही बल

आपदा स्थितियों में विशिष्ट कार्यवाही के प्रयोजनार्थ केंद्रीय पुलिस बलों की 8 बटालियनों को शामिल करके एक एनडीआरएफ गठित किया जा रहा है। इस बल का सामान्य अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में निहित होगा तथा बल की कमान और पर्यवेक्षण महानिदेशक, सिविल सुरक्षा एवं एनडीआरएफ के पास होगी।

राज्य की विशेषज्ञता प्राप्त कार्यवाही टीमें

राज्यों को आपदा से निपटने के लिए अपनी-अपनी विशेषज्ञता प्राप्त कार्यवाही टीमें गठित करने की भी सलाह दी गई है। केंद्र सरकार प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए सहायता उपलब्ध करवा रही है। राज्य सरकारों को सलाह दी गई है कि वे आपदा राहत निधि में अपने वार्षिक आवंटन के 10 प्रतिशत भाग का उपयोग खोज एवं बचाव उपकरण और संचार उपकरण प्राप्त करने पर व्यय कर सकते हैं।

क्षेत्रीय कार्यवाही केंद्र (आरआरसी)

15 क्षेत्रीय कार्यवाही केंद्रों की पहचान की गई है और इन्हें आवश्यक खोज बचाव उपकरणों के भण्डारण के लिए विकसित किया जा रहा है ताकि इस प्रकार के उपकरणों की नजदीकी आर.आर.सी. से आपात स्थल पर अविलम्ब पहुंचाया जा सके।

दुर्घटना कमान प्रणाली

आपदा कार्यवाही प्रबंधन के व्यवसायीकरण के लिए एक दुर्घटना नियंत्रण प्रणाली लागू की जा रही है। इस प्रणाली में दुर्घटना प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं में प्रशिक्षित दुर्घटना कमाण्ड और अधिकारियों के साथ विशेषज्ञता प्राप्त दुर्घटना कमाण्ड दलों की व्यवस्था है।

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक डाटा बेस

वेब पर उपलब्ध एक केंद्रीकृत डाटाबेस प्रचालन में आ गया है। भारतीय आपदा संसाधन नेटवर्क, आपदा रहत के लिए विशिष्ट उपकरणों और मानव शक्ति संसाधनों सहित आवश्यक और विष्ट संसाधनों की एक राष्ट्र स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक सूची है।

आपदा राहत कार्य

भारत सरकार के सम्बंधित मंत्रालयों एवं विभागों को सलाह दी गयी थी कि वे त्वरित कार्रवाई के लिए आपात सहायता कार्य योजना बनाएं और कार्यवाही दलों का गठन करें तथा संसाधनों की अग्रिम रूप से निर्धारित करें।

संचार नेटवर्क

बड़ी आपदा आने की स्थिति में सर्वप्रथम सामान्यतः संचार सुविधा प्रभावित होती है चूंकि ऐसी स्थिति में सामान्यतः परम्परागत संचार नेटवर्क प्रणाली ख़राब हो जाती है। इसलिए यह निर्णय लिया गया है की पर्याप्त रूप से संसाधनों से युक्त एक बहुप्रणाली, बहुचैनल संचार प्रणाली स्थापित की जाए।

आपदा राहत निधि

बारहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर आवंटित राशि सहित प्रत्येक राज्य के लिए एक सीआरएफ का गठन किया गया है। सीआरएफ्. में भारत सरकार और राज्य सरकार द्वारा 3:1 के अनुपात में योगदान किया जाता है। गंभीर प्रकृति की आपदा आने की स्थिति में, जहां राहत अभियानों के लिए धनराशि की आवश्यकता, राज्य के सीआरएफ खाते में उपलब्ध धनराशि से अधिक होती है, तो यथानिर्धारित प्रक्रिया के पालन के पश्चात् राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता निधि से अतिरिक्त केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली

भारतीय महासागर में सुनामी और तूफानी तरंगों की उत्पत्ति के बारे में पहले से ही चेतावनी दे देने के लिए भारत सरकार ने पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की है।


मानव विकास रिपोर्ट और आपदा प्रबंधन

एक प्रभावी आपदा प्रबंधन नीति और व्यवस्था के लिए जरूरी है कि वैश्विक एवं देश के स्तर पर आपदा संबंधी स्थिति, सूचनाएं एवं भविष्यवाणियों की पहले समीक्षा कर ली जाए। इस कड़ी में सबसे बेहतर और जरूरी होगा यूएनडीपी (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम) की वार्षिक रिपोर्ट पर गौर करना। वर्ष 2011 की मानव विकास रिपोर्ट कथित तौर पर टिकाऊ एवं न्यायसंगत विकास पर केंद्रित है। इस रिपोर्ट में इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया गया है कि नित्य हो रहे पर्यावरणीय नुकसान से दुनिया के वंचित एवं निर्धन लोगों की परेशानियां और बढ़ी हैं।

मानव विकास रिपोर्ट 2011 मानती है कि गैर-बराबरी बढ़ाने वाली प्रक्रियाएं अन्यायपूर्ण हैं। रिपोर्ट कहती है की लोगों के लिए बेहतर जिंदगी के अवसर किसी ऐसे कारक से बाधित नहीं होने चाहिए जो उसके नियंत्रण से बाहर हैं। असमानताएं विशेष रूप से तब अधिक अन्यायपूर्ण होती हैं जब एक समूह विशेष को लिंग, नस्ल या जन्म स्थान के आधार पर सुनियोजित ढंग से वंचित रखा जाता है। इस रिपोर्ट का सांख्यिकीय पूर्वानुमान बताता है की पर्यावरणीय चुनौती के परिप्रेक्ष्य तथा सन्दर्भ रेखा की तुलना में वर्ष 2050 तक मानव विकास संकेतक (एचडीआई) 8 प्रतिशत (दक्षिण एशिया तथा सब सहारा अफ्रीकी देशों में 12 प्रतिशत) कम हो जाएंगे। यह एक ऐसे पर्यावरणीय चुनौती के परिदृश्य में होगा, जिसमें वैश्विक तापन की वजह से कृषि उत्पादन, साफ पेयजल आदि में कमी आएगी और प्रदूषण की समस्याएं बढ़ेगी। इस दौरान प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि की वजह से वैश्विक एचडीआई अनुमानित संदर्भ रेखा से घटकर 15 प्रतिशत तक नीचे गिर जाएगा। रिपोर्ट कहती है कि इन आपदाओं से दुनिया की डेढ़ अरब आबादी प्रभावित होगी और इनमें सबसे ज्यादा बुरी हालत भारत सहित अन्य दक्षिण एशिया के देशों के लोगों की होगी।

मानव विकास रिपोर्ट, 2011 यह भी बताती है कि सन् 1870 से अब तक समुद्र के औसत स्तर में 20 सेंटीमीटर की वृद्धि हो चुकी है। परिवर्तन की यह दर अब अधिक तेज है। यह तेजी यदि बनी रही तो सन् 2100 में समुद्र स्तर में हुई आधे मीटर की वृद्धि से फ्रांस और इटली के क्षेत्रफल के बराबर के इलाके में, 10 लाख वर्ग किलोमीटर में, पानी भर जाएगा, और करीब 17 करोड़ लोग तबाह हो जाएंगे।

मानव विकास रिपोर्ट की इस पृष्ठभूमि में यदि हम आपदा प्रबंधन की बात करें तो हमें आशंका होती है कि प्रशासनिक ढीलापन, भ्रष्टाचार, एवं राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में हमारे आपदा प्रबंधन नीति और कार्यपालन के स्तर पर क्या हमें भविष्य की आपदाओं से सुरक्षित बचाया जा सकेगा? हमें एक मुकम्मल आपदा प्रबंधन नीति की सख्त दरकार है लेकिन इसके साथ-साथ एक साफ-सुथरा प्रशासन और राष्ट्रीय व सामाजिक भावना से ओत-प्रोत लोग भी होने चाहिए जो इस आपदा प्रबंधन की इकाई बन सकें।

आपदा प्रबंधन की कड़ी में मानव जीवन के साथ-साथ भौतिक सामानों का बीमा और बिमा में आकस्मिक आपदा, भूकंप, अग्निकांड, आतंकवाद, बढ़, तूफान, सुनामी आदि आपदाओं को शामिल करके भी एक नई पहल की जा सकती है। इसके लिए सरकार को विशेष रूप से पहल करनी पड़ेगी और आम लोगों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाना होगा ताकि लोग बीमा के महत्व को समझकर नियमित पॉलिसी ले सकें। हालांकि कुछ बीमा कंपनियां इस दिशा में कार्य कर रही हैं लेकिन आंकड़े बताते हैं कि आकस्मिक दुर्घटना या आपदा के लिए पॉलिसी लेने वाले नागरिकों की संख्या बेहद कम है।

आपदा प्रबंधन के लिए एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि स्थानीय वे पारंपरिक जानकारी अधिकतर मामलों में बेहद कारगर व प्रभावी होती है। रिपोर्ट बताती है कि सुनामी के दौरान भी अंडमान में बने पुराने व पारंपरिक घर नहीं टूटे। ऐसा ही हिमालय क्षेत्र में आए भूकंप में देखा गया। वहां के कई प्राचीन व पारम्परिक भवनों, मंदिर-मस्जिदों को अधिक नुकसान नहीं हुआ। भूकंप या आपदा संभावित क्षेत्र के लोग जानते हैं कि इन आपदाओं से निबटने के लिए भवन बनाते समय मजबूत, टिकाऊ व पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल करना है। भारतीय पुरातत्व व विज्ञान तकनीक विभाग इस बात की पुष्टि करता है कि आपदाओं में प्राचीन सार्वजनिक महत्व के निर्माणों की अधिक क्षतिग्रस्त नहीं देखा गया है।

आपदा प्रबंधन के लिए एक और जरुरी बात जरुरी है, वह है- आपदाओं के साथ जीने की कला का विकास। जापान के लोग आपदाओं के साथ जीने का अभ्यास करते हैं सब जानते हैं की जापान सर्वाधिक भूकंप संभावित क्षेत्र है। खासकर जापान के उन इलाकों में भी लोग पूरे उत्साह से जीवन जीते हैं जहां लगभग प्रत्येक वर्ष भूकंप के झटके आते रहते हैं। उत्तर बिहार के कोसी क्षेत्र के लोग जो लगभग प्रत्येक वर्ष भीषण बढ़ की आपदा झेलते हैं कभी बढ़ को कोसते नहीं। वहां के लोग कहते हैं- बाढ़ से जीबौ, बांध से मरबौ, अर्थात् हम बाढ़ से जीते हैं और बांध से मरते हैं। कई जाने-माने वैज्ञानिक एवं बिहार बाढ़ विशेषज्ञ तथा कोसी क्षेत्र से जुड़े समाजकर्मी इस अनुभव को बेहतर समझते हैं।


आपदा प्रबंधन की चुनौतियां

विभिन्न राज्यों में आपदाओं से निपटने में केंद्र के सामने अनेक चुनौतियां हैं। अधिकांश आपदाएं जलीय और मौसम विज्ञान संबंधी खतरों के कारण आती हैं। दुर्भाग्यवश इनकी संख्या, भयावहता और तीव्रता बढ़ती जा रही है। जोखिम की संभावना वाले अधिकतर राज्यों में इन भीषण घटनाओं में निपटने की तैयारियां पर्याप्त नहीं हैं। इन आपदाओं का चरित्र पूर्व की तुलना में अब अधिक भयावह होता जा रहा है। घटनाओं की प्रकृति में यह परिवर्तन केवल उनकी तीव्रता अथवा प्रभाव क्षेत्र में कालांतर में आए परिवर्तन तक ही सीमित नहीं रह गया है, अपितु अब यह घटनाएं नए-नए क्षेत्रों में भी घटित होने लगी हैं-

  • ऐसे में जबकि सरकार के पास कार्रवाई करने की व्यवस्था मौजूद है और क्षमताओं को सुदृढ़ बनाया जा रहा है, देश को आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में विशेषज्ञ वृत्तिजीवियों की आवश्यकता है ताकि आपदाओं को रोका जा सके और उनका शमन किया जा सके। लेकिन इसके लिए सरकार में और उसके बाहर, जिसमें अकादमिक संस्थाएं भी शामिल हैं, मानव कौशल विकास की उपलब्ध क्षमता सर्वथा अपर्याप्त हैं।
  • संस्थागत संरचना, नीतियों, कानूनों और दिशा-निर्देशों के रूप में हमारे पास एक सहायक वातावरण मौजूद है। अनेक राज्यों में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अभी भी काम करने की स्थिति में नहीं है। अनेक राज्यों में अभी भी उच्च राज्य स्तरीय कार्य योजना तैयार नहीं हो सकी है।
  • वित्त मंत्रालय ने स्वीकृति की पूर्व शर्त के रूप में सभी नई परियोजनाओं को आपदा शमन के नजरिए से छानबीन करने के आदेश जारी तो किए हैं, परंतु इसके प्रमाणित करने वाले अधिकारियों के पास ऐसा करने की वांछित योग्यता ही नहीं है।
  • जोखिम को कम करने के लिए जिस चीज की सर्वाधिक जरूरत होती है, वह है- जोखिम की अच्छी समझ। सभी राज्य सरकारें जोखिम के विस्तृत आकलन की पद्धति से परिचित नहीं हैं और इस कार्य को हाथ में लेने की सरकार की पर्याप्त क्षमता भी नहीं हैं।
  • आपदा के जोखिम को कम करने के प्रयासों को विकास के एक मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। पंचवर्षीय योजनाओं (10वीं और 11वीं) में स्पष्ट रूप से ऐसा करने को कहा गया है, परंतु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है।
  • जलवायु से जुड़े जोखिम संबंधी प्रबंधन को विकास की समस्याओं के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है और उसकी क्षमता के विकास की भी आवश्यकता है। कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन, अधोसंरचना और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इन क्षेत्रों से जुड़े संबंधित विभागों को अपने वैकल्पिक प्रयासों में आपदा जोखिम शमन को प्रमुखता से सम्मिलित करना होगा। चल रहे कार्यक्रमों को भी आपदा जोखिम शमन से समेकित करने का प्रयास करने की आवश्यकता है।
  • मानव संसाधन विकास को व्यवस्थित रूप देना होगा। क्षमताओं के विकास के लिए मात्र प्रशिक्षण ही पर्याप्त नहीं होगा। प्रशिक्षकों और प्रशिक्षणार्थियों का चयन व्यवस्थित ढंग से करना होगा और पुनश्चर्या प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रावधान करना होगा।
  • भीषण आपदाओं से निपटने के अनेक पारंपरिक ज्ञान (तौर-तरीकों) को या तो हम भूल चुके हैं या फिर उनको आजमाया नहीं जाता। इनमें से अनेक को पुनर्जीवित कर कुछ वैज्ञानिक पुट देकर उन्हें और सुदृढ़ बनाया जा सकता है।
  • जोखिम की संभावना वाले समुदायों के खतरे में कमी लाने यानी उसका सामना करने के लिए समर्थ और सशक्त बनाना होगा। भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के साथ-साथ विभिन्न क्रियाओं, तैयारियों और शमन के उपायों को व्यवस्थित रूप से अंजाम देने वाली सामुदायिक आपदा प्रबंधन योजनाओं को लागू करना होगा। इन योजनाओं की प्रभाविकता के परीक्षण के लिए बनावटी अभ्यास (मॉक ड्रिल) की भी आवश्यकता है।

गौरतलब है कि आपदा प्रबंधन की सरकार के केवल एक विभाग के कार्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह सभी विभागों और विकास सहभागियों का उत्तरदायित्व है। भीषण आपदाओं से हो सकने वाली संभावित मुसीबतों और विद्यमान जोखिम को समझना महत्वपूर्ण होगा और उनसे जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयारियां बढ़ानी होगी। राज्य और जिला योजनाओं के अतिरिक्त प्रत्येक भवन और परिवार की आपदा प्रबंधन योजनाएं तथा उनके लिए तैयारियां होनी चाहिए। निवारण की संस्कृति हमारी जीवनशैली में ही शामिल होनी चाहिए। कोई विवशता अथवा कृतज्ञता की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आपदाओं के प्रबंधन के तीन चरण होते हैं-

  1. रोकथाम के उपायों द्वारा क्षेत्र को आपदा शून्य करना;
  2. आपदा से निपटने की तैयारी; और
  3. आपदा पश्चात् राहत एवं बचाव तथा पुनर्वास।

प्राकृतिक आपदा हो या मानव निर्मित आपदा हो, या मानव निर्मित आपदा हो, प्रत्येक स्थिति में जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों एवं उच्चाधिकारियों की ओर आशा भरी नजरों से देखती है। अतः शासन-प्रशासन की इसके प्रशमन में महत्ती भूमिका होती है। सारांशतः सुनियोजित आपदा प्रबंध तकनीकें, जागरूकता अभियान एवं प्रशासनिक समन्वय द्वारा आपदाओं के प्रभावों को न्यूनतम किया जा सकता है।

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