जीवमंडल Biosphere

जैव जीव विभिन्न प्रकार के आवास स्थानों में मिलते हैं, जैसे-भूतल अथवा समुद्र के जल में, बर्फ से ढके क्षेत्रों में, वायु तथा मृदा में। आप जैव जगत के संगठन से परिचित हैं। इस संगठन के पदानुक्रम को जैव वर्णक्रम की तरह माना जा सकता है, जो विभिन्न स्तरों से मिलकर बना है। इस स्तरों का प्रसार आण्वीय-कोशिकीय से लेकर पारिस्थतिकीय तंत्र तथा जीव मण्डल तक हो सकता है। विभिन्न स्तर एक-दूसरे को प्रभावित करने के अतिरिक्त ये एक-दूसरे पर निर्भर भी रहते हैं, इसलिये किसी स्तर पर अलग से विचार कर पाना कठिन है।

जीव मण्डल की अपनी संरचना होती है, जो जैव एवं अजैव घटकों से मिलकर बनी है। प्रत्येक घटक एक विशिष्ट कार्य सम्पन्न करता है। समस्त कार्यो का कुल योग जीव मण्डल को प्रकार्यात्मक स्थिरता प्रदान करता है। सम्भवत: यही कारण है कि जीव मण्डल को सबसे बड़ा जैव तंत्र माना जाता है।

जीव मण्डल-संरचना तथा कार्य

आप जनसंख्या, जैव समाज एवं पारिस्थितिक तंत्र जैसे शब्दों से परिचित हैं। किसी भी प्रजाति के एक स्थान पर पाए जाने वाले जीवों की कुल संख्या को जनसंख्या कहते हैं। किसी क्षेत्र के अन्तर्गत इन जीवों की कुल जनसंख्या सम्मिलित रूप में जैव समाज का निर्माण करती है। ये जैव समाज लगातार एक-दूसरे से तथा अपने भौतिक वातावरण से पारस्परिक क्रिया करते रहते हैं।

उदाहरण के लिए, अपने घर में आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं। आप पड़ोसियों के साथ भी पारस्परिक क्रिया करते हैं। पाठशाला में आप सहपाठियों, मित्रों एवं अध्यापकों के साथ पारस्परिक क्रिया करते हैं। इसी प्रकार आपका अपने आप-पास के जन्तुओं एवं पेड़ पौधों के साथ कुछ सम्बन्ध होता हैं। आप अपने भौतिक वातावरण के साथ भी पारस्परिक क्रिया करते हैं। जैव संसार में ऊर्जा एवं पदार्थ का निवेश आवश्यक है, जिनका जैव एवं अजैव घटकों के मध्य लगातार विनिमय (आदान-प्रदान) होता रहता है। यह प्रकार्यात्मक तंत्र, पारिस्थितिक तंत्र कहलाता है। उदाहरण के लिए, कोई तालाब, झील, जंगल (प्राकृतिक), खेत तथा मानव निर्मित जल-जीवशाला विभिन्न जलीय एवं स्थलीय पारिस्थतिक तंत्रों को निरूपित करते हैं।

किसी भौगोलिक क्षेत्र में समस्त पास्थितिक तंत्र एक साथ मिल कर एक और भी बड़ी इकाई का निर्माण करते हैं, जिसको जीवोम अथवा बायोम कहते हैं। उदाहरण के लिए मरुस्थली बायोम या वन बायोग में कोई तालाब, झील, घास का मैदान या वन भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं। संसार के समस्त बायोमों को एक साथ मिलाकर एक और भी बड़ी इकाई का निर्माण होता है, जो एक विशाल स्वयंपोशी जैव तंत्र है और इसे जीवमंडल कहते हैं। जीव जंतु समुद्रतल से 7-8 किमी की ऊंचाई तक वायु में तथा 5 किमी तक की गहराई पर समुद्र के नीचे पाए जाते हैं। पृथ्वी का पोषण करने वाले ये क्षेत्र जीव मण्डल का निर्माण करते हैं।

जैसाकि आप जानते हैं पृथ्वी पर स्थल, जल तथा वायु जैव जीवों का पोषण करते हैं। पृथ्वी का जो भाग जल से बना है, वह जल मण्डल बनाता है। पृथ्वी के स्थलीय सतह पर तथा सागर जल के अन्दर भी मृदा एवं चट्टानें हैं। इस भाग को स्थल मण्डल कहते हैं। पृथ्वी सतह से ऊपर वायु पृथ्वी का गैसीय घटक है जिससे वायुमण्डल बनता है। जब हम इन तीनों मण्डलों (वायु-जल-स्थल) के साथ-साथ समस्त जैव जीवों को सम्मिलित रूप में एक बड़ी इकाई के रूप में लेते हैं, तो इसे जीव-मण्डल के रूप में जाना जाता है।


जीव मण्डल को जैव तंत्र के रूप में जाना जाता है। हम इसे तंत्र क्यों कहते हैं? शब्द कोष के अनुसार तंत्र शब्द का अर्थ है एक ऐसी इकाई जिसके विभिन्न घटक अथवा भाग सम्मिलित रूप में कुछ निवेश प्राप्त करते हैं, पारस्परिक क्रिया (प्रकार्य) करते हैं तथा उत्पाद प्रदान करने की कोई प्रविधि दर्शाते हैं, जिसके फलस्वरूप उस इकाई को कुल मिलाकर प्रकार्यात्मक स्थिरता प्राप्त होती है। उदाहरण के लिये घड़ी में चाबी भरना निवेश है, जिसका परिणाम होता है घड़ी के विभिन्न भागों में पारस्परिक क्रिया। घड़ी द्वारा समय दर्शाना इन समस्त पारस्परिक क्रियाओं का निर्गत या परिणाम है। कोई ऐसा तंत्र, जिसमें जैव तथा अजैव घटक उपरोक्त ढंग से पारस्परिक क्रिया करते हैं, किसी पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं या बड़े स्तर पर जीव मण्डल का निर्माण करते हैं। आइए हम जीव मण्डल का अध्ययन किसी बड़े जैव तंत्र के उदाहरण के रूप में करें। याद रहे कि जनसंख्या, समाज (जैव), भौतिक पर्यावरण (अजैव) सभी पारिस्थितिक तंत्र के घटक हैं। ये घटक पारिस्थितिक तंत्र को संरचना प्रदान करते हैं तथा लगातार होने वाली पारस्परिक क्रियायें तथा एक दूसरे पर उनकी निर्भरता के परिमाणस्वरूप ही इसके विभिन्न प्रकार्य सम्पन्न होते हैं। सम्मिलित रूप में यही प्रकार्य किसी पारिस्थितिक तंत्र को एक स्वतंत्र प्रकार्यात्मक इकाई का स्तर प्रदान करते हैं। हम किसी पारिस्थितिक तंत्र, जैसे कोई तालाब, वन, घास के मैदान इत्यादि की संरचना एवं प्रकायों का अध्ययन कर सकते हैं। यदि इस प्रकार प्राप्त समस्त जानकारी पर हम एक साथ विचार करें तो आप पाएंगे कि बड़ी इकाई, अर्थात् जीव मण्डल की संरचना तथा उसको अनेक प्रकार्य बहुत कुछ पारिस्थितिक तंत्र की संरचना तथा प्रकार्यों से मिलते-जुलते हैं।

जीव मण्डल के अजैव घटक बहुत से पदार्थों से बने हैं- जैसे, वायु, जल, मृदा तथा खनिज। प्रकाश, ताप, नमी तथा वायु दाब जैसे घटक जलवायु का निर्धारण करते हैं। किसी क्षेत्र की जलवायु, मृदा की प्रकृति तथा जल उपलब्धता से यह निश्चित होता है कि उस क्षेत्र में किस प्रकार के जीव पाए जाएंगे। वास्तव में, जैव तथा अजैव, दोनों ही घटक परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। आप स्थलीय एवं जलीय आवासों में इन प्रभावों के बारे में अध्ययन कर चुके हैं।

जीव मण्डल में जैव-जीव पौधे एवं जन्तु हैं। तत्पश्चात्, इन जीवों को इनकी पोषण पद्धति के आधार पर उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक के रूप में वर्गीकृत किया गया है। आइए हम इन शब्दों पर विस्तारपूर्वक विचार करें। जैसा कि शब्दों से स्पष्ट है। उत्पादक वे जीव होते हैं जो खाद्य पदार्थ का उत्पादन करते हैं। हम प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के बारे में पढ़ चुके हैं क्या आप इस वर्ग के अन्तर्गत समस्त पौधों को रख सकते हैं? यदि नहीं, तो क्यों? “उपभोक्ता' शब्द उन जीवों के लिए प्रयुक्त होता है जो खाद्य पदार्थ का उपभोग करते हैं। ये जीव, अन्य जीवों अथवा उनके किसी अंग अथवा अंगों का अपने भोजन के रूप में उपभोग करते हैं। आप बड़ी सरलता से समस्त जंतुओं को इस वर्ग में रख सकते हैं। गाय या भैस क्या खाती हैं? वे अन्य जीव, जैसे घास को क्यों खाती हैं? जीवों का एक तीसरा वर्ग भी हैं जिसे अपघटक कहते हैं। ये सूक्ष्म जीव हैं जिनके अन्तर्गत जीवाणु तथा कवक या फंगस आते हैं। ये मृत पौधों एवं जन्तु शरीरों के अपघटन में सहायता करते हैं। क्या आप इन अपघटकों के महत्व का अनुमान लगा सकते हैं, कल्पना कीजिये कि अपघटक न होते तो मृत जीवों के शरीरों का क्या होगा? मृदा फसलों को पोषण कैसे कर सकेगी? हम इसके बारे में चर्चा बाद में करेंगे।

पोषण पद्धति के आधार पर जीवों को स्वयंपोषी एवं परपोषी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। आपको ज्ञात है कि पहले वर्ग के जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं जबकि दूसरे वर्ग के जीव भोजन हेतु दूसरों पर निर्भर करते हैं। आप अध्ययन कर चुके हैं कि किस प्रकार जन्तु अपने भोजन के लिये पौधों एवं अन्य जन्तुओं का उपभोग करते हैं। मानव भी परपोषी है। हम भी अपना भोजन पकाकर स्वयं बनाते हैं, किन्तु यह प्रक्रिया पौधों से बहुत भिन्न है। वास्तव में हम सब्जियों एवं फलों का खाद्य पदार्थ के रूप में उपभोग करते हैं जो पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा बनाये जाते हैं। हम जन्तु उत्पाद भी लेते हैं, जैसे-दूध, अण्डा तथा मांस। यह भी हमें पौधों से ही प्राप्त होते हैं क्योंकि जन्तु पौधे खाते हैं।

परितंत्र की संरचना

एक परितंत्र के दो मुख्य घटक हैं – अजैव और जैव घटक।

क. अजैव घटक- अकार्बनिक व कार्बनिक पदार्थ, और जलवायु कारक, जैसे- हवा, पानी, मिट्टी और धूप अजैव घटक हैं।

1- अकार्बनिक पदार्थ ये विभिन्न पोषक तत्व और यौगिक, जैसे- कार्बन, नाइट्रोजन, सल्फर, फास्फोरस, कार्बन डाइऑक्साइड, जल आदि। 2- कार्बनिक यौगिक ये प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, खाद, मिट्टी पदार्थ आदि हैं।

ख. जैव घटक: ये निम्न प्रकार के होते हैं

1- उत्पादक ये क्लोरोफिल युक्त पौधे हैं। जैसे- काई (शैवाल), घास और पेड़।

प्रकाश संश्लेषण के दौरान ये सौर-ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं। चूंकि हरे पौधे अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं, अत: इनको स्वपोषी भी कहते हैं।

2- परभोक्ता: ये वे जीव हैं जिनकी भोजन आवश्यकताएं दूसरे जीवों को खाकर पूरी होती है। ये परपोषी या विषमपोषी कहलाते हैं जो सीधे पौधों (स्वपोषी) का भोजन करते हैं, शाकभक्षी या शाकाहारी कहलाते हैं, (टिड्डा, खरगोश, भेड़, बकरी)। वे प्राणी जो शाकाहारियों को खाते हैं, मांसभक्षी या मांसाहारी कहलाते हैं, जैसे-बाज, शेर आदि। वे जीव जो पौधों व प्राणियों दोनों का भोजन कर सकते हैं, सर्वाहारी या सर्वभक्षी कहलाते हैं (तिलचट्टा, लोमड़ी, मनुष्य)।

3- अपघटक जीव - ये मुख्यत: बैक्टीरिया व फफूंदी (कवक) हैं।

आहार श्रृंखला एवं खाद्य जाल

वनस्पति स्रोत से जीवों की एक श्रृंखला में इस भोजन हस्तांतरण, अर्थात बारंबार खाना और खाया जाना, की प्रक्रिया को आहार श्रृंखला कहते हैं। एक सरल-सी सामान्य आहारश्रृंखला ऐसे दिखाई जा सकती है-

उत्पादक (Producer) – शकभक्षी (Herbivorous)— मांसभक्षी (Carnivorous) जीवों को उदाहरणस्वरूप लेकर, एक साधारण स्थलीय आहार श्रृंखला ऐसे हो सकती है-

क. घास → हिरन → शेर

ख. घास → टिड्डा → मेंढक → सर्प → बाज

साधारण अवस्था में प्राय: कई आहार श्रृंखलाएँ आपस में जुड़ी होती हैं। अपनी भोजन आदतों के आधार पर एक प्राणी एक से अधिक आहार श्रृंखलाओं से संबंध रख सकता है। आहार श्रृंखलाओं के इस जाल को खाद्य जाल (Food web) कहते हैं।

पोषी स्तर: आहार श्रृंखला में भिन्न चरण या स्तर अलग-अलग पोषी स्तर बनाते हैं। हरे पौधे स्वपोषी, पहले पोषी स्तर है जो सूर्य की विकिरण ऊर्जा को शोषित करते हैं (उत्पादक) और आगे आने वाले दूसरों (परभोक्ता) के लिए उपलब्ध कराते हैं। शाकभक्षी प्रथम परभोक्ता – कीट, खरगोश, रोडेंट, हिरन, पशु आदि जो पौधे खाते हैं, दूसरा पोषी स्तर हैं। वे प्राणी जो शाकभक्षियों को खाते हैं, और द्वितीय परभोक्ता या मांसभक्षी कहलाते हैं, तीसरा पोषी स्तर बनाते हैं। ये सभी बड़े मांसभक्षियों (तृतीय परभोक्ता – शेर) द्वारा खाए जाते हैं, जो चौथा पोषी स्तर बनाते हैं। ऊंचे पोषी स्तरों के प्राणी अपने भोजन के साथ और भी अधिक विष प्राप्त करते हैं। इसे जैव आवर्धन कहते हैं। कुछ ऊर्जा प्रत्येक पोषी स्तर पर खो जाती है, परन्तु पोषक अवयवों में ऐसी कोई कमी नहीं होती। जब अंततः मृतप्राणी शरीर अपघटन के लिए अपघटकों (Decomposer) के पास आता है, पोषक तत्व वातावरण में मुक्त हो जाते हैं, यहाँ ये दुबारा उपयोग एवं पुनः चक्रण के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। अजैव पर्यावरण (भू-चट्टान, वायु, जल) और जीवों के मध्य पोषक तत्वों को चक्रीय प्रवाह को जीव-भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical cycle) कहते हैं।

आहार श्रृंखला

उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक, जीव मण्डल के जैव घटक हैं। उनकी भोजन बनाने की तथा उपभोग संबंधित पारस्परिक क्रियायें, जीव मण्डल का एक अन्य मनोरंजक लक्षण हैं। किसी जीव द्वारा किसी अन्य जीव का उपभोग करने की क्रमबद्ध प्रक्रिया किसी आहारश्रृंखला का निर्माण करती है। आहारश्रृंखला के विभिन्न स्तरों पर भोजन का स्थानान्तरण होता है। इन स्तरों को पोषण रीति कहते हैं। किसी क्षेत्र अथवा आवास की आहार श्रृंखला का अध्ययन करने से हमें विभिन्न जीवों में होने वाली पारस्परिक क्रियाओं तथा उनकी परस्पर निर्भरता का ज्ञान हो जाता है।

आइए हम किसी घास के मैदान में संपन्न हो रही एक सरल आहारश्रृंखला का अध्ययन करें। यह निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित की जा सकी है –

घास----हिरण----शेर

चित्र में घास, उत्पादक स्तर दर्शाती है। यह कार्बोहाइड्रेट के रूप में भोजन बनाने हेतु सूर्य प्रकाश का उपयोग करती है। इसका हिरणों द्वारा उपभोग किया जाता है। हिरणों का उपभोग शेर करता है। इस श्रृंखला में हिरण जैसे जन्तु, जो केवल पौधे खाते हैं, शाकाहारी कहलाते हैं। उपरोक्त आहारश्रृंखला में हिरण को खाने वाले शेर को मांसाहारी कहते हैं। ऐसे भी जन्तु हैं, जो पौधे और जन्तु, दोनों का ही उपभोग करते हैं। उनको सर्वभक्षी कहते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मानव है।

अभी हमने तीन चरणों वाली आहारश्रृंखला पर विचार किया था। इसी घास मैदान में अनेक अन्य आहार श्रृंखलाएं भी संपन्न हो सकती हैं। उदाहरण के लिए चार चरणों वाली श्रृंखला निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित की जा सकती थी –

घास----कीट----मेंढ़क---पक्षी

आइए देखें कि जीव मण्डल के जलीय पारिस्थतिक तंत्र में क्या होता है? तालाबों, झीलों या समुद्र में आहारश्रृंखला में निम्नलिखित जीव हो सकते हैं- पादप प्लवक तथा प्राणि प्लवक। पादप प्लवक के अन्तर्गत सूक्ष्म पादप तथा जल में तैरते हुए पौधे आते हैं, जबकि प्राणि प्लवक में सूक्ष्म जन्तु तथा स्वतंत्र रूप से तैरते हुए जन्तु होते हैं।

कार्य या शैवाल(पादप प्लवक)----छोटे जन्तु----बड़ी मछली (प्राणि प्लवक)

किसी घास के मैदान, वन, खेत या तालाब या किसी भी पारिस्थतिक तंत्र या जीव मण्डलों में प्रतिपादित होने वाली आहार श्रृंखलायें आपस में अनेक प्रकार से, जैसे आड़े तिरछे जुड़कर एक जाल सा बनाती हैं। आहारश्रृंखलाओं के इस जाल को खाद्य जाल कहते हैं।

किसी आहारश्रृंखला में प्रत्येक जीव कोई विशेष स्थान ग्रहण करता है जैसे कि उपरोक्त आहारश्रृंखला में कीट या शेर या मछली का स्थान प्रदर्शित किया गया है। कोई जीव एक से अधिक आहार श्रृंखलाओं में स्थान ग्रहण कर सकता है। उदाहरण के लिए हिरण सियार द्वारा खाया जा सकता है और शेर द्वारा भी खाया जा सकता हैं आहारश्रृंखला में उत्पादक तथा उपभोक्ता का स्थान ग्रहण करने वाले जीव पारिस्थितिक तंत्र या जीव मण्डल को कोई निश्चित संरचना प्रदान करते हैं। इनको पोषण रीति कहते हैं। आइए हम तीन से अधिक पोषण रीति वाली आहारश्रृखला को विभिन्न स्तरों का अध्ययन करें। इन्हें चित्र की भांति प्रदर्शित किया जा सकता है।

सर्वोच्च मांसाहारी (चौथी पोषण रीति)
माँसाहारी (तीसरी पोषण रीति)
शाकाहारी (द्वितीय पोषण रीति)
उत्पादक (प्रथम पोषण रीति)

आहार श्रृंखला के विभिन्न स्तर


विभिन्न पोषण रीति वाली कोई आहार श्रृंखला

क्या आप पहले बताई गई आहारश्रृंखलाओं में उपरोक्त पोषण रीतियों को पहचान सकते हैं? हम देखते हैं कि इन श्रृंखलाओं में तीन से अधिक पोषण रीतियां हैं। आप आहारश्रृंखला में मानव को कहाँ रखते हैं? जब हम केवल पौधों का सेवन करते हैं तो श्रृंखला में केवल उत्पादक तथा उपभोक्ता होते हैं। जबकि माँसाहारी व्यक्तियों की आहारश्रृंखला में अधिक उपभोक्ता स्तर होंगे, संभवतः प्रथम तथा द्वितीय स्तर के उपभोक्ता।

आहारश्रृंखला न केवल जीव मण्डल में जैव घटकों की संरचना प्रदर्शित करती है बल्कि दो महत्वपूर्ण प्रकायों को भी प्रदर्शित करती हैं। ये प्रकार्य हैं ऊर्जा एवं प्रदार्थों का स्थानान्तरण। यही दो मूल प्रकार्य जीव मण्डल को गतिशीलता प्रदान करते हैं, यह कथन किसी छोटे पारिस्थतिक तंत्र में प्रतिपादित हो रही आहार श्रृंखला के लिए भी सत्य है।

किसी आहारश्रृंखला में यह स्थानान्तरण शिकार एवं भक्षक के संबन्ध की प्रक्रिया संम्पन्न होने के दौरान होता है। ऊर्जा एवं पदार्थों का स्थानान्तरण विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में होता है, जैसे-वन, घास का मैदान, पाक, बाग, तालाब, झील, समुद्र, यहाँ तक कि जीव जलशाला भी। यह जीवों के साइज अथवा स्वरूप या फिर भौतिक पर्यावरण के घटकों पर किसी भी प्रकार निर्भर नहीं करता। आइये, हम इन प्रक्रियाओं का अध्ययन करें जिससे हम जीव मण्डल की कार्य विधियों की वास्तविकताओं को भली-भांति समझ सकें।

उर्जा का प्रवाह

आपको ज्ञात है कि आहारश्रृंखला वास्तव में खाद्य पदार्थ का क्रमबद्ध स्थानान्तरण है। आइए, हम पहले यह पता लगाएँ कि जीवमण्डल के जैव घटकों में खाद्य पदार्थ कहाँ से आता है और किस प्रकार जीवों द्वारा पौधों तथा अन्य जीवों का भक्षण करने के दौरान इसका स्थानान्तरण होता है। आप पढ़ चुके हैं कि प्रकार हरे पौधे भोजन तैयार करते हैं। यह प्रारम्भिक चरण है, जिसमें पर्यावरण से ऊर्जा, जैव घटकों में प्रवेश करती है। केवल पौधों में ही क्लोरोफिल नामक हरित वर्णक होता है, जिसके द्वारा उनमें सौर ऊर्जा का अंतग्रहण करने की क्षमता होती है। पृथ्वी तक पहुंचने वाली कुल सूर्य ऊर्जा का लगभग 1% पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में उपभोग होता है। इस ऊर्जा को अंतग्रहित करने के बाद पौधे इसे रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित कर देते हैं, जो कार्बोहाइड्रेट के रूप में भण्डारित हो जाती हैं। आपको ज्ञात होगा कि पौधे अपनी उपापचयी प्रक्रियाओं हेतु ऊर्जा का उपभोग करते हैं। इस ऊर्जा का मुख्य अंश श्वसन हेतु उपयोग हो जाता है। वे ऊर्जा का उपयोग वृद्धि अथवा ऊतक निर्माण के लिए भी करते हैं। कुछ ऊर्जा उपयोग नहीं होती है तथा ऊष्मा के रूप में मुक्त हो जाती है। पौधों का शाकाहारियों द्वारा भक्षण होता है। इन शाकाहारियों को हम प्रथम स्तर का उपभोक्ता भी कह सकते हैं। खाद्य में भण्डारित रासायनिक ऊर्जा भोजन के साथ ही पौधों से शाकाहारी जन्तुओं तक स्थानान्तरित हो जाती हैं। ये जन्तु, इस ऊर्जा के एक हिस्से का व्यय अपनी उपापचयी प्रक्रियाओं तथा वृद्धि पर करते हैं। इसके अतिरिक्त शाकाहारी कुछ ऊर्जा का उपयोग श्वसन में भी करते हैं। इस ऊर्जा का कुछ अंश उपयोग नहीं हो पाता है जो इन जन्तुओं द्वारा ऊष्मा के रूप में मुक्त कर दिया जाता है। शाकाहारियों का भक्षण मांसाहारियों द्वारा होता है जो द्वितीय स्तर अथवा पोषण रीति के उपभोक्ता हैं। जहां तक ऊर्जा के उपयोग करने का प्रश्न है, इस स्तर पर भी पहले स्तर अथवा पोषण रीति की सभी प्रक्रियाएं दोहराई जाती हैं। चित्र से हम ऊर्जा स्थानान्तरण के संबंध से स्वयं यह निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं। ऊर्जा की जो मात्रा उपयोग नहीं हो पाती है तथा ऊष्मा के रूप में मुक्त हो जाती है, उसे इस प्रक्रम में हुई ऊर्जा हानि माना जाता है।

ऊर्जा स्थानान्तरण से हम निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं –

  1. ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित हो जाती है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान प्रकाश ऊर्जा, रासायनिक रूप में परिवर्तित हो जाती है। हम हरे पौधों को उत्पादक कहते हैं। क्या वे वास्तव में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं? यह सत्य नहीं है। वास्तव में पौधे केवल ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करते हैं, अत: ऊर्जा के संदर्भ में हम इन पौधों को परिवर्तक या ट्रान्सड्यूसर कह सकते हैं।
  2. आहारश्रृंखला में किसी पोषण रीति से अगली पोषण रीति तक ऊर्जा का निरन्तर स्थानान्तरण होता रहता है। प्रत्येक पोषण रीति या स्तर पर जीवों द्वारा ऊर्जा का उपयोग अपनी वृद्धि के लिए भी होता है। कुछ ऊर्जा की ऊष्मा के रूप में हानि भी हो जाती है तथा इसका उपयोग नहीं हो पाता है। यदि हम सभी पोषण रीतियों में होने वाली ऊर्जा तथा ऊष्मा के रूप में मुक्त ऊर्जा की मात्रा की गणना करें तो हम पायेंगे कि इस प्रकार ऊर्जा की कुल हानि का परिमाण काफी अधिक है।
  3. हम देखते हैं कि प्रत्येक स्थानान्तरण में ऊर्जा की हानि होती है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि प्रत्येक अगले चरण अथवा पोषण रीति के लिए उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा, उत्पादक स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा से क्रमश: कम होती जाती है। विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में भिन्न-भिन्न आहारश्रृंखलाओं एवं ऊर्जा स्थानान्तरणों के अध्ययन से ऊर्जा स्थानान्तरण के संबन्ध में एक रोचक तथ्य उभर कर आया है। सामान्यत: ऊर्जा में कमी 10% के नियम के अनुसार होती है। प्रत्येक चरण पर उपलब्ध ऊर्जा उससे पहले के चरण पर उपलब्ध ऊर्जा का 10% होती है।

ऊर्जा एक रूप दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाती है। भोजनश्रृंखला में इसके स्थानान्तरण के दौरान सदैव कुछ ऊर्जा की हानि होती है। कुछ उपलब्ध ऊर्जा का एक बहुत बड़ा अंश प्रयुक्त नहीं होता तथा इसे जीव द्वारा पर्यावरण में ऊष्मा के रूप में मुक्त कर दिया जाता है। स्पष्ट है कि जैव घटकों में ऊर्जा का प्रवाह एक ही दिशा में होता है। यह अजैव पर्यावरण के माध्यम से जीवों में प्रवेश करती है तथा ऊष्मा के रूप में मुक्त हो जाती है। हम ऐसा इसलिए कहते हैं कि ऊष्मा के रूप में मुक्त ऊर्जा पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया में दोबारा उपयोग नहीं हो सकती है। क्या आप इस कथन से सहमत होंगे कि जीवमण्डल में ऊर्जा स्थानान्तरण, ऊष्मा गतिकी के सिद्धांत के अनुसार होता है। आहारश्रृंखला की ऊर्जा गतिकी को एक अन्य विधि से भी समझाया जा सकता है। इसमें ऊर्जा स्थानान्तरण का पिरामिड के रूप में ग्राफीय निरूपण किया जाता हैं तथा इसे पारिस्थतिक पिरामिड कहते हैं। ये पिरामिड पोषण रीति की संरचना भी प्रदर्शित करते हैं।

पारिस्थितिक पिरामिड विभिन्न स्तर प्रदर्शित करते हैं। पिरामिड का आधार उत्पादकों को प्रदर्शित करता है और जैसे-जैसे ऊपर चलते जाते हैं, इसका आकार पतला होता जाता है जो क्रमशः अगली पोषण रीति या स्तर को दर्शाता है। माँसाहारी जन्तु पिरामिड की चोटी पर होते हैं। पारिस्थतिक पिरामिड आहार श्रृंखला को प्रदर्शित करते हैं। इन पिरामिडों को प्रत्येक पोषण रीति पर उपलब्ध जीवों की कुल संख्या के आधार पर भी बनाया जा सकता है (संख्या का पिरामिड)। इनको कुल जैव द्रव्यमान (जीव का द्रव्यमान या भार) के आधार पर भी बना सकते हैं अर्थात् जीवभार पिरामिड, ऊर्जा पिरामिड बनाना भी सम्भव है जिसमें प्रत्येक पोषण रीति पर ऊर्जा स्थानान्तरण का ग्राफ दर्शाया गया हो।

आहारश्रृंखलाओं एवं ऊर्जा स्थानान्तरण का अध्ययन करने के पश्चात्, आपको स्पष्ट हो जायेगा कि इनका हमारी एवं अन्य जीवों की भोजन सम्बन्धी आदतों से निकट संबंध है। ऊर्जा स्थानान्तरण के बारे में अपने ज्ञान के आधार पर क्या आप आहार श्रृंखला में स्वयं को और अधिक लाभकारी स्थिति में रख सकते हैं। आपके विचार में आहारश्रृंखला में किस स्थान पर रहने पर आपको अपने भोजन से सर्वाधिक ऊर्जा प्राप्त होगी?

हम पहले ही यह चर्चा कर चुके हैं कि आहारश्रृंखला  में ऊर्जा स्थानान्तरण के दौरान उत्पादक स्तर पर अधिक ऊर्जा उपलब्ध होती है। क्या हम यह कह सकते हैं कि आप इस स्तर के जितने निकट होंगे आपको उतनी ही अधिक ऊर्जा (कैलौरी) मिल सकेगी।

आप उत्पादक स्तर से जितनी दूरी पर हैं, अर्थात् श्रृंखला में आपका स्थान दाहिने हाथ की ओर जितना अधिक है, उतनी ही कम ऊर्जा (कैलौरी) आपको उपलब्ध होगी।

अत: अब आप यह मान सकते हैं कि शाकाहारी आदतों से हमें कुल ऊर्जा अधिक उपलब्ध होती है। आप कह सकते हैं कि श्रृंखला में दाहिने हाथ की ओर स्थान पाने वाले पशुओं को कम ऊर्जा उपलब्ध होगी। यदि आप उन पशुओं को खाते हैं जो पेड़ पौधे खाते हैं, तो क्या आपको सीधे ही वनस्पति उत्पाद खाने की तुलना में कम ऊर्जा नहीं मिलेगी?

आइए, हम आहार श्रृंखला को एक अन्य पक्ष का अध्ययन करें। आप जानते हैं कि पारिस्थितिक तंत्र एवं जीवमण्डल में भी आहार श्रृंखला में तीन या अधिक चरण होते हैं। ऊर्जा स्थानान्तरण क बारे में अपनी जानकारी के आधार पर आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अधिक चरणों का अर्थ है कि आहारश्रृंखला के दाहिने सिरे पर स्थित जीव को ऊर्जा की कम मात्रा उपलब्ध होगी।

क्योंकि मानव में सोच समझकर निर्णय लेने की क्षमता है। अत: वह आहारश्रृंखला में आसानी से फेर बदल करके अपने लिए अधिक अच्छा स्थान सुनिश्चित कर सकता है। हो सकता है कि इस प्रक्रिया में आहारश्रृंखला इस प्रकार अव्यवस्थित हो जाए कि खाद्य जाल में सम्पन्न हो रही अन्य आहारश्रृंखलायें प्रभावित हो जायें। मानवीय प्रक्रियाओं द्वारा आहारश्रृंखलाओं को छोटा करने के प्रयास के कारण पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन उत्पन्न होता है और अन्तत: जीव मण्डल में भी असंतुलन उत्पन्न होता है।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्रसिद्ध सहारा रेगिस्तान शाकाहारियों की लगातार बढ़ती हुई संख्या तथा उनके द्वारा आवश्यकता से अधिक घास चरने के कारण बना था। इसका कारण था रोमनों द्वारा शेरों का पकड़ा जाना, जिससे शाकाहारियों का भक्षण करने वालों की संख्या कम हो गई। राजस्थान के अधिकांश भागों में रेगिस्तान में परिवर्तित हो जाने का कारण शाकाहारियों द्वारा अधिक चरना माना जाता है।

आइए हम किसी आहार श्रृंखला, 'घास-हिरण--शेर', का उदाहरण लें। यदि हम समस्त शेरों को हटा दें या मार डालें, तो क्या होगा? तब हिरणों की संख्या बढ़ जायेगी क्योंकि उनको खाने वाला कोई नहीं होगा? हिरणों की बढ़ी हुई संख्या का परिणाम होगा उत्पादकों (घास) का अधिक उपभोग। संख्या बहुत बढ़ जाने पर ये समस्त उत्पादकों को समाप्त तक कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि समस्त हिरणों को हटा दिया जाय तब शेरों की संख्या कम हो जायेगी, क्योंकि उनको पर्याप्त भोजन उपलब्ध न होगा। यदि हिरण अथवा शेर का खाद्य जाल की अन्य आहारश्रृंखलाओं में भी स्थान हो तो किसी एक को भी हटाने से पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो जायेगा। शेर अन्य जीवों का भी भक्षण प्रारम्भ कर सकते हैं, जैसे पालतू पशु या मानव। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उत्पादकों को हटाने या समाप्त कर देने पर आहारश्रृंखला की कार्यप्रणाली तथा जीवमण्डल पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

आहारश्रृंखला का एक अन्य रोचक पक्ष यह जानकारी है कि किस प्रकार जाने अथवा अनजाने कुछ हानिप्रद रसायन इस श्रृंखला के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश कर लेते हैं। हम अपनी फसलों को रोग तथा कीटों से बचाने हेतु अनेक कीटनाशक तथा अन्य रसायनों का उपयोग करते हैं। ये रसायन या तो पानी में घुल जाते हैं तथा मृदा से रिसकर अंतत: भूमिगत जलस्तर तक पहुंच जाते हैं, या मृदा द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं या मृदा में से पौधों द्वारा जल एवं खनिजों के साथ-साथ अवशोषित कर लिए जाते हैं। इस प्रकार से आहारश्रृंखला में प्रवेश करते हैं। पोषण रीति के एक स्तर से दूसरे स्तर में स्थानान्तरण के दौरान प्रत्येक स्तर पर ये हानिप्रद रसायन सान्द्रित होते जाते हैं।

अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ है कि मानव शरीर में इन रसायनों की मात्रा उन जीवों से अधिक है जो आहारश्रृंखला के प्रारंभिक स्तर पर हैं। मच्छरों को मारने के लिए डी.डी.टी. का उपयोग इसका एक उदाहरण है। मानवों में इसकी सान्द्रता सबसे अधिक है।

क्या आप अनुभव करते हैं कि खाद्य पदार्थों के स्थानान्तरण का अध्ययन हमें खाद्य की कमी की समस्या हल करने में किसी प्रकार सहायता कर सकेगा। क्या हम फसलों को उन्नत कर सकते हैं जिससे कि वे सौर ऊर्जा को अधिक क्षमता से प्रग्रहित कर सक? वैज्ञानिक इस दिशा में कार्य कर रहे हैं जिससे कि नई किस्मों को विकसित करके खेतों के पारिस्थितिक तंत्र को उन्नत किया जा सके।

पदार्थों का पुनः चक्रण

आपको ज्ञात है कि पौधों द्वारा मृदा में से पानी के साथ खनिज अवशोषित किये जाते हैं तथा CO2, वायु से प्राप्त की जाती है। जिसका उपयोग प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में होता है। इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले मुख्य तत्व अथवा पदार्थ, C,N,O,S,P तथा जल हैं। ये पदार्थ पारिस्थितिक तंत्र के उत्पादक स्तर में प्रवेश करने के पश्चात् दूसरे स्तरों पर स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं। इन पदार्थों का स्थानान्तरण एवं परिवहन मृदा, जल, वायु तथा जैव जीवों के द्वारा होता है। इन रसायनों का पारिस्थितिक तंत्र तथा अन्तत: जीव मंडल में पुन: चक्रण को जैव भू-रसायन चक्र कहते हैं। ऊर्जा की भांति ये रसायन पारिस्थितिक तंत्र से लुप्त नहीं होते हैं। अपघटकों द्वारा पौधों एवं जन्तुओं के मृत शरीर को अपघटित किये जाने पर ये पदार्थ पुन: पोषण भंडार में मुक्त कर दिए जाते हैं। पौधों द्वारा पुन: अवशोषित किये जाने पर ये तत्व पुन: परिवहन में आ जाते हैं। इस प्रकार प्रदार्थों के पुन: चक्रण में अपघटक प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

C,N जैसे तत्वों तथा अन्य रसायनों में प्रत्येक के पारिस्थितिक तंत्र या जीवमण्डल में पुन: चक्रण के संदर्भ में कुछ बातें महत्वपूर्ण हैं। प्रत्येक रासायनिक तत्व उपयोग करने योग्य रूप में उपलब्ध होना चाहिए, उदाहरण के लिए कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड को रूप में। अन्यथा इसे जीवों द्वारा उपयोग करने योग्य रूप में परिवर्तित करना पड़ेगा, जिसकी क्षमता सम्भवत: कई जीवों में न हो। एक बार अवशोषित किए जाने के बाद पदार्थ परिवर्तित होता है तथा उसे पुन: पोषण भंडार में वापस मुक्त कर दिया जाता है। आपको निम्नलिखित बातों का ज्ञान होना आवश्यक है-

  1. स्त्रोत
  2. किस रूप में उपलब्ध है।
  3. पुन: चक्रण के दौरान तत्व किस रूप में परिवर्तित होता है।
  4. तत्व, पोषण भंडार में किस रूप में मुक्त होता है।
नाइट्रोजन चक्र में भाग लेने वाले जीव
भूमिका/क्रियाजीव
नाइट्रोजन स्थिरीकरणराइजोबियम, नील-हरित शैवाल
अमोनीकरण (अमोनिया से नाइट्रेट)नाइट्रोसोमोनास (नाइट्रीकारी जीवाणु)
नाइट्रीकरणनाइट्रोबैक्टर
विनाइट्रीकरण (नाइट्रेट से स्वतंत्र नाइट्रोजन)सूडोमोनास (विनाइट्रीकारक जीवाणु)

पदार्थों के चक्र

H,N,O,C,P तथा K जैसे पोषक तत्वों की जैव जीवों को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है तथा इन्हें असूक्ष्म पोषक तत्व कहते हैं। कुछ अन्य पोषक तत्वों की बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है जैसे Mn, Zn आदि। इन्हें सूक्ष्म पोषण तत्व कहते हैं। आइए हम कुछ सामान्य पोषक तत्वों, जैसे-जल, C,N तथा O के चक्र का अध्ययन करें।

जल चक्र

जल पर्यावरण में परिवहित होता है। इसको जलीय चक्र कहते हैं। जल में मुख्य तत्व हाइड्रोजन है जिसका चक्रण पानी के यौगिक रूप में प्रवाहित होने के साथ होता है। जलाशयों (सागर, समुद्र, झील, नदियाँ) तथा जैव जीवों के शरीर की सतह से जल का लगातार वाष्पन होता रहता है। पौधों में वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल हानि वाष्पन का प्रमुख स्त्रोत है। इस प्रकार वाष्पित जल वायु में जल वाष्प के रूप में उपस्थित रहता है। निम्न ताप पर ये वाष्प कण संघनित होकर जल की बूंद बनाते हैं। ये बूंदें वर्षा अथवा हिम रूप में बरसती हैं और इस प्रकार जल पुनः पृथ्वी पर वापस आ जाता है। जलचक्र द्वारा जीवों को शुद्ध जल उपलब्ध होता है।

कार्बन चक्र

कार्बन जैव जीवों का मूल घटक है। यह कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन तथा न्यूक्लिइक अम्लों के रूप में होता है। कार्बन का स्थानानतरण आहारश्रृंखला के माध्यम से होता है। गैसीय रूप में कार्बन का मुख्य भण्डार वायुमण्डल है, जबकि सागर, जैव कार्बन का प्रमुख भण्डार है। वायुमण्डल में यह कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में प्राप्त है जो लगभग 0.03-0.04% है। पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करने की क्षमता होती है। कार्बोहाइड्रेट खाद्य पदार्थ के रूप में एक पोषण रीति के जन्तुओं से दूसरे स्तर के जन्तुओं में स्थानान्तरित होता रहता है। अपघटकों द्वारा यह फिर से वायुमण्डल एवं जल भण्डारों में वापस आ जाता है। वायुमण्डल एवं जल भण्डारों के मध्य CO2 का विनिमय निरंतर चलता रहता है। ज्वालामुखी उद्गार से भी वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड मुक्त होती है।

नाइट्रोजन चक्र

नाइट्रोजन भी जैव जीवों के ऊतकों का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह प्रोटीनों, एमीनोअम्लों तथा न्यूक्लिइक अम्लों का आवश्यक घटक है। वायुमण्डल, नाइट्रोजन का समृद्ध भण्डार है। इसमें लगभग 78% नाइट्रोजन होती है जो आण्विक रूप में उपस्थित रहती है। जल भंडारों में भी नाइट्रोजन होती है। यह जैव जीवों द्वारा इसके तत्व के रूप में उपयोग में नहीं लाई जा सकती है। इसको उपयोग करने योग्य रूप में परिवर्तन करना आवश्यक है जैसे नाइट्रेट। यह मुख्यत: कुछ जीवों द्वारा सम्भव किया जाता है। वायुमण्डल से नाइट्रोजन का जीवमण्डल के जैव घटकों में विशेष प्रकार के जीवणुओं द्वारा स्थितीकरण तथा स्वांगीकरण होता है।

अन्य प्रकार के जीवाणु नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने में समर्थ नहीं हैं। परंतु कुछ नील-हरित शैवालों में भी स्थिरीकरण का गुण होता है। यह शैवाल धान के खेतों में भी पाई जाती है। नाइट्रोजन स्थिरीकारक जीवाणु फलीदार फसल के पौधों की जड़ों की गांठों में पाये जाते हैं। कुछ अफलीदार पौधों जैसे एलनस, ग्रीकग्रों भी नाइट्रोजन स्थितरीकरण करते हैं। मृत पौधों एवं जन्तुओं के शरीर का सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन प्रक्रिया के माध्यम से नाइट्रोजन वायुमण्डल में पुनः मुक्त हो जाती है मृदा में स्थित नाइट्रेट भी पौधों द्वारा अवशोषित किये जाते हैं। जीवाणु में उपस्थित नाइट्रोजन का स्थिरीकरण, वायुमण्डलीय एवं औद्योगिक प्रक्रियाओं द्वारा भी हो सकता है। आजकल औद्योगिक प्रक्रियाओं द्वारा स्थिरीकृत नाइट्रोजन की मात्रा तथा जैव प्रक्रियाओं द्वारा स्थिरीकृत नाइट्रोजन की मात्रा के लगभग बराबर हो गई है। जीव मण्डल में नाइट्रोजन चक्र में निम्नलिखित महत्वपूर्ण चरण होते हैं-

वायुमण्डल की नाइट्रोजन ----- नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा स्वांगीकरण विनाइट्रीकरण -- नाईट्रीकरण--- अमोनीकरण

वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण नाइट्रेटों या नाइट्राइटों के रूप में होता है। इसका अमीनीकरण सूक्ष्म जीवों द्वारा होता है। एक अन्य प्रकार के सूक्ष्मजीव नाइट्रीकरण की प्रक्रिया द्वारा इन्हें नाइट्रेटों तथा नाइट्राइटों में परिवर्तित करने में तथा विनाइट्रीकरण की प्रक्रिया द्वारा अधिक नाइट्रोजन के रूप में परिवर्तित करने में सहायता करते हैं।

जीवमण्डल में नाइट्रोजन चक्र को एक आदर्श चक्र माना जाता है क्योंकि यह चक्र वायुमण्डल तथा जल भण्डरों में नाइट्रोजन की कुल मात्रा को अपरिवर्तित रखता है। NPK तथा यूरिया जैसे नाइट्रोजन युक्त रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से भी मृदा में पोषक तत्व तथा नाइट्रोजन चक्र को बनाये रखने में सहायता मिलती है। आजकल नाइट्रोजन का औद्योगिक उत्पादन तथा उर्वरकों का उपयोगी तीव्र दर से बढ़ रहा है, यह दर विनाइट्रीकरण की दर से कहीं अधिक है। इस कारण आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन अधिकाधिक जल भण्डारों में पहुंच रही है। नदियों तथा झीलों में पहुंचने वाली आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन बहुधा शैवाल तथा अन्य वनस्पति प्लवकों की वृद्धि को बढ़ावा देती है और वृद्धि पंख मत्स्य तथा कवचप्राणियों जैसे महत्वपूर्ण जन्तुओं की कीमत पर होती है। अन्य जलीय जीवों को भी इससे हानि पहुंचती है क्योंकि जल में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है।

ऑक्सीजन चक्र

वायुमण्डल के गैसीय घटकों का लगभग 21% ऑक्सीजन है। जल भण्डारों में यह पानी में घुली हुई स्थिति में होती है जो जलीय जीवों को जीवित रखने में सहायता करती है। ऑक्सीजन, CO2 तथा H2O के रूप में यौगिक रूप में भी जैव शरीरों में प्रवेश तथा निर्गम करती है। जीवमण्डल का ऑक्सीजन उपलब्ध करने वाले प्रमुख स्त्रोत हरे पौधे हैं। आप जानते हैं कि ऑक्सीजन, प्रकाश संश्लेषण का सह-उत्पाद है। समस्त जीव, पौधे, जन्तु तथा अपघटक भी श्वसन हेतु वायुमण्डल में उपलब्ध ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। इस प्रक्रिया का सह-उत्पाद CO2 वायुमण्डल में मुक्त की दी जाती है। कोयला, लकड़ी का उपयोग करते हैं ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का अभूतपूर्ण संतुलन बनाये रखने में तथा इन दोनों चक्रों में जीव प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

कुछ अन्य रासायनिक पदार्थ, जैसे-फॉस्फोरस, सल्फर, पोटेशियम भी जीवमण्डल के जैव एवं अजैव घटकों के मध्य चक्रण करते हैं। उपरोक्त चक्र जीवमण्डल के प्रकार्यों के बारे में महत्वपूर्ण संकेत प्रदान करते हैं - (1) ऊर्जा के विपरीत ये पदार्थ जीवमण्डल के जैव एवं अजैव घटकों के मध्य चक्रण करते रहते हैं, (2) जीवमण्डल में चक्रण करते हुए विभिन्न रासायनिक पदार्थों की मात्रा लगभग स्थिर बनी रहती है।

कभी-कभी मानव द्वारा किये गये कुछ कार्यों के परिणामस्वरूप पदार्थों के इस पुन: चक्रण में कुछ गतिरोध उत्पन्न हो जाते हैं। रसायनों का आवश्यकता से अधिक उपयोग जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग तथा ऐसी मशीनों का प्रचालन जिनमें पूर्ण दहन नहीं होता, आदि जैसे अनेक कार्यों के परिणामस्वरूप ये चक्र अचक्रीय हो सकते हैं। इसका परिणाम आहारश्रृंखला में व्यवधान उत्पन्न हो सकता हैं। हमें आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने तथा औद्योगिक विकास में संबंधित निर्णय लेने में पर्यावरण के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *