वार्षिक वित्तीय विवरण या वार्षिक बजट Annual Financial Statement or Annual Budget

संविधान के अनुच्छेद 112(1) के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष भारत सरकार की उस वर्ष के लिए अनुमानित प्राप्तियों एवं व्यय का विवरण रखवायेगा जिसे वार्षिक वित्तीय विवरण कहा जाता है। भारत में वार्षिक बजट प्रायः फरवरी के अंत में लोकसभा में पेश किया जाता है क्योंकि वित्त विधेयक राज्यसभा में पेश नहीं किये जा सकते।

भारत में बजट दो भागों में संसद के समक्ष पेश किया जाता है

  1. रेल बजट- रेल मंत्री द्वारा आय-व्यय का विवरण प्रस्तुत किया जाता है,
  2. साधारण बजट- वित्त मंत्री द्वारा अन्य सभी विभागों की आय तथा व्यय का विवरण प्रस्तुत किया जाता है।

बजट की तैयारी: इसमें महत्वपूर्ण कार्य विभिन्न विभागों से आने वाले वित्तीय वर्ष के अनुमानित व्यय का विवरण एकत्रित करना है। वित्त मंत्री विभिन्न विभागों के विवरण के आधार पर नए कर लगाने या बढ़ाने तथा कम करने संबंधी सुझाव तैयार करता है। इसके पश्चात् वित्त मंत्री अपने सुझावों के प्रारूप को मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत करता है। वित्त मंत्री मंत्रिपरिषद के सुझावों के अनुसार ही बजट को अंतिम रूप प्रदान करता है।

बजट के दो भाग: एक भाग में केंद्र सरकार की आय का विवरण तथा दूसरे भाग में व्यय का विवरण होता है। फिर व्यय को दो भागों में बांटा जाता है- पहला, भारत की संचित निधि में से किया जाने वाला व्यय जो इस प्रकार है-

  1. राष्ट्रपति का वेतन, भत्ते तथा उसके पद संबंधी अन्य व्यय,
  2. लोकसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति तथा उप-सभापति के वेतन तथा भत्ते,
  3. भारत सरकार पर ऋण तथा उसका ब्याज आदि,
  4. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते,
  5. संघीय न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन,
  6. नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक के वेतन तथा भत्ते,
  7. किसी न्यायालय या मध्यस्थ न्यायालय के निर्णय, आज्ञा आदि की लागू करने के लिए जो धनव्यय किया जाता है,
  8. अन्य कोई व्यय जिसको संसद कानून द्वारा इस निधि में से लेने के लिए घोषणा कर दे।

दूसरा, साधारण व्यय, उपर्युक्त सभी व्यय को छोड़कर शेष सभी व्यय को संसद में मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाता है तथा व्ययों के संबंध में अनुदानों के लिए मांगें प्रस्तुत की जाती हैं। कोई भी मांग राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं की जा सकती। साधारण व्यय दूसरे भाग में आता है।

बजट का पारित होना: बजट को पारित होने के लिए निम्नलिखित अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है-

बजट प्रस्तुत करना: संसद का बजट अधिवेशन प्रायः फरवरी के मध्य में शुरू होता है। सर्वप्रथम रेल मंत्री रेल बजट प्रस्तुत करता है तथा उसके बाद वित्त मंत्री आम बजट लोकसभा में रखता है और इसकी प्रतियां सदस्यों के बीच वितरित की जाती हैं। आगामी बजट के साथ-साथ चालू वर्ष का विवरण भी दिया जाता है। साथ ही किसी व्यय या आय के बढ़ने या कम होने के कारण भी दिए जाते हैं ताकि सदस्य देश में परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार नए वर्ष के बजट पर विचार कर सकें। इसमें नए वर्ष की आर्थिक तथा वित्तीय नीति पर भी प्रकाश डाला जाता है। लोकसभा के बाद बजट राज्यसभा में भी प्रस्तुत किया जाता है।

बजट पर बहस: बजट पेश होने के कम से कम तीन दिन के बाद दोनों सदनों में इस पर वाद-विवाद आरम्भ होता है। यह बहस तीन या चार दिन तक चलती है। यह वाद-विवाद बजट की प्रमुख नीति तथा साधारण सिद्धांत से संबंधित होता है। इस बहस में उन व्ययों पर भी चर्चा होती है जो भारत की संचित निधि में से किए जाने हैं। विपक्षी दल का नेता बहस प्रारम्भ करता है। इस बहस के दौरान कोई मतदान नहीं होता और न ही कोई संशोधन प्रस्ताव पेश किए जा सकते हैं। इस बहस के बाद वित्त मंत्री को उत्तर देने का अधिकार होता है।

मागों पर मतदान: बहस के पश्चात् विभिन्न विभागों की मांगों पर मतदान होता है। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मांगों पर मतदान केवल लोकसभा में ही होता है तथा राज्यसभा की इस सम्बंध में कोई शक्ति प्राप्त नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष सदनके नेता के परामर्श से विभिन्न विभागों की मांगों की बहस के लिए समय निश्चित करता है। निश्चित समय में संबंधित विभाग की मांगों पर बहस होना अनिवार्य है। यदि किसी विभाग का समय समाप्त हो रहा हो तथा विचार होना शेष हो तो उन मांगों को बिना बहस किए ही लोकसभा में मतदान के लिए पेश कर दिया जाता है। परंतु 1993 से अब किसी भी विभाग की व्यय की मांगें संसद के सदस्यों द्वारा विचार किए बिना पारित नहीं हो सकती क्योंकि संसद ने स्थायी समिति प्रणाली प्रारम्भ कर दी है। प्रत्येक स्थायी समिति में 30 सदस्य लोकसभा तथा 15 सदस्य राज्यसभा के सम्मिलित किए जाते हैं। प्रत्येक विभाग से संबंधित स्थायी समिति उस विभाग के व्यय की मांगों पर लोकसभा में उन मांगों पर विचार करती है। यदि लोकसभा के पास समय की कमी हो तो समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही संबंधित विभाग की मांगें लोकसभा द्वारा पारित कर दी जाती हैं।

लोकसभा को विभादों के व्ययों की मांगें सम्बन्धी निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त हैं:

  1. लोकसभा मांगों को स्वीकार कर सकती है,
  2. लोकसभा मांगों को अस्वीकार कर सकती है, तथा;
  3. लोकसभा मांगों की राशि को कम कर सकती है, परन्तु वह मांगों की राशी को बाधा नहीं सकती क्योंकि व्यय की कोई भी मांग राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना पेश नहीं की जा सकती है।

यदि लोकसभा किसी विभाग की मांग को अस्वीकार कर दे या मांग की राशि को कम कर दे तो मंत्रिपरिषद को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है क्योंकि लोकसभा की ऐसी कार्यवाही मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव समझा जाता है। परंतु यदि विपक्षी दल के किसी प्रस्ताव को मंत्रिमंडल स्वेच्छा से स्वीकार कर ले तो ऐसी स्थिति में मंत्रिमंडल को त्याग-पत्र नहीं देना पड़ता है।

विनियोग विधेयक Appropriation Bills

लोकसभा द्वारा पारित की गयी व्यय मांगों तथा संचित निधि में से किए जाने वाले व्ययों की एकत्रित करके विधेयक का रूप दिया जाता है जो विनियोग विधेयक कहलाता है। इस विधेयक को लोकसभा में पेश किया जाता है और विधेयक उन सब अवस्थाओं को पार करेगा जिसमें से साधारण विधेयक गुजरता है। बहस केवल उन बातों तक ही सीमित रहती है जिन पर लोकसभा ने पहले विचार न किया हो। जिन मांगों के संबंध में लोकसभा पहले मतदान कर चुकी हो या जिनका सम्बंध भारत की संचित निधि से ही उन मांगों के सम्बंध में कोई संशोधन प्रस्ताव पेश नहीं किया जा सकता है।

विनियोग विधेयक लोकसभा से पारित होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष उसे धन विधेयक के रूप में प्रमाणित करके राज्यसभा की सिफारिशों के लिए भेज देता है। संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार राज्यसभा की विनियोग विधेयक 14 दिनों के अंदर सिफारिशों सहित लोकसभा को भेजना आवश्यक होता है। राज्यसभा की सिफारिशों को स्वीकार करना या अस्वीकार करना लोकसभा की इच्छा पर निर्भर है। यदि राज्यसभा विधेयक की 14 दिनों के अंदर वापस नहीं करती है तो विधेयक को उसी रूप में पास समझा जाता है जिस रूप में लोकसभा ने पास किया था। संसद में पारित होने के बाद विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति औपचारिकता मात्र होती है क्योंकि वित्त विधेयक राष्ट्रपति की अग्रिम सिफारिश प्राप्त करने के पश्चात् ही लोकसभा में पेश किया जाता है। इसलिए राष्ट्रपति वित्तविधेयक के संबंध में निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं करता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद सरकार के विभिन्न विभागों को व्यय करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। ऐसी शक्ति के बिना कोई भी सरकारी विभाग किसी प्रकार का कोई व्यय नहीं कर सकता।

धन की अग्रिम स्वीकृत: भारत में वित्तीय वर्ष 31 मार्च को समाप्त होता है और 1 अप्रैल से नया वित्तीय वर्ष आरम्भ होता है। अतः आवश्यक है कि आने वाले वित्तीय वर्ष का अनुमानित बजट 31 मार्च से पहले पारित किया जाए। प्रायः यह होता है कि वार्षिक बजट संसद की ओर से 31 मार्च से पहले पारित करना सम्भव नहीं होता है, ऐसी स्थिति में संसद की स्वीकृति के बिना सरकार किसी प्रकार का व्यय नहीं कर सकती। यदि ऐसी स्थिति जारी रही तो सम्पूर्ण सरकारी कार्यवाही बंद हो जायेगी। इसलिए सरकारी कार्यों को बिना बाधा के जारी रखने के लिए संसद कुछ निश्चित राशि को व्यय करने की अग्रिम स्वीकृति दे देती है। बाद में जब बजट पास होता है तो अग्रिम राशि की बजट में शामिल कर लिया जाता है। इसलिए इसे धन की अग्रिम स्वीकृति कहते हैं।

लेखानुदान Votes on account
बजट पास करने की प्रक्रिया सामान्यता चालू वित्तीय वर्ष के आरंभ होने के बाद तक चलती रहती है, इसलिए जब तक संसद मांगें स्वीकृत नहीं कर लेती है तब तक के लिए आवश्यक है कि देश का प्रशासन चलाने के लिए सरकार के पास पर्याप्त धन उपलब्ध हो इसलिए लेखानुदान के लिए विशेष उपबंध किया गया है जिसके द्वारा लोकसभा की शक्ति दी गई कि वह बजट की प्रक्रिया पूर्ण होने तक वित्त वर्ष के एक भाग के लिए पेशगी अनुदान दे सकती है।

अनुपूरक अनुदान: संसद की ओर से स्वीकृत मांगें अनुमानित होती हैं। इसलिए यदि किसी विभाग के व्यय के लिए राशि कम हो जाए तो सरकार लोकसभा में अनुपूरक अनुदान की मांग पेश करती है, जिसका वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पहले लोकसभा द्वारा पारित होना आवश्यक है। इसलिए इसे अनुपूरक अनुदान कहा जाता है।

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