अखिल भारतीय मुस्लिम लीग All India Muslim League

1885 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress-INC या कांग्रेस) एक राजनीतिक पार्टी के रूप में अस्तित्व में आई थी। यह जाहिर तौर पर एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी थी, लेकिन मुस्लिम जल्द ही इसे एक हिंदू संगठन के रूप में देखने लगे। तदनुसार, 1901 में नवाब वक़ार उल मुल्क (1841-1917) ने भारत में मुस्लिम राजनीतिक राय का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक राजनीतिक संगठन स्थापित करने का प्रयास किया। अक्टूबर 1906 आगा खान के नेतृत्व में मुसलमानो का एक प्रतिनिधिमंडल शिमला में भारत के वायसराय, लॉर्ड मिंटो से मिला, जिसने ब्रिटिश भारत के मुसलमानों को, अपनी राजनीतिक पार्टी प्रोत्साहित किया। मिंटो ने भारत में तेजी से बढ़ती कट्टरपंथी राजनीति विशेष रूप से कांग्रेस में "चरमपंथियों" के एक समूह के बीच, इसे इनके प्रभाव को कम करने वाले कारक के रूप में देखा। इस प्रकार आगा ख़ान, वक़ार उल-मुल्क और अन्य मुस्लिम प्रतिनिधियों को 30 दिसंबर 1906 को दक्का (अब ढाका) में एक नए संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML या League) शुरू करने के लिए आमंत्रित किया गया।

लीग की पहली बैठक  ऑल इंडिया मुस्लिम एजुकेशनल सम्मेलन  (1886 में स्थापित) के समापन पर आयोजित की गई थी। यहाँ केवल एक दिन के लिए इसका समय निर्धारित किया गया। इसके सदस्यों को एक राजनीतिक एसोसिएशन के निर्माण पर चर्चा के लिए नई बैठक में भाग लेने के लिए कहा गया। लीग के उद्देश्य इस प्रकार थे -

1.भारत के मुसलमानो के बीच ब्रिटिश सरकार के पार्टी वफ़ादारी को बढ़ावा देना और इसके संबंध में किसी भी ग़लत धारणा की सरकार की मंशा को दूर करना।

2.भारत के मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों को आगे रखना और उनको लाभ दिलाना, सम्मानपूर्वक अपनी जरूरतों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व सरकार के समक्ष करना।

3.ऊपर उल्लेख किए जा चुके उद्देश्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, भारत के मुसलमानों और अन्य समुदायों एक बीच दुश्मनी की किसी भी भावना की वृद्धि को रोकना।

नई संवैधानिक घटनाक्रम (भारतीय परिषद अधिनियम, 1909) के पेश होने की की पूर्व संध्या पर सरकार ने 'मुस्लिम पक्ष "पेश करने के लिए लीग का चुनाव किया गया था। लीग के उद्घाटन सत्र में, दो संयुक्त सचिवों और इकतीस सदस्यों को उत्तरी भारत के छह क्षेत्रों पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से लेकर बंगाल तक का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किया गया था।दो साल बाद लीग की एक शाखा भारत के बारे में ब्रिटिश नीति को प्रभावित करने के लिए एक दबाव समूह के रूप में कार्य करने के लिए सैयद अमीर अली (1849-1928) की अध्यक्षता में लंदन में स्थापित की गयी।

आगा खान 1913 तक अध्यक्ष थे जबकि सैयद वजीर हसन, संयुक्त सचिव (1910-1912) और सचिव (1912-1919) के रूप में लीग में सेवारत रहे और इन्होने अपने प्रारंभिक वर्षों में पार्टी में एक प्रमुख भूमिका निभाई। पहले पाँच वर्षों में सन् 1909 को छोड़कर लीग की प्रतिवर्ष बैठकें भारत के विभिन्न शहरों होती रही, जिनका प्रमुख उद्देश्य अपनी वफादारी को ब्रिटिश सरकार को समझाना, विरोधी लीग संगठनों का मुकाबला करना और विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर मुस्लिम विचार व्यक्त करना था। इसने कुछ प्रांतीय और जिला स्तरीय लीग की स्थापना की और इसके नेताओं ने भारत के विभिन्न शहरों का समय-समय पर दौरा किया और विभिन्न भाषाओं में अपने पर्चे भी निकले और इसके नेताओं को पार्टी के उद्देश्यों पर बातचीत का एक मंच भी दिया।

अपने अस्तित्व के पहले तीस साल तक लीग ने अधिकांश गतिविधियों में अपने को सीमित रखा।

सन् 1916 में कांग्रेस के साथ हुए लखनऊ समझौते के बाद लीग राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय हुआ। इस समझौते में लीग के संवैधानिक सिद्धांतों की स्थापना हुई और जो भारत सरकार अधिनियम में परिलक्षित हुए, एवं भविष्य के संविधानों में इनका पालन किया जाना था।इसके अलावा सरकार के साथ अनौपचारिक संपर्कों से और अपनी वार्षिक बैठकों में विशेष रूप से राजनीतिक संकट से प्रभावित मध्य पूर्व मुस्लिम देशों के ऊपर भी चर्चा की गयी।

1906 से 1910 तक लीग का केंद्रीय कार्यालय अलीगढ़ में स्थित था। इसके बाद इसे लखनऊ ले जाया गया और महमूदाबाद के राजा ने 3,000 रुपये के सालाना दान के माध्यम से यहाँ कार्यालय को बनाए रखा। सन् 1936 में इसे दिल्ली ले जाया गया, जहाँ पर यह सन् 1947 तक रहा। सन् 1927 तक पार्टी के सदस्यों की संख्या 1300 तक थी। सन् 1930 इलाहाबाद में जब दार्शनिक मुहम्मद इकबाल (1877-1938) भारत के उत्तर पश्चिमी भाग में दक्षिण एशिया के मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य के निर्माण की बात की, उस समय इस बैठक में सिर्फ़ 75 लोगो ने भाग लिया था। सदस्यता के लिए प्रोत्साहित करने के लिए, 6 रुपए का प्रवेश शुल्क को समाप्त कर दिया गया था, और वार्षिक सदस्यता एक रुपया कर दी गयी।

लीग के विभिन्न नेता भारत के मुसलमानों के प्रवक्ता की भूमिका ग्रहण करना चाहते थे यहाँ पर विभिन्न नेताओं की अलग-अलग राय और  व्यक्तित्व संघर्ष भी उभर कर सामने आए। लीग के प्रारंभिक वर्षों में, एक टकराव पंजाब में ग्रामीण हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले फजल ई-हुसैन (1877-1937), और मुहम्मद शफी (1869-1932), जो लाहौर के शहरी क्षेत्र से थे, के बीच विकसित हुआ। सन् 1927 में मुहम्मद शफी और मोहम्मद अली जिन्ना (1876-1948), जो औपचारिक रूप से 1913 में लीग में शामिल हुए थे, के बीच भी संघर्ष सामने आया। मुहम्मद शफी संयुक्त निर्वाचक मंडल का विरोध कर रहे थे जबकि मोहम्मद अली जिन्ना और उनके अनुयायियों की बढ़ती संख्या उन्हें समर्थन दे रही थी।

एक दशक बाद पंजाब के नेता सिकंदर हयात खान (1892-1942) ने लीग के नेतृत्व के लिए जिन्ना को आमंत्रित किया। 1934 से 1947 तक मोहम्मद अली जिन्ना का नाम AIML के साथ पर्याय बन गया था, और जिन्ना 1943 के बाद पार्टी के निर्विवाद महान नेता (कायदे आजम) बन गये थे।  बंगाल और पंजाब के मुस्लिम नेताओं विशेष रूप से खिज्र हयात खान तिवाना (Khizr Hayat Khan Tiwana,1900-1975) ने प्रांतीय हितों के पक्ष में स्वतंत्र ढंग से कार्य करने का प्रयास किया। इस कारण खिज़ को 1944 में लीग से निष्कासित कर दिया गया था।

प्रांतीय विधानसभाओं के लिए उम्मीदवारों का चुनाव, प्रांतीय विधायिकाओं में भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण बन गया था। नतीजतन, AIML को अपने इतिहास में पहली बार, एक व्यवहार्य रूप में एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में देखा जाने लगा। 4 मार्च, 1934 में सशक्त और करिश्माई मोहम्मद अली जिन्ना को, जो 1909 के बाद से एक प्रमुख मुस्लिम राजनीतिज्ञ रहे थे और एक अमीर वकील भी थे, उन्हे पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। जिन्ना 1936 में आम चुनाव के लिए एक संसदीय बोर्ड के लिए मनोनीत किए गये थे, जिसने पार्टी के उम्मीदवारों का चयन किया। यहां तक ​​कि इस समय केवल तीन अमीर समर्थकों पार्टी कामकाज जारी रखा था। इस समय बंगाल और पंजाब में कांग्रेस और क्षेत्रीय मुस्लिम पार्टियों दोनों ने इनका विरोध किया; बहरहाल, पार्टी ने राष्ट्रीय महत्व के लिए अपनी धीमी गति से चढ़ाई शुरू कर दी थी।

लीग का उदय, मुख्य रूप से जिन्ना का राष्ट्रीय नेतृत्व और स्वतंत्र रूप से समृद्ध महासचिव लियाकत अली खान (1895-1951) के संगठनात्मक काम की वजह से था। जिन्ना की तरह, उन्होने पार्टी को अगले दस वर्षों में खुद को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया था। AIML के अध्यक्ष को प्रतिवर्ष और महासचिव को तीन साल के लिए निर्वाचित किया जाता था। अध्यक्ष के तहत एक दर्जन सदस्यों की कार्यकारिणी की थी जिन्हे भारत के सभी भागों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया था। इसके बाद AIML परिषद (AIML Council) जिसके सदस्य लीग की नीतियों पर वोट डाल सकते थे, इनके बाद लीग के प्राथमिक सदस्य थे। सैद्धांतिक रूप में पार्टी में प्रांतों में एक संगठनात्मक संरचना भी थी। हालांकि, लीग केवल एक व्यवहार्य संगठन था जो कि राष्ट्रीय स्तर पर सन् 1937 के बाद के वर्षों में ही विकसित हुआ। लीग के विधान सभाओं के लिए प्रांतीय पार्टियों और केंद्र में संसदीय दलों दोनों के, जिन्ना नेता थे।

1936 के आम चुनावों में लीग ने मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों में से आधे पर चुनाव लड़ा। लीग को लगभग 60% सीटें मिली, परंतु बंगाल को छोड़कर, मुस्लिम बहुल प्रांतों में इसे कोई सीट नही मिली। बंगाल में इसे 117 में से 39 सीटें मिली। इस समय कांग्रेस ने अधिकांश प्रांतों में विजय हासिल की और लीग ने इस चुनावी पराजय को हिंदू हितों के अनुकूल और मुस्लिमम हितों के हानिकारक रूप में देखा। परिणामस्वरूप कांग्रेस से बड़ी संख्या में  मुस्लिमों ने दलबदल किया। 1939 में लीग ने पीरपुर रिपोर्ट (The Pirpur Report) और शरीफ रिपोर्ट (The Sharif Report) प्रकाशित की, जिसमें कांग्रेस के कुशासन व्यापक रूप से चर्चा की गयी और इसने लीग के लिए मुसलमानों को जुटाने के लिए उत्तेजित किया। अक्टूबर 1937 में, जिन्ना ने लखनऊ में घोषणा की, कि भारत में तीन राजनीतिक संस्थाएँ हैं, कांग्रेस, ब्रिटिश और लीग। इस प्रकार लीग ने भारतीय राजनीति एक नये संघर्ष की शुरुआत की। बाद में, लीग मुस्लिम समुदाय के लिए एक पांच साल की योजना बनाई और ऑल इंडिया मुस्लिम छात्र संघ (All-India Muslim Students Federation) का आयोजन किया।

23 मार्च 1940 को लाहौर में अपनी वार्षिक बैठक में लीग ने भारत के उत्तर पश्चिमी और पूर्वोत्तर में भारत के मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य पाकिस्तान बनाने का संकल्प लिया (पाकिस्तान शब्द सर्वप्रथम 1930 में बनाया गया था)। एक अनुमान के अनुसार 100,000  लोगों ने लाहौर के इस प्रसिद्ध सत्र में भाग लिया था। लगभग 90,000 लोग पार्टी के सदस्य थे, और सदस्यता में वृद्धि जारी थी। एक साप्ताहिक पार्टी समाचार पत्र, डॉन(Dawn), 1941 में निकाला गया, और अगले ही वर्ष यह राष्ट्रीय पाठकों तक पहुँच बनाने के लिए एक दैनिक बन गया। 1943 में, लीग पाकिस्तान के क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिए एक योजना समिति बनाई गई हैं, और एक समिति प्रांतीय लीग दलों के बीच  अनुशासन और नियमों को लागू करने के लिए भी बनाई गयी।

1944 में लीग में लेखकों की एक समिति बनाई गई थी; अगले दो वर्षों में इसने मुख्य रूप पाकिस्तान साहित्य श्रृंखला के अंतर्गत इसने 10 पर्चे, अख़बारों में लेख और चुनाव अभियान सामग्री प्रकाशित की, इसमे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, प्रोफेसर जमील उद दीन अहमद और यहाँ के छात्रों ने ने प्रमुख सहयोग किया और लाहौर के शेख मुहम्मद अशरफ लीग के आधिकारिक प्रकाशक बन गये। लीग ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय से छात्र कार्यकर्ताओं को भर्ती किया, सक्रिय रूप से विशेष रूप से शहरों में और ग्रामीण दोनोंक्षेत्रों में पाकिस्तान के लिए मांग की और लीग के उम्मीदवारों के लिए चुनाव अभियानो में लीग का प्रचार किया। 1940 में सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि के साथ, लीग ने लीग की बैठकों की रक्षा के लिए और मुस्लिम नेताओं, विशेष रूप से मोहम्मद अली जिन्ना के अंगरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए एक अर्द्धसैनिक मुस्लिम नेशनल गार्ड (Muslim National Guard) बनाया गया।

1937 और 1946 के बीच संगठनात्मक काम की वजह से, लीग ने 1946 के आम चुनावों में लीग ने जबरदस्त जीत हासिल की, इसने पंजाब में एक तिहाई सीटें, बंगाल में 250 में से 115 सीटें और पूरे भारत में मुस्लिमों के लिए आरक्षित लगभग सीटें जीत ली। अब पार्टी की सदस्यता लाखों में थी। इस जीत ने जिन्ना के इस दावे का समर्थन किया, कि मुसलमानों ने मुस्लिमों के हितों की रक्षा के लिए पाकिस्तान की मांग की है। अँग्रेज़ों ने बहुत जल्द ही, महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू के इन दावों के बावजूद कि कांग्रेस मुस्लिमों के साथ संपूर्ण भारत की प्रवक्ता है, जिन्ना को भारत के मुसलमानों के प्रवक्ता के रूप में स्थान दे दिया। इस चुनावी जीत का एक परिणाम के रूप में, मुस्लिम नेताओं की एक एक बढ़ती हुई संख्या, जिन्होने मुसलमानों के बीच साख नहीं खोना चाहते थे लीग शामिल हुई।लीग ने यह भी प्रदर्शन किया की वह दक्षिण एशिया के मुसलमानों की पार्टी थी। 1946 में लीग कांग्रेस के साथ समता के आधार पर, अंतरिम सरकार में प्रवेश करने पर सहमत हुई। लियाकत अली खान ने सरकार में सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक, वित्त सदस्य का पद प्राप्त किया।

1947 के शुरुआत में ही कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों भारत और पाकिस्तान की स्वतंत्रता और इन्हे संप्रभु राज्यों में विभाजित किया जाना चाहिए इस बात पर सहमति व्यक्त की। 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के निर्माण के साथ, जिन्ना गवर्नर जनरल और लियाक़त अली खान, पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री बने। AIML इस समय दो पार्टियों, पाकिस्तान मुस्लिम लीग और भारतीय मुस्लिम लीग में विभाजित हो गयी।

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