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वर्द्धनवंश का उद्भव The Emergence of Vardhan Dynasty – Vivace Panorama

वर्द्धनवंश का उद्भव The Emergence of Vardhan Dynasty

हर्षचरित के अनुसार वर्द्धन वंश का संस्थापक पुष्यभूति था। वह शिव का भक्त था और उसने एक नवीन राजकुल की स्थापना की जिसकी राजधानी श्रीकण्ठ थी। इस वंश को वैश्य जाति का कहा गया है। मंजूश्रीमूलकल्य ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से भी उनके वैश्य होने की पुष्टि होती है। बाण के अनुसार हर्ष के पैतृक राज्य की राजधानी स्थाण्वीश्वर (थानेश्वर) थी। यह श्रीकण्ठ जनपद में सरस्वती नदी के तट पर स्थित थी। इस क्षेत्र का समीकरण वर्तमान हरियाणा से किया जा सकता है।

हर्ष के बांसखेड़ा एवं मधुवन अभिलेखों में पुष्यभूति वंश के प्रारंभिक शासक नरवर्द्धन, राज्यवर्द्धन प्रथम, आदित्यवर्द्धन और राज्यवर्द्धन द्वितीय थे। इस वंश के प्रारंभिक तीन शासकों की राजनैतिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी, ये महाराज कहलाते थे। यह भी संभव है कि ये गुप्तों, हूणों या मौखरियों के अधीनस्थ रहे हों। नरवर्द्धन व राज्यवर्द्धन प्रथम की उपाधि महाराज थी लेकिन यह उपाधि उस समय पूर्ण प्रभुता का सूचक नहीं थी। प्रभाकर वर्द्धन ही सबसे पहले महाराजाधिराज कहलाया।

आदित्यवर्द्धन राज्यवर्द्धन के बाद शासक बना। उसने परवर्ती गुप्त शासक महासेनगुप्त की बहन महासेनगुप्ता से विवाह किया। परवर्ती गुप्तों से इस संबंध की स्थापना के बाद पुष्यभूतियों की राजनैतिक स्थिति में बदलाव अवश्य आया होगा।

प्रभाकरवर्द्धन को इस कुल का प्रथम प्रभावशाली शासक माना जा सकता है। यह प्रथम शासक था जिसने परमभट्टारक महाराजाधिराज उपाधि धारण की। हर्ष के बांसखड़ा अभिलेख में उसका एक ऐसे शासक के रूप में वर्णन किया गया है जिसका यश चारों समुद्रों के पार पहुँच गया था, जिसने अपने शौर्य अथवा नीति द्वारा अन्य शासकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। हर्षचरित में इसके राज्याभिषेक होने का उल्लेख है। स्पष्ट है कि वह एक प्रभुता सम्पन्न शासक था।

यह नि:सन्देह है कि प्रभाकरवर्द्धन उत्तरी भारत का शक्तिशाली शासक था। उसकी पत्नी का नाम यशोमति थी।

हर्ष के शासक बनते ही आसाम के राजा भास्कर वर्मा ने उससे मैत्री करने के लिए अनेक उपहारों के साथ अपने दूत हसवेग को हर्ष के पास भेजा। भास्कर वर्मा हर्ष से मैत्री बनाने के लिए समुत्सुक थे।

यह मैत्री पारस्परिक हित के लिए थे क्योंकि वे दोनों गौड़ाधिपती शशांक के शत्रु थे। शशांक के प्रति दोनों की शत्रुता से परस्पर एकता स्वाभाविक थी। हर्षचरित में उल्लेख है कि हर्ष ने शासक बनते ही गौड़ के राजा शशांक को पराजित करने के लिए अपने सेनापति भण्डि को आगे भेजा। प्रश्न यह उठता है कि शशांक के विरुद्ध अभियान का क्या परिणाम हुआ, इस संबंध में आंशिक संकेत ह्वेनसांग की जीवनी से मिलता है। कहा गया है कि उन्होंने (हर्ष ने) शीघ्र ही अपने भाई की हत्या का प्रतिशोध लिया और अपने को भारत का अधिपति बनाया। ह्वेनसांग की जीवनी में कोंगद देश पर हर्ष के आक्रमण का भी उल्लेख है। इसके परिणामों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं हैं। हर्ष शशांक से अपने भाई की हत्या का बदला अवश्य लेना चाहता था किन्तु हर्ष को 619 ई. तक सफलता नहीं मिली थी। जाम के लेख से यह स्पष्ट होता है कि इस समय तक भी शशांक पूरे वैभव के साथ शासन कर रहा था। अभिलेख में कहा गया है- महाराजाधिराज श्री शशाक राज्य शासति। उसे सामन्तों पर प्रभुता रखने वाला तथा महाराजाधिराज कहा जाना महत्त्वपूर्ण है। यह लेख महासामन्त माधवराज द्वितीय का है तथा उसमें ग्राम दान की चर्चा है। इसी प्रकार दक्षिणी मगध में रोहतासगढ़ नामक स्थान पर शशांक के नाम का एक प्रस्तर बना हुआ है जिसमें शशांक को महासामन्त कहा है। उल्लेखनीय है कि हर्षचरित में गौड़ नरेश को गौड़ाधिपति बताया है जबकि ह्येनसांग ने उसे कर्णसुवर्ण का शासक कहा है। ह्वेनसांग के यात्राविवरण के अनुसार शशांक की महाराजाधिराज के रूप में 637 ई. तक सत्ता विद्यमान थी। ऐसा प्रतीत होता है कि रोहतासगढ़ का प्रस्तर (जिसमें शशांक को महासामन्त बताया) हर्ष के सिंहासनारोहण से पूर्व का है अर्थात् जब शशांक संभवत: मौखरियों (कन्नौज शासक) का सामन्त था और मौखरियों की शक्ति क्षीण होने पर वह स्वतंत्र हो गया। स्वतंत्र होने पर शशांक के अधिकार में सम्पूर्ण बंगाल रहा होगा, साथ ही उड़ीसा का गंजाम प्रदेश भी उसके राज्य का एक अंग था।


यहाँ स्मरणीय है कि ह्वेनसांग ने उन प्रदेशों के शासकों का उल्लेख किया है जिन पर हर्ष का आधिपत्य नहीं था। पूर्वी भारत की यात्रा के समय ह्वेनसांग ने कर्णसुवर्ण (समतट-डवाक एवं पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ति) के प्रदेश के शासक का उल्लेख नहीं किया। इससे अपरोक्ष रूप से संकेत मिलता है कि उसकी पूर्वी भारत यात्रा (ह्ननसांग की) तक हर्ष का उपरोक्त प्रदेशों पर अधिकार हो गया था क्योंकि पहले कर्णसुवर्ण प्रदेश के शासक बाण ने गौड़ाधिपति (शशांक) बताया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि 637 ई. तक बंगाल क्षेत्र हर्ष के अधिकार क्षेत्र में थे। दूसरे शब्दों में भाण्डि के साथ सेना भेजने में हर्ष को तत्काल सफलता नहीं मिली थी क्योंकि गंजाम लेख सूचना देता है कि 619-20 ई. तक उड़ीसा क्षेत्र पर शशांक की सत्ता कायम थी ओर वह महाराजाधिराज के रूप में प्रतिष्ठित था। संभवतः शशाक की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों को पराजित कर हर्ष ने बंगाल एवं उड़ीसा पर कब्जा किया होगा। बसाक की मान्यता है, संभवतः शशाक के साथ दूसरा युद्ध भी हुआ था और शशांक के उत्तराधिकारियों से सब प्रदेश छीन कर भास्कर वर्मा को दे दिये होंगे। भाण्डि के प्रथम अभियान के फलस्वरूप शशांक कन्नौज से वापस लौटा होगा अथवा भाण्डि को लौटने को बाध्य किया होगा किन्तु उसकी सत्ता 619 ई. तक समाप्त नहीं की जा सकी। इस तथ्य की पुष्टि आर्य मंजुश्रीमूलकल्प से भी होती है। इसमें विवरण आया है कि हकाख्य (प्रथम शब्द ‘ नामधारी राजा) नामक राजा भारत के पूर्व प्रदेश की ओर बढ़ा और पुण्डनगर (पुण्ड्रवर्द्धन) तक पहुँच गया और उसने सौमाख्य (‘श नामधारी राजा) को पराजित किया एवं अपने राज्य में उसे सीमित रहने के लिए बाध्य किया और फिर हकाख्य राजा वापस लौट आया। इससे प्रतिध्वनित होता है कि हर्ष शशांक का पूर्णत: उन्मूलन नहीं कर पाया था। इस तरह पूर्व प्रस्तावित 606 ई. के भाण्डि अभियान का कोई तात्कालिक परिणाम नहीं निकला। अत: ह्वेनसांग का यह कथन समीचीन प्रतीत नहीं होता कि शीलादित्य ने शीघ्र ही अपने भाई की हत्या का बदला लिया और अपने को भारत का अधिपति बनाया।

पुलकेशिन द्वितीय का अधिकार नर्मदा तक फैले विस्तृत क्षेत्र पर था और लाट (सौराष्ट्र), गुर्जर (गुजरात) राज्यों पर पुलकेशिन का प्रभाव था। पश्चिमी क्षेत्र पर प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से मालवा (वलभी) के ध्रुवसेन पर हर्ष ने आक्रमण कर दिया जिसे पुलकेशिन के विरुद्ध अभियान का प्रथम चरण कहा जा सकता है। गुर्जर नरेश दद्द के 706 ई. के नौसारी दानपत्र से ज्ञात होता है कि हर्षदेव द्वारा पराजित वलभी नरेश का परित्राण (शरण देन) करने से उत्पन्न हुआ। यश का वितान गुर्जर राजा दद्द पर निरन्तर फैला हुआ था। (श्री हर्ष देवाभिभूतो श्री वलभीपति परित्राणो पजात: भ्रमदभ्र विभ्रमयशो वितान: श्री दद्दः) इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वलभी नरेश ध्रुवसेन पराजित हुआ एवं दद्द की शरण में गया। इस विजय के बाद ध्रुवसेन को अपने पक्ष में मिलाने हेतु हर्ष ने कूटनीति का प्रयोग किया और उससे अपने पुत्री का विवाह कर दिया तथा शत्रु को मित्र बना लिया। इस संबंध में निहार रंजनराय का विचार है कि हर्ष संभवत: ऐसे राजनैतिक उद्देश्य से प्रेरित था जिसका प्रभाव उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों सम्राटों पर पड़ता था। यह नर्मदा सीमाप्रान्त का प्रश्न था जो पूर्व में गुप्त सम्राटों के समय उठा। उन्होंने विजय या वैवाहिक संबंधों द्वारा हल करने की चेष्टा की थी। वही सवाल हर्ष के समक्ष उठ खड़ा हुआ।

दद्द का समय 629 ई. से 640 ई. के मध्य माना जाता है और ध्रुवसेन 630 ई. के लगभग गद्दी पर बैठा था। यह युद्ध 633 ई. के आस-पास हुआ था। वलभी के साथ संघर्ष ह्वेनसांग के पश्चिमी भारत में जाने से (अर्थात् 641-42 ई.) पूर्व हुआ। उसने वलभी को मो-ला-पो कहा है।

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