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लघु सौरमण्डलीय पिण्ड Small Solar System Bodies – Vivace Panorama

लघु सौरमण्डलीय पिण्ड Small Solar System Bodies

अंतर्राष्ट्रीय खगोलशास्त्रीय संघ (IAU) के अनुसार यह सौरमंडलीय पिण्डों की तीसरी श्रेणी है। इसके तहत क्षुद्रग्रह, धूमकेतु या पुच्छलतारा, उल्का, उपग्रह व अन्य छोटे खगोलीय पिण्डों को शामिल किया गया है।

क्षुद्रग्रह या ग्रहिकाएँ Asteroids

इन्हें लघु ग्रह, अवांतर ग्रह आदि नामों से भी जाना जाता है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले विभिन्न आकारों के चट्टानी मलवे (rocky debris) जो मुख्यतः बृहस्पति और मंगल की कक्षाओं के मध्य की 547 मिलियम किमी० की पट्टी में विचरण करते हैं, क्षुद्रग्रह कहलाते हैं। अंतरिक्ष में करीब 40,000 क्षुद्रग्रह हैं। चिरॉन (Chiron) नामक क्षुद्रग्रह शनि तथा अरुण (Uranus) के बीच चक्कर लगाती है। खगोलविदों के अनुसार ग्रहों के विस्फोट के फलस्वरूप टूटे हुए ग्रह (अवांतर ग्रह) के रूप में इनकी उत्पति हुई है। ये बड़े ग्रहों के टुकड़े हैं जो किसी समय टूटकर इनसे अलग हो गये। फोर वेस्टा (Four vesta) एकमात्र ऐसा क्षुद्रग्रह है जिसे नंगी आँखों से देखा जा सकता है। कुछ अन्य बड़े क्षुद्रग्रह आटेन (Aten), पलास (Pallas), हाइजिया (Hygeia) आदि हैं।


धूमकेतु या पुच्छलतारा Comets

Comet शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द Aster Komates से हुई है जिसका अर्थ है लंबे बाल वाला तारा। इसका लम्बा बाल इसमें पाई जानेवाली एक पूँछ होती है जो कि हवा में उड़ते हुए लम्बे बाल की तरह लगती है। यह पूँछ एक नाभिक से निकलती है। यह धूमकेतु की सामान्य रूप से दिखाई पड़नेवाली संरचना है। लेकिन धूमकेतु की संरचना सदैव ऐसी नहीं होती। उसकी पूँछ सूर्य के नजदीक आने पर ही दिखाई पड़ती है। प्लूटो के बाद का क्षेत्र धूमकेतु क्षेत्र है जिसके बाद गहन अंतरिक्ष शुरु हो जाता है।

एक धूमकेतु मुख्य रूप से बर्फ व धूलकणों का बना होता है। यह बर्फ, मिथेन, अमोनिया, कार्बन डाईऑक्साइड, जल इत्यादि के जमने से बना होता है। इस बर्फ में कुछ चट्टानें भी जमी रहती हैं। यह धूमकेतु सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृत्तीय (elliptical) कक्षा में घूमता रहता है। धूमकेतु इस प्रकार सूर्य का चक्कर लगाते हैं कि इसकी पूँछ (tail) का फैलाव सदैव सूर्य के विपरीत दिशा में रहता है तथा सिर (head or coma) सूर्य की ओर रहता है। सामान्यतया इसकी कक्षा काफी लंबी होती है, इसीलिए कई वर्षों बाद दिखाई पड़ता है। इसी लंबे अंतराल के कारण पहले ऐसा समझा जाता था कि धूमकेतु दुबारा आते ही नहीं हैं लेकिन सर्वप्रथम एडमण्ड हेली ने यह सिद्ध किया कि धूमकेतु काफी लंबे अंतराल के बाद आते हैं। हेली धूमकेतु (Halley’s Comet) एक प्रमुख धूमकेतु है जो कि अंतिम बार 1986 में दिखायी दिया था। यह धूमकेतु 75.81 वर्ष (लगभग 76 वर्ष) बाद दिखाई देता है। अब यह 2062 में दिखायी पड़ेगा।

जैसे ही धूमकेतु आंतरिक सौर मंडल में प्रवेश करता है, सूर्य की गर्मी से इस पर आच्छादित बर्फ पिघलने लगती है और गैस बनने लगती है जिसके कारण यह गैस से घिरे एक नाभिक का रूप धारण कर लेता है। सूर्य से निकलनेवाली गैस सूर्य की विपरीत दिशा में अर्थात् धूमकेतु के केन्द्र से पीछे काफी दूर तक (करोड़ों किमी० तक) फैल जाती है और इस प्रकार धूमकेतु की पूँछ बन जाती है, जो अंतरिक्ष में काफी दूर तक फैल जाती है। इस प्रकार, जब हमें धूमकेतु दिखाई पड़ता है (अर्थात् जब सौर मंडल के अंदरुनी हिस्से में प्रवेश करता है) तो हमें नाभिक से निकलती लम्बी पूँछ दिखाई पड़ती है। यह पूँछ हमेशा सूर्य से विपरीत दिशा में रहती है। इसकी पूँछ में एक खतरनाक रसायन सायनोजेन (CN) होता है।


पहले धूमकेतुओं की कक्षा की जानकारी नहीं होने के कारण और कभी-कभी दिखाई पड़ने के कारण इन्हें अपशकुन (bad omen) का प्रतीक माना जाता था। लेकिन खगोल विज्ञान के विकास के साथ ही ये भ्राँतियाँ अब दूर हो गई हैं।


उल्का Meteor

रात्रि के समय आकाश में अत्यंत चमकीले पदार्थ तेजी के साथ पृथ्वी की ओर गिरते नजर आते हैं। वस्तुतः ये क्षुद्रग्रह व अन्य आकाशीय पिण्डों के टुकड़े होते हैं जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो हवा के घर्षण से इसका ताप बढ़ता जाता है और ये जलकर नष्ट हो जाते हैं। यह टूटते हुए तारों की शक्ल में नजर आते हैं। इसे ही उल्का कहते हैं। कुछ उल्काएँ वायुमंडल में पूरी तरह से नहीं जल पाती है। और बचा हुआ पिण्ड पृथ्वी के धरातल पर आकर गिर पड़ता है। इसे उल्कापिण्ड (Meteorite) कहते हैं।

उपग्रह Satellites

वे आकाशीय पिण्ड जो अपने-अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं उपग्रह कहलाते हैं। इनमें भी अपना प्रकाश नहीं होता है और ये अपने ग्रह के साथ सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं। ग्रहों के समान उपग्रहों का परिक्रमण पथ भी दीर्घवृतीय या अण्डाकार (elliptical) होता है। उपग्रह ग्रहों की अपेक्षा छोटे होते हैं। अधिकतर उपग्रह उसी दिशा में अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं जिस दिशा में वह ग्रह सूर्य की परिक्रमा करता है। लेकिन कुछ उपग्रह ऐसे भी हैं जिनका मार्ग अलग  विपरीत दिशा में है।

बुध तथा शुक्र को छोड़कर शेष सभी ग्रहों के उपग्रह हैं। सौरमंडल में 167 ज्ञात उपग्रह हैं। जिनमें गैनीमीड (Gaynmede) सबसे बड़ा तथा डीमोस (Deimos) सबसे छोटा है।

पृथ्वी का उपग्रह: चन्द्रमा Moon

चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। पूरे सौर मंडल में यही एक उपग्रह है जो सामान्य उपग्रह से बहुत बड़ा है। प्रायः सभी उपग्रह अपने मूल ग्रह के आकार का आठवाँ भाग है जबकि चन्द्रमा पृथ्वी के व्यास के लगभग एक चौथाई के बराबर है। चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के छठे भाग के बराबर है। चन्द्रमा पृथ्वी का निकटतम खगोलीय पिण्ड है। चन्द्रमा की पृथ्वी से औसत दूरी 382 हजार किमी० है। चन्द्रमा की पृथ्वी से निकटतम दूरी (Perigee) 364 हजार किमी० तथा अधिकतम दूरी (Apogee) 406 हजार किमी० है। चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर 27.3 दिन (27 दिन 7 घंटे 43 मिनट 11.47 सेकण्ड) में और इतने ही समय में अपनी धुरी पर भी एक चक्कर लगाता है। चन्द्रमा के परिक्रमण काल व घूर्णन काल समान होने के कारण हमें इसका केवल एक ही सतह दिखायी देता है और यही सतह हमेशा सूर्य के सामने रहता है। इसका पिछला भाग हमेशा अंधकार में डूबा रहता है जिसे शांति का सागर (sea of Tranquility) कहते हैं। वहाँ का तापमान बहुत ही कम है। इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 0.012 भाग है। इसका घनत्व 3.4 ग्राम प्रति घन सेमी० है। पृथ्वी और चन्द्रमा एक ही प्रकार की चट्टानों से बने हैं। इसी से अनुमान लगाया जाता है कि चन्द्रमा की उत्पत्ति पृथ्वी के ही एक भाग के टूट जाने से हुई है। कहा जाता है कि प्रशांत महासागर का गड्डा चन्द्रमा के पृथ्वी से टूटकर अलग हो जाने से बना है। चन्द्रमा पर प्राप्त चट्टानों से बनी मिट्टी का रंग नारंगी है। चन्द्रमा पर जल नहीं है। चन्द्रमा पर जलरहित क्षेत्र (waterless area) को तूफान का महासागर (Ocean of Storms) कहा जाता है। चन्द्रमा का धरातल ऊबड़-खाबड़ है। धरातल पर कहीं ऊँचे-ऊँचे पहाड़ हैं तो कहीं सपाट मैदान हैं तो कहीं गहरे-गहरे गड्ढे हैं। चन्द्रमा पर सबसे ऊँचा स्थान लिबनिट्ज पर्वत (Libnitz mountain) है जो चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित है और 35,000 फीट ऊँचा है। उल्कापात या ज्वालामुखी विस्फोट के कारण चन्द्रमा के तल पर अनेक गड्ढे बन गए हैं। चन्द्रमा में जो धब्बे दिखाई देते हैं वे समुद्र नहीं हैं जैसी कि प्राचीन मान्यता थी बल्कि वे ज्वालामुखी से निकले लावे के बड़े-बड़े मैदान हैं। नंगी ऑखों से हम चन्द्रमा का जो भाग देखते हैं उसमें चमकीली और

विभिन्न ग्रहों के उपग्रह
ग्रह उपग्रहों की संख्या मुख्य उपग्रहों के नाम
पृथ्वी 1 चन्द्रमा (Moon)
मंगल 2 फोबोस एवं डीमोस
वृहस्पति 67 इओ, यूरोपा, गैनीमीड, कैलिस्टो, लो
शनि 62 टाइटन, येपेटस, रिया, डियोन, टीथिस, एटलस, लापेटस, हेलेन, प्रोमेथ्रस, फोइबे
अरुण 27 मिरण्डा, एरिअल, अम्ब्रीएल, टाइटेनिया, ओबेरॉन, बेलिण्डा, आफेलिया
वरुण 14 ट्रिटोन तथा नेरेइड

गहरी पट्टियाँ दिखाई देती हैं। चमकनेवाले भाग पहाड़ों व ऊँचे पठारों का क्षेत्र है, जो सूर्य का प्रकाश पाते हैं। गह दिखनेवाले भाग नीची भूमि है जिसको कभी समुद्र समझा गया था और उसी के अनुसार नाम भी दिये गये थे। यद्यपि चन्द्रमा पर जल नहीं है। चन्द्रमा पर जहाँ दिन का तापमान 100-130°C होता हैं वहीं रात का तापमान -170°C तक होता है। तापान्तर का इतना होना वायुमंडल की अनुपस्थिति के कारण है।

चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं है क्योंकि इसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति गैसों को बनाये रखने में असमर्थ है। इसलिए चन्द्रमा पर कोई ध्वनि भी नहीं है क्योंकि ध्वनि वायु के माध्यम से संचारित कपन है। चन्द्रमा से आकाश का रंग काला दिखायी देता है। चन्द्रमा की रोशनी 1.3 सेकण्ड में पृथ्वी पर पहुँचती है।

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