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भारत में 1920 के दशक में नयी शक्तियों का उदय Rise of New Powers In India In The 1920s – Vivace Panorama

भारत में 1920 के दशक में नयी शक्तियों का उदय Rise of New Powers In India In The 1920s

20वीं शताब्दी में दूसरे दशक के अंतिम एवं तीसरे दशक के प्रारम्भिक वर्ष आधुनिक भारतीय इतिह्रास में कई कारणों से महत्वपूर्ण थे। इस दौरान, जहां एक ओर राष्ट्रीय आंदोलन में भारतीयों ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय परिदृश्य पर विभिन्न राजनीतिक धाराओं का क्रिस्टलीकरण भी हुआ। ये विभिन्न राजनैतिक धारायें अपने अभ्युदय की प्रक्रिया में जहां एक ओर सत्य और अहिंसा पर आधारित गांधीवादी सत्याग्रह की अवधारणा से अभिप्रेरित थीं, वहीं दूसरी ओर कुछ अन्य कारणों ने भी इनके अभ्युदय में सकारात्मक भूमिका निभायी। इस काल के भारतीय चिंतकों पर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं एवं परिस्थितियों का जो प्रभाव दर्ज किया गया, वह पहले इतना कभी नहीं देखा गया था। दूसरे शब्दों में भारतीय चिंतकों के मनोमस्तिष्क पर धारदार और सुस्पष्ट सामाजिक-आर्थिक अंतर्वस्तु का प्रवेश हुआ।

1920 के दशक में जिन नयी शक्तियों का अभ्युदय हुआ वे इस प्रकार थीं-

समाजवादी एवं मार्क्सवादी विचारों का प्रसार

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर विभिन्न समाजवादी एवं साम्यवादी संगठनों के उदय ने भारत में कांग्रेस के एक खेमे पर भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करायी तथा उन्हें गहराई तक अभिप्रेरित कर दिया। जवाहरलाल नेहरू तथा सुभाष चन्द्र बोस इसके सर्वप्रमुख प्रेरणा प्रतीक थे। इन दोनों प्रमुख कांग्रेसियों पर समाजवादी विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा। ये युवा राष्ट्रवादी, गांधीवादी विचारों तथा राजनैतिक कार्यक्रम से असंतुष्ट थे तथा भारत की आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक रुग्णता को दूर करने की वकालत कर रहे थे। 1917 की रूसी क्रांति ने इन युवा राष्ट्रवादियों पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। फलतः ये समाजवादी विचारों से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सके। ये युवा राष्ट्रवादी-

  1. स्वराजवादी एवं परिवर्तन विरोधी दोनों के आलोचक थे।
  2. ‘पूर्ण स्वराज्य’ (पूर्ण स्वतंत्रता) के नारे के साथ साम्राज्यवाद विरोधी स्वर की मुखर अभिव्यक्ति के पक्षधर थे।
  3. चेतना एवं अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक धाराओं के उदय से प्रभावित थे।
  4. राष्ट्रवादी और साम्राज्यवाद विरोधी विचारधारा के सामाजिक न्याय से समन्वय की आवश्यकता पर जोर, पूंजीवादी और जमींदारी प्रथा की आलोचना और समाजवादी विचारधारा अपनाने की शिक्षा पर बल देते थे।

1920 में एम.एन. राय, अंबानी मुखर्जी तथा ताशकंद में रहने वाले कुछ अन्य उत्प्रवासी भारतीयों ने कामिंटर्न (रूस का अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी संगठन) के द्वितीय अधिवेशन के पश्चात् भारतीय साम्यवादी पार्टी (Indian Communist Party) की स्थापना की। एम.एन. राय प्रथम भारतीय थे, जिन्हें कामिंटर्न के नेतृत्व हेतु चुना गया।

1924 में कई साम्यवादियों यथा- एस.ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद, शौकत उस्मानी तथा नलिनी गुप्ता को कानपुर बोल्शेविक षडयंत्र केस में कारावास की सजा सुनायी गयी।

1925 में कानपुर में अखिल भारतीय स्तर के संगठन कम्युनिस्ट पार्टी आफ इण्डिया की स्थापना की गयी।


1929 में सरकार ने 32 लोगों को गिरफ्तार कर लिया तथा उन पर मेरठ षडयंत्र केस का मुकदमा चलाया। गिरफ्तार किये गये लोगों में क्रांतिकारी राष्ट्रवादी, ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ता तथा तीन ब्रिटिश साम्यवादी फिलिप स्प्रेट, बेन ब्रैडले और लेस्टर हचिन्सन सम्मिलित थे। सरकार का मुख्य उद्देश्य यूनियन आंदोलन को समाप्त करना तथा साम्यवादियों को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग-थलग करना था। पूरे राष्ट्र में कृषक एवं मजदूर संगठनों ने एकजुट होकर प्रयास किया तथा मार्क्सवादी एवं साम्यवादी विचारों का प्रचार-प्रसार किया। 1928 में सभी कृषक एवं मजदुर संगठनों को मिलाकर एक नया संगठन बनाया गया तथा इसका नाम अखिल भारतीय कामगार तथा कृषक दल (आल इण्डिया वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी) रखा गया। इस पार्टी को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया तथा देश के विभिन्न स्थानों में इसकी शाखायें खोली गयीं। सभी साम्यवादियों को इनका सदस्य बनाया गया। वर्कर्स एण्ड पीजेंट्स पार्टी का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस के अंतर्गत कम करते हुए इसे अधिक क्रांतिकारी रुझान वाली तथा जनसामान्य की पार्टी बनाया गया। साथ ही वर्ग संगठनों में स्वतंत्र रूप से किसानों और मजदूरों को सम्मिलित कर स्वतंत्रता प्राप्ति एवं तत्पश्चात भारत को समाजवाद के लक्ष्य तक पहुंचना था।

भारतीय युवाओं की सक्रियता

पूरे भारत में युवा संगठन स्थापित किये गये तथा युवाओं के सैकड़ों अधिवेशन सम्पन्न हुए। 1928 में जवाहरलाल नेहरू ने अखिल बंगाल छात्र सम्मेलन को सम्बोधित किया।

किसानों के प्रदर्शन

मध्य प्रांत में किसानों ने काश्तकारी नियमों में संशोधन, भूराजस्व में कमी, बेदखली के विरुद्ध संरक्षण तथा ऋणग्रस्तता से बचाव जैरो मुद्दों का लेकर उग्र प्रदर्शन किये। आंध्र में रम्पा क्षेत्र, राजस्थान, बम्बई तथा मद्रास के काश्तकारों ने भी इसी तरह के प्रदर्शन किये। गुजरात के बारदोली में 1928 में किसान आंदोलन का नेतृत्व वल्लभभाई पटेल ने किया।

व्यापार संघ आदोलन का विकास

भारत में व्यापार संघ आंदोलन (Trade Union Movements) का नेतृत्व 1920 में स्थापित अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) ने किया। लाला लाजपत राय इसके प्रथम अध्यक्ष एवं दीवान चमन लाल इसके प्रथम सचिव थे। बाल गंगाधर तिलक ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1920 के दशक में इंटक के नेतृत्व में अनेक कारखानों में हड़तालें आयोजित की गयीं। जिनमें खड़गपुर रेलवे वर्कशॉप, टाटा आयरन एवं स्टील फैक्ट्री (जमशेदपुर), बाम्बे टेक्सटाइल मिल्स (इस मिल की हड़ताल में एक लाख पचास हजार श्रमिकों ने लगभग पांच महीने तक मिल में हड़ताल जारी रखी), एवं बकिंघम कर्नाटक मिल की हड़तालें प्रमुख थीं। 1928 में देश भर में आयोजित विभिन्न हड़तालों में लगभग 5 लाख श्रमियों ने भाग लिया। मद्रास में पहली बार मजदूर दिवस को मई दिवस के रूप में मनाया गया

जातीय आंदोलन

पूर्ववर्ती शोषण एवं उत्पीड़न के विरुद्ध भारतीय समाज में विभिन्न जातीय आंदोलन एक बार पुनः गति पकड़ने लगे। हालांकि इन आंदोलन की प्रकृति विभाजनकारी, संकीर्ण एवं मौलिक थी। इनमें निम्न आंदोलन सम्मिलित थे-

  1. मद्रास में जस्टिस पार्टी का आंदोलन।
  2. आत्म-सम्मान आंदोलन (1925)- यह आंदोलन मद्रास के ई.पी. रामास्वामी नायकर पेरियार के नेतृत्व में चलाया गया।
  3. सतारा (महाराष्ट्र) में सत्यशोधक कार्यकर्ताओं का आंदोलन।
  4. भास्करराव जाधव (महाराष्ट्र) के नेतृत्व में चलाया गया आंदोलन।
  5. महाराष्ट्र में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में महारों का आंदोलन।
  6. केरल में के. अयप्पन एवं सी. केसवन के नेतृत्व में सिद्धांतवादी इर्झावों का आन्दोलन।
  7. सामाजिक स्थिति में सुधार हेतु बिहार में यादवों का आंदोलन।
  8. पंजाब में फजल-ए-हुसैन के नेतृत्व में यूनियनिस्ट पार्टी का आंदोलन।

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