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भारतीय संघ एवं राज्यों का पुनर्गठन Reorganization of the Indian Union and the States – Vivace Panorama

भारतीय संघ एवं राज्यों का पुनर्गठन Reorganization of the Indian Union and the States

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत राज्यों का संघ है- इससे स्वतः यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान में राज्यों से संबंधित जितने भी उपबंध हैं, वे सभी राज्यों में एक समान रूप से लागू होते हैं (अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर)। संविधान निर्माताओं ने राज्यों के संघ की व्याख्या कर इसके स्वरूप को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार भारतीय संघ इन इकाइयों के मध्य हुए किसी समझौते का परिणाम नहीं है और इकाइयों की संघ से अलग होने की स्वतंत्रता भी प्राप्त नहीं है। इसके पश्चात् अनुच्छेद 2 में भारतीय संसद को उपयुक्त शर्तों के आधार पर किसी भी नए राज्यको संघ में सम्मिलित करने का या नये राज्यों की स्थापना करने का अधिकार है। परंतु इससे संबद्ध राज्य के विधानमण्डल की सहमति प्राप्त करनी पड़ती है ताकि संसद उस राज्य की जनता की मनोदशाओं को जान सके।

भारत में देशी राज्यों का विलय

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारतीय राज्य क्षेत्र दो वर्गों में विभक्त था- ब्रिटिश भारत और देशी रियासतें। ब्रिटिश भारत में 9 प्रांत थे, जबकि देशी रियासतों की संख्या 600 थी, जिनमें 542 रियासतों को छोड़कर शेष पाकिस्तान राज्य में शामिल हो गई। 542 रियासतों में से तीन रियासतों- जूनागढ़, हैदराबाद तथा जम्मू-कश्मीर को भारत में विलय कराने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जूनागढ़ रियासत को जनमत संग्रह के आधार पर तब भारत में मिलाया गया, जब उसका शासक पाकिस्तान चला गया। हैदराबाद की रियासत को सैन्य कार्यवाही करके भारत में सम्मिलित किया गया और जम्मू-कश्मीर रियासत के शासक ने पाकिस्तानी कबायलियों के आक्रमण के कारण विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करके अपनी रियासत की भारत में मिलाया। देशी रियासतों का भारत में विलय तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदर्शिता और साहसपूर्ण कूटनीतिक प्रयासों के कारण संभव हो पाया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत ब्रिटिश प्रांतों एवं देशी रियासतों को एकीकृत करके भारत में राज्यों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया, जो निम्नलिखित हैं:

‘ए श्रेणी के राज्य

ब्रिटिश भारत के प्रांतों के साथ 216 देशी रियासतों की सम्मिलित करके ‘ए’ श्रेणी के राज्यों का गठन किया गया। ये राज्य थे-असम, बिहार, बंबई, मध्य प्रदेश, मद्रास, ओडीशा, पंजाब, संयुक्त प्रांत, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश। इनकी संख्या 10 थी।

‘बी’ श्रेणी के राज्य


275 देशी रियासतों की नयी प्रशासनिक इकाई में गठित करके ‘बी’ राज्य की श्रेणी प्रदान की गयी। ये राज्य थे- हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पेप्सू (पटियाला और पूर्वी पंजाब के राज्यों का संघ), राजस्थान, सौराष्ट्र तथा त्रावणकोर-कोचीन। इनकी संख्या 8 थी।

‘सी’ श्रेणी के राज्य

61 देशी रियासतों को एकीकृत करके ‘सी’ राज्य की श्रेणी में रखा गया। ये राज्य थे- अजमेर, बिलासपुर, भोपाल, दुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर, त्रिपुरा और विंध्य प्रदेश के राज्य। इनकी संख्या 10 थी।

‘डी’ श्रेणी के राज्य

अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह को ‘डी’ राज्य की श्रेणी में रखा गया था।

राज्य पुनर्गठन आयोग

संविधान के द्वारा राज्यों का श्रेणियों में विभाजन तात्कालिक उपयोगिता के आधार पर किया गया था। प्रायः सभी इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थे। जब केंद्रीय सरकार ने मद्रास राज्य की तेलुगू भाषी जनता के अनुरोध पर 1952 में आंध्र को अलग राज्य बना देने का निर्णय किया तो स्थिति में आकस्मिक परिवर्तन आ गया। 1 अक्टूबर, 1953 में आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना के पश्चात्, भाषा के आधार पर नए राज्यों के पुनर्गठन की मांग भड़क उठी। जब इस समस्या की असंभव हो गया तो इस समस्या के शांतिपूर्ण निदान के लिए 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग की नियुक्ति की गई।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश फजल अली इस आयोग के अध्यक्ष और पंडित एच.एन. कुंजरू और सरदार के.एम. पाणिक्कर इसके सदस्य थे।

हालांकि संविधान निर्माण के पश्चात् ही 27 नवंबर, 1947 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश एस.के. धर की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय आयोग का गठन किया और उसे इस बात की जाँच-पड़ताल करने के लिए कहा कि भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन उचित है अथवा नहीं। इस आयोग ने दिसंबर 1948 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। इस रिपोर्ट में आयोग ने प्रशासनिक आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का समर्थन किया।

22 दिसंबर, 1953 को फजल अली की अध्यक्षता में गठित आयोग ने 30 सितंबर, 1955 में केंद्र सरकार की अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी और राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में निम्न सिफारिशें कीं-

  1. राज्यों का पुनर्गठन भाषा और संस्कृति के आधार पर अनुचित है।
  2. राज्यों का पुनर्गठन राष्ट्रीय सुरक्षा, वितीय एवं प्रशासनिक आवश्यकता तथा पंचवर्षीय योजनाओं की सफलता को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
  3. ए, बी, सी और डी वर्गों में विभाजित राज्यों को समाप्त कर दिया जाये तथा इनकी जगह पर सोलह राज्यों तथा तीन केंद्र शासित प्रदेशों का निर्माण किया जाए।

संसद ने इस आयोग की सिफारिशों को कुछ परिवर्तनों के साथ स्वीकार कर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम के अंतर्गत भारत में चौदह राज्य और पांच केंद्र शासित प्रदेश थे। जिन चौदह राज्यों का उल्लेख था, वे हैं- आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, बंबई, जम्मू-कश्मीर,केरल, मध्यप्रदेश, मद्रास, मैसूर, उड़ीसा (वर्तमान में ओडीशा), पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल।

जिन पांच केंद्रशासित प्रदेशों का नाम था, वे हैं- दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा एवं अंडमान-निकोबार द्वीप समूह।

भारत में मौजूदा 29 राज्य हैं- आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा तेलंगाना ।

नए राज्यों का निर्माण

भारत में नए राज्यों के निर्माण की शक्ति संविधान द्वारा भारतीय संसद को प्रदान की गई है (अनुच्छेद-3)। तत्सम्बन्धी संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, केन्द्रीय व्यवस्थापिका अर्थात् संसद सामान्य विधानद्वारा किसी राज्य में से उसका राज्यक्षेत्र अलग करके अथवा दो या अधिक राज्यों को अथवा राज्यों के भागों को मिलाकर नए राज्य का निर्माण के सकती है। संसद राज्यों की सहमति अथवा अनुमति के बिना भी उनके राज्यक्षेत्रों में परिवर्तन हेतु संविधान द्वारा अधिकृत है।

संविधान का अनुच्छेद संसद को किसी भी राज्य के क्षेत्र को बढ़ाने अथवा घटाने की, सीमाओं में परिवर्तन करने की अथवा राज्य के नाम में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान करता है। संसद द्वारा यह कार्य साधारण कानून बनाकर किया जा सकता है। अनुच्छेद-3 में उल्लिखित कानून निर्माण सम्बन्धी प्रावधानों के अनुसार, तत्संबंधी विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही प्रस्तुत किया जाएगा और राष्ट्रपति द्वारा यह विधेयक प्रभावित होने वाले राज्य के विधानमण्डल को निर्दिष्ट किया जाएगा। विधेयक भेजे जाने के साथ ही राष्ट्रपति द्वारा राज्य को अपना मत प्रस्तुत करने के सम्बन्ध में एक अवधि का निर्धारण किया जा सकता है। राज्य द्वारा अभिव्यक्त किए गए मत को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के लिए संसद बाध्य नहीं है। साथ ही संविधान द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद-2 और 3 के अधीन निर्मित कोई भी कानून अथवा विधि अनुच्छेद-368 के प्रयोजनार्थ इस संविधान का संशोधन नहीं समझे जाएंगे।

उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ की तरह तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की मांग के आंदोलन की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। छोटे राज्यों की अवधारणा के साथ सत्ता का विकेंद्रीकरण जुड़ा हुआ है। जवाहरलाल नेहरू सत्ता के विकेंद्रीकरण के पक्षधर रहे। इस प्रकार भारतीय राष्ट्र में मजबूत केंद्र बनाम कमजोर प्रदेश और विकेंद्रीकृत सत्ता की दो राजनीतिक धाराएं सक्रिय रही हैं।

विभिन्न राज्य पुनर्गठन आयोग
वर्ष आयोग का नाम अनुशंसा
1903 सर हर्बर्ट रिजले आयोग बंगाल सरकार की भाषायी आधार पर बंगाल विभाजन का सुझाव दिया।
1911 लॉर्ड हार्डिंग आयोग बंगाल विभाजन को निरस्त करने की मांग की गई थी।
1918 मांटेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट राज्यों के गठन के भाषायी एवं जातीय आधार को अस्वीकार किया परंतु छोटी इकाइयों पर बल दिया।
1928 मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट इस आयोग ने जनसंख्या, भौगोलिक आर्थिक एवं वित्तीय स्थिति, भाषा एवं जनता की इच्छा को आधार माना।
1930 भारतीय साविधिक आयोग इसने जाति, धर्म, आर्थिक हित, भौगोलिक एकरूपता, गांव-शहर में संतुलन इत्यादि में किसी भी एक मुद्दे को नहीं अपितु अन्य अनेक मामलों को गठन का आधार स्वीकार किया।
1936 संवैधानिक सुधार समिति इसकी अनुशंसा पर सांप्रदायिक आधार पर सिंध प्रांत का गठन किया गया।
1948 धर आयोग इस आयोग ने भाषायी आधार के बजाय ऐतिहासिक, भौगोलिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आधार को पुनर्गठन का आधार माना।
1948 जे.वी.पी. आयोग हालांकि इस आयोग ने आर्थिक, वित्तीय, प्रशासनिक एवं जनेच्छा के आधार को अस्वीकार नहीं किया लेकिन भाषा को भी एक आधारिक तथ्य के रूप में स्वीकार किया जिसके परिणामस्वरूप 1956 में आंध्र प्रदेश का गठन हुआ।
1955 फजल अली आयोग इस आयोग ने राष्ट्रीय एकता, प्रशासनिक, आर्थिक, वित्तीय व्यवहार्यता एवं आर्थिक विकास एवं अल्पसंख्यक हितों की रक्षा को पुनर्गठन के आधार रूप में स्वीकार किया। इस आयोग की अनुशंसा को परिवर्तनों के साथ स्वीकार कर राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया गया।

छोटे राज्य कितने उपयोगी

देशभर में उठ रहे राज्यों के विभाजनों के मुद्दे को खड़ा करने के पीछे विभिन्न दलों एवं राजनेताओं की महत्वाकांक्षाएं तो सर्वोपरि हैं अपितु देश एवं राज्य में चल रही प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति जनता में द्वेष पैदा करना भी है।

देश में पहले भी छोटे राज्यों के गठन के उदाहरण देखने को मिले हैं, किंतु तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर देशभर में जो स्थिति निर्मित हुई है वह निश्चय ही चिंतनीय है। तेलंगाना की मांग ने जो उग्र-रूप धारण किया देश के विभिन्न राज्यों में भी राज्यों के विभाजन की आवाजें उठाई जाने लगीं। तेलंगाना राष्ट्र समिति के आंदोलन के आगे झुकते हुए पृथक् तेलंगाना राज्य के गठन की मांग स्वीकार करने की घोषणा केंद्र सरकार ने 9 दिसंबर, 2009 की यद्यपि की थी, तथापि इस घोषणा के बाद आंध्र प्रदेश में उत्पन्न व्यापक विरोध ने सरकार के इस फैसले के कार्यान्वयन की राज्य विधानसभा पर टाल दिया है। ज्ञातव्य है कि तेलंगाना राष्ट्र समिति एक लम्बे समय से पृथक् तेलंगाना राज्य के गठन हेतु आंदोलनरत् है। टी.आर.एस. पार्टी के नेता चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन के पश्चात् उनकी नाजुक हालत से निपटने के लिए दबाव के चलते केंद्र सरकार ने पृथक् तेलंगाना राज्य के गठन का फैसला किया। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि सभी राजनीतिक दलों की सहमति के बाद ही तेलंगाना मामले में कोई कदम उठाया जाएगा। सेवानिवृत न्यायाधीश श्री बी.एन. कृष्णा की अध्यक्षता में 3 फरवरी, 2010 को तेलंगाना मुद्दे पर गठित पांच सदस्यीय समिति के कार्य क्षेत्रों की केंद्र सरकार ने 12 फरवरी, 2010 की घोषणा की। समिति पृथक तेलंगाना की मांग के साथ ही अखंड आंध्र प्रदेश की वर्तमान स्थिति बनाए रखने की मांग के संदर्भ में भी विभिन्न परिस्थितियों का अध्ययन करेगी। इसके सदस्यों में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति श्री रणबीर सिंह, अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के शोधार्थी डा. अबुसलेह शरीफ और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के प्रोफेसर डा. रवींद्र कौर शामिल हैं।

गौरतलब है कि श्री कृष्णा समिति ने 31 दिसंबर, 2010 को अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंप दी। इस रिपोर्ट पर विचार करने के लिए सरकार ने 6 जनवरी, 2011 को सर्वदलीय बैठक बुलाई। परंतु टीआरएस, तेलुगुदेशम पार्टी तथा भाजपा इस बैठक से अलग रहे। वैसे तो तेलंगाना क्षेत्र में आठ टीआरएस सर्वप्रमुख दल है। टीआरएस ने स्पष्ट कर दिया है कि उसे अलग तेलंगाना के अतिरिक्त अन्य कोई समझौता मंजूर नहीं है।

उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड, पूर्वाचल और हरित प्रदेश के बाद अब अलग बृज प्रदेश राज्य की मांग बलवती हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा तेलंगाना राज्य की स्थापना की घोषणा किए जाने के बाद देशव्यापी स्तर पर राज्य निर्माण की मांगे उठने लगीं। इस परिप्रेक्ष्य में डा. कर्ण सिंह ने राज्य पुनर्गठन आयोग की पुनर्स्थापना का सुझाव सरकार को दिया है। अगर नए राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना होती है तो उसके सामने संभवतः नए राज्यों के गठन के लिए कोई एक, राष्ट्रीय स्तर पर लागू किए जा सकने वाले आधार की खोजने की चुनौती होगी। संबद्ध क्षेत्रों में अल्पविकास एवं पिछड़ापन एक आधार हो सकता है।

भारतीय राजनीति में बहुत सारे मुद्दे ऐसे रहे हैं जो इस गणराज्य के बनने के दौरान आंदोलन के आधार बने लेकिन गणराज्य बनने की जो प्रक्रिया रही उसमें काफी कुछ बदला। सत्ता को संचालित करने वाली शक्तियों ने उन तमाम तरह के आंदोलनों में अपना राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विस्तार किया है। सत्ता के उन आंदोलनों की राजनीतिक अवधारणा को ही परिवर्तित कर दिया। दरअसल विकेंद्रीकरण अब खुद सत्ता को नियंत्रित करने वाली राजनीतिक शक्तियों की जरूरत के रूप में सामने आ गया। इस बात की इस तरह से समझा जा सकता है कि आखिर आंध्र प्रदेश में फिर से विधान परिषद की बहाल करने की जरूरत क्यों महसूस की गई? क्या यह संसदीय व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया? क्या तेलंगाना राज्य बनाने के दूरगामी फैसले को ध्यान में रखकर यह किया गया?

गौरतलब है कि सत्ता को संचालित करने वाली शक्तियों का विस्तार हुआ है यह तटीय आंध्र, रायलसीमा एवं तेलंगाना में भी हुआ है। वस्तुतः सत्ता की संचालित करने वाली राजनीतिक शक्तियों के बीच सत्ता के बंटवारे की ही लोकतंत्र के विस्तार के रूप में स्थापित किया जाता है। लेकिन इन शक्तियों में सत्ता के बंटवारे की संभावना बढ़ाना लोकतंत्र का विस्तार नहीं है अपितु लोकतंत्र का विस्तार तो विभिन्न राजनीतिक वर्गों की सत्ता की स्थापना है। राज्यों का गठन लगभग उसी रूप में सामने आया है जैसे एक जिले की, दो जिलों में बांट देने की प्रक्रिया पूर्ण होती है।

श्रीकृष्णा समिति रिपोर्ट
  • मौजूदा स्थिति को यथावत बनाए रखना व्यवहारिक नहीं है और इसमें हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी है।
  • आंध्र प्रदेश की सीमांध्र और तेलंगाना में विभाजित किया जाए और हैदराबाद को केंद्रशासित प्रदेश बनाया जाए। समिति के अनुसार यह भी व्यवहारिक नहीं है।
  • आंध्र प्रदेश का रॉयलसीमा, तेलंगाना और तटीय आंध्र प्रदेश में विभाजित किया जाए और इसमें हैदराबाद, रॉयल तेलंगाना का हिस्सा ही। यह आर्थिक तौर पर सही है।
  • आंध्र प्रदेश की सीमांध्र और तेलंगाना में विभाजित किया जाए। इसके केंद्र शासित प्रदेश में- रंगा रेड्डी, महबूब नगर और नलगोंडा जिलों को शामिल किया जाए। समिति ने इसे भी व्यवहारिक नहीं माना है।
  • आंध्र प्रदेश की सीमांध्र और तेलंगाना की मौजूदा सीमाओं को बरकरार रखते हुए वभाजित किया जाए, जिसमे हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी हो और सीमांध्र की नई राजधानी बनाई जाए। समिति का मानना है कि इस विकल्प पर विचार किया जा सकता है। लेकिन इस विकल्प पर हैदराबाद और तेलंगाना के अन्य जिलों में उनके निवेश, नौकरी और जीवनयापन जैसे मुद्दों के बारे में तटीय आंध्र और रॉयल सीमा क्षेत्र के लोगों को शंका है।
  • राज्य को एकीकृत रखा जाए और तेलंगाना क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सशक्तिकरण के लिए कुछ संवैधानिक और वैधानिक कदम उठाए जाएं और तेलंगाना क्षेत्रीय काउंसिल का गठन किया जाए। समिति ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण से एकीकृत आंध्र प्रदेश का विकल्प सुझाया है जो सभी के लिए बेहतर है लेकिन विभाजन को एक ही सूरत में स्वीकार किया जाना चाहिए जबकि अन्य विकल्प मौजूद न हो या तीनों क्षेत्र आपसी सहमति से ऐसा चाहते हैं।

राज्यों के पुनर्गठन की समस्या को लेकर फजल अली की अध्यक्षता में गठित आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। आयोग के अन्य सदस्य थे हृदयनाथ कुंजरू एवं के.एम. पाणिक्कर। उस समय के.एम. पाणिक्कर ही केवल छोटे राज्यों के पक्षधर थे। आज 54 वर्ष बाद यह प्रतीत होता है कि पाणिक्कर का पक्ष शायद सही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश देश के बड़े राज्य बने एवं विकास की दौड़ में सवसे पीछे हैं इसके विपरीत दक्षिण के छोटे राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, महिला प्रगति आदि सभी क्षेत्रों में कहीं आगे हैं, उनमें केरल का सूचकांक सबसे ऊपर है। छोटे राज्यों में जनता एवं प्रशासन की निकटता के कारण चीजें खुलकर सामने आ जाती हैं। आज बीमार प्रांत उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग विभिन्न कोनों से आ रही है। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वाचल और बुंदेलखंड प्रांतों के निर्माण की बात उठाई थी। राहुल गांधी ने भी बुंदेलखंड के विकास हेतु एक स्वायत्त परिषद बनाने का सुझाव दिया है। वर्तमान में बरेली, रामपुर, बदायूं, मुरादाबाद, अमरोहा, शाहजहांपुर, पीलीभीत और बिजनौर को मिलाकर रूहेलखंड प्रांत के निर्माण की भी मांग उठ रही है।

अंततः कहा जा सकता है कि समय आ गया है कि राज्यों के पुनर्गठन के लिए फिर से एक आयोग का गठन किया जाए। पुनर्गठन का आधार विकास का मुद्दा होना चाहिए, संस्कृति, परम्परा, भाषा आदि नहीं। यह जरूरी हो गया है कि सरकार इस विचार को सिद्धांत एवं नीति के रूप में स्वीकार कर ले। छोटे राज्य बनाने में बुनियादी संरचना के निर्माण पर होने वाले व्यय के आर्थिक भार को सहने के लिए भी तैयार रहना होगा।

विभिन्न राज्य पुनर्गठन आयोग अधिनियम

  • असम सीमा परिवर्तनं अधिनियम, 1951 के द्वारा भारत के राज्य क्षेत्र से एक भाग भूटान को सौंप कर असम की सीमा में परिवर्तन किया गया
  • आंध्र राज्य अधिनियम 1953 के द्वारा, संविधान के प्रारम्भ के समय विद्यमान मद्रास राज्य से कुछ राज्यक्षेत्र निकालकर, आंध्र प्रदेश नामक नया राज्य बनाया गया।
  • हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर (नया राज्य) अधिनियम, 1954 से हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर, इन दो भागों का विलय कर एक राज्य अर्थात् हिमाचल प्रदेश बनाया गया।
  • बिहार और पश्चिमी बंगाल अधिनियम, 1956 द्वारा कुछ राज्य क्षेत्र बिहार से पश्चिमी बंगाल की अंतरित किए गए।
  • राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 से भारत के विभिन्न राज्यों की सीमाओं में स्थानीय और भाषाई मांगों को पूरा करने के लिए परिवर्तन किया गया। विद्यमान राज्यों के बीच कुछ राज्यक्षेत्रों को अंतरित किया गया। इसके अतिरिक्त एक नया केरल राज्य बनाया गया और मध्य और विंध्य प्रदेश की रियासतों का उनसे लगे हुए राज्यों में विलय कर दिया गया।
  • राजस्थान और मध्य प्रदेश अधिनियम, 1959 द्वारा राजस्थान राज्य से कुछ राज्यक्षेत्र मध्य प्रदेश की अंतरित किए गए।
  • आंध्र प्रदेश और मद्रास (सीमा परिवर्तन) अधिनियम, 1959 द्वारा आंध्र प्रदेश और मद्रास राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन किए गए।
  • बंबई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 द्वारा बंबई राज्य को विभाजित करके गुजरात नामक एक नया राज्य बनाया गया और बंबई के बचे हुए राज्य की महाराष्ट्र नाम दिया गया।
  • अर्जित राज्यक्षेत्र अधिनियम, 1960 से भारत और पाकिस्तान के बीच 1958-1959 में किए गए समझौते द्वारा अर्जित कुछ राज्यक्षेत्रों का असम, पंजाब और पश्चिमी बंगाल राज्यों में विलय के लिए उपबंध किया गया।
  • नागालैंड राज्य अधिनियम, 1962 के द्वारा नागालैंड राज्य की रचना की गई जिसमें नागा पहाड़ी और त्येनसांग क्षेत्र का राज्यक्षेत्र समाविष्ट किया गया।
  • पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 जिसके द्वारा पंजाब राज्य को पंजाब और हरियाणा राज्यों में और चंडीगढ़ के संघ राज्यक्षेत्रों में बांटा गया।
  • आंध्र प्रदेश और मैसूर अधिनियम, 1968 (राज्य क्षेत्र अंतरण)।
  • बिहार और उत्तर प्रदेश (सीमा परिवर्तन) अधिनियम, 1968।
  • असम पुनर्गठन अधिनियम, 1969 द्वारा असम राज्य के भीतर मेघालय नाम का स्वशासी उपराज्य बनाया गया।
  • हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 (1970 का 53) की धारा 4 द्वारा (25-1-1971 से) राज्य का दर्जा दिया गया।
  • पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 द्वारा मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय की राज्यों के प्रवर्ग में सम्मिलित किया गया और मिजोरम तथा अरुणाचल प्रदेश की संघ राज्यक्षेत्र में सम्मिलित किया गया।
  • हरियाणा और उत्तर प्रदेश (सीमा परिवर्तन) अधिनियम, 1979।
  • मिजोरम राज्य अधिनियम, 1986 द्वारा मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया गया।
  • अरुणाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1986।
  • गोवा, दमन और दीव पुनर्गठन अधिनियम,1987।
  • मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 द्वारा नया छत्तीसगढ़ राज्य बना।
  • उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 द्वारा नया उत्तरांचल (वर्तमान उत्तराखण्ड) राज्य बना।
  • बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 द्वारा झारखंड राज्य बना।
  • आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2013 द्वारा तेलंगाना राज्य बना।

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