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दिल्ली सल्तनत- कुतुबुद्दीन ऐबक और आराम शाह: 1206-1210 ई. Delhi Sultanate- Qutbu l-Din Aibak and Aram Shah: 1206-1210 AD. – Vivace Panorama

दिल्ली सल्तनत- कुतुबुद्दीन ऐबक और आराम शाह: 1206-1210 ई. Delhi Sultanate- Qutbu l-Din Aibak and Aram Shah: 1206-1210 AD.

दिल्ली सल्तनत

गोरी की विजय से 1526 ई. तक दिल्ली पर मुस्लिम सुल्तानों का शासन रहा जिसे दिल्ली सल्तनत कहा जाता है। इस दौरान कई वंशों के सुल्तानों ने दिल्ली पर शासन किया। गोरी की मृत्यु के बाद ऐबक उसके भारतीय प्रदेशों का शासक बना।

कुतुबुद्दीन ऐबक और आराम शाह (1206-1210 ई.)

ऐबक एक तुर्की शब्द है, जिसका अर्थ होता है चंद्रमा का देवता। इस वंश को कई नामों से जाना जाता है। प्रथम नाम है गुलाम वंश, (वंश के शासक में केवल तीन ही गुलाम कुतुबुद्दीन, इल्तुतमिश, बलबन)। उनमें भी इल्तुतमिश और बलबन शासक बनने से पूर्व ही मुक्त हो गये थे।

ममलुक वंश- ममलुक वैसे दासों को कहा जाता है, जो स्वतंत्र माता-पिता के पुत्र होते हैं। ममलुक शब्द उन दासों के लिए भी आता है जो घरेलू सेवा में नहीं वरन सैनिक सेवा में लगाए गए। ममलुक वंश नामकरण भी उचित नहीं लगता है।

प्रारंभिक तुर्की वंश- यह तीसरा नाम है। यह नाम भी उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि इसके बाद फिर किसी तुर्की वंश की स्थापना नहीं हुई।

इलवरी वंश- केवल एक शासक कुतुबुद्दीन ऐबक इस वंश का नहीं है। अतः इलवरी वंश ही सही प्रतीत होता है (सबसे अधिक मान्यता प्राप्त)।


मुहम्मद गोरी का कोई उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण अत: उसके प्रान्तीय राज-प्रतिनिधियों ने शीघ्र ही अपने-अपने अधिकार-क्षेत्रों में अपनी शक्ति स्थापित कर ली। गृजूनी के सिंहासन पर किरमान का शासक ताजुद्दीन यल्दूज आरूढ़ हुआ। कुतुबुद्दीन ऐबक ने सुल्तान की उपाधि धारण की तथा बंगाल के इख्तियारुद्दीन, मुलतान एवं उच्च के शासक नासिरुद्दीन कबाचा आदि मुस्लिम पदाधिकारियों ने उसे भारतीय प्रदेशों का शासक स्वीकार कर लिया। कुतुबुद्दीन ऐबक के उत्कर्ष से ताजुद्दीन यल्दौजू को बड़ी ईर्ष्या हुई और वह पंजाब पर प्रभुत्व जमाने के लिए उससे लड़ बैठा। कुतुबुद्दीन ने यल्दौजू को परास्त कर गजनी से खदेड़ भगाया तथा उसे चालीस दिनों तक अपने अधिकार में रखा। परन्तु गजनी के लोगों ने उसकी ज्यादतियों से ऊबकर अपने उद्धार के लिय यल्दौज को गुप्त रूप से आमंत्रित किया। यल्दौज इस अवसर से लाभ में नहीं चूका तथा उसके अचानक एवं अप्रत्याशित रूप से वापस आ से कुतुबुद्दीन शीघ्रता से भाग गया। इससे भारत एवं अफ़गानिस्तान के बीच राजनैतिक एकता की सम्भावना जाती रही और यह बाबर की दिल्ली विजय तक पूरी नहीं हुई। कुतुबुद्दीन केवल भारत का सुल्तान रह गया। चार वर्षों से कुछ अधिक शासन करने के पश्चात् चौगान अथवा पोलो खेलते समय घोड़े से गिरकर 1210 ई. के नवम्बर मास के आरम्भ में लाहौर में उसकी मृत्यु हो गयी।

मिनहाजुस्सिराज का कहना है कि कुतुबुद्दीन एक वीर एवं उदार-हृदय सुल्तान था। वह निर्भीकता एवं सैनिक पराक्रम से सम्पन्न रहने के कारण कभी किसी युद्ध में पराजित नहीं हुआ तथा अपनी विस्तृत विजयों से हिन्दुस्तान का एक बृहत् भाग इस्लाम की ध्वजा के नीचे ले आया। वह लाखों में दान किया करता था तथा अपनी असीम उदारता के लिए सभी लेखकों द्वारा लाखबख्श (लाखों का दाता) कहा गया है। उसके दरबार में हसन निजामी जैसा विद्वान् (इतिहासकार) रहता था। उसने ताज उल मासिर की रचना की। फक्र-ए-मुदब्बीर उसी के दरबार में रहता था। ऐबक ने कुछ निर्माण कार्य भी किए। दिल्ली में उसने कुब्बत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण करवाया। अजमेर में अढ़ाई दिन का झोपड़ा बनवाया। दिल्ली में किला-ए-राय पिथौरा के बगल में एक नगर की स्थापना की जो दिल्ली के प्राचीनतम सात नगरों में प्रथम माना जाता है। 1199 ई. में कुतुबमीनार का निर्माण शुरु किया जिसे इल्तुतमिश ने पूरा किया। यह कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर है। ताजुल-मआसिर का लेखक हसनुन्निज़ामी, जो कुतुबुद्दीन की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता है, लिखता है कि- वह निष्पक्ष भाव से लोगों का न्याय करता था तथा राज्य में शान्ति एवं उन्नति की वृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहा करता था।

परन्तु सुल्तान अपनी विजयों और प्रशासन में आवश्यकता पड़ने पर कठोर कार्रवाई करने में तनिक भी संकोच नहीं करता था। इस्लाम में उसकी अद्भुत भक्ति थी।

लाहौर में कुतुबुद्दीन की अचानक मृत्यु हो जाने पर वहाँ के अमीरों और मलिकों ने उपद्रव पर नियंत्रण करने, साधारण जनता में शान्ति कायम रखने तथा सैनिकों के हृदयों के संतोष के लिए आरामबख्श को सुल्तान आरामशाह के नाम से उसका उत्तराधिकारी खड़ा किया। आरामशाह राज्य-शासन के योग्य नहीं था। शीघ्र ही दिल्ली सरदारों ने आराम के विरुद्ध षड्यंत्र रच कर उसे हटाने के लिए मलिक शम्सुद्दीन इल्तुतमिश को आमंत्रित किया, जो उस समय बदायूं का शासक था। इस बुलावे के उत्तर में इल्तुतमिश अपनी सारी सेना लेकर आगे बढ़ा तथा आराम को दिल्ली के निकट, जूद के मैदान में परास्त किया। आराम का फिर क्या हुआ, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

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