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अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन International Labour Organisation – ILO – Vivace Panorama

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन International Labour Organisation – ILO

इसकी स्थापना राष्ट्र संघ से संबद्ध एक स्वायत्त अंतरसरकारी अभिकरण के रूप में 11 अप्रैल, 1919 को हुई थी। यह 1946 में संयुक्त राष्ट्र का प्रथम विशिष्ट अभिकरण बना। इसका मुख्यालय जेनेवा में है।

आईएलओ का मूल उद्देश्य रहन-सहन के स्तर एवं श्रम की अन्य दशाओं को सुधारने तथा पूर्ण रोजगार का लक्ष्य प्राप्त करने पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय क्रिया-कलापों को प्रोत्साहित करना है। यह अंतरराष्ट्रीय श्रम संधियों एवं सिफारिशों के आधार पर श्रम मानदंडों की रचना करता है तथा रोजगार संवर्धन, मानव संसाधन विकास, सामाजिक संस्थाओं के विकास, ग्रामीण विकास, लघु उद्योग, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग का विस्तार करता है। संगठन द्वारा विशेषज्ञ अभियानों एवं फैलोशिप कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न देशों की सरकारों की प्रेरक सहायता उपलब्ध करायी जाती है।

आईएलओ के संविधान के अनुसार श्रम की दशाओं में सुधार लाने के लक्ष्य को काम के घंटों के नियमन, श्रम आपूर्ति के विनियमन, बेरोजगारी के निवारण, पर्याप्त श्रम मूल्य की व्यवस्था, कार्य से संबद्ध जोखिमों से श्रमिकों की सुरक्षा, मूल देश से पृथक् देशों में नियोजित मजदूरों के हितों की सुरक्षा के प्रावधानों, समान कार्य हेतु समान मजदूरी के सिद्धांत के क्रियान्वयन, श्रमिक संघ के अधिकार की मान्यता तथा व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा के संगठन इत्यादि के माध्यम से हासिल किया जाता है।

सदस्य देशों को आईएलओ की बैठकों या सम्मेलनों में स्वीकार की गयी संधियों को अपने प्रतिस्पर्द्धा राष्ट्रों के समक्ष अनुमोदनार्थ प्रस्तुत करना पड़ता है। संधि को अनुमोदित करने वाले राष्ट्र अपने कानूनों को संधि की शर्तों के अनुसार परिवर्तित करते हैं तथा नियतकालिक रूप से इन कानूनों के क्रियान्वयन सम्बन्धी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं।

सितंबर 1999 तक आईएलओ सम्मेलन द्वारा 182 संधियां तथा 190 सिफारिशें स्वीकार की जा चुकी थीं, जो संयुक्त होकर अंतरराष्ट्रीय श्रम संहिता का निर्माण करती हैं।

कार्यस्थल पर मूलभूत सिद्धांतों एवं अधिकारों की आईएलओ उद्घोषणा (जो 1998 में स्वीकार की गयी) में सदस्य देशों से अपेक्षा की गयी है कि वे श्रमिकों के सामूहिक सौदेबाजी एवं संघ की स्वतंत्रता के अधिकारों को प्रोत्साहित करें, बेगार प्रथा एवं बाल श्रम का उन्मूलन करें तथा रोजगार एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भेदभाव को प्रतिबंधित करें। बाल श्रम के घातक रूपों को प्रतिबंधित करने वाली एक संधि को 1999 में अंगीकार किया गया।

आईएलओ की संरचना प्रतिनिधियों की त्रिस्तरीय प्रणाली पर आधारित है, जिसमें सरकारें, नियोक्ता एवं नियोजक शामिल हैं। इसके प्रमुख अंगों में अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन, शासकीय निकाय, अंतरराष्ट्रीय श्रम अध्ययन संस्थान, उन्नत तकनीक एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय केंद्र तथा अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय सम्मिलित हैं।


अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन की बैठक वार्षिक होती है। प्रत्येक देश सम्मेलन में दो सरकारी, एक नियोक्ता एवं एक श्रमिक प्रतिनिधि भेजता है। सम्मेलन का कार्य शासकीय निकाय का चुनाव करना, श्रम मानदंडों को तय करना तथा आईएलओ के बजट को स्वीकृति देना है।

शासकीय निकाय 28 सदस्य सरकारों, 14 सदस्य नियोक्ताओं तथा 14 सदस्य श्रमिकों से जुड़े होते हैं। 28 सरकारी प्रतिनिधियों में से 10 सदस्य औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण देशों से संबद्ध होते हैं। स्थायी सदस्यता प्राप्त इन देशों में ब्राजील, चीन, भारत, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान, रूस, अमेरिका एवं इंग्लैंड शामिल हैं। शासकीय निकाय की बैठक वर्ष में तीन-चार बार होती है। यह निकाय सम्मेलन में प्रस्तुत करने से पूर्व बजट की समीक्षा करता है, विभिन्न औद्योगिक समितियों के कार्यों की समीक्षा करता है, आईएलओ के महानिदेशक की नियुक्ति करता है तथा अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय के कार्य का अधीक्षण करता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय आईएलओ के सचिवालय के रूप में कार्य करता है, जिसका प्रधान महानिदेशक होता है। यह कार्यालय सामाजिक व आर्थिक प्रश्नों से जुड़ी सूचनाएं प्रकाशित करता है, आईएलओ के अंगों की बैठकों हेतु दस्तावेज तैयार करता है, विशेष अध्ययनों को संचालित करता है तथा सरकारों, नियोक्ताओं व श्रमिक संघों को परामर्श एवं सहायता प्रदान करता है।

आईएलओ द्वारा 1960 में स्थापित अंतरराष्ट्रीय श्रम अध्ययन संस्थान (जेनेवा) द्वारा सामाजिक और श्रम नीति से जुड़ी शिक्षा एवं अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। आईएलओ द्वारा संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर ध्यान देने के लिए ट्यूरिन में एक अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सदस्यों की संख्या 1999 में 174 थी। इसे 1969 में शांति का नोबेल पुरस्कार भी दिया जा चुका है।

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