पृथ्वी की संरचना Structure of The Earth

पृथ्वी के भूस्वरूप Relief Forms or Features Of Earth

पृथ्वी की सतह के भू-स्वरूपों Relief ) को वर्गीकृत करते हुए सेलिसबरी ने अपनी पुस्तक Physiography में तीन भागों में विभाजित किया है-

  1. प्रथम कोटि के भू-स्वरूपों के अन्तर्गत महाद्वीपों और महासागरों को सम्मिलित किया जाता है;
  2. दूसरी कोटि के भू-स्वरूपों में पर्वत, मैदान, पठार, तथा
  3. तीसरी कोटि के भू-स्वरूपों में अनाच्छादन (Denudation) अर्थात् अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण की शक्तियों द्वारा निर्मित नदी, घाटियाँ, डेल्टा, हिमोढ़, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

प्रथम कोटि के भू-स्वरूप

धरातल पर महाद्वीप और महासागर भूमण्डल के प्रमुख अंग माने गए हैं। पृथ्वी की सतह पर स्थल खण्ड ऊपर उठे भाग हैं जिनके निर्मित महाद्वीपीय भाग हैं। जल .खण्ड पृथ्वी के धरातल पर नीचे धैसे हुए भाग होते हैं।

पृथ्वी के धरातल पर फैले हुए महाद्वीप और महासागरों का कुल क्षेत्रफल 51,0066,100 वर्ग किलोमीटर है। महाद्वीपों के अन्तर्गत कुल क्षेत्र 14.89 करोड़ वर्ग किमी अथवा समस्त पृथ्वी के धरातल का 29.08 प्रतिशत भाग है, परन्तु महासागरों के अन्तर्गत धरातल का 70.92 प्रतिशत क्षेत्र आता है। महाद्वीपों का सबसे ऊंचा शिखर एवरेस्ट पर्वत ,848 मीटर है जबकि महासागरों में सबसे गहरा गर्त प्रशांत महासागर में मेरियाना 11,033 मीटर गहरा है।

पृथ्वी का बाह्य भाग जिस पर मानव निवास करता है भूपटल (Crust) कहलाता है। भूपटल को दो भागों में विभाजित किया जाता है-

  1. समुद्री भूपटल या समुद्र तल Oceanic crust or ocean Bottom
  2. महाद्वीपीय भूपटल Continental Crust

समुद्री भूपटल Oceanic crust

पृथ्वी के भूपटल का लगभग 70.8 प्रतिशत भाग जल से ढका हुआ है। यह समुद्री भूपटल लगभग 4 किलोमीटर (औसत) जल से ढकी हुई है। इस किलोमीटर के नीचे लगभग 0.5 किलोमीटर अवसाद पाए जाते हैं। इसके नीचे लगभग 1.5 किलोमीटर तक ज्वालामुखी बैसाल्टी चुट्टानें पायी जाती हैं जिसे भूकम्पी परत-2 कहा जाता है, इसके लगभग 6 किलोमीटर नीचे और मोहो (Moho) से ऊपर भूकम्पी परत-3 पाई जाती है। इस भूकम्प परत-3 में भूकम्प की तरंग की गति अधिक होती है जिसमें लौह और मैग्नेशियम युक्त भारी आग्नेय चट्टानें पाई जाती हैं। गहरे समुद्रों या बेसिनों का भूपटल सभी स्थानों पर समान रूप से मोटाई वाला माना गया है। यहां पर (Sima) की चट्टानें सभी ओर पाई जाती हैं।

महाद्वीपीय भूपटल Continental Crust

भूपटल की मोटाई 25 से 50 किलोमीटर मानी गई है। महाद्वीपीय धरातल की औसत ऊँचाई समुद्र तल से केवल 800 मीटर है, वहीं एवरेस्ट पर्वत जो धरातल की सर्वाधिक ऊँची चोटी है लगभग 8.8 किलोमीटर ऊँची है। महाद्वीपीय भूपटल की संरचना और मोटाई एक समान नहीं है। महाद्वीपीय भूपटल की ऊपरी परत अवसादी, आग्नेय एवं रूपान्तरित चट्टानों से निर्मित है। इस ऊपरी परत के नीचे की परत (जिसके बारे में अभी जानकारी अपूर्ण है) में भूकम्पी तरंग की गति ऊपरी परत की अपेक्षा अधिक पाई गयी है, जिससे इसकी संरचना में भिन्नता का आभास मिलता है।

भूपटल के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि महाद्वीपीय भूपटल में सिलिका, एल्युमिनियम व पोटैशियम की मात्रा अधिक और लोहा, कैल्सियम तथा मैग्नेशियम की मात्रा कम पाई जाती है। इससे पता चलता है कि महाद्वीपीय भूपटल की तुलना में समुद्री भूपटल अधिक घनत्व वाली चट्टानों से बना है।

समुद्री भूपटल और महाद्वीपीय भूपटल की सीमा का निर्धारण कर पाना बहुत कठिन है! महाद्वीपों की सीमाएं तट रेखा पर ही समाप्त नहीं होती हैं वरन् पानी में आगे तक महाद्वीपीय निमग्न तट (Continental shelf ) के रूप में समुद्री जल में पाई जाती हैं। विश्व के धरातल का लगभग 6 प्रतिशत भाग इन महाद्वीपीय निमग्न तट के अन्तर्गत आता है, जिन पर महाद्वीपों से लाए अवसाद 200 मीटर की गहराई तक फैले हुए हैं। इसी कारण वास्तविक समुद्र तल का विस्तार कुल पृथ्वी तल का 70.8-6 = 64.8 प्रतिशत ही माना जाता है।

पृथ्वी की आन्तरिक रचना Interior Of The Earth

पृथ्वी के धरातल का स्वरूप पृथ्वी की आन्तरिक अवस्था और संरचना का परिणाम होता है, अतः पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का विशेष स्थान है। पृथ्वी की आन्तरिक स्थिति कैसी है? आज भी यह एक रहस्य बना हुआ है। यद्यपि वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आन्तरिक रचना के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया है परन्तु आज भी वैज्ञानिक इस प्रश्न का निश्चित उत्तर देने में असमर्थ हैं कि पृथ्वी के भीतर का भाग किस अवस्था में है? पृथ्वी के भीतरी भाग की भौतिक एवं रासायनिक रचना कैसी है? इन प्रश्नों का हल वैज्ञानिकों ने अनेक साधनों से ढूंढने का प्रयास किया है।

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना सम्बन्धी प्रमाण

घनत्व पर आधारित प्रमाण - पृथ्वी की पपड़ी कठोर चट्टानों से निर्मित है। भूपृष्ठ की अधिकांश चट्टानें अवसादी हैं, जिनकी मोटाई 500 से 1,500 मीटर मानी जाती है। इसके नीचे आग्नेय चट्टानें पायी जाती हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी का औसत घनत्व 5.5 है, जबकि भूपृष्ठ की अवसादी चट्टानों का घनत्व केवल 2.7 ही है। ज्वालामुखी से निकले पदार्थ का घनत्व 3 या 3.5 होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग का घनत्व 5.5 से अधिक होना चाहिए। अतः वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी का केन्द्र (Core) भारी पदाथों से निर्मित है, जिसका घनत्व 11 माना जाता है।

दबाव पर आधारित प्रमाण - ऐसा अनुमान है कि पृथ्वी के धरातल से केन्द्र (भीतर) की ओर पदार्थों का भार बराबर बढ़ता जाता है। केन्द्र की ओर इस दबाव की अधिकता से भूगर्भ घने हो जाते हैं, परन्तु अनेक वैज्ञानिकों का मत है कि भीतरी पदार्थों की रचना ऊपर के धरातल पर पाए जाने वाले पदार्थों से भिन्न है। भीतरी भाग के पदार्थ भारी तत्वों से और ऊपरी पर्त के पदार्थ हल्के पदार्थों से बने हैं। अनेक वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर जाने पर चट्टानों का दबाव बढ़ता जाता है। धरातल से 1,600 मीटर की गहराई पर सर्वत्र प्रति 9.29 वर्ग डेसीमीटर (1 वर्गफुट) पर 117 क्विण्टल भार पाया जाता है। इस आधार पर गणना की जाए तो पता चलेगा कि पृथ्वी के केन्द्र के पदार्थ पर एक वर्गफुट पर 5.5 हजार से 8.5 हजार टन का भार पड़ता है, परन्तु अनेक विद्वानों का मत है कि प्रत्येक चट्टान की इसी कारण अधिकांश ऐसी सीमा होती है जिससे आगे उसका घनत्व नहीं बढ़ सकता चाहे उसका दबाव कितना ही अधिक क्यों न हो। वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी का केन्द्र लोहा और निकल जैसी भारी पदार्थों से बना है।

तापक्रम पर आधारित प्रमाण- पृथ्वी के भीतरी भाग में गहराई के साथसाथ ताप की मात्रा बढ़ती जाती है। आग्नेय चट्टानों, ज्वालामुखी पर्वत, गर्म जल स्रोतों, खानों में उष्णता के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर जाने पर तापक्रम में वृद्धि होती जाती है। यह अनुमान है कि प्रति  32 मीटर गहराई पर 1°C तापक्रम बढ़ जाता है या औसत रूप में तापमान प्रति 100 मीटर पर 2° या 3° सेन्टीग्रेड की दर से बढ़ता है। इस अनुमान से पृथ्वी के 96 किलोमीटर की गहराई पर तापमान में इतनी अधिक वृद्धि हो जाएगी कि कोई भी चट्टान अथवा खनिज ठोस अवस्था में नहीं रह सकती है, किन्तु अब यह माना जाता है कि कुछ किमी पश्चात् तापमान की यह वृद्धि दर घटती जाती है। सीमा (Sima) की पट्टी में तापमान प्रायः स्थिर से (विशेष ऊंचे) बने रहते हैं, फिर अत्यधिक दबाव भी ताप को बाँधे रखता है।

ज्वालामुखी पर आधारित प्रमाण- वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ज्वालामुखी उद्गार के समय द्रव लावा का निकलना इस बात का प्रतीक है कि केन्द्रीय पिण्ड द्रव अवस्था में है, परन्तु यदि पृथ्वी का केन्द्र द्रव अवस्था में होता तो सूर्य और चन्द्रमा के आकर्षण से प्रभावित अवश्य होता, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है।

भूकम्प विज्ञान पर आधारित प्रमाण- भूकम्पीय तरंगों का अध्ययन सीसमोग्राफ यन्त्र के माध्यम से किया जाता है। भूकम्प की तरंगों का वेग, गति आदि के आधार पर भूगर्भ की संरचना का अध्ययन किया गया है। भूकम्प की लहरें जिन-जिन भागों में पहुंचती हैं उसे भूकम्प क्षेत्र कहते हैं। भूकम्प लहरें तीन प्रकार की होती हैं-

  1. प्राथमिक लहरें (Primary waves or “P’ waves)
  2. द्वितीयक लहरें (Secondary waves or ‘S’ waves)
  3. धरातलीय लहरें (Surface Waves or Long Waves – ‘L’ Waves)

प्राथमिक लहरें Primary waves or “P’ waves

यह लहरें ध्वनि की लहरों के समान होती हैं, इन लहरों में ध्वनित कणों की गति लहर की रेखा के सीध में होती है। अंग्रेजी में इन लहरों को P लहरें कहा जाता है। इन लहरों की गति सबसे अधिक होती है। इनकी गति 8 से 14 किलोमीटर प्रति सेकण्ड होती है। ये लहरें ठोस पदार्थ में तीव्रता से अधिक गहराई तक प्रवेश कर जाती हैं, किन्तु द्रव या लचीलापन आने पर इनकी गति कुछ कम होने लगती है।

द्वितीयक लहरें, गौण अथवा आड़ी लहरें Secondary waves or ‘S’ waves

ये लहरें प्रकाश तथा जल की लहरों के समान होती हैं। इनमें कण लहर की दिशा के समकोण पर चलते हैं। इनकी गति 5 से 7 किलोमीटर प्रति सेकण्ड होती है। इन लहरों को अंग्रेजी के अक्षर S के नाम से पुकारा जाता है। ये लहरें भी अधिक गहराई तक प्रवेश कर जाती हैं, परन्तु तरल पदार्थों में अस्पष्ट या लुप्त हो जाती हैं।

धरातलीय लहरें Surface Waves or Long Waves – ‘L’ Waves

इस प्रकार की लहरें धरातल के ऊपरी भाग तक ही सीमित रहती हैं। पृथ्वी के आन्तरिक भूगर्भ में प्रवेश नहीं कर पाती हैं। ये अत्यन्त प्रभावशाली लहरें होती हैं। इन लहरों का प्रदोलन आवृति काल सभी लहरों से लम्बा होता है। इनकी गति सबसे कम होती है। इन्हें अंग्रेजी के L अक्षर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इनकी गति 2 किलोमीटर प्रति सेकण्ड होती है।

भूकंप विज्ञान तथा पृथ्वी की आतंरिक संरचना Seismology and Constitution of Earths Interior

भूकम्प लहरों द्वारा पृथ्वी के भूगर्भ का आकलन किया गया है। अनेक प्रयोगों से पता चला है कि भूकम्प लहरें पृथ्वी के मध्य भाग तक सीधी नहीं जाती हैं जिससे यह आभास मिलता है कि पृथ्वी का भीतरी भाग ठोस जैसा नहीं है। यदि यह भाग ठोस होता तो भूकम्प की लहरें सीधी जाती। अनेक अध्ययनों से पता चला है कि ये लहरें टेढ़ीमेढ़ी भी न जाकर कुछ वक्राकार गति में मुड़ जाती हैं। पृथ्वी के आन्तरिक भाग के घनत्व में काफी अन्तर पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के घनत्व के कारण ही ये लहरें वक्राकार रूप धारण कर लेती हैं।

ओल्डहम नामक विद्वान ने 1909 ई. में यह प्रमाणित किया कि भूकम्प केन्द्र से कोण की दूरी पर गौण लहरें अदृश्य हो जाती हैं तथा प्रधान लहरें अपनी कमजोर स्थिति को प्रगट करती हैं। पृथ्वी के मध्य पिण्ड में गौण लहरों का प्रवेश नहीं पाया जाता है, इससे वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी के केन्द्रीय भाग में द्रव पदार्थ अवश्य हैं। ये द्रव पदार्थ सभी धातुओं (लोहा, निकल, आदि) के तरल रूप में होंगे। सन् 907 में क्रोशिया की कुल्पा घाटी में भूकम्प के अध्ययन से पता चला है कि प्राथमिक तथा गौण लहरों के समान दो लहरें और पायी जाती हैं जिनको Pg तथा Sg नाम दिया गया है। इन दोनों लहरों की गति प्राथमिक तथा गौण लहरों की तुलना में कम होती है। कोनार्ड ने सन् 1923 में व्यूर्न नामक स्थान पर आए भूकम्प के अध्ययन से पता लगाया कि दो प्रकार की लहरें और होती हैं जो प्राथमिक, गौण Pg तथा Sg के बीच अनुभव की जाती हैं। इन लहरों को P* तथा S* नाम दिया गया है। इन लहरों का अध्ययन जेफ्रीज ने जर्सी (1929) तथा हस्फोर्ड (1926)  के भूकम्पों के आधार पर भी किया है।

भूगर्भ में विभिन्न गहराइयों पर भूकम्प की लहरों की गति एवं विशेषताओं के आधार पर भूगर्भ को मोटे तौर पर तीन परतों में बाँटा जा सकता है-

1) ऊपरी परत Upper Layer- पृथ्वी के ऊपरी धरातल में साधारणतया Pg लहरें 5.4 किलोमीटर तथा Sg लहरें 3.3 किलोमीटर प्रति सेकण्ड की गति से चलती हैं। ये लहरें जिन चट्टानों से होकर गुजरती हैं उनका घनत्व 2.7 होता है। इस आधार पर यह प्रमाणित होता है कि पृथ्वी की ऊपरी परत ग्रेनाइट चट्टानों की बनी है। इन दोनों लहरों से पूर्व Ps तथा Ss लहरों का अंकन किया जाता है जो न्यूनवेग से ऊपरी भाग में प्रवाहित होती हैं जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि पृथ्वी का सबसे ऊपरी भाग परतदार चट्टानों से बना है।

2) मध्यवर्ती परत Middle Layer- कोनार्ड ने 1923 में, टयूर्न के भूकम्प में P* और S* नामक लहरों का पता लगाया। P* और S* लहरों की गति क्रमशः 6 से किलोमीटर प्रति सेकण्ड ऑकी गयी है। इन लहरों से पृथ्वी की मध्यवर्ती परत का घनत्व स्पष्ट रूप से पता लगता है। अतः मध्यवर्ती परत में अधिक घनत्व वाली बेसाल्ट से बनी चट्टानों की अधिकता है। उनकी मोटाई 20 से 30 किलोमीटर तक ऑकी गयी है। डेली तथा जैफ्रे इस परत को ग्लासी बेसाल्ट की मानते हैं जबकि होम्स तथा वेगनर एम्फीबोलाइट से बनी मानते हैं।

3) निचली परत- निचली परत तक केवल प्राथमिक लहरें ही पहुँच पाती हैं। प्राथमिक (P) लहर की गति 7.8 किलोमीटर प्रति सेकण्ड तथा  S लहर की गति 4.5 किलोमीटर प्रति सेकण्ड ऑकी गयी है। इस परत का घनत्व अन्य परतों की अपेक्षा अधिक है, क्योंकि यह परत अधिक घनत्व वाले पदार्थों से निर्मित है। यहाँ पृथ्वी के केन्द्रीय भाग में केवल प्राथमिक लहरें ही प्रवेश कर पाती हैं, क्योंकि इस भाग का घनत्व सर्वाधिक है, परन्तु यहाँ की चट्टानें क्या तरल अवस्था में हैं? इस पर स्पष्टतः मतभेद है, क्योंकि पृथ्वी के मध्य भाग में लोहा और निकल जैसे खनिजों की बहुलता है, इसलिए प्राथमिक लहरें लहरनुमा प्रवेश करती हैं।

पृथ्वी के आन्तरिक भाग की भौतिक अवस्था

पृथ्वी के आन्तरिक भाग में जाने पर प्रारम्भ में प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1°C सेण्टीग्रेड तापक्रम की वृद्धि होती है। इस गणना के अनुसार पृथ्वी के आन्तरिक भाग में 20 से 30 किलोमीटर जाने पर तापक्रम की वृद्धि के कारण कोई भी चट्टान अपनी मौलिक अवस्था में नहीं रह सकेगी और इस ताप आधिक्य के कारण चट्टानें द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाएंगी। ज्वालामुखी विस्फोट के समय निसृत लावा भी इस तथ्य की पुष्टि करता है। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के सिद्धान्त भी आन्तरिक भाग की द्रव अवस्था में होने की सम्भावना व्यक्त करते हैं, किन्तु वहाँ की चट्टानों पर ऊपरी तल का भारी दबाव उन्हें द्रव जैसा नहीं बनने देता। अत: वहाँ की सारी स्थिति बड़ी जटिल है।

यदि पृथ्वी का आन्तरिक भाग द्रव होता तो स्थल भाग भी ज्वार शक्तियों के प्रभाव से प्रभावित होता। चन्द्रमा और सूर्य की आकर्षण शक्तियों से अप्रभावित रहने और पृथ्वी के ठोस पिण्ड के समान व्यवहार के कारण अनेक वैज्ञानिक पृथ्वी को ठोस ही मानते हैं, परन्तु भूकम्प लहरों के आधार पर पृथ्वी को पूर्ण रूप से ठोस भी नहीं कहा जा सकता है और न उसके आन्तरिक भाग को पूर्ण रूप से द्रव अवस्था में ही माना जा सकता है। इसीलिए कुछ वैज्ञानिकों ने अर्द्धद्रव अवस्था की स्थिति का अनुमान किया है।

अतः पृथ्वी के आन्तरिक भाग की भौतिक अवस्था के सम्बन्ध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं-

  1. पृथ्वी, ज्वार शक्तियों के प्रभाव के समय ठोस आकृति की भांति व्यवहार करती है।
  2. आन्तरिक चट्टानें उपयुक्त अवसर पर या दबाव घटने पर ही गाढ़े द्रव का रूप धारण कर लेती हैं।
  3. आन्तरिक चट्टानें दवाव मुक्त होने पर या स्थानीय रूप से विशेष ताप वृद्धि के कारण ही द्रव अवस्था में आ सकती हैं।

पृथ्वी की आतंरिक संरचना Chemical Constitution and Layering System of the Earth’s Interior

पृथ्वी की उत्पति सम्बन्धी सिद्धान्तों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि पृथ्वी प्रारम्भ में तप्त अवस्था में थी और धीरे-धीरे शीतल होकर वर्तमान ठोस अवस्था में आयी है। अत: इसकी संरचना में अनेक प्रकार के रासायनिक तत्वों का योग है। उसमें कई हल्के और भारी पदार्थ पाए जाते हैं।

पृथ्वी की इस रासायनिक संरचना का अध्ययन सर्वप्रथम जर्मन वैज्ञानिक एडवर्ड स्वेस (Eduard Suess) ने किया और उसका विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक ‘डस एण्ट लिट्ज डर अरड़े’ (Das Antlitz der Erde in three volumes (1885–1909) - जर्मन भाषा) में किया है। पृथ्वी की ऊपरी परत अवसादी चट्टानों से निर्मित है जिस पर कम गहराई तथा घनत्व भी कम है। इस परत का संगठन सिलिका, फेल्सफर तथा अभ्रक के तत्वों से युक्त है, इस परत के नीचे पृथ्वी की संरचना को निम्न 3 विभागों में बांटा गया है-

1) सियाल- ऊपरी परत के नीचे की प्रथम परत को स्वेस ने सियाल के नाम से सम्बोधित किया है। जिसे ‘सि’ (SI) सिलिका (Silica) (लगभग 70) प्रतिशत) तथा 'अल' (AL) ऐलुमिनियम के लिए प्रयुक्त शब्दों से बनाया गया है। ‘सिलिका’ तथा ‘अल्युमिनियम’ दोनों पदार्थ इस परत में अधिक मात्रा में मिले हैं। इस परत का घनत्व 2.4 से 2.9 के मध्य है तथा इसकी औसत गहराई 50 से 300 किलोमीटर ऑकी गयी है। इस भाग की प्रमुख चट्टानें ग्रेनाइट हैं।

2) सीमा- सियाल परत के नीचे, स्वेस के अनुसार, सीमा की परत पायी जाती है। इसी परत में से ज्वालामुखी लावा निःसृत होता है। यहीं से गर्म और तरल लावा पदार्थ पर्याप्त मात्रा में ज्वालामुखी को प्राप्त होता है। इस आवरण का रासायनिक संगठन ‘सी' (SI) सिलिका और ‘मा’ (MA) मैग्नीशियम खनिजों के द्वारा होता है। इसी कारण इस आवरण का नाम स्वेस ने ‘सीमा' रखा। इस परत में क्षारीय पदार्थों की अधिकता पायी जाती है। इसके अतिरिक्त लोहा, कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के सिलीकेट अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इस आवरण में औसत घनत्व 2.9 से 4.7 तक पाया जाता है। इस परत की गहराई 1000 से 2000 किलोमीटर तक है। इस भाग में बेसाल्ट आग्नेय चट्टानों की अधिकता पायी जाती है।

3) नीफे- सीमा आवरण के नीचे भाग को स्वेस ने नीफे नाम से सम्बोधित किया है। इस आवरण का निर्माण कठोर धातुओं के योग से हुआ है। यह कठोर पदार्थ निकिल (Ni) तथा फे (Fe) फेरियम (लोहा) हैं। इस परत का घनत्व 11 है। इसका व्यास 4,300 मील (6,880 किमी) है। यह पृथ्वी की तीसरी तथा अन्तिम परत है। इस आन्तरिक कोर Core) में लोहे की उपस्थिति चुम्बकीय शक्ति का आधार है। इस भारी क्रोड से पृथ्वी की स्थिरता Rigidity) भी प्रमाणित होती है।

पृथ्वी की विभिन्न परतों की मोटाई, गहराई तथा स्वभाव Thickness, Depth and Nature of Different Layers Earths Interior

पृथ्वी की संरचना विभिन्न तत्वों और पदार्थों से हुई है तथा उनका घनत्व भी भिन्न-भिन्न है। भूगर्भ में एकसमान घनत्व वाले पदार्थों वाले भाग को एक आवरण माना जाता है। पृथ्वी के भीतरी भाग में विभिन्न घनत्व वाले ऐसे कई आवरण हैं।

अनेक भूगर्भिक प्रमाणों जैसे भूकम्प की लहरों की गति के अध्ययन के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग का तीन खण्डों क्रस्ट (Crust), मैण्टिल (Mantle) तथा कोर (Core) में विभक्त किया गया है-

क्रस्ट Crust

पृथ्वी के धरातल पर, जिस पर हम निवास करते हैं दो भिन्न प्रकार के भाग पाए जाते हैं। स्थल भाग तथा सागरीय तल, इनके नीचे क्रस्ट में भिन्नता पायी जाती है। महाद्वीपों के नीचे क्रस्ट की मोटाई 50 किलोमीटर तथा तथा महासागरों के नीचे 5 किलोमीटर है जबकि International Union Geodesy and Geophysics अनुसार 30 किलोमीटर बतायी गयी है। इसका औसत घनत्व 3 है। इसे पुनः निम्न दो भागों में बांटते हैं-

सागरीय क्रस्ट Oceanic crust - विश्व धरातल के 65 प्रतिशत भाग पर सागरीय क्रस्ट का विस्तार है, यह सागरीय क्रस्ट लगभग 5 किलोमीटर सागरीय जल से आवृत है। यह सागरीय क्रस्ट सभी स्थानों पर संरचना की दृष्टि से समान पायी जाती है। इस क्रस्ट की मोटाई 8 किलोमीटर मानी गयी है।

महाद्वीपीय क्रस्ट Continental Crust - यह क्रस्ट 25 से 50 किलोमीटर की मोटाई में महाद्वीपों के नीचे पायी जाती है। इसकी औसत मोटाई 35 किलोमीटर है। इस क्रस्ट की संरचना एक समान नहीं है। उसकी ऊपरी परत अवसादी, आग्नेय तथा रूपान्तरित चट्टानों से निर्मित है, इसके नीचे का भाग भूकम्प तरंगों से विशेष प्रभावित क्षेत्र है।

मैण्टिल Mantle

क्रस्ट के नीचे का भाग मैण्टिल कहलाता है। इसमें पृथ्वी का अधिकांश आयतन पाया जाता है। इसका औसत घनत्व 4.5 है इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह भाग भारी चट्टानों से निर्मित है। इस भाग में ऑक्सीजन और सिलिका की अधिकता पायी जाती है। इस भाग में भूकम्पीय लहरों की गति 7.9 किलोमीटर प्रति सेकण्ड के स्थान पर 8.1 किलोमीटर प्रति सेकण्ड हो जाती है।

भूकम्पीय लहरों की गति के आधार पर मैण्टिल को दो भागों में विभाजित किया जाता है-

1) ऊपरी मैण्टिल Upper Mantle - क्रस्ट के निचले भाग से ऊपरी मैण्टिल के मध्य भूकम्पीय लहरों की गति में परिवर्तन हो जाता है, गति मन्द पड़ जाती है। अतः क्रस्ट और ऊपरी मैण्टिल के मध्य असम्बद्धता की स्थिति होती है। इसकी खोज सर्वप्रथम ए. मोहोरोविसिस ने 1909 में की थी। अत: इसे मोहो असम्बद्धता भी कहते हैं अथवा केवल मोहो (Moho) भी कहा जाता है। ऊपरी मैण्टिल की मोटाई मोहो असम्बद्धता से 1,000, किमी. है, लेकिन International Union Geodesy and Geophysics ने इसकी मोटाई मोहो असम्वद्धता से 200 किलोमीटर (प्रारम्भिक मतानुसार 400 किलोमीटर) मानी है।

2) निम्न मैण्टिल Lower Mantle -निम्न मैण्टिल परत की मोटाई 700 किलोमीटर मानी गयी है। अन्य मतानुसार इसकी मोटाई मोहो असम्बद्धता से 1,000 किमी. से 2,900 किलोमीटर मानी गयी है। इस भाग में तापमान अधिक रहते हैं। इस भाग में प्रवाहित S भूकम्पीय लहरों से पता चला है कि यह निश्चित रूप से ठोस भाग है। घनत्व में क्रमशः वृद्धि और भूकम्पीय लहरों की तीव्रता का मुख्य कारण इस भाग में दबाव की अधिकता है। अधिक गहराई पर अधिक दबाव की स्थिति रहती है, यहाँ सिलीकेट खनिजों में लोहे की मात्रा गहराई के साथ बढ़ती जाती है जिससे इस भाग का घनत्व अधिक हो गया है। ऊपरी मैण्टिल और निम्न मैण्टिल के मध्य 300 किलोमीटर चौड़ी संक्रमण परत (Transition zone) पायी जाती है।

भूक्रोड या पृथ्वी का अन्तरतम भाग Core or Centre of the Earth

पृथ्वी के अन्तरतम भाग की मोटाई 3,417 किमी. मानी जाती है। इस भाग में सर्वाधिक घनत्व 10 तक या इससे अधिक पाया जाता है। इसका आयतन समस्त पृथ्वी के आयतन का केवल 16 प्रतिशत है तथा समस्त द्रव्यमान (Mass) का 32 प्रतिशत है। इस भाग में P भूकम्पीय लहरों की गति में वृद्धि हो जाती है। इसी आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि इस भाग में लोहे निकल धातुओं एवं ऐसी ही भारी चट्टानों की अधिकता है। इस परत को दो भागों में विभाजित किया गया है-

  1. वाह्य कोर Outer Core
  2. आन्तरिक कोर Inner Core

बाह्य कोर outer core - बाह्य कोर का विस्तार पृथ्वी के भीतर, धरातल से 2,900 किलोमीटर से 5,200 किलोमीटर माना है। इस परत में भूकम्पीय लहर S प्रविष्ट नहीं हो पाती है, अतः यह अनुमान लगाया जाता है कि यह परत तरल पदार्थ से निर्मित होनी चाहिए।

आन्तरिक कोर Inner core - पृथ्वी के ऊपरी धरातल से केन्द्र की ओर 5,200 किलोमीटर की गहराई से आन्तरिक कोर की परत आरम्भ होती है और 6,371 किलोमीटर तक पायी जाती है। इस भाग का घनत्व 11 से 13.6 तक है, अतः इस भाग को ठोस किन्तु लचीली अवस्था में ही माना गया है। भूकम्पीय लहर की गति इस भाग में 11.23 किलोमीटर प्रति सेकण्ड रहती है।

यह अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी के भीतरी भाग (Core) अथवा अन्तरतम की रचना लोहे तथा निकिल द्वारा हुई है, परन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि केन्द्रीय भाग सिलीकेट से निर्मित है जो अत्यधिक दबाव के कारण धातु के रूप में परिवर्तित हो जाती है और इसी कारण इस भाग का घनत्व अधिक पाया जाता है परन्तु कुछ अन्य विद्वानों की मान्यता है कि आन्तरिक भाग को यदि सिलीकेट से निर्मित मान भी लिया जाए तो भी अधिक दबाव के कारण घनत्व इतना अधिक नहीं हो सकता है जितना वर्तमान में पाया जाता है। अतः अधिकांश वैज्ञानिक इस धारणा के हैं कि पृथ्वी का आतंरिक भाग (Core) धात्विक पदार्थों से ही बना है।

पृथ्वी की परतों और उनकी गहराई के सम्बन्ध में विद्वान एक मत नहीं हैं। इन सब समस्याओं के निराकरण हेतु भूकम्प लहरों के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक परतों का सरल रूप प्रस्तुत किया गया है।

1. स्थलमण्डल Lithosphere- यह पृथ्वी का ऊपरी भाग है जो सियाल परत के नाम से जाना जाता है, जिसमें ग्रेनाइट चुट्टानों की अधिकता पायी जाती है। इस भाग में मुख्यतः सिलिका, ऐलुमिनियम मिश्रित पदार्थ पाया जाता है। इस परत की मोटाई 100 किलोमीटर ऑकी गयी है। इस परत की चट्टानों का घनत्व 3.5 है।

2. पाइरोस्फीयर Pyrosphere- इस आवरण को मिश्रित मण्डल भी कहते हैं। इस परत में बेसाल्ट की अधिकता पायी जाती है तथा घनत्व 5.6 है। इस परत की मोटाई 2,880 किलोमीटर तक है।

3. बैरीस्फीयर Barysphere - इस परत की मोटाई 2880 किलोमीटर से आगे पृथ्वी के मध्य भाग तथा घनत्व 8 से 11 है। इस परत के निर्माण में लोहा तथा निकिल नामक खनिजों की अधिकता पायी जाती है।

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