मौलिक अधिकार Fundamental rights

संविधान के भाग 3 मेँ अनुच्छेद 12 से 35 तक मुख्य रुप से 7 मौलिक अधिकारोँ को स्थान दिया गया था, लेकिन 44 वेँ संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के मौलिक अधिकार को विधायी अधिकार बना दिया गया, जिससे केवल मूल अधिकार रह गए हैं। मौलिक अधिकारोँ के संबंध मेँ राज्य की विधान सभाओं को कोई विधि बनाने का अधिकार नहीँ है, केवल संसद को अधिकार दिया गया है।

अर्थ

  • व्यक्तियों की अंतर्निहित शक्तियोँ को विकसित करने और उसके व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करने के लिए अपरिहार्य है।

विशेषतायें

  • भारतीय संविधान के अंतर्गत मूल अधिकारों को 8 उपभागों मेँ विभाजित किया गया है। इसमें आरंभ के 2 अनुच्छेद 12, 13 मूल अधिकारोँ की सामान्य रुप रेखा बताते हैं।
  • अनुछेद भारत का तात्पर्य है कि मूल अधिकार केंद्र तथा राज्य सरकारोँ पर ही भाग्य कारी नहीँ है बल्कि अन्य संस्थाओं, जिला परिषदों, ग्राम पंचायतों आदि पर भी लागू होते हैं।
  • नागरिकोँ को दिया जाने वाले ये अधिकार निरपेक्ष तथा असीमित नहीं है क्योंकि लगभग हर अधिकार के साथ संविधान उचित प्रबंधों का भी उल्लेख करता है।

नागरिकोँ तथा गैर नागरिकों को प्राप्त अधिकारोँ मेँ अंतर

भारतीय नागरिकों को प्राप्त मूल अधिकार गैर नागरिकों को प्राप्त मूल अधिकार
केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमेँ से किसी भी आधार पर कोई विभेद का प्रतिषेध (अनुच्छेद 15) विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 145)
लोक नियोजन मेँ अवसर की समानता (अनुच्छेद 16) अपराधो के लिए दोषसिद्धि के बारे मेँ संरक्षण (अनुच्छेद 20)
विचार, अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सम्मेलन, संगठन व समिति बनाना निर्बाध विचरण एवं निवास तथा पेशा और व्यापार करने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21)
अल्पसंख्यकों को शिक्षा एवं संस्कृति संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30) मानव व्यापार या बलपूर्वक श्रम का प्रतिषेध (अनुच्छेद 23)
14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानो या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियोजित करने का प्रतिषेध (अनुच्छेद 24)
धर्म के निर्वाण आचरण प्रचार तथा अंतः करण की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25)
धार्मिक मामलोँ का प्रबंध करने की स्वतंत्रता (अनुछेद 26)
धर्म विशेष की अभिवृद्धि के लिए कर न देने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27)
कुछ शिक्षण संस्थाओं मेँ धार्मिक शिक्षा या उपासना के लिए उपस्थित होने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28)
  •  पृथक्करण के सिद्धांत के अंतर्गत कानून का यदि कोई भाग मूल अधिकार के प्रतिकूल है तो उस कानून के संपूर्ण भाग को असंवैधानिक घोषित करने के बजाय सिर्फ उस भाग को असंवैधानिक घोषित किया जाएगा।

समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18

  • इसमे विधि के समक्ष समानता तथा विधि को समान संरक्षण दिया गया है - अनुच्छेद 14।
  • धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध किया गया है – अनुच्छेद 15।
  • लोक नियोजन के विषय मेँ अवसर की समानता प्रदान की गई लेकिन सरकार पिछडे हुए नागरिकोँ के किसी वर्ग के पक्ष मेँ जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय मेँ राज्य के अधीन सेवाओं मेँ पर्याप्त नहीँ है। नियुक्तियां या पदो के लिए आरक्षण कर सकती है - अनुच्छेद 16।
  • अस्पृश्यता से उपजी किसी नजर निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा, जो विधि अनुसार दंडनीय होगा - अनुच्छेद 17।
  • उपाधियोँ का अंत किया गया है, राज्य सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाय और कोई उपाय नहीँ प्रदान करेगा - अनुच्छेद 18।

अनुच्छेद 15 के दो अपवाद

  • राज्य स्त्रियोँ और बच्चो के लिए विशेष उपबंध कर सकता है - अनुच्छेद 15 (1)।
  • राज्य को सामाजिक और शिक्षा की दृष्टि से पिछडे से पिछड़े वर्गो को अनुसूचित जाति एवं जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष उपबंध बनाने मेँ बाधा नहीँ होगी।
  • संसद राज्यगत किन्हीं नियुक्तियोँ के लिए निवास संबंधी योग्यताएं निश्चित कर सकती है।
  • पिछड़ी परिगणित जातियो को उचित प्रतिनिधित्व ना मिलने पर कुछ स्थान सुरक्षित रखे जा सकते हैं।

स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 19 से अनुच्छेद 22

  • संविधान का अनुच्छेद 19 भारत के नागरिकोँ को विशिष्ट रुप से 6 बुनियादी स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है, जो निम्नलिखित है,
  1. वाक्, स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  2. शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन करने की स्वतंत्रता
  3. संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता
  4. भारत के राज्य क्षेत्र मेँ सर्वत्र आबाध संचरण करना।
  5. भारत के राज्य क्षेत्र मेँ किसी भाग मेँ निवास करना या बस जाना।
  6. कोई वृति उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार होना।
  • उपर्युक्त स्वतंत्रताओं को भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था के हित मेँ सरकार सीमित कर सकती है।

अनुच्छेद 20 : अपराध के लिए दोष सिद्धि के संबंध मेँ संरक्षण

  • कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक दोषी नहीँ ठहराया जाएगा जब तक यह सिद्ध ना हो जाए कि उसने उस समय किसी अधिरोपित विधि का उल्लंघन किया है, तथा उस विधि के उल्लंघन के लिए निर्धारित दंड से अधिक नहीँ होगा।
  • किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दंडित नहीँ किया जाएगा।
  • किसी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीँ करेगा, अनुच्छेद 20।

अनुच्छेद 21 : प्राण एवम दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण

  • अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी व्यक्ति को उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के द्वारा ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीँ।
  • नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत को अनुच्छेद 21 का इसका आवश्यक तत्व माना गया है तथा यह अनुच्छेद 14 मेँ समाहित है।
  • शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21 (क) के अनुसार राज्य 6 से 14 वर्ष तक आयु के सभी बालकोँ को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा जैसा की विधि द्वारा उबंधित है ( अनुच्छेद 86वें संविधान संसोधन 2001 द्वारा जोड़ा गया है)।

अनुच्छेद 22 : कुछ दशाओं मेँ गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण

  • गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणो से तुरंत अवगत कराना पड़ेगा तथा उसे अपनी रूचि के अनुसार कानूनी परामर्श करने एवं अपना बचाव करने के अधिकार से वंचित नहीँ किया जाएगा।
  • गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से लेकर मजिस्ट्रेट के नयायालय तक के समय को छोडकर, गिरफ्तारी से 24 घंटे की अवधि मेँ निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित करना आवश्यक है।
  • खंड (1) तथा खंड (2) की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति पर लागू नहीँ होगी, जो –
  • शत्रु देश का नागरिक है, या
  • निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है,
  • निवारक निरोध की विधि किसी व्यक्ति को तीन मास से अधिक अवधि के लिए निर्णय करने के लिए सलाह सलाहकार बोर्ड की संस्तुति आवश्यक है शोषण के निरुद्ध करने के लिए सलाहकार बोर्ड की संस्तुति आवश्यक है।

शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 - अनुछेद 24)

  • मानव के व्यापार और बलातश्रम पर रोक, मानव का दुर्व्यापार और बेगार प्रथा इसी प्रकार का अन्य बालातश्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा, अनुच्छेद 23।

कारखानोँ आदि मेँ बच्चो का प्रतिषेध

  • 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने या खान मेँ काम करने के लिए नियोजित नहीँ किया जाएगा, अनुच्छेद 24।

धार्मिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 28

  • अंतःकरण की और धर्म को आबाध रुप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता अनुच्छेद 25।
  • लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य को बनाए रखते हुए सभी व्यक्तियो को धर्म को आबाध रुप से मानने एवं प्रचार करने का समान अधिकार होगा।
  • राज्य इस संबंध मेँ एसी विधि बना सकेगा जो धार्मिक आचरण से संबंधित किसी राजनीतिक वित्तीय या अन्य लौकिक क्रिया कलापों का विनियमन या निर्बंधन करती हैं।
  • सुधार एवं सार्वजनिक कल्याण के लिए सार्वजनिक प्रकार की हिंदुओं की धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गो के लिए खोलने का उपबंध करती है।
  • कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिक्ख धर्म का अंग माना जाएगा।
  • हिंदुओं के प्रति निर्देश का अर्थ सिख, जैन या बौद्ध धर्म के मानने वालो के प्रति भी निर्देश तथा संस्थाओं से तात्पर्य भी इन सभी संस्थाओं से है, अनुच्छेद 25।

धार्मिक कार्योँ के प्रबंधन की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 26

  • लोक व्यवस्था, सदाचार एवं स्वास्थ्य को ध्यान मेँ रखते हुए, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को।
  • धार्मिक और पूजा प्रयोजनोँ के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अपने धर्म संबंधित कार्योँ का प्रबंधन करने का,
  • चल और अचल संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का,
  • ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार होगा -अनुच्छेद 26।

धर्म की अभिवृद्धि के लिए करो के भुगतान के बारे मेँ स्वतंत्रता - अनुच्छेद 27

  • धार्मिक उत्थान एवं रखरखाव लिए एकत्रित किए गए धन का व्यय राज्य नहीँ कर सकता है।
  • कुछ शिक्षा संस्थाओं मेँ धार्मिक शिक्षा बिहार धार्मिक उपासना मेँ उपस्थित होने के विषय मेँ स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28)
  • राज निधि से पूर्णतः पोषित किसी शिक्षा संस्था मेँ कोई धार्मिक शिक्षा नहीँ दी जाएगी।
  • उपर्युक्त प्रावधान उस शिक्षा संस्थान मेँ लागू नहीँ होगा जिसका प्रशासन राज्य करता है, लेकिन वह किसी ऐसे न्यास या विन्यास के अधीन स्थापित हुई है, जिसके अनुसार उस संस्थान मेँ धार्मिक शिक्षा देना अनिवार्य है।
  • राज्य से मान्यता प्राप्त या राज्य निधि से सहायता प्राप्त शिक्षण संस्था मेँ होने वाली उपासना मेँ किसी भी व्यक्ति को भाग लेने के लिए बाध्य नहीँ किया जा सकता, अनुच्छेद 28।

संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार, अनुच्छेद 29 से अनुच्छेद 30

  • भारत के राज्य क्षेत्र के निवासी नागरिकोँ के किसी अनुभाग को जिसकी अपनी, लिपि, संस्कृति या भाषा है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा।
  • यह राज्य द्वारा पोषित किसी शिक्षा संस्था मेँ किसी भी नागरिक को केवल जाति, भाषा, मूलवंश या धर्म के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीँ किया जाएगा।
  • शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गोँ का अधिकार।
  • धर्म या भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यक वर्ग को को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाएं स्थापित करने एवं उनका प्रशासन करने का अधिकार है।
  • राज्य को ऐसी संस्थाओं की संपत्ति को अनिवार्य रुप से अर्जित करते समय यह ध्यान रखेगा, कि संस्था को इतनी रकम मिल जानी चाहिए कि उसके हित बने रहें।
  • राज्य शिक्षा संस्थाओं को सरकारी सहायता देने मेँ इस प्रकार की शिक्षा संस्थाओं मेँ तथा अन्य शिक्षा संस्थाओं मेँ कोई भेद-भाव नहीँ करेगा, अनुच्छेद 30।

संवैधानिक उपचारोँ का अधिकार, अनुच्छेद 32 से अनुच्छेद 35

  • मौलिक अधिकारोँ को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार।
  • इसके द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाही द्वारा उत्तम न्यायालय मेँ समावेदन करने का अधिकार है।
  • उच्चतम न्यायालय को इन अधिकारोँ के प्रवर्तन के लिए ऐसे आदेश या रिट, जैसे - बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेक्षण रिट निकालने का अधिकार है।
  • संसद उच्चतम न्यायालय के अधिकार को बनाए रखते हुए उपर्युक्त अधिकार किसी क्षेत्रीय या स्थानीय न्यायालय को स्थानीय सीमाओं के भीतर प्रदान कर सकती है।
  • इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारोँ को सशस्त्र बलोँ आदि पर लागू होने मेँ परिवर्तित करने की संसद की शक्ति - संसद विधि द्वारा।
  • सशस्त्र बलोँ के सदस्योँ को या लोक व्यवस्था बनाए रखने वाले बलों के सदस्योँ या राज्य द्वारा स्थापित इंटेलिजेंस ब्यूरो या अन्य संगठनोँ मेँ नियोजित सदस्योँ को या उपाय उपर्युक्त प्रयोजनोँ के लिए स्थापित दूर संचार प्रणाली मेँ या उससे संबंधित नियोजित व्यक्तियो को इन अधिकारोँ को लागू होने मेँ सीमाएं निर्धारित कर सकती है, जिससे यह कार्य निर्बाध रुप से सुनिश्चित रुप से होता रहे, अनुछेद 33।
  • जब किसी क्षेत्र मेँ मार्शल लॉ लागू हो तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारोँ पर बंधन।

रिट अधिकारिता

केवल पांच तरह की ही रिटें है और वे सिर्फ उच्चतम नयायालय को अनुच्छेद 32 के तहत तथा उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत उपलब्ध हैं। ये परमाधिकार रिट कहे जाते हैं क्योंकि ये केवल उत्तम एवं उच्च न्यायालय को ही उपलब्ध हैं। अधीनस्थ न्यायालय भी मूल अधिकारोँ पर सुनवाई कर सकते हैं, किंतु सामान्य याचिका द्वारा, रिट याचिका द्वारा नहीँ।

  • अनुच्छेद 32 के तहत, रिट मूल अधिकार के प्रवर्तन के लिए रिट निकाल सकते हैं।
  • अनुच्छेद 32 के तहत, रिट द्वारा मूल अधिकारों का प्रवर्तन उच्चतम न्यायालय का संवैधानिक कर्तव्य है, जबकि उच्चं न्यायालय मूल अधिकारोँ के प्रवर्तन के लिए रिट निकालने के लिए बाध्य नहीँ है। उच्च न्यायालय कोई और उपचार सुझा सकते हैं या मूल अधिकारों को प्रवर्तित करने से मना भी कर सकते हैं।
  • उच्चतम न्यायालय पूरे देश के लिए रिट निकाल सकता है। उच्च न्यायालय  सिर्फ अपने अधिकारिता क्षेत्र के अंदर ही रिट निकाल सकते हैं।

बंदी प्रत्यक्षीकरण

  • इसका शाब्दिक अर्थ है - शरीर को हमारे समक्ष उपस्थित करो।
  • यह रिट तब निकाली जाती है, जब किसी को अवैधानिक रुप से निरुद्ध किया गया है। इस रिट का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण करना है। अवैधानिक रूप से निरुद्ध व्यक्ति न्यायालय द्वारा मुक्त किया जा सकता है।
  • ये रिटें लोक अधिकारी एवं गैर सरकारी व्यक्ति दोनों के विरुद्ध निकाली जा सकती है।
  • ये रिटें याचिका प्रभावित व्यक्ति को ही नहीँ बल्कि किसी भी व्यक्ति द्वारा दायर की जा सकती हैं।

परमादेश

  • ये रिटें सिर्फ लोक अधिकारी के विरुद्ध निकाली जा सकती है, गैर - सरकारी व्यक्ति के विरुद्ध नहीँ।
  • ये रिट तब निकाली जाती है, जब किसी लोक अधिकारी द्वारा अपना वैधानिक कर्तव्य न करने के कारण किसी व्यक्ति के वैधानिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। न्यायालय, लोक अधिकारी को अपना वैधानिक कर्तव्य करने को बोल सकता है या आदेश दे सकता है।
  • केवल प्रभावित व्यक्ति ही इस रिट याचिका दायर कर सकता है।

प्रतिषेध

  • यह केवल न्यायिक और अल्प न्यायिक प्राधिकारिओं के विरुद्ध निकाली जा सकती है।
  • ये रिट तब निकाली जाती है, जब न्यायिक या अल्पन्यायिक प्राधिकारी अपनी आधिकारिता  की सीमा के बाहर चला गया है। यह रिट निकाली जाती है जब मामला विचाराधीन है (अर्थात अंतिम आदेश या निर्णय से पहले। जिससे कि न्यायिक प्रक्रिया को वहीँ रोका जा सके या अधीनस्थ न्यायालय को अपनी अधिकारिता की सीमा के अंदर रखा जा सके। यह रिट उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों द्वारा अवर न्यायालयों के विरुद्ध जारी की जाती है।
  • केवल प्रभावित व्यक्ति ही इस रिट याचिका को दायर कर सकता है।

उत्प्रेरण

  • यह रिट प्रतिषेध के समान ही है, अंतर सिर्फ इतना है कि इसमेँ अंतिम आदेश है या निर्णय के घोषित होने के बाद निकाला जाता है। इसके फलस्वरुप अवैधानिक आदेश या निर्णय विखंडित हो जाता है।

अधिकार पृच्छा

  • इसका शाब्दिक अर्थ है - आपका क्या अधिकार है?
  • यह रिट केवल लोक अधिकारी के विरोध मेँ निकाली जा सकती है।
  • यह रिट ये सुनिश्चित करने के लिए निकली जाति है की लोक अधिकारी के पद पर आसीन व्यक्ति, उस पद की अर्हता को पूरा करता है।
  • यह रिट याचिका द्वारा किसी भी व्यक्ति द्वारा दायर की जा सकती है।

मौलिक अधिकारोँ के प्रति न्यायालय का दृष्टिकोण

  • 1967 से पूर्व उच्चतम न्यायालय का मानना था की संसद मौलिक अधिकारोँ सहित संविधान के संपूर्ण भाग को संशोधित कर सकती है।
  • लेकिन गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) के मामले मेँ उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया की मौलिक अधिकार संसद की संशोधन शक्ति से परे हैं।
  • 24वें संवैधानिक संशोधन, 1971 द्वारा न्यायालय के उक्त निर्णय को अप्रभावी ठहराते हुए हुए संसद ने व्यवस्था दी कि मौलिक अधिकारोँ मेँ संशोधन किया जा सकता है।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 नामक मुकदमे मेँ न्यायालय ने यद्यपि 24वें संशोधन की वैधता पर उंगली नहीँ उठाई, परंतु संसद की संविधान संशोधन शक्ति को सीमित करते हुए निर्धारित किया कि संविधान के मूल ढांचे मेँ संसद परिवर्तन नहीँ कर सकती है।
  • 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा संसद ने व्यवस्था दी कि संसद मौलिक अधिकारोँ को संशोधित कर सकती है एवं ऐसे किसी भी संशोधन अधिनियम को न्यायालय मेँ प्रवर्तित नहीँ किया जा सकता है।
  • 44वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा न्यायालय को न्यायिक समीक्षा की शक्ति, वापस कर दी गई। इसके अतिरिक्त सभापति के अधिकार अनुच्छेद 19 (1) ब31 को निरस्त कर दिया गया।
  • मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ (1980) के मामले मेँ न्यायालय ने मौलिक अधिकारोँ को आधारभूत ढांचे के अंतर्गत माना है। लेकिन मूलभूत ढांचा क्या है कि व्याख्या न्यायालय द्वारा अभी नहीँ की गई है।
  • पिवीयर्स के मामले मेँ न्यायाधीश हैगड़े ने कहा कि संविधान मेँ मूल अधिकारोँ को स्थान देने का मुख्य उद्देश्य देश मेँ एक विधि द्वारा संचालित सरकार की व्यवस्था करना है, न कि मानव द्वारा संचालित सरकार की।
  • भारतीय संविधान मेँ डायसी द्वारा प्रतिपादित विधि शासन के सिद्धांत को अंगीकृत किया गया है।
  • साकलन पेपर्स बनाम भारत सरकार तथा तथा बृज भूषण बनाम राज्य के मामलोँ मेँ सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है कि विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता मेँ प्रेस की स्वतंत्रता भी निहित है।
  • किसी भी प्रकाशन पर पूर्ण प्रतिबंध को वाक्-स्वतंत्रय और विचारोँ की अभिव्यक्ति करने की स्वतंत्रता के विपरीत माना है। बृज भूषण बनाम राज्य के मामले मेँ सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी पुष्टि की है।
  • चम्पकम बनाम दोराई राजन 1951 ऐसा पहला मुकदमा था, जिसमें नीति-निदेशक सिद्धांतोँ की अपेक्षा मौलिक अधिकार को अधिक वरीयता दी गई थी।
  • शंकरी प्रसाद और सज्जन सिंह के मामले मेँ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान संशोधन विधि शब्द के अंतर्गत नहीँ आते हैं, लेकिन लोकनाथ के मामले मेँ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान संशोधन विधि शब्द के अंतर्गत आते हैं और केशवानंद भारती वाद मेँ भी यही निर्णय दिया गया।
  • एम. आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य 1963 के वाद मेँ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पिछड़े वर्ग में वर्गीकरण असंवैधानिक है, कोई विशेष वर्ग पिछड़ा वर्ग है कि नहीँ, इसके निर्धारण के लिए व्यक्ति की जाति ही एकमात्र कसौटी नहीँ हो सकती है। इसके निर्धारण के लिए आर्थिक दशा, निर्धनता, पेशा, निवास स्थान आदि पर भी ध्यान देना चाहिए।
  • मौलिक अधिकारोँ मेँ संशोधन संबंधी, उच्चतम न्यायालय मेँ लाया गया प्रथम विवाद शंकर प्रसाद केस, 1951 था।
  • महान्याययवादी बनाम लछमा देवी A.I.R. 1986 S.C. के मामले मेँ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर मृत्युदंड देना अनुच्छेद 21 के अधीन प्रदत्त मूल अधिकार का उल्लंघन है, जो अमानवीय और मानव गरिमा के विरुद्ध दण्ड देना वर्जित करता है।
  • कोई भी व्यक्ति अपने मौलिक अधिकार को छोड नहीँ सकता, न्यायालय ने इस संबंध मेँ फैसला विश्वेश्वरनाथ बनाम आयकर तथा खुर्शीद बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद मेँ सुनाया था।

भारतीय संविधान मेँ आरक्षण का प्रावधान

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (4) मेँ कहा गया है कि, सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो के लिए अथवा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के हितो के लिए सरकार विशेष व्यवस्था कर सकती है।
  • भारत मेँ आरक्षण की शुरुआत 1909 के भारत शासन अधिनियम से हुई, जिसे मार्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है।
  • 1932 मेँ ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड के कम्युनल अवार्ड से भारत मेँ पहली बार अस्पृश्यों को कुछ राजनीतिक अधिकार मिले।
  • 1932 मेँ ही गांधी जी और अंबेडकर के बीच पूना मेँ एक समझौता हुआ, जिसे पूना एक्ट के नाम से जाना जाता है।
  • भारत शासन अधिनियम 1935 मेँ आरक्षण संबंधी उपबंध दिए गए हैं।
  • राज्य सरकारों द्वारा पहली बार आरक्षण के लिए गुजरात सरकार ने राणे आयोग का गठन किया।
  • 1953 मेँ केंद्र सरकार ने कालेकर आयोग का गठन किया, 30 जनवरी, 1953 से 31 मार्च, 1955 में उसने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
  • 1978 मेँ मंडल आयोग का गठन किया गया। 20 दिसंबर, 1978 को गठित मंडल आयोग ने मई, 1980 मेँ अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था। आयोग की संस्तुतियोँ को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने 13 अगस्त, 1990 को इसे लागू किया।
  • उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण के संबंध मेँ अपना निर्णय सुनाते हुए कहा था कि आरक्षण का लाभ सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़े वर्ग के लोगोँ को ही मिलना चाहिए। उसने साथ शब्दोँ मेँ कहा था कि, पिछड़ों मेँ जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं उन्हें आरक्षण का लाभ नहीँ मिलना चाहिए। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को ध्यान मेँ रखते हुए सरकार ने न्यायाधीश प्रसाद की अध्यक्षता मेँ एक आयोग गठित किया और उनसे क्रीमी लेयर के अंतर्गत आने वाले विभिन्न लोगोँ की पहचान करने का कार्य सौंपा। आयोग ने जांच के बाद अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
  • सबसे अधिक आरक्षण तमिलनाडु में 69 % और कर्नाटक 73 % है।

मौलिक अधिकार के विकासात्मक चरण

  • अंग्रेजो ने सन 1215 मेँ इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज से नागरिकों के मूल अधिकारोँ की सुरक्षा प्राप्त की थी, यह अधिकार-पत्र मूल अधिकार से संबंधित प्रथम लिखित दस्तावेज है।
  • सन 1215 के मैग्ना कार्टा ,1679 के बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम, सन 1689 के बिल ऑफ राइट्स, सन 1776 की अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा तथा 1789 की मानव अधिकार की फ्रांसीसी घोषणा इत्यादि मानव अधिकारोँ की मूल समस्या के समाधान मेँ मील का पत्थर हैं।
  • वर्तमान समय मे समाचार-पत्र मेँ छपे लेख एवं पोस्टकार्ड तक को रिट मानकर उच्चतम न्यायालय ने दीन दुखियों की पीड़ा को हरने का बीड़ा लिया है।
  • राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 359 के अधीन मौलिक अधिकारोँ को निलंबित कर सकता है।

स्मरणीय तथ्य

  • सर्वप्रथम मौलिक अधिकारोँ की मांग कांग्रेस द्वारा अपने बंबई अधिवेशन मेँ उठाई गयी। इस अधिवेशन के अध्यक्ष हसन इमाम थे।
  • कांग्रेस ने कराची अधिवेशन 1931 मेँ प्रस्ताव किया की भारतीय संविधान मेँ मौलिक अधिकारोँ की आवश्यक सूची को शामिल किया जाना चाहिए, इससे पूर्व नेहरु कमेटी ने 19 मौलिक अधिकारोँ का उल्लेख अपनी रिपोर्ट मेँ किया था।
  • संपत्ति का अधिकार पहले एक मौलिक अधिकार था लेकिन 44 वेँ संविधान संशोधन अधिनियम (1878) द्वारा इसे मौलिक अधिकारोँ की श्रेणी से निकाल कर एक कानूनी अधिकार बना दिया गया।
  • मैग्ना कार्टा अधिकारों का वह प्रपत्र है जिसे इंग्लैण्ड के किंग जॉर्ज द्वारा 1215 में सामंतों के दबाव में जारी किया गया, यह नागरिकोँ के मूल अधिकारो से संबंधित पहला लिखित प्रपत्र था।
  • भारत मेँ सभी व्यक्तियोँ (नागरिकोँ एवं विदेशियोँ) को दिए जाने वाले मूल अधिकार अनुच्छेद 14, 21, 23, 25, 27 और 28 मेँ समाहित हैं।
  • अस्पृश्यता को संविधान मेँ परिभाषित नहीँ किया गया है।
  • 1954 मेँ भारत सरकार ने चार प्रकार के नागरिक सम्मान प्रारंभ किए - भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री। भारत सरकार द्वारा प्रदान उपाधियां भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री आदि को जनता पार्टी सरकार ने 1977 मेँ समाप्त कर दिया गया था, जो कि 1980 मेँ फिर चालू हो गया।
  • जब अनुच्छेद 352 के अधीन आपात उद्घोषणा की जाती है तो अनुच्छेद 19 निलंबित हो जाता है।
  • गिरफ्तार अथवा हिरासत मेँ लिए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय मेँ आवश्यक समय के अतिरिक्त ऐसी गिरफ़्तारी से 24 घंटे की अवधि मेँ निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा। इन 24 घंटो मेँ यात्रा मेँ लगा समय शामिल नही होता।
  • राष्ट्रपति के विशेष अधिकार द्वारा अनुच्छेद 20 व 21 मेँ निहित अधिकारोँ को छोडकर अन्य समस्त मौलिक अधिकारोँ को निलंबित किया जा सकता है।
  • 50वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 33 का विस्तार कर इंटेलिजेंस, दूरसंचार तथा पैरा मिलिट्री के सदस्योँ को भी इसमेँ सम्मिलित कर लिया गया।
  • अनुच्छेद 359 के द्वारा राष्ट्रपति घोषणा कर सकता है, कि जब तक आपातकाल की घोषणा जारी रहैगी तब तक मौलिक अधिकार निलंबित रहेंगे।
  • मौलिक अधिकारोँ का उल्लंघन होने पर सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय मेँ अपील की जा सकती है।
  • निवारक निरोध कानून के तहत किसी व्यक्ति को अपराध करने के पूर्व ही गिरफ्तार किया जा सकता है।
  • संवैधानिक उपचारोँ का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारोँ के लिए प्रभावी कार्यविधियां प्रतिपादित करता है। इसलिए इसको संविधान की आत्मा कहा जाता है।
  • राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1932 के गोल मेज सम्मेलन मेँ मांग रखी थी की भारत के लिए जो संविधान बनाया जाए उसमेँ भाषाई और धार्मिक स्वतंत्रताएं अवश्य शामिल की जाएं।
  • 1945 में तेज बहादुर सप्रू समिति के प्रस्तावोँ मेँ दो प्रकार के अधिकारोँ की चर्चा थी - न्याय योग्य अधिकार और वाद योग्य अधिकार।
  • संविधान सभा मेँ मूल अधिकारोँ की उप-समिति ने जो प्रारुप सूची फरवरी 1948 को तैयार की मूल अधिकारोँ का वही प्रारुप संविधान मेँ शामिल किया गया।
  • संसद मेँ अनुच्छेद 35 के अंतर्गत अस्पृश्यता निवारक अधिनियम, 1955 को 1976 मेँ संशोधित करते हुए अस्पृश्यता बरतने पर कैद और कठोर दंड की व्यवस्था की।
  • अनुच्छेद 19 को सभी मूल अधिकारोँ मेँ आवश्यक अथवा मूल अधिकार के अध्याय का केंद्र कहा गया है।
  • पिछड़े वर्गों के लिए 1953 मेँ काका कालेकर आयोग की स्थापना की गई थी, जिसने सन 1955 में अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की थी। इस रिपोर्ट सरकार 2399 जातियों को सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हुई माना गया था, जिनमे 837 जातियां अत्यधिक पिछड़ी हुई थीं।
  • 1 जनवरी, 1979 को मंडल आयोग की स्थापना की गई। वी. पी. मंडल को इस आयोग के अध्यक्ष थे। मंडल आयोग ने 31 दिसंबर, 1980 को अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की थी। इस रिपोर्ट में 3743 जातियों को पिछड़ा हुआ माना गया था।
  • मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 13 अगस्त, 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व मेँ केंद्रीय सरकार ने एक कार्यालय ज्ञापन निकाला तथा सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो के लिए 27 प्रतिशत अतिरिक्त स्थान आरक्षित कर दिए गए।
  • अनुच्छेद 18 केवल निर्देशात्मक है, आदेशात्मक नहीँ है।

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