कर्मचारी भविष्य निधि संगठन Employees' Provident Fund Organisation

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की स्थापना भारत सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत की गईमचारी भविष्य निधि संगठन अनेक सेवाएं कराता है, जैसे प्रतिष्ठान के सदस्यों द्वारा दी गई धनराशि का संग्रहण, सदस्यों के खातों की देखरेख तथा सदस्यों और उनके आश्रितों को विभिन्न लाभकारी योजनाओं के तहत् धनराशि का वितरण। कर्मचारी भविष्यनिधि संगठन और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत कर्मचारियों को सेवानिवृति पर कई प्रकार के लाभ उपलब्ध हैं। इनमें भविष्य निधि, पारिवारिक पेंशन और जमाराशि से जुड़ा बीमा शामिल है। जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर यह पूरे भारत में लागू है। यह अधिनियम अनुसूची में निर्देशित सभी प्रतिष्ठानों तथा ऐसे सभी प्रतिष्ठानों जहां बीस या बीस से अधिक व्यक्ति कार्यरत हो, पर लागू होता है। इस अधिनियम के अंतर्गत तीन योजनाएं तैयार की गई हैं-कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952, कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 तथा जमा राशि से जुड़ी कर्मचारी बीमा योजना, 1976। केंद्रीय न्यासी बोर्ड त्रिपक्षीय निकाय है, जिसके अध्यक्ष केंद्रीय श्रम तथा रोजगार मंत्री होते हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि योजना (ईपीएफ), 1952 के प्रावधान के अंतर्गत एक कर्मचारी अपने प्रतिष्ठान में अनिवार्य जमा पूंजी के बल पर अपने को वित्तीय दृष्टि से सुरक्षित महसूस करता है।

प्रशासनिक रूप से, संगठन को जोनों में संगठित किया गया है जिनकी प्रत्येक की अध्यक्षता अतिरिक्त केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त करता है। राज्यों में एक या एक से अधिक क्षेत्रीय कार्यालय होते हैं जिसकी अध्यक्षता क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त (ग्रेड-I) करता है, इन्हें फिर उप-क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है, जिनकी अध्यक्षता क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त (ग्रेड-II) करता है। इनकी सहायता सहायक भविष्य निधि आयुक्त करता है। प्रत्येक जिले में एक छोटा जिला कार्यालय बनाया गया है जहाँ पर एन्फोर्समेंट अधिकारी स्तानीय अवस्थापनाओं की जाँच करता है और शिकायतों को सुनता है।

कर्मचारी भविष्य निधि की स्थापना

कर्मचारी भविष्य निधि की स्थापना दिनांक 15 नवम्बर 1941 को कर्मचारी भविष्य निधि अध्यादेश (Employees' Provident Funds Ordinance – EFPO) के जारी होने के साथ हुई। इस अध्यादेश को कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952 द्वारा बदला गया। कर्मचारी भविष्य निधि बिल को संसद में वर्ष 1952 के बिल संख्या 15 के रूप में लाया गया ताकि कारखानों तथा अन्य संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के भविष्य निधि की स्थापना के प्रावधान हो सके। इसे अब कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम 1952 के रूप में जाना जाता है। यह अधिनियम जम्मू एवं काश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे भारत में लागू है। इस अधिनियम तथा इसके अंतर्गत बनी योजनओं का प्रशासन एक त्रिपक्षीय बोर्ड केंद्रीय न्यासी बोर्ड जिसमे सरकार (केंद् तथा राज्य दोनो), नियोक्ता तथा कर्मचारियों के प्रतिनिधि शामिल हैं द्वारा किया जाता है।केंद्रीय न्यासी बोर्ड संगठित छेत्र के कर्मचारियों के लिए एक अंशदायी भविष्य निधि योजना, एक पेंशन योजना तथा एक बीमा योजना का प्रशासन करता है। यह ग्राहकों की संख्या तथा वित्तीय लेन देन के आधार पर संसार की सबसे बड़ी संस्था है। बोर्ड की सहायता कर्मचारी भविष्य निधि संगठन जिसमे देश भर में 122 विभिन्न स्थानों पर कार्यालय हैं, द्वारा की जाती है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन भारत सरकार के श्रम एवं नियोजन मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं। संगठन के पास इसके पदाधिकारियो तथा कर्मचारिओं के प्रशिक्षण एवं नियोक्ताओं और श्रमिकों के प्रतिनिधिओं के लिए सेमिनार करने के लिए एक सुस्सज्जित प्रशिक्षण संसथान भी है।

केंद्रीय न्यासी बोर्ड निम्नलिखित तीन योजनाएं चला रहा है-

1. कर्मचारी भविष्य निधि योजना 1942
2. कर्मचारी पेंशन योजना 1995
3. कर्मचारी जमा सहबद्ध बीमा योजना 1976

कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय ट्रिब्यूनल

कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952 केंद्र सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान करता है।

ट्रिब्यूनल में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त केवल एक व्यक्ति होता है। कोई व्यक्ति ट्रिब्यूनल के प्रीसाइडिंग अधिकारी नियुक्त किए जाने के योग्य नहीं होगा जब तक कि वह-

  1. एक उच्च न्यायालय का का न्यायाधीश या,
  2. जिलाधीश, नहीं है या रहा है या बन्ने की योग्यता रखता है।

ट्रिब्यूनल, पक्षों द्वारा अपील करने के पश्चात्, दोनों को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात्, ऐसा आदेश दे सकता है जैसा वह उचित समझे, आदेश को, जिसके खिलाफ अपील की गई है, पुख्ता कर सकता है, संशोधित या पलट सकता है या ऐसे निर्देशों के साथ जैसा ट्रिब्यूनल सही समझे, आदेश पारित करने वाले प्राधिकरण को वह आदेश, लौटा सकता है। बिल्कुल नवीन अधिनिर्णय या आदेश, जैसा कि प्रकरण बनता हो, अतिरिक्त प्रमाण का संज्ञान लेने के बाद, जारी कर सकता है।

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