अनाच्छादन Denudation

पृथ्वी के धरातल पर सदैव ही दो शक्तियां क्रियाशील रहती हैं। एक शक्ति धरातल पर नवीन रूपों का सृजन करती है और दूसरी उनको सुधार कर समतलीकरण करती है। भूगर्भिक या आन्तरिक शक्तियां धरातल पर नवीन रूपों को जन्म देती हैं और बाह्य शक्तियाँ धरातल के रूपों को सुधारती हैं अथवा उन्हें पुनः समतल कर सन्तुलित करने का प्रयास करती हैं। अतः ज्यों ही कोई स्थल भाग समुद्र के गर्भ से बाहर निकलता है, बाह्य शक्तियां उसकी समतल बनाने के कार्य में लग जाती हैं।

बाह्य शक्तियां दो वर्ग की हैं। इनमें से पहली शक्ति स्थिर या स्थैतिक शक्ति कहलाती है। इस प्रकार की शक्ति को ऋतु अपक्षय (weathering) कहते हैं। वारसेस्टर के अनुसार, “ऋतु अपक्षय वह क्रिया है जिसके अन्तर्गत पृथ्वी के घरातल की कठोर चट्टानें विघटित अथवा अपघटित होती हैं।" इस प्रक्रिया में चट्टानें एक ही स्थान पर स्थिर प्रायः रहकर यान्त्रिक विधि द्वारा टूटती हैं अथवा वियोजन (Decomposition) द्वारा टूटफूट कर ढीली हो जाती हैं और अपने स्थान पर ही विखर कर रह जाती हैं। वर्षा और तापमान के प्रभाव से भूपटल की चट्टानें टूट कर टुकड़े-टुकड़े होने लगती हैं तो यह कार्य अपक्षय कहलाता है। दूसरी शक्तियाँ गतिशील होती हैं। ये टूटी हुई, मुलायम और ढीली चट्टानों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाती रहती हैं और मार्ग में उनका क्षय करती रहती हैं। इन शक्तियों में नदियों, हिमनदों, पवनों तथा समुद्र की लहरों द्वारा भूपटल को घिसा या काटा जाता है अतः उस प्रक्रिया को अपरदन कहते हैं। यह दोनों ही शक्तियाँ कभी शान्त नहीं रहकर निरन्तर क्रियाशील रहती हैं। प्रथम प्रकार की या स्थिर शक्तियों द्वारा चट्टानें केवल खण्ड-खण्ड हो जाती हैं और वहीं पड़ी रहती हैं। इन क्रियाओं को स्थिर प्रक्रियाएँ (static Processes) कहते हैं। दूसरी प्रकार की क्रिया में चट्टानों के टूटे हुए टुकड़े स्थानान्तरित कर दिए जाते हैं। अतः ऐसी क्रियाएं गतिशील प्रक्रिया (Mobile Processes) कहलाती हैं। अतः धरातल पर क्रियाशील इन दोनों ही शक्तियों अपक्षय और अपरदन के सामूहिक प्रभाव को ही अनाच्छादन या अनावृत्तिकरण (Denudation) कहा जाता है। इसके मुख्य प्रकार निम्न हैं :

  1. ऋतु अपक्षय
  2. अपरदन
  3. निक्षेपण

ऋतु अपक्षय Weathering

भूपटल की चट्टानों का बहुत अधिक क्षय मौसम के दो प्रधान तत्वों (तापमान और वर्षा) के प्रभाव से होता है, इसलिए वे सभी प्रक्रियाएँ, जो चट्टानों के विनाश में लगी रहती हैं, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मौसम के तत्वों से सम्बन्धित होती हैं। चट्टानों के विनाश में जल, ताप, कुहरा और हिम अधिक प्रभावी होते हैं। पेड़-पौधे, जीव-जन्तु और मनुष्य भी कुछ भ्रंश तक चट्टानों के विनाश में सहायता पहुंचाते हैं, अतः उन सभी प्रक्रियाओं को, जिनसे चट्टानें अपने स्थान पर टूटती रहती हैं और टूटा हुआ पदार्थ अपने मूल स्थान पर ही पड़ा रहता है, अपक्षय कहा जाता है।

हिण्डस के अनुसार, “अपक्षय यांत्रिक या रासायनिक अपघटन की वह क्रिया है जो चट्टानों के भौतिक स्वरूपों को समाप्त करती रहती है।“

अपक्षय के प्रकार Types of Weathering

भूपटल की चट्टानें अनेक कारणों से अपने स्थान पर टूटती-फूटती हैं। इनमें से ताप, जल, तुषार (हिम) जैसे भौतिक कारकों, ऑक्सीकरण, घोलीकरण तथा कार्बोनेशन जैसे रासायनिक कारकों तथा जन्तु और वनस्पतियां जैसे जैविक कारकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है अत: इस आधार पर अपक्षय तीन प्रकार का होता है-

  1. भौतिक अथवा यांत्रिक Physical or Mechanical Weathering
  2. रासायनिक Chemical Weathering
  3. जैविक Biological Weathering

भौतिक अथवा यांत्रिक ऋतु क्षय Physical or Mechanical weathering

जब चट्टानें विना किसी रासायनिक परिवर्तन के ही विघटित हो जाती हैं तो उस क्रिया को भौतिक अपक्षय कहा जाता है।

ताप, पाला और वर्षा भौतिक विखण्डन के मुख्य साधन हैं। इनके द्वारा चट्टानों के फैलने और सिकुड़ने की भौतिक क्रिया से चट्टानें अपने आप टूट जाती हैं।

ताप- गर्मी से प्रत्येक वस्तु फैलती है और ठण्ड से सिकुड़ती है अतः दिन में सूर्य की गर्मी से चट्टानें फैलती हैं और रात्रि को ठण्ड के कारण सिकुड़ती हैं। निरन्तर चट्टानों के फैलने और सिकुड़ने की इस क्रिया से चट्टानें कमजोर हो जाती हैं और चट्टानों में चटखनें और दरारें पड़ जाती हैं जिससे उनका विखण्डन हो जाता है। चट्टानों की ऊपरी परत के निचली परत से पृथक होने की क्रिया को अवदलन (Exfoliation) कहते हैं। मरुस्थलीय प्रदेशों में जहां वनस्पति का अभाव रहता है और दैनिक ताप परिसर बहुत अधिक रहता है, यह प्रक्रिया बड़ी प्रभावशाली होती है।

पाला- ठण्डे प्रदेशों में पाला ऋतु अपक्षय का महत्वपूर्ण साधन है। यहाँ चट्टानों की दरारों में जब कभी जल भर जाता है तो रात्रि को वह शीत के कारण जम जाता है। जमने पर जल का आयतन बढ़ जाता है और दिन को सूर्य ताप से जमा हुआ जल पिघल जाता है तथा रात्रि को यह पुनः जम जाता है। निरन्तर इस प्रकार की क्रिया होते रहने से चट्टानों की दरारें चौड़ी होती जाती हैं और अन्त में चट्टानें खण्डखण्ड होकर टूट जाती हैं।

वर्षा- वर्षा के द्वारा भी चट्टानें नष्ट होती जाती हैं। उष्ण प्रदेशों में सूर्य की गर्मी से तपी हुई चट्टानों पर जब वर्षा का जल गिरता है तो उसका वही प्रभाव होता है जो गरम चिमनी पर जल के छोटे पड़ने से होता है। चट्टानें तड़कने से वर्षा के अन्त में धीरे-धीरे टूट जाती हैं।

रासायनिक ऋतु अपक्षय Chemical Weathering

इसमें ऑक्सीकरण, कार्बनीकरण तथा जलीकरण के प्रभाव से चट्टानों के खनिजों एवं रासायनिक तत्वों में रासायनिक परिवर्तन हो जाता है। इससे चट्टानें ढीली पड़ जाती हैं और उनका अपघटन तथा विघटन होने लगता है। इससे अपक्षय की तीव्र गति हो जाती है। इस प्रकार की क्षति उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में बड़ी मात्रा में होती है। यह क्रिया निम्नांकित प्रकार से होती है-

ऑक्सीकरण- इसमें चट्टान के खनिजों के साथ ऑक्सीजन मिल जाती है जिससे लौह-खनिज ऑक्साइडों के रूप में बदल जाते हैं। इन ऑक्साइडों का आयतन अपने पूर्व पदार्थों से अधिक हो जाता है फलतः चट्टानें ढीली पड़ जाती हैं और शीघ्र ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। लोहे में जंग का लगना ऑक्सीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है। लौह युक्त चट्टानों में यह क्रिया अधिक होती है।

कार्बोनीकरण- कार्वन और जल मिलकर कार्बोनिक अम्ल बन जाता है। यह अम्ल चूने की चट्टानों को सरलता से घोल देता है। अतः जब कार्बन मिश्रित वर्षा का जल भूमि में प्रवेश करके ऐसे प्रदेशों में चला जाता है जो चूने की चट्टानों से बना है तो वह सम्पूर्ण चट्टानों को घोलकर नष्ट कर देता है।

जलयोजन- जब जल चट्टानों के खनिजों के साथ मिलता है तो खनिजों का आयतन बढ़ जाता है। फलतः चट्टानों के भीतर भारी दवाव पैदा हो जाता है जिससे खनिज कण भीतर ही भीतर पिसकर चूर्ण हो ज़ाते हैं। इससे चट्टानें ढीली हो जाती हैं और उसकी परतें बिखरने लगती हैं।

घोल- वर्षा का जल कई खनिजों को घोल देता है। खनिजों का जल में घुलना ही विलयन कहलाता है जिसके फलस्वरूप चट्टानों में टूट-फूट होती है।

जैविक अपक्षय Bilogical Weathering

धरातल पर जैविक ऋतु अपक्षय जन्तु, वनस्पति एवं मनुष्य तीन साधनों द्वारा होता है-

जन्तु Animals- जन्तुओं द्वारा भी चट्टानों पर भौतिक तथा रासायनिक दोनों ही प्रभाव पड़ते हैं। अनेक प्रकार के जन्तु (खरगोश, चूहा, लोमड़ी, गीदड़, केंचुए, आदि) तथा कीड़े-मकोड़े भूमि को खोदकर मिट्टी ऊपर लाते रहते हैं। यह मिट्टी कमजोर होकर वर्षा जल के साथ तीव्रता से वह जाती है।

वनस्पति- वनस्पति से शैलों का भौतिक एवं रासायनिक दोनों ही प्रकार से अपक्षय होता है। पेड़-पौधों की जड़ शैलों की दरारों में प्रवेश कर निरन्तर भीतर घुलने का प्रयास करती है। ज्यों-ज्यों जड़ें भीतर प्रवेश करती हैं और मोटी होती जाती हैं, वे शैलों की सन्धियों पर अधिकाधिक दबाव डालती हैं। फलस्वरूप शैलों की सन्धियाँ फैलकर चौड़ी हो जाती हैं। जड़ों की इस क्रिया से शैलों के बड़े-बड़े टुकड़े टूटकर अलग हो जाते हैं।

मानव- खेत और उद्यान बनाने के लिए भूमि को खोदना, मकानों के लिए मिट्टी और शैलों को तोड़ा जाता है। खनिज पदार्थ निकालने के लिए भूमि में गहरे गट्टे खोदे जाते हैं तथा सड़कें व रेलमार्ग बनाने के लिए सुरंगें खोदी जाती हैं। इस प्रकार मानव द्वारा शैलों को तोड़कर कमजोर बनाया जाता है। कालान्तर में टूटे हुए टुकड़े घिसते रहते हैं।

अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारक Factors Affecting to weathering

अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारकों में ये मुख्य हैं-

  1. चट्टानों की प्रकृति- यदि चट्टानें कोमल हैं तो वे कठोर चट्टानों की अपेक्षा शीघ्र टूट जाती हैं।
  2. भूमि का ढाल- जिन भूमियों का ढाल तीव्र होता है वहां अपक्षय मन्द ढाल वाली भूमियों की अपेक्षा अधिक होता है।
  3. चट्टानों में सन्धियों का पाया जाना- जिन चट्टानों में सन्धियां अधिक पायी जाती हैं उनका अपक्षय शीघ्रता से होता है।
  4. वनस्पति का आवरण- जिन क्षेत्रों में धरातल वनस्पति से ढका होता है, वहाँ निर्जन भूमि की अपेक्षा कम अपक्षय होता है।
  5. जलवायु- आर्द्र जलवायु में मुख्यतः रासायनिक अपक्षय ऑक्सीकरण तथा कार्बोनीकरण की क्रिया द्वारा होता है, जिनसे चट्टानों की ऊपरी सतह भुरभुरी हो जाती है तथा शुष्क जलवायु में यान्त्रिक अपक्षय अधिक होता है। यहां तापमान में अन्तर होते रहने से चट्टानें फैलती और सिकुड़ती हैं, अतः उनका भौतिक अपक्षय होता है।

ऋतु-अपक्षय का मानव जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है Effects of Weathering of Human Life

मिट्टियों का निर्माण- धरातल के ऊपर पायी जाने वाली मिट्टी की तह मानव जीवन का आधार है। इस मिट्टी की परत से ही कृषि सम्भव होती है। धरातल पर प्राप्त यह मिट्टी ऋतु अपक्षय का परिणाम है।

खनिजों की प्राप्ति- धरातल पर प्राप्त बहुत से खनिज शैलों के अपक्षय से ही बनते हैं। चूना, जिप्सम, गन्धक, चाक, आदि खनिज शैलों के उपरान्त खनिज तत्वों के एकत्र होने से ही प्राप्त होते हैं।

मैदानों की रचना- शैलों के क्षय पदार्थ को हिमनद तथा नदियाँ बहा ले जाती हैं और बाद में उसे मौर्ग में बिछा देती हैं, फलस्वरूप समतल मैदानों की रचना होती है।

धरातल का रूप परिवर्तन- नदियाँ, हिमनद, पवनें तथा लहरें ऋतु अपक्षय के कारण कई शैलों की चूरचार अथवा शिलाखण्ड को धरातल के अपक्षरण के साधन के रूप में काम में ले लेते हैं जिससे धरातल का रूप परिवर्तित होता है।

भूस्खलन एवं झीलों का निर्माण- पर्वतीय भागों में ऋतुअपक्षय से हिम तथा शिलाखण्डों का फिसलन होता रहता है। कभी-कभी इस फिसलन से नदियों की घाटियों के मार्ग में बाधा पड़ जाती है और वहाँ जल भर जाने पर झीलें बन जाती हैं।

अपरदन Erosion

अपक्षय की क्रिया से शैलों का बराबर विघटन होता रहता है। विघटन से शैलें चूर-चूर होती रहती हैं। शैलों का यह चूर्ण उसी स्थान पर एकत्रित होता रहता है या गुरुत्वाकर्षण के द्वारा फिसलकर ढाल के नीचे जमा हो जाता है। अवसाद या यहाँ अधिक समय तक नहीं बना रहता। गतिशील शक्तियाँ इसे हटाकर अन्यत्र ले जाती हैं। इन शक्तियों में बहता हुआ जल, हिमनद, पवनें और लहरें मुख्य हैं। हटते समय अथवा अपनी यात्रा के मार्ग में यह चट्टानी अवसाद अपने सम्पर्क में आयी हुई धरातलीय शैलों से रगड़ खाता हुआ चलता है। गतिशील शक्तियों द्वारा यह शैल चूर्ण परिवहित होता रहता है। इस प्रकार शैलों के अपघर्षण (Corosion) और परिवहन (Transportation) दोनों प्रक्रियाओं को सामूहिक रूप से अपरदन (Erosion) कहा जाता है।

अपरदन कार्य के तीन मुख्य अंग हैं-

  1. गतिशील शक्तियों द्वारा ढालों से अपरदन द्वारा छीलन या शैलों के चूर्ण को ग्रहण करना
  2. इस छोलन को अन्यत्र बहाकर ले जाना
  3. पारस्परिक अपघर्षण द्वारा जिस स्थल खण्ड के ऊपर से वह बह रहा है उसको खुरचना। इसमें अपघर्षण की क्रिया अपरदन का मूल आधार है जो परिवहन के बिना कभी सम्भव नहीं होती। अतः परिवहन अपरदन का महत्वपूर्ण अंग है। परिवहन की तीन मुख्य विधियाँ हैं-
    1. घोलकर Solution- अपरदन का साधन शैलों को घोलकर अदृश्य रूप से ले जाए, जैसे नमक और चूना सदैव जल में घुले हुए रूप में बहते हैं।
    2. लटकाकर Suspension- अपरदन का साधन शैलों के महीन कणों को अपने साथ तैरते हुए (लटकते हुए) बहा ले जाए; जैसे बाढ़ के समय बड़ी मात्रा में मिट्टी के कण इसी प्रकार स्थानान्तरित होते हैं।
    3. बहाकर Saltation- अपरदन का साधन अपने प्रवाह वेग से शैलअथवा धूलकणों को तलहटी के साथ घसीटते हुए या स्वतन्त्र रूप से बहा ले जाए। उदाहरणतः जल में चट्टानी टुकड़े और हवा में धूलकण इसी प्रकार हटते हैं।

निक्षेपण Deposition

अपरदन के कारक अपने द्वारा परिवहित पदार्थ अपनी अन्तिम अवस्था में जमा देते हैं इसे निक्षेपण कहते हैं निक्षेपण की मात्रा तथा स्थिति निम्न कारकों पर निर्भर करती है-

  1. अपरदन के कारकों का वेग Velocity
  2. परिवहित पदार्थों की मात्रा Quantity
  3. धरातल का ढाल Slope
  4. परिवहन क्षमता (Capacity) में कमी
  5. अपरदन के कारक की अवस्था Stage
  6. निक्षेपण का स्थान Place

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