जैवमंडल Biosphere

जैवमण्डल अथवा जीवमण्डल सामान्य रूप से पृथ्वी की सतह के चारों ओर व्याप्त एक आवरण होता है, जिसके अन्तर्गत वनस्पति तथा पशु जीवन बिना किसी रक्षक साधन के सम्भव होता है। स्ट्रालर तथा स्ट्रालर (A. N. strahler and A. H.Strahler) के शब्दों में पृथ्वी के सभी जीवित जीव तथा वे पर्यावरण, जिनसे इन जीवों की पारस्परिक क्रिया होती है, मिलकर जीव या जैवमण्डल की रचना करते हैं।” रूसी जीवविज्ञानी बर्नाडस्की ने 1919 में जीवमण्डल (Biosphere) शब्द प्रथम बार प्रयोग किया था।

भूगोल परिभाषा कोश के अनुसार, “पृथ्वी की सतह अथवा पर्पटी एवं उसका समीपवर्ती वायुमण्डल जिसमें जीव पाए जाते हैं, जीवमण्डल कहलाता है।"

जैवमण्डल की उत्पति - पृथ्वी पर जल एवं जीवों के उद्भव से पूर्व यह एक चट्टानी ग्लोब के समान थी, जिस पर घीरे-घीरे छिछले सागर और पतली गैसें जैसे मिथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन, सल्फाइड तथा जलवाष्प विस्तृत होती गई। पृथ्वी उस समय अधिक उष्ण एवं उजाड़ ग्रह था जिसे जियोस्फीयर अथवा भूमण्डल (Geosphere) कहा गया। तब भूमण्डल (Geosphere) के अन्तर्गत स्थलमण्डल (Lithophere), जलमण्डल (Hydrosphere) तथा वायुमण्डल (Atmosphere) के भाग सम्मिलित किए गए।

करोड़ों वर्षों में जाकर सूर्य के प्रकाश, जलवाष्प, पानी और ताप की निरन्तर क्रिया प्रतिक्रिया से सागर जल में विविध जटिल क्रियाओं द्वारा ही अन्ततः जीवन शुरू हुआ। यह जीवन आकार विहीन और जैली के समान धब्बे अमीबा के रूप में था। इस प्रारम्भिक जीवन ने पर्यावरण से शक्ति ग्रहण कर अपने प्रकार के जीवों को जन्म देना आरम्भ कर दिया। इसी से कुछ करोड़ वर्षों में अनेक प्रकार के प्राणी एवं वनस्पति के रूप विकसित एवं बहुगुणित होते गए। भूमण्डल (Geosphere) की ऊपरी परत में जीवों के उत्पन्न एवं विकसित होने से ही इसे जैवमण्डल (Biosphere) अथवा जीवन का मण्डल (Zone of Life) कहा गया। परिवर्तन के लम्बे समय के पश्चात् आज से कई हजार वर्ष पूर्व जव आधुनिक मानव की उत्पति हुई तो उसने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से इस जैवमण्डल को प्रभावित किया। जैवमण्डल के प्रभावी क्षेत्र के अन्तर्गत समस्त जलमण्डल, स्थलमण्डल का बाह्य भाग तथा वायुमण्डल का कुछ भाग मुख्यतः विक्षोभ मण्डल सम्मिलित किए जाते हैं।

पृथ्वी पर जैव जगत के प्रमुख अंग के रूप में दो भाग पाए जाते हैं-

  1. वनस्पति Vegetation
  2. पशु और वन्य जीव Animals

प्राकृतिक वनस्पति को प्रभावित करने वाले घटक Factors Affecting Natural Vegetation

पृथ्वी ये सभी भागों में किसी न किसी प्रकार की वनस्पति अवश्य पायी जाती है, चाहे वह झाड़ियों या घास के रूप में हो अथवा सघन वनों के रूप में जलवायु और मिट्टी के अन्तर्सम्बन्ध से ही वनस्पति उगती है। वनस्पति को प्रभावित करने वाले मुख्य घटक ये हैं-

  1. तापमान,
  2. जल-पूर्ति,
  3. प्रकाश,
  4. पवन,
  5. मिट्टी

यहाँ पर जलवायु के घटक तापमान, वर्षा या जलपूर्ति, पवनें, और प्रकाश सबसे महत्वपूर्ण हैं। ये अग्रलिखित हैं-

1. तापमान Temperature- तापमान और वनस्पति में गहरा सम्वन्ध पाया जाता है। वनस्पति के विकास के लिए कम से कम तीन महीने का तापमान 10° सेण्टीग्रेड से अधिक होना चाहिए। अत: जुलाई माह की 10° सेण्टीग्रेड की समताप रेखा उत्तरी गोलार्द्ध में वृक्ष सीमा (Tree Line) बनाती है, यह टुण्ड्रा तथा टैगा क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करती है। इससे कम तापमान के निकटवर्ती क्षेत्र प्राय: वनस्पति शून्य होते हैं। उष्ण मरुस्थलों में अधिक ऊँचे तापमानों के कारण ऐसी वनस्पति पायी जाती है जिसमें पतियाँ कम एवं जड़ें अधिक व गहरी होती हैं। शीत मरुस्थलों में ऐसी वनस्पति पायी जाती है जो सामान्यतः छोटी-छोटी झाड़ियों पौधे और घास के रूप में फैली होती है। इनकी जड़ें बहुत छोटी और पतली होती हैं। काई और लिकेन (moss and lichen) यहाँ की मुख्य वनस्पति है।

उष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाली वनस्पति एवं शीत कटिबन्धीय शंकुल या नुकीली पतियों वाली वनस्पति में अन्तर का मुख्य कारण तापमान की भिन्नता ही है।

2. जल-पूर्ति Water supply- तापमान के द्वारा वनस्पतियों की भिन्न-भिन्न जातियाँ निश्चित होती हैं और जल के द्वारा उनको विरलता या सघनता का निश्चय होता है। जहाँ जल की मात्रा अधिक होती है वहाँ बड़े पत्तों वाले लहलहाते वृक्षों और हरी घास की प्रधानता रहती है। अत्यधिक नम भागों में पाए जाने वाले पौधों को नम भूमि के पौधे (Hydrospheres) कहते हैं। ऐसे पौधों के तने लम्बे और पतले, जड़ें छोटी, पत्तियाँ चौड़ी और पतली होती हैं। लेकिन सहारा जैसी शुष्क भूमि में घास, कंटीले और कम पत्ती वाले वृक्ष पैदा होते हैं। शुष्क जलवायु के पौधों (Xerophytes) की जड़े लम्वी होती हैं।

3. प्रकाश Light- जल की भाँति प्रकाश भी वनस्पति की अनिवार्य आवश्यकता है। जहाँ कहीं प्रकाश कम रहता है वहाँ भोजन वनने की प्रक्रिया में कमी हो जाने के कारण वनस्पति कम विकसित हो पाती है। पतियों का हरा रंग इसी प्रकाश के कारण ही होता है। कम प्रकाश से पतियाँ पीली अर्थात् हरे रंग (Cholorophyll) का अभाव हो जाता है। प्रकाश व गैसों से प्रतिक्रिया द्वारा वृक्षों को उर्जा शक्ति भी मिलती है। उपर्युक्त तीनों तत्व वनस्पति के अनिवार्य घटक हैं।

4. पवन Wind- यह भी वनस्पतियों के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है। कभी-कभी प्रचण्ड अथवा झुलसाने वाली उष्ण व शुष्क पवनें वनस्पति को हानि भी पहुंचाती हैं। पवनों का प्रमुख प्रभाव वनस्पति में उपस्थित जल की मात्रा को कम करना है। वृक्षों के जल को उष्ण पवन उनकी पत्तियों द्वारा वाष्पीकरण से उड़ा ले जाता है।

5. मिट्टी Soil- वनस्पति के समुचित विकास में तापमान और जल के साथ-साथ मिट्टी की किस्म भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। मिट्टी से ही वनस्पति को भोजन मिलता है। मिट्टी में मिले हुए अनेक प्रकार के रसायन, , आदि जल में घुलकर वनस्पति को भोजन देते हैं। अधिक मात्रा में लवण तत्व वृक्ष के लिए विष का काम करता है एवं वहाँ वनस्पति पैदा नहीं होती। कणों की महीनपन के अनुसार मिट्टी में जल की मात्रा कम या अधिक होती है। छोटे कणों वाली चिकनी मिट्टी में जल की मात्रा अधिक रहती है, लेकिन यदि मिट्टी के कण मोटे होते हैं तो उस मिट्टी में जल बहुत कम रुकता है। उपजाऊ मिट्टियों में सघन तथा अनुपजाऊ मिट्टियों में विरल वनस्पतियाँ उगती हैं।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार Types of Natural Vegetation

सामान्यतया पृथ्वी के धरातल पर तीन प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं-

  1. वन,
  2. घास के मैदान, तथा
  3. कॅटीली झाड़ियाँ

वनों में पत्ती वाले वृक्षों की सघनता और उसके विविध आकार होते हैं। घास के मैदानों में वनस्पति की कमी प्रायः वृक्षों की अनुपस्थिति होती है। मरुभूमियों में वनस्पति यत्र-तत्र ही दिखायी पड़ती है तथा उसकी मात्रा भी बहुत कम एवं शुष्कता सहने वाले कैंटीले पौधों या झाड़ियों की होती है।

वनों का विश्व वितरण World Distribution of Forests

वन प्रायः उन भागों में मिलते हैं जहाँ वर्षा अधिक होती है अथवा मिट्टी पर शीतकाल में गिरी हिम पिघलकर यथेष्ट मात्रा में नमी प्रदान कर देती है और जहाँ सामान्यत: अधिक नमी ऊँचे तापमान मिलते हैं। विश्व के सभी महाद्वीपों में वनों का विस्तार एक सा नहीं है। सघन वनों की उत्पत्ति के लिए ऊँचे तापमान, घनी वर्षा, उचित प्रकाश की मात्रा, पवनों की अनुकूल दिशा एवं उपजाऊ मिट्टी का होना आवश्यक है।

विश्व के कुल वन प्रदेशों का 60% भाग ही उपयोगी है जिनसे लकड़ियाँ प्राप्त की जाती हैं। इस क्षेत्र में से वास्तविक रूप से 14,660 लाख हेक्टेअर भूमि के वनों से (अर्थात् 57% क्षेत्र) से लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं। अगम्य वन क्षेत्र सामान्यतः रूस के भीतरी भाग, कनाडा, अलास्का तथा एशिया और लैटिन अमरीका के मुख्यतः पर्वतीय, दलदली व अनेक भागों में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं।

इस प्रकार वनों की उपयोगिता की दृष्टि से रूस भाग्यशाली देश है। इसके दूसरी ओर यूरोप, चीन एवं भारत के अधिकांश पहुंच वाले वन काम में आ चुके हैं। अफ्रीका महाद्वीप कृा क्षेत्रफल तो बहुत विशाल है, किन्तु अनेक प्रतिकूल कारकों से वहाँ की वनसम्पदा बहुत सीमित है। विश्व में विभिन्न प्रकार के वनों का वितरण इस प्रकार है-

विश्व में वनों के प्रकार तथा वितरण Types of Forest And Their Distribution

विश्व के वनों को 5 प्रकारों में बांटा जा सकता है-

1. उष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाले वन Tropical Broad Leaves Evergreen Forests- विश्व में इस प्रकार के वनों का विस्तार धरातल पर लगभग 145 करोड़ हेक्टेअर भूमि पर है। इसमें से 51.3% दक्षिणी अमरीका, 21.2% अफ्रीका, 17.5% एशिया, 7% आस्ट्रेलिया और 3% उत्तरी-मध्य अमरीका में पाए जाते हैं।

इन वनों का सबसे अधिक विस्तार भूमध्य रेखा से 10° उत्तरी और 5° दक्षिणी अक्षांशों के बीच में है। ऐसे वन विशेषतः अमेजन बेसिन, विषुवत रेखीय अफ्रीका के मध्यवर्ती एवं पश्चिमी भाग (कांगो बेसिन) तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं उनसे तत्सम्बन्धी द्वीप समूहों (मलेशिया, इण्डोनेशिया, न्यूगिनी, आदि) में मिलते हैं, जहाँ वर्ष भर तापमान ऊँचे (27°सेण्टीग्रेड से 30° सेण्टीग्रेड तक) रहते हैं और वर्षा की मात्रा 150 सेण्टीमीटर से 200 सेण्टीमीटर तक होती है।

इन सघन वनों के कुछ बहुमूल्य एवं उपयोगी वृक्ष, महोगनी, बाँस, रोजवुड, लॉगवुड, ब्राजील वुड, रबर, आयरन वुड, मेनिऑक, नारियल, केला, ग्रीन हार्ट, सैगो, सिनकोना, बेंत, बैडफूट, आदि हैं। ज्वरीय तटों पर मैंग्रोव आदि दलदली भागों के वृक्ष एवं नारियल व ताड़ वृक्ष पैदा होते हैं।

2. उष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती के पर्णपाती (मानसूनी) वन Torpical Broad Leaves Deciduous Forests- विश्व के जिन भागों में वर्षा मौसमी एवं कम मात्रा में होती है वहाँ पतझड़ की ऋतु होती है। यहाँ केवल ग्रीष्म में ही वर्षा होती है। इस प्रकार के वन भारत, उत्तरी म्यांमार, उत्तरी थाईलैण्ड, लाओस, उत्तरी वियतनाम, मध्य अमरीका, उत्तरी आस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका, मलेशिया आदि देशों में पाए जाते हैं।

इन वनों के प्रसिद्ध वृक्ष सागवान, बाँस, साल, ताड़, चन्दन, शहतूत, , देवदार, महोगनी, बैंत, आम, नीम, पीपल, सिरस, बड़, नारियल, आदि हैं।

दक्षिणी अमरीका में ब्राजील के पूर्वी व उत्तर-पूर्वी भाग में कम वर्षा के कारण मानसूनी सघन वनों के स्थान पर कटिंगा (Katinga) नामक झाड़ियाँ ही अधिक पैदा होती हैं, जिनक पतियाँ शुष्क ऋतु में झड़ जाती हैं।

3. शीतोष्ण कटिबन्धीय चौड़ी पत्ती वाले सदापर्णी वन Temperate Broad Leaves Evergreen Forests- भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों में महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर 30° से 40° अक्षांशों के बीच ये वन मिलते हैं। स्पेन, पुर्तगाल, इटली, चिली, कैलीफोर्निया, अल्जीरिया और ट्यूनीशिया में इस प्रकार के वन विशेष रूप से पाए जाते हैं। यूरोप में इस प्रकार की झाड़ियों को मैक्वीस(Maquis) और संयुक्त राज्य अमरीका में चैपरैल (Chapparel) कहते हैं। इन प्रदेशों के वन सदा हरेभरे रहते हैं।

इन वनों के मुख्य वृक्ष ओके, जैतून, अंजीर, चीड़, फार, साइप्रस, कारिगम, मैपल, यूकेलिप्टस, चेस्टनट, लॉरेस, , वालनट, आदि हैं। सूर्य के प्रकाश की प्रधानता के कारण ये प्रदेश रसदार फल एवं मेवे वाले पेड़ों की उत्पत्ति के लिए विशेष उपयुक्त हैं। अतः नीबू, नारंगी, अंगूर, अनार, नाशपाती, , शफ्तालू, आदि रसदार फल एवं विविध प्रकार के मेवे के वृक्ष जैसे , अंजीर, खूबानी, बादाम, पिश्ता, अखरोट आदि के वृक्ष मिलते हैं।

4. शीतोष्ण कटिबंघीय वाले वन Temperate Broad Leaves Deciduous Forests- विश्व में इन वनों का विस्तार लगभग 47 करोड़ हेक्टेअर पर है। इनका विस्तार मुख्यतः एशिया, उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप में है। ये साधारणतः शीत शीतोष्ण या पश्चिमी यूरोपीय एवं चीन तुल्य व सैण्ट लारेन्स तुल्य जलवायु वाले प्रदेशों में पाए जाते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनका विस्तार 40° और 60° अक्षांशों के बीच में है एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में 35° से 50° के मध्य पहाड़ी भागों पर मिलता है। पश्चिमी यूरोप में अधिकांश मूल वन काटे जा चुके हैं।

ये वन चीन, जापान, कोरिया, मंचूरिया, पश्चिमोत्तर यूरोप, पश्चिमी कनाडा, पूर्वी संयुक्त राज्य और कनाडा के सेण्ट लरेंस प्रदेश में विशेष रूप से पाए जाते हैं।

इन वनों के मुख्य वृक्ष ओके, मैपल, बीच, एल्म, हेमलाक, अखरोट, चेस्टनट, पोपलर, ऐश, चेरी, हिकौरी, वर्च, आदि हैं। ये वृक्ष मकान तथा फर्नीचर बनाने की सुन्दर और टिकाऊ लकड़ियाँ प्रदान करते हैं। ये वन कृषि भूमि प्राप्त करने हेतु नष्ट किए जा रहे हैं।

5. शीत कटिबन्धीय शंकुल सदापर्णी वन Cold Coniferous Evergreen Forests

ये वन लगभग 106 करोड़ हेक्टेअर क्षेत्र पर फैले हैं। इनमे से 39.5% उत्तरी अमरीका में, 33.6% एशिया में, 21.9% यूरोप में, 4.1% दक्षिण अमरीका में, और 3% अफ्रीका में हैं। इन वनों का विस्तार उत्तरी अमरीका और यूरेशिया के उत्तरी भागों में पाया जाता है। साइबेरिया (रूस) में इन्हें (टैगा) कहते हैं।

इन वनों की लकड़ी बहुत ही मुलायम और उपयोगी होती है, जिससे वह कागज बनाने, दियासलाई की सीकें, चौखट, पेटियाँ, आदि बनाने के लिए अधिक उपयुक्त होती है। इन वनों के मुख्य वृक्ष चीड़ (पीला चीड़, श्वेत चीड़, स्कॉट चीड़), स्प्रूस (नार्वे स्प्रूस, लाल स्प्रूस), हैमलॉक, लार्च, सीडर, फर, (डगलस फर, बालसम फर), साइप्रस, आदि हैं। ये वृक्ष सदा हरे-भरे रहते हैं। इनकी ऊपरी पर्त मोटी और चिकनी होती है जिससे वे हिम, पाला और कठोर शीत से अपनी रक्षा कर सकें। शीत जलवायु के कारण लकड़ी बहुत कम नष्ट हो पाती है।


घास के मैदान  Grasslands

भूमध्येरखीय और मानसूनी प्रदेशों से उत्तर या दक्षिण की ओर जाने पर वर्षा कम होती जाती है, अतः वन भी कम पाए जाते हैं। नदियों की घाटियों को छोड़कर अन्य किसी भी स्थान पर जल की मात्रा वृक्षों को पनपने के लिए पर्याप्त नहीं होती है। इन प्रदेशों में वर्षा विशेषकर ग्रीष्म ऋतु में होती है तथा इसकी मात्रा अपर्याप्त होने से वृक्ष ऊँचे नहीं हो पाते। जो वर्षा होती है वह इतनी नहीं होती कि दूर तक मिट्टी सीख जाए। इसलिए मिट्टी का थोड़ा सा भाग ही तर हो पाता है जिसका लाभ केवल छिछली जड़ों वाली घास ही उठा सकती है। अत: इन भागों में घास के विस्तृत मैदान पाए जाते हैं। ये मैदान दो प्रकार के होते हैं :

उष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान Tropical Grasslands Or Savannah

उत्तरी गोलार्द्ध में 30° उत्तरी अक्षांश और दक्षिणी गोलार्द्ध में 30° दक्षिणी अक्षांश तक पाए जाते हैं। इनका सबसे अधिक विस्तार सूडान, वेनेजुएला, जाम्बेजी नदी के बेसिन और ब्राजील के दक्षिणी भाग में पाया जाता है। छोटी पत्तियों या कॉटे वाले वृक्ष पाए जाते हैं जैसे- खेजड़ा, इमली, ताड़, बबूल, छुई-मुई। वर्षा ऋतु में घास हरी रहती है, किन्तु शरद शीत तथा बसन्त ऋतु में यह सूख जाती है। केवल नदियों के तटों पर सदैव पर्याप्त जल मिलने के कारण वृक्ष अधिक संख्या में मिलते हैं। नदियों के तटों से दूर होते ही पुनः सूखी घास के मैदान जाते हैं। अफ्रीका, एशिया तथा आस्ट्रेलिया में घास के इन मैदानों को, जहाँ घास की पत्तियाँ कड़ी, लम्बी और चौड़ी होती हैं सवाना, नदी के उत्तर में ओरीनीको नदी संग्रहण क्षेत्र में लानोस, ब्राजील में केम्पोस और अफ्रीका में पार्कलेण्ड कहते हैं।

शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान Temperate Grasslands or Steppe- यह मैदान उन क्षेत्रों में, जो समुद्र से दूर हैं और जहाँ वर्षा अधिक नहीं होती, पाए जाते हैं। शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदानों की घास उष्ण प्रदेशों की अपेक्षा अधिक छोटी, कोमल और कम सघन किन्तु पौष्टिक और वृक्ष विहीन होती है। मध्य एशिया तथा कालासागर तटवर्ती यूरोप में इन घास के मैदानों को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। यहाँ इन्हें स्टेपी, उतरी अमरीका में प्रेयरी, दक्षिण अमरीका में पेम्पास, अस्ट्रेलिया में डाउनलैण्डस तथादक्षिणी अफ्रीका में बेल्ड कहते हैं।

इन मैदानों में ग्रीष्मकाल अत्यन्त उष्ण तथा शुष्क तथा शीतकाल हिमाच्छादित तथा बसन्त वर्षाकाल होता है। वसन्त ऋतु में बर्फ पिघलने और थोड़ी बहुत वर्षा हो जाने के कारण भूमि नम हो जाती है और वह हरी घास और अनेक प्रकार के फूलों से परिपूर्ण हो जाती है। ग्रीष्मकाल के पहले भाग तक जब तक वर्षा होती रहती है यह घास हरी रहती है, किन्तु ग्रीष्मकाल में तापमान ऊँचा हो जाने से यह झुलस जाती है और सारा क्षेत्र भूरा दिखायी देने लगता है। शीतकाल में घास के मैदान प्रायः बर्फ से ढके रहते हैं। कुछ वृक्ष केवल नदियों के किनारे ही दृष्टिगोचर होते हैं। इन घास के मैदानों में तेज दौड़ने वाले तथा घास खाने वाले पशु मिलते हैं घोड़े, खच्चर, नील गाय, हिरन, एमू, शुतुरमुर्ग एवं उन पर निर्भर हिंसक पशु, आदि। ग्रीष्मकाल में इन मैदानों में गेहूं की खेती अधिक की है और पशु चराए जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका व् कनाडा के प्रेयरी के मैदानों में निर्यात हेतु सबसे अधिक गेंहू पैदा किया जाता है एवं इसे विश्व का खाद्यान्न भण्डार कहा जाता है।

विश्व के मरुस्थल Deserts Of The World

विश्व के सम्पूर्ण धरातल के लगभग 16% भाग पर मरुस्थल और 15.65% भाग पर अर्द्ध मरुस्थलीय क्षेत्र विस्तृत हैं। इस प्रकार कुल क्षेत्र के 31.65% भाग पर मरुस्थल और अर्द्धमरुस्थलीय अवस्थाएँ पायी जाती हैं। इसमें वर्षा की मात्रा 10 से 50 सेण्टीमीटर के बीच होती है, अतः यहाँ पर जल के अभाव में घास भी नहीं पाती। इन भागों में दिन में प्रचण्ड गर्मी पड़ती है और रात्रि में ठिठुराने वाली सर्दी तथा वर्षा का वर्ष भर नितान्त अभाव पाया जाता है। ऐसे मरुस्थलीय क्षेत्र कर्क और मकर रेखाओं के पश्चिमवर्ती स्थल खण्डों में पाए जाते हैं। विश्व के मरुस्थल निम्नांकित हैं-

  1. सहारा उत्तरी अफ्रीका
  2. आस्ट्रेलिया का महान् मरुस्थल
  3. अरव का मरुस्थल (पश्चिम एशिया)
  4. रूस में तुर्किस्तान का मरुस्थल उत्तरी अमेरिका में एरिजोना का मरुस्थल
  5. मध्य एशिया में गोबी का मरुस्थल
  6. अर्जेण्टाइना में पैटागोनिया का मरुस्थल
  7. भारत-पाकिस्तान का थार का मरुस्थल
  8. दक्षिणी अफ्रीका में कालाहारी मरुस्थल
  9. पश्चिमी चीन का तकला-मकान का मरुस्थल
  10. ईरान का मरुस्थल
  11. चिली और पेरू का अटाकामा मरुस्थल

मानूसनी प्रदेशों में पश्चिम की ओर जाने पर वर्षा की न्यूनता से वनस्पति कंटीली झाड़ियों अथवा छोटी-छोटी घास का रूप ले लेती है। ऐसे क्षेत्र भी उष्ण मरुस्थल ही कहलाते हैं।

इसी प्रकार उष्ण घास के मैदानों से ध्रुवों की ओर बढ़ने पर घास कम होती जाती है और अन्त में ये मैदान भी मरुस्थल का रूप ले लेते हैं। अत्यन्त शीत तथा बर्फ पड़ने और ग्रीष्म ऋतु का सामान्यतः अभाव होने से ये शीत मरुस्थल कहलाते हैं।

उष्ण मरुस्थल की वनस्पति Vegetations of Hot Deserts

मरुस्थलों में जीवित रहने वाले वृक्षों द्वारा जल संचित करने एवं अपने को जीवित बनाए रखने का ढंग निराला होता है। इसमें से कुछ की जड़ें बहुत ही लम्वी और मोटी होती हैं, जिससे मिट्टी के भीतर जल भी चूस सकें और उसे अपने तने में संचित कर सकें। कुछ पौधों की पतियाँ तथा तने बहुत मोटे और इस प्रकार प्राकृतिक रूप सर गांठ वाले व सुरक्षित रहते हैं, की उनमे से जल बाहर णा जा सके। कुछ वृक्षों की पतियों पर मोमी आवरण रहता है जो वाष्पीकरण की क्रिया को रोकता है। कुछ के तनों पर नुकीले काँटे होते हैं जो उन्हें पशुओं द्वारा खाये जाने से बचाते हैं। कुछ पर गूदा होता है।

उष्ण मरुस्थलों की वनस्पति झाड़ियाँ या गुच्छेदार घास होती है। यह मुख्यतः चार भागों में बाँटी जा सकती है-

शुष्क घास के मैदान- उन भू-भागों में पाए जाते हैं जहाँ उष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान समाप्त होते हैं और मरुस्थल प्रारम्भ होते हैं। यहाँ पर गुच्छेदार बिखरी (सेवण) घास उगती है।

कंटीली झाड़ियाँ- उन भागों में मिलती हैं जहाँ मरुस्थल समाप्त होकर भूमध्यसागरीय प्रदेश प्रारम्भ होते हैं।

काँटेदार वृक्ष- जैसे बबूल, कैर, वेर, , खेजड़ा, आदि मरुस्थल के मध्य भाग के इधर-उधर छिटके रहते हैं।

मरुद्यानों के उपजाऊ भाग- मरुस्थलों के आसपास के पर्वतों का जल पर्वतों की तलहटियों में समाकर नीचे-नीचे किसी कड़ी चट्टान तक पहुंचकर मरुस्थल के मध्य भाग में यत्र-तत्र प्राकृतिक स्रोतों के रूप में निकल जाता है। वन मरुद्यानों के चारों ओर अंगूर, जैतून और ताड़, आदि के वृक्ष अधिक पैदा होते हैं। विश्व में सबसे बड़े मरुद्यान अफ्रीका में नील नदी की घाटी व दजला फरात की घाटी है।

शीत मरुस्थलीय वनस्पति Vegetations of Cold Deserts

यह यूरेशिया और कनाडा के धुर उत्तरी भागों में पायी जाती है। यहाँ कठोर सर्दी और छोटी ग्रीष्म ऋतु के कारण वनस्पति का प्रायः अभाव सा रहता है। शीत ऋतु में भूमि बर्फ से आच्छादित रहती है, अतः पेड़-पौधे नहीं उगते, किन्तु ग्रीष्मकाल में बर्फ पिघल जाने से कई प्रकार की शीघ्रतापूर्वक बढ़ने वाली छोटी-छोटी घासें उग आती हैं जिनमें कई किस्म के रंग-बिरंगे फूल खिल जाते हैं। लेकिन घासों का भी अन्त हो जाता है। घास के अतिरिक्त एक प्रकार की काई (Lichen or Moss) भी वहाँ पायी जाती है तथा कुछ छोटी-छोटी झाड़ियाँ (पौधे) जैसे- क्रानबेरी, काउबेरी, हार्टलबेरी, बिल्ली, सेज, विलदैरी, ब्ल्यूबेरी, आदि पायी जाती हैं। इस क्षेत्र की वनस्पति का जीवन बहुत ही थोड़े समय का रहता है।

वनों का आर्थिक महत्व Economic Importance Of Forests

वनों से मुख्य रूप से दो प्रकार के उत्पाद (Produce) प्राप्त होते हैं-

मुख्य उत्पाद Major Produces

वनों का मुख्य उत्पादन लकड़ियाँ हैं। इन वनों से दो प्रकार की लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं-

मुलायम लकड़ी- जो शीतोष्ण कटिबन्ध के शंकुल वनों से प्राप्त होती है। इन लकड़ियों में सबसे मुख्य वृक्ष चीड़ का है जिससे बढ़िया किस्म की लकड़ी प्राप्त हो जाती है। व्यापारिक महत्व की अन्य मुलायम लकड़ियों के वृक्ष फर, लार्च, सीडर, स्प्रूस, हेमलॉक और रैडवुड हैं। मुलायम लकड़ियों के वृक्ष, मुख्यतः पोलैण्ड, नार्वे, स्वीडेन, फिनलैण्ड, आस्ट्रिया कनाडा, पूर्वी संयुक्त राज्य, पूर्व सोवियत संघ, साइबेरिया, क्यूवा, दक्षिणी चिली, न्यूजीलैण्ड और तस्मानिया में पाए जाते हैं। इनसे कागज की लुग्दी, दियासलाई की सलाइयाँ और चाय पैक करने के खोखे बनाए जाते हैं।

कठोर लकड़ियाँ- सुविधा की दृष्टि से दो भागों में विभाजित की जाती हैं

शीतोष्ण कटिबन्धीय कठोर लकड़ियाँ- जो शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों के पतझड़ वाले चौड़ी पत्ती के वृक्षों से प्राप्त होती है, जैसे- बीच, बर्च, मैपिल, पोपलर, बलूत, एल्म, एशचेस्टनट, यूकेलिप्ट्स, कॉरीगम, बालनट, आदि। इनका उपयोग मुख्यतः फर्नीचर बनाने में किया जाता है। इन लकड़ियों के वृक्ष मुख्यतः यूरोप में आल्पस, पिरेनीज, मध्यवर्ती रूस और साइबेरिया एशिया में चीन, मंचूरिया, कोरिया और जापान उत्तरी अमरीकी में अप्लेशियन पर्वत दक्षिणी अमरीका में पैटागोनिया और दक्षिणी चिली एवं आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड से प्राप्त होती है।

उष्ण कटिबन्धीय कठोर लकड़ियाँ- प्रायः विषुवत् रेखीय प्रदेशों में वृक्षों से प्राप्त होती है। यह दक्षिणी अमरीका में सेल्वाज, अफ्रीका के काँगो बेसिन और ऊपरी गिनी तट तथा इण्डोनेशिया से प्राप्त होती है। मुख्य वृक्ष एबोनी, महोगनी, लौह-काष्ठ, सागवान, रोजवुड आदि हैं। इनसे फर्नीचर बनाया जाता है।

विश्व के सम्पूर्ण वन क्षेत्र के 50%  भाग पर उष्णकटिबन्धीय व सदापर्णी, 35% पर शीतोष्ण कटिबन्धीय कोणधारी तथा 15% भाग पर पर्णपाती वन हैं शेष 4% भागों पर शुष्क व अर्द्ध शुष्कप्रदेशों के विकसित वन क्षेत्र हैं।

व्यापारिक दृष्टि से तो नुकीली पती वाले वन ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वनों से प्राप्त होने वाले कुल पदार्थों का 80% इन वनों से मिलता है। पतझड़ वाले वनों में केवल फर्नीचर बनाने के लिए उपयुक्त लकड़ियाँ मिलती हैं। ये वन कुल वनों से मिलने वाली लकड़ी का 18% उत्पन्न करते हैं और उष्ण कटिबन्ध के वन केवल 2% लकड़ी उत्पन्न करते हैं। विश्व में मुलायम लकड़ी की माँग सबसे अधिक रहती है, क्योंकि यह लकड़ी अपने हल्केपन, मजबूती, टिकाऊपन, मुड़ने, झुकने और सरलतापूर्वक काम में लायी जाने के उपयुक्त होती है। विश्व के कोमल व शीतोष्ण वनों की लकड़ी के प्रमुख उत्पादक देश- संयुक्त राज्य, रूस, यूक्रेन, नार्वे, स्वीडेन व कनाडा हैं। इसी भाँति उष्ण शीतोष्ण एवं मानसूनी लकड़ी के मुख्य उत्पादक देश भारत, थाइलैण्ड, म्यांमार, नेपाल, ब्राजील, मैक्सिको व दक्षिणी चीन हैं। विषुवत रेखीय कठोर लकड़ी के मुख्य उत्पादक देश ब्राजील, मध्य अमरीका, कैरेवियन देश, काँगो, जायरे एवं मध्य अफ्रीका, मलेशिया, इण्डोनेशिया व फिलीपीन हैं।

वनों के व्यापारिक महत्व का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व के समस्त व्यापार का 60% (मूल्य की दृष्टि में) वनों की उपज होती है। यहाँ की सबसे मुख्य उपज लकड़ी है। अन्य उपजें, , गोंद, राल, कागज की व रासायनिक लुग्दी, आदि हैं।

इंधन और औद्योगिक लकड़ियों का उपयोग एवं उत्पादन

विकासशील देशों में वनों का विनाश ईधन व इमारती लकड़ी प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है। नाइजीरिया और तंजानिया में 95% लकड़ी ईंधन के रूप में काम में लायी जाती है। ब्राजील में यह 86%, इंडोनेशिया में 80%, भारत में 91%, स्पेन तथा टर्की में 60% है। भारत में भद्रावती (कर्नाटक) के इस्पात के कारखाने में लकड़ी ईंधन के रूप में प्रयोग की जाती है।

वनों से औद्योगिक उपयोग के लिए अनेक उप उत्पादन लुग्दी, प्लाई, शहतीर, इमारती लकड़ी, बाँस, बल्लियाँ, आदि प्राप्त किए जाते हैं। कोणधारी वनों का सबसे अधिक उपयोग व विदोहन होता रहा है।

विश्व में लकड़ियों के मुख्य निर्यातक देशों में कनाडा, रूस, नार्वे, ब्राजील, स्वीडेन, फिनलैण्ड, म्यांमार और थाईलैण्ड हैं। मुख्य आयातक देश ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमरीका, नीदरलैण्ड, बेल्जियम और जर्मनी हैं।

गौण उत्पाद Secondary Produces

वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेकानेक वस्तुएँ भी एकत्रित की जाती हैं जिनमें मुख्यतः वृक्षों की जड़ें एवं कन्द व मूल वृक्षों की छालें, पत्तियाँ (औषधियाँ, रेशे, छप्पर छाने के लिए फूस और कपड़ा बनाने में होता है), सुपारियाँ (भोजन और तेल के लिए) रेशे (जैसे कपोक आदि), वृक्षों के तने का दूध (Lalex) (रबड़, बलाटा, मोम, राल, चिकल, आदि के लिए) तथा वनस्पति मोम जो अनेक प्रकार के वृक्षों के तनों तथा उन पर आश्रित कीड़े-मकोड़ों से प्राप्त होता है। इनसे प्राप्त होने वाली मुख्य वस्तुएँ (उप-उत्पाद) निम्नलिखित हैं-

  1. सिनकोना जिससे कि कुनैन बनायीं जाती है।
  2. चमड़ा कमाने व रंगने की छालें व फल
  3. अनेक प्रकार की सुपारियाँ (नट) व फल जो कि खाने, रसायन उद्योग व दवा में काम में आते हैं
  4. रबड़ मुख्यतः बलोटा व हीविया वृक्षों के तनें के रस से प्राप्त होता है।
  5. चिकल या चूसने का गोंद (चिकल गम) चिकल रोज के रस से प्राप्त होता है।
  6.  अन्य पदार्थों में खजूर, ताड़, नारियल, बाँस, कई प्रकार के रेशे, तारपीन, कोहन नट, पतियाँ, औषधियाँ, कार्क, लाख, गट्टापाचा, गन्दा बिरोजा मुख्य हैं। कन्द मूल, छाल, पते, फूल व फल का अनेक प्रकार की अचूक औषधियों के बनाने में भी कई देशों में उपयोग होता रहा है।

लकड़ी काटने का उद्योग Lumbering Industry

लकड़ी काटने का उद्योग मुख्यत: संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा, नार्वे, स्वीडेन, फिनलैण्ड, रूस, साइबेरिया तथा अन्य शीतोष्ण कटिबन्धीय देशों में किया जाता है।

संयुक्त राज्य अमरीका (U.S.A.)

संयुक्त राज्य में लगभग 33% क्षेत्र में वन हैं। यह देश के उत्पादन की दो तिहाई व्यापारिक लकड़ियाँ प्रदान करते हैं। यहाँ अधिकतर मुलायम लकड़ियों के वन पाए जाते हैं, जैसे पाइन, डगलस, फर, पीला पाइन, स्प्रूस, आदि। इनसे लुग्दी, कागज और गत्ता, बिरोजा, तारपीन का तेल, अखबारी कागज बनाए जाते हैं। लकड़ी काटने और चीरने का उद्योग निम्न सात क्षेत्रों में किया जाता है।

उत्तर-पूर्वी क्षेत्र- न्यू इंग्लैण्ड राज्य के उत्तरी व पूर्वी भाग में फैला है। वर्च, हैमलॉक, , मैपिल और बीच, आदि वृक्ष बहुतायत से पाए जाते हैं। अगस्ता लकड़ी चीरने का मुख्य केन्द्र है।

महान झीलों का क्षेत्र- बड़ी झीलों के निकटवर्ती भागों में मिशीगन, विस्कॉसिन और मिनिसोटा राज्यों में फैला है। झीलों और नदियों का सस्ता जल परिवहन तथा विद्युत शक्ति के कारण लकड़ी चीरने का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है। श्वेत पाइन, हेमलॉक, बीच व मैपिल यहाँ की मुख्य लकड़ी है।

अप्लेशियन क्षेत्र- पैन्सिलवानिया के पश्चिमी भाग, वर्जीनिया, उत्तरी कैरोलिना और टेनेसी राज्यों में फैला है। श्वेत पाइन, स्प्रूस और पीला पाइन यहाँ अधिक होता है।

मध्यवर्ती क्षेत्र- अटलाण्टिक तट पर न्यूयार्क से उत्तरी कैरोलिना तक तथा मध्य में उत्तरी कैरोलिना से पश्चिम की ओर पठार तक फैला है। इस क्षेत्र में , एशमैपिल, बीच, एल्म, बालनट, चेस्टनट, पोपलर, वासवुड और हिकारी के वृक्ष अधिकता से मिलते हैं। यह क्षेत्र इमारती लकड़ी चीरने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है।

दक्षिणी क्षेत्र- अटलाण्टिक तथा खाड़ी के तट वाले राज्यों में फैला है। लम्बी और छोटी पतियों वाले पाइन, स्लैप पाइन, लावलौली पाइन और पीली पाइन के वृक्ष मिलते हैं। यहाँ की लकड़ी से प्लाइवुड, कागज, लुग्दी और दियासलाई बनायी जाती है।

रॉकी पर्वतीय क्षेत्र- कनाडा की दक्षिणी सीमा से मैक्सिको की उत्तरी सीमा तक फैला है। इस क्षेत्र में स्प्रूस, पीला पाइन, फर, सीडर, लार्च, एस्पेन, एल्डर, आदि वृक्ष मिलते हैं।

पश्चिमी क्षेत्र- यहाँ प्रशान्त महासागर के तट से पूर्व में वाशिंगटन कास्केड रेंज, सियरा नेवादा और कोस्ट रेंज के ढालों और नदियों की घाटियों में वन पाए जाते हैं। डगलस फर, सीडर, हेमलॉक, मैपिल, एस्पेन, हिकोरी, ओक, रैडवुड, चैपरेल, आदि के वृक्ष मिलते हैं। यहाँ लकड़ी चीरने का उद्यम विशेष रूप से विकसित है।

कनाडा Canada

कनाडा में 4,176 लाख हेक्टेअर क्षेत्र में वन पाए जाते हैं, इसमें से 50% वन मानव की पहुंच में हैं। वन पश्चिम से पूर्व की ओर 960 किलोमीटर से 1,600 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में समस्त देश के 35% भाग में फैले हैं। इन वनों में कई प्रकार की बहुमूल्य लकड़ियाँ (स्प्रूस, बालसम, पाइन, फर, हेमलॉक, सीडर और पोपलर, आदि) पायी जाती हैं। इनके अतिरिक्त लाल पाइन, जैक पाइन, श्वेत पाइन, बर्च मैपिल, एल्म और वासवुड भी बहुत मिलती हैं। इन लकड़ियों के सहारे कनाडा में कई लकड़ी चीरने, यान्त्रिक व रासायनिक लुग्दी बनाने तथा सैलूलोज बनाने, फर्नीचर बनाने, वस्त्रों के धागे और प्लास्टिक बनाने के कई कारखाने चलाए जाते हैं। रूस के पश्चात् मुलायम लकड़ियों के सबसे बड़े क्षेत्र के कारण ही कनाडा को विश्व का मुलायम लकड़ियों का भण्डार (Storehouse of Soft woods) कहा गया है। यहाँ के अधिकांश वनों का विदोहन निर्यात हेतु किया जाता है। यहाँ क्रमबद्ध रूप से काटे गये वन क्षेत्रों में पुनः वन विकसित किए जाते रहे हैं।

यूरोपीय देश European Countries

यूरोप के लगभग 30% भाग पर वन हैं। यहाँ कोमल लकड़ी के वनों का विस्तार अधिक है। ये 50° उत्तर से 70° उत्तरी अक्षांशों के बीच नार्वे, स्वीडेन, फिनलैण्ड होते हुए उत्तरी रूस तक फैले हैं। इन वनों में पाइन, स्प्रस, फर, लार्च, सिल्वर व फर, आद्रि वृक्षों की अधिकता है।

नार्वे व स्वीडेन में क्रमश: 28.9 .% व 65.9% भाग पर ये वन पाए जाते हैं। उत्तरी और दक्षिणी तट को छोड़कर शेष भाग में पर्वतीय ढालों और नदियों की घाटियों में वन फैले हैं। यहाँ के वनों में 80 % में कोणधारी वन तथा शेष क्षेत्र में चौड़ी पती वाले वन पाए जाते हैं जिन पर आधारित फर्नीचर, लुग्दी, कागज, आदि उद्योग स्थापित किए गए हैं।

फिनलैण्ड के 75.8% भाग पर वन पाए जाते हैं। इन वनों में स्प्रूस, पाइन और फर के वृक्ष मिलते हैं। के कुल निर्यात में से 88% निर्यात सम्बन्धी उद्योग की वस्तुओं का होता है, जिसमें चिरी हुई लकड़ियाँ, प्लाईवुड, अखबारी कागज आदि का होता है।

उपर्युक्त देशों में एवं रूस में प्रतिवर्ष जितने क्षेत्र से वन काटे जाते हैं, उससे 12.5% क्षेत्र में वन लगाकर उनका पूरा-पूरा संरक्षण किया जाता है।

रूस Russia

रूस में विश्व के सबसे अधिक शंकुल वन पाए जाते हैं। इनमें स्प्रूस, फर, लार्च, वृक्ष पाए जाते हैं। इनकी लकड़ी कागज, लुग्दी और सैलूलोज बनाने के खूब काम आती है। मध्यवर्ती भाग में मिश्रित वृक्ष हैं और दक्षिण में केवल पतझड़ वाले वृक्ष ही पाए जाते हैं। एल्डर, विली, बर्च, एंस्पन, लिण्डन, आदि मुख्य वृक्ष हैं। उतर के शंकुल वन वाल्टिक समुद्र से सुदूरपूर्व में ओखोट्स्क तक फैले हुए हैं। वैसे तो सारे रूस में लकड़ी काटने का कार्य किया जाता है, परन्तु पश्चिम में जहाँ बड़े-बड़े नगर हैं यह विशेष रूप से केन्द्रित हैं। उत्तर में डाइना नदी के समीप यह उद्योग तेजी से बढ़ रहा है।

साइबेरिया के वन क्षेत्र यूराल से लेकर प्रशान्त महासागर तक तथा धुव वृत्त के उत्तर तक फैले हुए हैं। विश्व की लकड़ियों के भण्डार का 21% साइबेरिया से प्राप्त होता है। साइबेरिया के वन टैगा (Taiga) नाम विख्यात हैं। यहाँ पाइन, स्प्रूस और सीडर के वृक्ष मुख्य हैं। पतझड़ वृक्षों के प्रतिनिधि मुख्यतः बर्च तथा एस्पेन हैं। लकड़ी पर आधारित उद्योग मास्को, ओमस्क, पर्म, इकुंटस्क और पाकुटस्क, आदि नगरों में स्थापित किए गए हैं।

साइबेरिया के वन चार क्षेत्रों में सघन हैं i) ओब नदी घाटी क्षेत्र, ii) यनीसी नदी घाटी क्षेत्र, iii) लीना नदी घाटी क्षेत्र, iv) कोलिमा क्षेत्र जिनसे पर्याप्त मात्रा में लकड़ी प्राप्त की जाती है।

अब मध्य दक्षिणी यूक्रेन देश में भी शीतोष्ण वनों का तेजी से वैज्ञानिक रूप से विदोहन किया जाने लगा है।

एशियाई देश Asian Countries

एशिया में अधिकतर वन जापान, चीन, कोरिया, म्यांमार, इण्डोनेशिया, थाइलैण्ड, भारत एवं विषुवतरेखीय प्रदेश में मिलते हैं। जापान दोनों कोरिया के लगभग 64% भाग पर वन हैं। इनका विस्तार उत्तरी और होशू के भीतरी पहाड़ी भागों में पाया जाता है। इन वनों में फर, स्प्रूस, हिकोरी, सूगी, आदि नुकीली पती वाले वृक्ष और मैपिल, बूना, पोपलर, , आदि चौड़ी पती वाले वृक्ष मिलते हैं। होशू के दक्षिणी भागों में कपूर, बाँस, लैकर तथा ताड़ के वृक्ष भी मिलते हैं। जापान में लकड़ी चीरने और काटने का व्यवसाय काफी उन्नत है। चीन में केवल 17.5%  भाग पर वन छाए हैं। जनसंख्या में वृद्धि होने के साथ ही यहाँ अधिकांश वनों का अविवेकपूर्ण विनाश किया गया। अब ये अधिकतर पश्चिमी और दक्षिणी भागों में ही मिलते हैं। इन वनों में फर, स्प्रूस, हेमलॉक, , चेस्टनट, आदि वृक्ष पाए जाते हैं। 1970 के पश्चात् तेजी से दक्षिणी, पूर्वी एवं आन्तरिक भागों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण द्वारा नवीन क्षेत्रों में वनों का विस्तार किया गया है। म्यांमार (वर्मा) में अराकान योमा एवं इरावदी नदी के बेसिन में विश्वविख्यात सागवान के वन पाए जाते हैं। भारत में 20.64% भाग पर वन पाए जाते हैं। इन पर आधारित अनेक उद्योग कार्यरत हैं।

अन्य देश

दक्षिणी अमरीका के वनों में दक्षिणी ब्राजील, अमेजन बेसिन उत्तर-पूर्वी अर्जेण्टाइना और पराग्वे में उत्तम प्रकार की चीड़ के वृक्ष मिलते हैं। ये 30 मीटर ऊँचे और 2 मीटर मोटे तने वाले होते हैं। इनको वर्ष भर काटा जाता है, किन्तु परिवहन के साधनों का अभाव इनके विदोहन में बाधा डालता है। यूरुग्वे में केवल 7.4% और अर्जेण्टाइना में 12.7% भाग पर वन मिलते हैं। चिली और पश्चिमी पैटागोनिया में 35° दक्षिणी अक्षांश तक शीतोष्ण कटिबन्धीय वन मिलते हैं, किन्तु अधिक वर्षा और असमान धरातल के कारण लकड़ी काटने में कठिनाई पड़ती है। यहाँ के मुख्य वृक्ष बीच, सीडर, पाइन, और एलरसी हैं।

आस्ट्रेलिया में केवल 4.9% भाग पर वन पाए जाते हैं। इसमें से आधे शीतोष्ण कटिबन्ध में हैं। यहाँ के मुख्य वृक्ष हैं, कारिगम तथा यूकेलिप्टस जो 180 से 300 फीट ऊँचा होता है। सबसे अधिक वृक्ष दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया और तस्मानिया में मिलते हैं।

न्यूजीलैंड में 30% भाग वनों से आच्छादित है। यहाँ भी कारीगम के वृक्ष अद्किकता से मिलते हैं। अन्य वृक्ष पाइन, टोतोरा , तवा और बीच के हैं। यहाँ कटिंगा कंटीली को साफ कर , मेपल, बर्च व बीच के वन क्षेत्र विकसित किए गये हैं।

इस प्रकार संक्षेप में लकड़ी उद्योग विश्व के निम्नलिखित क्षेत्रों में विस्तृत है-

  1. मानसूनी प्रदेशों के ग्रीष्मकालीन पतझड़ वाले वनों में, जहाँ सगवान, , साल, आदि के सुन्दर, टिकाऊ और कठोर वृक्ष मिलते हैं।
  2. साधारण शीतप्रधान समशीतोष्ण वनों में, जहाँ यूकेलिप्टस, मैग्नोलिया, , मेपल, बर्च, हेमलॉक, आदि कठोर वृक्ष मिलते हैं।
  3. साधारण शीत प्रधान समशीतोष्ण प्रदेशों में जहाँ सुन्दर और टिकाऊ मैपिल, वर्च, बीच, बलूत, पोपलर, आदि वृक्षों की अधिकता होती है।
  4. शंकुल वनों में, जहाँ कागज को लुग्दी, कागज, दियासलाई की सलाइयाँ, तारपीन तथा अन्य द्रव्य तेल, आदि के उपयुक्त चीड़, देवदार, स्प्रूस, फर, आदि के मुलायम लकड़ी वाले वृक्ष मिलते हैं।
  5. भूमध्यरेखीय वनों में जहाँ वनों की सघनता कम है और जहाँ नदियाँ उपलब्ध हैं, वहाँ महोगनी, इबोनी, रोजवुड, हाईवुड, रबड़, आदि की मजबूत और टिकाऊ लकड़ियों के वृक्ष मिलते हैं।

वनों का हास और उनका संरक्षण Deforestation And Conservation of Forests

विश्व में कुल स्थलमण्डल में से ध्रुवीय व बफीले प्रदेशों को छोड़कर शेष भाग में से 40% भाग भौतिक दृष्टि से वनों के अनुकूल है। 25% भाग पर कृषि की जाती है और शेष भाग पहाड़ी है अथवा नगर, कस्वे, सड़क, मरुस्थल घास तथा झाड़ियों से युक्त है।

आरम्भ में भूतल के 40% भाग पर वन फैले थे, किन्तु कृषि के विस्तार एवं मानव बसाव, विकसित औद्योगीकरण, आदि के कारण अब लगभग 15% भाग पर ही वन शेष रह गए हैं। औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग 50% वन क्षेत्रों का उपयोग किया जा रहा है, जबकि 50% क्षेत्र अगम्य क्षेत्रों में होने अथवा अनुपयुक्त लकड़ियों के कारण उपयोग में नहीं आ रहा है। भूतल से पिछले एक सौ वर्षों में वनों को अधिकांश देशों में निर्दयतापूर्वक काटा जा रहा है। उनके संरक्षण पर 1965 से पूर्व अपवादस्वरूप ही ध्यान दिया गया। इसी कारण विषुवतरेखीय, मानसूनी एवं उष्ण शीतोष्ण प्रदेशों की वन सम्पदा वर्तमान में दयनीय स्थिति में पहुँच गयी है। यह एक विश्वव्यापी विशेष चिन्ता का भी विषय है अब पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ने से उजड़े वन क्षेत्रों का अधिकांश देशों में तेजी से विकास किया जा रहा है।

वन विनाश के कारण Causes of  Deforestation

वनों के विनाश के निम्न कारण उत्तरदायी हैं-

  1. अत्यन्त उष्ण आद्र और समशीतोष्ण प्रदेशों में जलवायु सम्बन्धी कारणों से वृक्षों में रोग लग जाते हैं जो घीरेघीरे वृक्षों को क्षीण कर देते हैं और अन्ततः ये वृक्ष नष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, श्वेत पाइन परब्लिस्टररोग, चेस्टनट पर चेस्टनट ब्लाइट और एल्मवृक्ष पर डच एल्म रोग लग जाता है, जो इन वृक्षों को नष्ट कर देता है।
  2. वृक्षों पर आक्रमण करने वाले कारकों में कीटों और पतंगों का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहता है। इन कीटों के कारण लकड़ियों में छिद्र हो जाते हैं और वे व्यापार के काम की नहीं रहती। पाइन पर पाइन बीटल, कोन बीटल तथा मैगोट नामक कीड़े अधिक प्रभाव डालते हैं। सा फ्लाई, जित्सी, , ब्राउनटेल, आदि कीड़े वृक्षों की पतियों को खा जाते हैं और उनकी वृद्धि को रोक देते हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में दीमक वृक्षों को नष्ट कर देती है।
  3. वनों में पाए जाने वाले जंगली पशु भी उगते हुए पौधों अथवा प्रौढ़ वृक्षों की छालों, पतियों, जड़ों अथवा उनके तनों को खाकर नष्ट कर देते हैं। साही, चूहे, गिलहरी, लोमड़ी, बीवर, खरगोश, आदि जीव भूमि को खोद देते हैं और वृक्षों की जड़ों को खाकर वनों को ही नष्ट कर देते हैं।
  4. घास के मैदानों या खुले वनों में भेड़बकरियाँ अपने खुरों से घास और पेड़ों की जड़ें अन्तिम विन्दु तक चर जाती हैं अथवा उन्हें अपने खुरों से पूरी तरह रौद देती हैं जिससे ये नहीं पाते। अनियन्त्रित चराई भी वनों के विनाश का एक कारण है।
  5. तेज और तूफानों से ऊँचेऊँचे वृक्ष भी गिरकर नष्ट हो जाते हैं।
  6. वाढ़, सूखा, भूमिस्खलन, मिट्टी के अपरदन, ज्वालामुखी भूकम्प, आदि प्राकृतिक प्रकोपों से वनों का विनाश होता है।
  7. मेघ गर्जन के समय जब विजली गिरती है तब इससे कई भागों के वन नष्ट हो जाते हैं या जल जाते हैं।
  8. शुष्क मौसम में आपस में रगड़ खाते रहने से भी वनों में आग लग जाती है और प्रवाहित पवनों से यह आग घीरे-घीरे सारे वन प्रदेशों में फैलकर वृक्षों को नष्ट कर देती है। मानव की असावधानी से भी वनों में आग लग जाती है।
  9. जिन भू-भागों में स्थानान्तरित खेती (Shifting cultivation) की विधि अपनायी जाती है वहाँ मानव कृषि भूमि के लिए वनों को स्वयं नष्ट कर देता है और घीरे-घीरे सम्पूर्ण क्षेत्रों के वनों का विनाश हो जाता है।
  10. जनसंख्या की वृद्धि के फलस्वरूप न केवल नवीन बसाव व घरेलू ईधन वरन् औद्योगिक कार्यो (फर्नीचर, जहाज, रेलों के स्लीपर और डिब्बे, कागज, लुग्दी, आदि) प्राप्त करने के लिए भी वनों को काटा गया है यन्त्रीकरण में विकास होने से भी वनों का ह्यास तीव्रता से हुआ है।

वनों का संरक्षण एक अनिवार्यता

वन किसी देश की अमूल्य सम्पति हैं, जिन पर न केवल उसकी जलवायु प्रभावित होती है, वरन् जिनसे देश के उद्योगों के लिए कच्चा माल भी प्राप्त होता है। वनों से अप्रत्यक्ष लाभ प्रत्यक्ष लाभों से कई गुना अधिक है, अतः इनका संरक्षण करना अत्यन्त आवश्यक माना जाता है। तनों के संरक्षण हेतु सभी देशों में अधिनियम बनाकर वृक्षों का काटा जाना निषिद्ध घोषित किया जाता है। वृक्षों की रोगों और कीड़ों से रोकथाम करने के लिए उन पर कीटाणुनाशक औषधियों को छिड़का जाता है। सरकती हुई खेती पर निरन्तर नियन्त्रण करके वन सम्पदा की संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। रेलमार्गों, सड़कों, नहरों और तालाबों के किनारे समुद्री डेल्टाओं तथा पर्वतीय क्षेत्रों में नष्ट हुए वनों को वृक्षारोपण द्वारा फिर से पनपाया जाने लगा है। लकड़ी के लिए वनों की अविवेकपूर्ण कटाई पर भी कठोर नियंत्रण रखना आवश्यक है।

विश्व के प्रायः सभी देशों की सरकारें वृक्षों के संरक्षण की ओर पर्याप्त ध्यान देने लगी हैं केवल वयस्क वृक्षों (Mature Trees) को ही काटा जाता है। छोटे और मध्यम आयु वाले वृक्षों को पूरा होने तक बढ़ने दिया जाता है। विश्व के प्रायः सभी देशों में वर्ष के किसी नकिसी दिन अथवा सप्ताह में वृक्षारोपण उत्सव (van Mahotsava) मनाया जाता है। संयुक्त राज्य, फिलिपीन, कम्बोडिया में इस Arbor Day, जापान में Green week , इजराइल में New Year’s Day of trees, आइसलैंड में  Afforestation day तथा भारत में van Mahotsava कहते हैं।

वर्तमान में पर्यावरण, वन्य रखने में वनों की महत्ता को समझकर 1960 के पश्चात् से ही तेजी से संरक्षण का नारा बुलन्द किया जाने लगा है। यही कारण है कि चीन व भारत जैसे घने बसे देश, संयुक्त राज्य अमरीकां व कनाडा जैसे विशाल व विकसित देश, ब्राजील एवं अर्जेण्टाइना जैसे विरल बसाव के देश एवं साम्यवादी देश, आदि सभी वर्ग के देशों में वनों का संरक्षण एवं वनों के क्षेत्रफल में वृद्धि करना एक प्रकार से राष्ट्रीय नीति का परमावश्यक अंग बनता जा रहा है। आज तो यह भी स्वीकार किया गया है कि सभ्यता को बचाना है एवं उसे प्रदूषण के घातक प्रभाव से बचाना है तो वन सम्पदा को संरक्षित रखकर उसके क्षेत्र में न्यूनतम वृद्धि (मैदानों में 25% पर्वतीय, भागों में 45% से 50%)  करना एवं उसको बनाए रखना भी अनिवार्य है। इसी कारण सभी देशों में तेजी से राष्ट्रीय अभयारण्यों के क्षेत्र में एवं संख्या में वृद्धि की जा रही है। विश्व की सभ्यता के विकास को स्थायी बनाने रखने तथा प्राकृतिक सम्पति के विशाल भण्डार को सुरक्षित रखने हेतु वनों को काटे जाने से बचाना आवश्यक है। इस ओर कठोर कदम उठाए जाने चाहिए। भारत में वनों के संरक्षण हेतु अनेक उपाय किए गए हैं जिनमें सामाजिक संस्थाओं और सरकार के कुछ उपाय आन्दोलनों के रूप में चलाए गए हैं। इनमें चिपको आन्दोलन, रूख माइला आन्दोलन, एष्पिको आन्दोलन, मैत्री आन्दोलन, पश्चिमी घाट बचाओ आन्दोलन और तिलाड़ी का आन्दोलन विशेष उल्लेखनीय हैं।

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