Notice: Function _load_textdomain_just_in_time was called incorrectly. Translation loading for the colormag domain was triggered too early. This is usually an indicator for some code in the plugin or theme running too early. Translations should be loaded at the init action or later. Please see Debugging in WordPress for more information. (This message was added in version 6.7.0.) in /home/vivace/public_html/wp-includes/functions.php on line 6131
कुमारगुप्त प्रथम Kumaragupta I – Vivace Panorama

कुमारगुप्त प्रथम Kumaragupta I

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के पश्चात् कुमारगुप्त शासक बना। उसकी मुद्राओं पर उसके लिए कई प्रकार की उपाधियाँ मिलती हैं। जैसेश्री मेहन्द्र, अश्वमेध महेन्द्र, सिंह महेन्द्र, सिंह विक्रम व्याघ्रबल पराक्रम, महेन्द्र कुमार, सिंह विक्रम, महेन्द्रादित्य आदि। कुछ इतिहासकारों का मत है कि कुमारगुप्त प्रथम से पहले गोविन्दगुप्त नाम के एक गुप्त राजा ने तीन वर्षों के लिए शासन किया था। गोविन्दगुप्त के सन्दर्भ में दो साक्ष्य महत्त्वपूर्ण हैं। प्रथम वैशाली की मुहर जिसमें गोविन्दगुप्त को महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और महादेवी ध्रुवदेवी का पुत्र बताया गया है। इसमें महाराज की उपाधि का उल्लेख है। गोविन्दगुप्त वैशाली के तीर भुक्ति प्रदेश में सामन्त शासक था। दूसरा साक्ष्य मन्दसौर का अभिलेख है जिसमें गोविन्दगुप्त का उल्लेख है।

समकालीन अभिलेखों व साहित्यिक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि कुमारगुप्त के शासन-काल के दौरान पूर्ण शान्ति रही। शासन के अन्तिम चरण में हूण आक्रमण से गुप्त साम्राज्य की शान्ति अवश्य भंग हो गयी। उसे उत्तराधिकार में एक विस्तृत साम्राज्य की प्राप्ति हुई। कुमारगुप्त के काल को गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष की पराकाष्ठा का काल माना जा सकता है। कुमारगुप्तकालीन बहुत से अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनसे उसकी शासन की शान्ति का बोध होता है। भिलसड अभिलख, उदयगिरि अभिलख, करमदण्डा अभिलख, मंदसौर अभिलख आदि महत्त्वपूर्ण हैं। मंदसौर अप्रशस्ति की रचना वत्सभट्टि ने की थी। यह एक वैयक्तिक लेख है, जिसे कुमारगुप्त द्वितीय के शासनकाल में रचा गया। ऐतिहासिक दृष्टि से यह अभिलेख महत्त्वपूर्ण है। इसमें कुमारगुप्तकालीन कई विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख हुआ है। इसमें रेशम बनाने की श्रेणी का उल्लेख हुआ है, जिसने विलक्षण सूर्यमन्दिर का निर्माण करवाया। कालान्तर में इस मन्दिर के कुछ भाग नष्ट हो गये। फिर उसी पट्टवाय श्रेणी के सदस्यों ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार किया। मन्दिर का निर्माण मालव संवत् 493 (436 ई.) व जीर्णोद्धार मालव-संवत् 529 (472 ई.) में हुआ।

कुमारगुप्त एक विशाल साम्राज्य का अधिकारी था। आर्यमंजूश्रीमूलकल्प में उसकी प्रशंसा मिलती है। कुमारगुप्त की मुद्राएँ अहमदाबाद, वल्लभी, जूनागढ़, मौखी आदि से प्राप्त हुई हैं। पुराणों में भी उल्लेख आया है कि उसने साम्राज्य का विस्तार कलिंग और माहिषक को मिलाकर किया था। उसने पिता से प्राप्त सम्पूर्ण साम्राज्य जिसमें मध्य और पश्चिमी प्रान्त भी सम्मिलित थे, अपने अधिकार में बनाए रखा। उसके साम्राज्य में पुण्ड्रवर्धन (उत्तरी बंगाल), दशपुर (मालव), एरिकिण (उत्तरचेदि) के राज्य थे। मंदसौर के शिलालेख से ज्ञात होता है कि वह चारों समुद्रों की चंचल लहरों से घिरी हुई पृथ्वी पर शासन करता था। सुराष्ट्र से बंगाल तक उसका राज्य फैला था। कुमारगुप्तकालीन एलिचपुर और ब्रह्मपुरी से मिले सिक्कों से स्पष्ट है कि दक्षिण में भी गुप्तों का प्रभाव बना हुआ था। स्कन्दगुप्त के भितरी स्तम्भ लेख से ज्ञात होता है कि उसके अन्तिम दिनों में युद्ध के कारण गुप्त साम्राज्य की गति हिल गई थी।

गुप्त साम्राज्य पर पुष्यमित्र नामक किसी जाति ने आक्रमण किया। यह आक्रमण इतना भयंकर था कि इससे गुप्त साम्राज्य की शक्ति हिल गई और देश की शान्ति भग हो गई। कुमारगुप्त इस युद्ध में विजयी हुआ।

पुष्यमित्रों से भी अधिक विकट संकट इस समय गुप्त साम्राज्य को विदेशियों से था जो भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर संकट उत्पन्न कर रहे थे। इनका तादात्म्य हूणों से स्थापित किया जा सकता है। हूण मध्य एशिया की एक बर्बर घुमक्कड़ जाति थी जो कि चीन की दीवार के निर्माण के कारण चीनी साम्राज्य को छोड़कर पश्चिम की ओर बढ़े। हूण अफगानिस्तान की ओर से भारत की ओर बढ़े। उन्होंने भारत पर आक्रमण कर दिया था। इस समय कुमारगुप्त की वृद्धावस्था थी। उसने अपने पुत्र स्कन्दगुप्त को ही शत्रुओं का सामना करने के लिए भेजा। उसने हूणों के विरुद्ध भयंकर आक्रमण किया। स्कन्दगुप्त के पराक्रम के सामने हूण टिक नहीं सके और भगा दिये गये। गुप्तवंश की शक्ति व प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हो गयी। सम्भवत: इसी दौरान कुमारगुप्त की मृत्यु हो गयी क्योंकि रणभूमि से लौटकर स्कन्दगुप्त अपने पिता के दर्शन नहीं कर सका था।

कुमारगुप्त ने भी अश्वमेध यज्ञ का सम्पादन किया और महेन्द्रादित्य की उपाधि धारण की। उसकी अश्वमेध प्रकार की मुद्राओं से इसकी पुष्टि होती है। सिक्कों पर अन्य उपाधियाँ भी अंकित हैं जैसे श्री महेन्द्र, अजित-महेन्द्र, सिंह महेन्द्र, महेन्द्र कल्प, श्री महेन्द्र-सिंह, महेन्द्र-कर्म आदि। उसके सिक्कों पर कार्तिकेय देवता की मूर्ति अंकित है। कुमारगुप्त ने कार्तिकेय को अपना प्रमुख देवता बनाया जिसके नाम (कुमार) पर स्वयं उसका नाम रखा गया था। सम्भवत: वह कार्तिकेय का उपासक रहा होगा।

कुमारगुप्त ने अपने पूर्वजों की भाँति प्रजा को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। उसके शासनकाल में स्वामी महासेन (कार्तिकेय) के अलावा बुद्ध, शिवलिंग, सूर्य तथा विष्णु की पूजा होती थी। मन्दसौर में बुनकरों की एक श्रेणी ने सूर्य का एक मन्दिर बनवाया। उसके शासन-काल में बहुत से मन्दिरों व धर्मशालाओं का निर्माण करवाया गया था। कुमारगुप्त का दृष्टिकोण धर्मसहिष्णु था। उसके सिक्कों व अभिलेखों से उसके व्यक्तिगत धर्म की जानकारी मिलती है। वह वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसके लिए परमभागवत की उपाधि का प्रयोग मिलता है। मानकुवर लेख के अनुसार उसके राज्य में बौद्धजन बुद्धमित्र ने बुद्ध की प्रतिमा की स्थापना की थी। बौद्धों के प्रति भी उसका दृष्टिकोण सौहार्द था जिसकी पुष्टि ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से होती है। वह प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति बिना किसी भेदभाव के करता था। उसका प्रशासनिक अधिकारी पृथ्वीषेण शैवोपासक था।


कुमारगुप्त ने भी अपने पूर्वजों के समान बहुत प्रकार की सुवर्ण व रजत मुद्राएँ प्रचलित कीं। इनमें धनुर्धारी प्रकार, अश्वारोही प्रकार, छत्र प्रकार, वीणावादक प्रकार, अप्रतिघ प्रकार, राजदम्पत्ति प्रकार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पश्चिमी भारत में उसके चाँदी के सिक्के मिले हैं। सोने के सिक्कों की उसकी तौल 125 से 129 ग्रेन तक है। कुमारगुप्त के विभिन्न प्रकार के सिक्कों से उसके रूप, आकृति और गुणों का पर्याप्त परिचय मिलता हैं। वह सुडौल शरीर का स्वामी था। उसकी शिकार तथा घुड़सवारी में रुचि थी। वीणावादक सिक्कों से उसकी संगीत के प्रति रुचि स्पष्ट होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *