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राष्ट्रमंडल देश Commonwealth of Nation – Vivace Panorama

राष्ट्रमंडल देश Commonwealth of Nation

राष्ट्रमंडल उन प्रभुसत्ता-संपन्न देशों का एक स्वैच्छिक संघ है, जो कभी ब्रिटिश कानून और सरकार के अधीन थे।

मुख्यालय: लंदन (युनाइटेड किंगडम)।

सदस्यता: एंटीगुआ और बरबूदा, ऑस्ट्रेलिया, बहामास, बांग्लादेश, बारबाडोस, बेलिज, बोत्सवाना, बूनेई, ब्रिटेन, कैमरून, कनाडा, साइप्रस, डोमिनिका, फिजी द्वीप समूह, घाना, ग्रेनेडा, गुयाना, भारत, जमैका, केन्या, किरिबाती, लिसोथो, मलावी, मलेशिया, मालदीव, माल्टा, मॉरीशस, मोजाम्बीक, नीमीबिया, नौरू, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, पाकिस्तान, पापुआ न्यू गिनी, रवांडा, सेंट किट्स और नेविस, सेंट लूसिया, सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइन्स, सामोआ, सिशेल्स, सियरा लियोन,, सिंगापुर, सोलोमन द्वीप समूह, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, स्वाजीलैंड, तंजानिया, त्रिनिदाद और टोबैगो, तुवालु, युगांडा, वनुआतू और जाम्बिया।

यूनाइटेड किंगडम समुद्र पार (overseas) क्षेत्र: ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र (हिंद महासागर में); जिब्राल्टर (भूमध्यसागर में); बरमूदा, फॉकलैंड द्वीप समूह, दक्षिणी जॉर्जिया और दक्षिण सैंडविच द्वीप समूह; ब्रिटिश अंटार्कटिक क्षेत्र सेंट हेलेना और अधीन देश (अटलांटिक महासागर में); मोंसेरात, ब्रिटिश वर्जिन द्वीप समूह, कैमेन द्वीप समूह, टक्र्स और कैकोस द्वीप समूह, एंग्युला (कैरेबियन सागर में), तथा; पिटकैर्न द्वीप समूह (पश्चिम प्रशांत में)।

ऑस्ट्रेलियाइ विदेशी क्षेत्र: कोरल समुद्र द्वीप समूह, कोकोस (किलिंग) द्वीप समूह, क्रिसमस द्वीप समूह, हर्ड और मैकडोनाल्ड द्वीप समूह, आस्ट्रेलियाई अंटार्कटिक क्षेत्र, अश्मोर और कार्टियर द्वीप समूह।

न्यूजीलैंड विदेशी क्षेत्रः टोकेलाऊ द्वीप समूह और रोज़ डिपेंडेंसी।

न्यूजीलैंड सबद्ध राज्यः कूक द्वीप समूह और नीऊ।


कार्यकारी भाषा: अंग्रेजी।

राष्ट्रमंडल दिवस: प्रत्येक वर्ष के मार्च का दूसरा सोमवार।

उद्भव एवं विकास

बीसवीं सदी के शुरू होते ही राष्ट्रमंडल ने अपना रूप धारण करना प्रारंभ कर दिया। उस समय तक ग्रेट ब्रिटेन ने अपने कुछ उपनिवेशों में स्वशासन की ठोस शुरूआत कर दी थी, विशेषकर आस्ट्रेलिया, ब्रिटिश उत्तरी अमेरिका (कनाडा) तथा उस क्षेत्र में, जो बाद में दक्षिण अफ्रीका कहलाने लगा। 1910 और 1920 के दशकों में ये उपनिवेश वैदेशिक मामले में भी स्वतंत्रता की ओर बढ़ने लगे। इन समुद्र पार समुदायों की बढ़ती परिपक्वता और स्वतंत्रता, प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इनके आचरण और राष्ट्र संघ में इनकी व्यक्तिगत सदस्यता ने युनाइटेड किंगडम की तुलना में इनके पद (status) और संबंधों को पुनः परिभाषित करना आवश्यक कर दिया। 1926 के साम्राज्यवादी सम्मेलन ने बेलफॉर (Balfour) फार्मूला अपनाया, जिसे स्वतंत्र उपनिवेशों (जिसमें उस समय छह देश-आस्ट्रेलिया, कनाडा, आयरे (आयरलैंड), न्युफाउंडलैंड, न्युजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका संघ सम्मिलित थे) तथा ब्रिटेन के बीच संबंधों को, यद्यपि राजमुकुट (Crown) के प्रति सामूहिक निष्ठा से बंधे हुये, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य के अंदर स्वायत्त, पद में समान तथा आंतरिक या विदेशी मामलों में किसी भी रूप में एक-दूसरे के अधीनस्थ नहीं होने वाले तथा ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के स्वतंत्र समुदायों, के रूप में परिभाषित किया। वेस्टमिन्सटर संविधि (1931 का एक ब्रिटिश कानून) ने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल पर 1926 की घोषणा की कानूनी रूप दे दिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु आन्दोलन का तीव्र प्रसार हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अफ्रीका, एशिया और पश्चिमी गोलार्द्ध के अनेक देश ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गये। भारतीय उप-महाद्वीप के देश सबसे पहले स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले और राष्ट्रमंडल में सम्मिलित होने वाले देशों में थे। भारत और पाकिस्तान 1947 में राष्ट्रमंडल के सदस्य बने, जबकि श्रीलंका (तत्कालीन सिलोन) 1948 में। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि, राष्ट्रमंडल के मूल सदस्यों के विपरीत, नये सदस्य देशों की जनसंख्या मुख्य रूप से गैर-यूरोपीय थी। अनेक नये सदस्यों ने गणतंत्रीय संरचना अपनाने की भी इच्छा व्यक्त की तथा ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति अपनी निष्ठा को समाप्त घोषित कर दिया। इससे राष्ट्रमंडल को नये ढंग से परिभाषित करना आवश्यक हो गया। 1949 में एक नई पद्धति की शुरूआत हुई जब भारत को स्वयं की गणतंत्र घोषित करने तथा साथ ही राष्ट्रमंडल का पूर्ण सदस्य बने रहने की अनुमति दी गई। राजा को स्वतंत्र सदस्य देशों के स्वतंत्र संघ के प्रतीक के रूप में मान्यता प्रदान की गई। इस प्रकार एक साझा राजमुकुट के प्रति निष्ठा की अनिवार्यता की समाप्त घोषित कर दिया गया।

राष्ट्रमंडल के सात मूल सदस्यों में न्युफाउंडलैंड 1949 में कनाडा का एक प्रांत बन गया, जबकि आयरलैंड और दक्षिण अफ्रीका समूह के अन्य सदस्यों से असहमत होने के कारण राष्ट्रमंडल से अलग हो गये। दक्षिण अफ्रीका ने 1994 में पुनः इसकी सदस्यता ग्रहण की।

1998 में राष्ट्रमंडल में 33 गणतंत्र और 21 राजतंत्र सम्मिलित थे, जिसमें 16 ब्रिटिश सामाज्ञी के क्षेत्र (realms) में आते हैं अर्थात् इन्होंने ब्रिटिश साम्राज्ञी को अपने देश का नाम-मात्र का प्रधान (titular head of state) घोषित किया है। पांच सदस्य राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था वाले हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रमंडल में युनाइटेड किंगडम के 13 समुद्र पार क्षेत्र, छह आस्ट्रेलियाई बाह्य क्षेत्र, दो न्युजीलैंड आश्रित क्षेत्र तथा दो न्युजीलैंड-संबद्ध क्षेत्र सम्मिलित हैं। राष्ट्रमंडल की सदस्यता साम्राज्ञी को राज्य का सांकेतिक प्रधान स्वीकार करने के सिद्धांत और हरारे घोषणा, 1991 के कुछ निश्चित प्रमुख सिद्धांतों को अपनाने पर आधारित होती है। एक राष्ट्रमंडल देश का दूसरे राष्ट्रमंडल देश में प्रतिनिधित्व उच्चायुक्त के द्वारा होता है, जबकि गैर-राष्ट्रमंडल देश में उसका प्रतिनिधित्व राजदूत के द्वारा होता है।

कई ऐसे क्षेत्र, जो पहले ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र में आते थे, राष्ट्रमंडल में सम्मिलित नहीं हुये। इनमें मिस्र, इराक, म्यांमार, फिलीस्तीन, पार-जॉर्डन, सूडान, ब्रिटिश सोमालीलैंड, दक्षिणी कैमरून तथा अदन (अब यमन का हिस्सा) प्रमुख हैं। मोजाम्बीक 1995 में राष्ट्रमंडल का सदस्य बना। यह राष्ट्रमंडल का पहला ऐसा सदस्य बना, जो कभी भी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा नहीं रहा था। मोजाम्बीक पहले पुर्तगाल का एक उपनिवेश था। यह दक्षिणी अफ्रीका के राष्ट्रमंडल देशों से घिरा हुआ है। इसे रंगभेद के विरुद्ध लड़ाई में सीमांत राज्यों को सहायता देने की राष्ट्रमंडल की रणनीति के तहत मौद्रिक सहायता प्रदान की जा रही थी। तुवालु एक विशिष्ट सदस्य है। इसे सभी गतिविधियों और कार्यात्मक बैठकों में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इसे राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक में सम्मिलित होने का अधिकार नहीं है।

उद्देश्य

राष्ट्रमंडल के उद्देश्यों और अन्य पक्षों के निर्धारण के लिये कोई औपचारिक संविधान, घोषणा-पत्र या संधि की व्यवस्था नहीं है। इनकी अभिव्यक्ति परामर्श, सहायोग और पारस्परिक सहायता के माध्यम से होती है। राष्ट्रमंडल के आदशों और सिद्धांतों का निर्धारण सदस्य देशों के शिखर सम्मेलन में होता है।

घनिष्ठता की भावना की सतत अनुभूति को अभिव्यक्त करना तथा पूर्व में या वर्तमान में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने वाले सदस्यों के मध्य सहयोग को प्रोत्साहित करना संगठन के मुख्य उद्देश्य हैं।

संरचना

राष्ट्रमंडल सबसे कम संस्थागतं स्वरूप वाले अंतर-सरकारी संगठनों में से एक है। राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक  (Commonwealth Heads of Government Meeting— CHOGM) और सचिवालय राष्ट्रमंडल के प्रमुख अंग हैं। शासनाध्यक्षों की द्वि-वार्षिक बैठकें आयोजित की जाती हैं, जिनमें सामूहिक हित के विषयों पर चर्चाएं होती है तथा संगठन की गतिविधियों के मौलिक दिशा-निर्देशों का निर्धारण होता है। चोगम का संचालन आम सहमति के आधार पर होता है न कि मत के आधार पर। संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद चोगम विश्व का सबसे बड़ा अंतर-सरकारी सम्मेलन है।

इसके अतिरिक्त वैदेशिक मामलों, रक्षा, वित्त, शिक्षा, कानून, कृषि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आदि विषयों पर सदस्य देशों के वरिष्ठ मंत्रियों के मध्य विशेष परामर्श होते हैं। विशिष्ट मुद्दों पर समन्वय सुनिश्चित करने के लिये अनेक नियमित या तदर्थ आधार पर बैठकें होती हैं।

1965 में चोगम ने राष्ट्रमंडल सचिवालय के रूप में एक स्थायी मशीनरी का गठन किया। सचिवालय संयुक्त परामर्श और सहयोग के लिये एक केंद्रीय संगठन का कार्य करता है। यह बैठकें और सम्मलेन आयोजित करता है, सामूहिक निर्णयों का क्रियान्वयन करता है, विशिष्ट तकनीकी सहायता प्रदान करता है तथा समूहिक हित के विषयों से संबंधित सूचनाएं प्रसारित करता है। लंदन स्थित सचिवालय अग्रलिखित कार्यों के आधार पर अनेक मंडलों (divisions) में संघटित है- अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, आर्थिक मामले, खाद्य उत्पादन और ग्रामीण विकास युवा मामले, शिक्षा सूचना, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कानून, स्वास्थ्य और प्रयुक्त (applied) अध्ययन। सचिवालय के अंदर राष्ट्रमंडल तकनीकी सहयोग कोष (सीएफटीसी) का गठन किया गया है जो आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए, विशेषकर कम विकसित देशों को बहुपक्षीय तकनीकी सहायता प्रदान करता है। इस कोष का वित्तीय पोषण सभी राष्ट्रमंडल देशों के द्वारा स्वैच्छिक आधार पर होता है। सचिवालय औद्योगिक विकास इकाई, महिला एवं विकास सलाहकार तथा राष्ट्रमंडल सहभागिता कोष का भी प्रबंधन करता है। महासचिव सचिवालय का प्रधान अधिकरी होता है।

1911 में स्थापित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ संसदीय प्रजातंत्र के संवैधानिक, विधायी, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं से सम्बंधित ज्ञान को विकसित करने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करता है। यह संघ महासभा के द्वारा शासित होता है। राष्ट्रमंडल संसदीय सभा के वार्षिक सम्मेलन के दौरान महासभा की भी बैठक होती है। सम्मेलन में भाग ले रहे शिष्टमंडल के सदस्य महासभा के सदस्य होते हैं।

गतिविधियां

संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद राष्ट्रमंडल एकमात्र ऐसा अंतरराष्ट्रीय समूह है, जो विकसित और विकासशील देशों को एकजुट करता है। इसके सदस्य देशों में विश्व की एक-चौथाई जनसंख्या निवास करती है। ये सदस्य अनेक अन्य अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय, राजनीतिक और आर्थिक समूहों के भी सदस्य हैं। अतः राष्ट्रमंडल स्वयं में एक छोटी दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है।

आर्थिक मामलों में सहयोग राष्ट्रमंडल का एक अति महत्वपूर्ण लक्षण है। सदस्य देशों के विदेश मंत्री अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक और आर्थिक विषयों पर चर्चा करने के उद्देश्य से साधारणतया अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों के अवसर पर एक-दूसरे से मिलते हैं। ये बैठकें उत्तर-दक्षिण आर्थिक विषमता, संरक्षणवाद, ब्रेटन वुड्स संस्थाओं में सुधार, गरीब-देशों की ऋण समस्या, भूमंडलीकरण के प्रभाव, आदि मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय राय उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। 1983 में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विषयों पर एक परामर्श समूह का गठन किया गया।

राष्ट्रमंडल ने अल्प-विकसित देशों में तकनीकी सहायता के प्रवाह के लिये सीएफटीसी का गठन किया। 1990 में विकासशील देशों के पूंजी बाजार में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राष्ट्रमंडल सहभागिता कोष की स्थापना की गई। एडिनबर्ग राष्ट्रमंडल आर्थिक घोषणा, 1997 ने छोटे और कम विकसित देशों पर अधिक ध्यान देते हुये सतत विश्व आर्थिक एकीकरण की मांग की। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रमंडल व्यापार में तेजी लाने के लिये व्यापार अवरोधों को समाप्त करने तथा एक राष्ट्रमंडल व्यापार परिषद गठित करने पर सहमति बनी। एडिनबर्ग शिखर सम्मेलन पहला राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन था, जिसने एक आर्थिक घोषणा को अपनाया।

राजनीतिक क्षेत्र में, राष्ट्रमंडल मानवाधिकारों की रक्षा और स्वच्छ प्रशासन को प्रोत्साहित करने के लिये समर्पित है। दक्षिणी अफ्रीकी देशों में बहुमत के शासन की स्थापना में सहायता देना राष्ट्रमंडल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। राष्ट्रमंडल ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का विरोध किया, जिम्बाब्वे में बहुमत का शासन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा नामीबिया की तकनीकी और मानवीय सहायता प्रदान की। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद समाप्त करने तथा प्रजातंत्र स्थापना हेतु 1985 में राष्ट्रमंडल प्रतिष्ठित व्यक्ति समूह (Commonwealth Group of Eminent Persons—COMGEP) का गठन किया गया। ब्रिटेन की गैर-रंगभेद नीति अपनाने की अनिच्छा के विरोध में कई सदस्य देशों ने 1986 के राष्ट्रमंडल खेलों का बहिष्कार किया। इस बहिष्कार का उद्देश्य ब्रिटेन को अलग-थलग करना था। दक्षिण अफ्रीका पर तब तक राष्ट्रमंडल का दबाव बना रहा जब तक वहां गैर-रंगभेदी सरकार की स्थापना नहीं हुई। दक्षिण अफ्रीका 1961 में राष्ट्रमंडल से बाहर हो गया, लेकिन देश में 1994 में बहुमत का शासन स्थापित होने के बाद पुनः राष्ट्रमंडल में सम्मिलित हो गया।

हरारे शिखर सम्मेलन, 1991 में राष्ट्रमंडल की कार्यसूची में पुनः परिभाषित करते हुए एक घोषणा-पत्र जारी किया गया। इस घोषणा में सदस्यों ने सिंगापुर घोषणा, 1971 के प्रति समर्पण की अभिपुष्टि की तथा वे विश्व शांति और संयुक्त राष्ट्र संघ को समर्थन को आगे बढ़ाने के लिये सहमत हुए। 1991 की घोषणा के अंतर्गत सभी सदस्य, अपनी राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को नजरंदाज करते हुए, प्रजातंत्र, मानवाधिकार, स्वच्छ शासन, न्यायिक स्वतंत्रता, महिला समानता, शैक्षिणक अवसर, ठोस आर्थिक प्रबंध के सिद्धांत तथा सतत विकास के माध्यम से पर्यावरण की सुरक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए भी प्रतिबद्ध हुए। इस सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को राष्ट्रमंडल की सदस्यता के लिए अनिवार्य घोषित किया गया।

मिलब्रुक कार्य योजना, 1995 के प्रमुख लक्ष्य हैं—चुनाव आयोजित करने, संवैधानिक और विधिक मामलों में सलाह देने, आदि के विषयों के संबंध में हरारे घोषणा के क्रियान्वयन में सदस्य देशों की सहायता देना। इस कार्य योजना में यह निर्णय लिया गया कि किसी पथभ्रष्ट (errant) सदस्य द्वारा हरारे घोषणा के उल्लंघन की स्थिति में राष्ट्रमंडल सचिवालय अनेक अनुशासनात्मक कार्यवाहियों करने के लिये अधिकृत होगा। इन कार्यवाहियों में अस्वीकृति की अभिव्यक्ति, तथ्य निर्धारकों तथा मध्यस्थों की नियुक्ति, एक निश्चित अवधि के अंदर प्रजातंत्र की बहाली की शर्त, मंत्रिमंडलीय बैठकों से बहिष्कार, सभी प्रकार की भागीदारी तथा सहायता से निलंबन और आर्थिक दंड (व्यापार प्रतिबंध सहित) सम्मिलित होगे।

हरारे सिद्धांतों के उल्लंघन के आरोपी सदस्यों की जांच करने के उद्देश्य से वर्ष 1995 में एक आठ सदस्यीय राष्ट्रमंडल मंत्रिस्तरीय कार्य दल (सीएमएजी) की स्थापना की गई। उल्लंघनों से निबटने के लिये महासचिव उचित समय पर सीएमएजी की बैठक बुला सकता है।

नाइजीरिया में अबाचा सरकार द्वारा प्रजातंत्र को कुचलने और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के कारण 1995 में नाइजीरिया को राष्ट्रमंडल से निलंबित कर दिया गया, लेकिन प्रजातंत्र की स्थापना की दिशा में कदम उठाने के कारण उसे पुनः मई 1999 में राष्ट्रमंडल में सम्मिलित कर लिया गया।

पाकिस्तान में अक्टूबर 1999 में सैनिक तख्ता-पलट की प्रतिक्रियास्वरूप सीएमएजी ने देश की संगठन की सभी परिषदों से निलंबित कर दिया (पाकिस्तान 1972 में राष्ट्रमंडल से अलग हो गया था, लेकिन उसने 1989 में पुनः राष्ट्रमंडल की सदस्यता ग्रहण की थी)। फिजी में सैनिक विद्रोह के कारण उसे जून 2000 में राष्ट्रमंडल से निलंबित कर दिया गया (फिजी भी 1987 में राष्ट्रमंडल से अलग हो गया था, लेकिन 1997 में संगठन में पुनः वापस आ गया)।

डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में 1999 में आयोजित चोगम ने राष्ट्रमंडल की भूमिका की समीक्षा करने और नई शताब्दी की चुनौतियों का सर्वोत्तम तरीके से सामना करने के लिये उसे सलाह देने के उद्देश्य से एक राष्ट्रमंडल उच्चस्तरीय समूह (सीएचएलजी) का गठन किया।

अंतर-राष्ट्रमंडल संबंधों को प्रोत्साहन देने तथा राष्ट्रमंडल के नागरिकों की क्षमता के विकास के प्रति समर्पित अनेक राष्ट्रमंडल संस्थाएं और एजेंसियां कार्यरत हैं। ये संस्थाएं कृषि, वानिकी, स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कृति संचार, सुचना और मीडिया, क़ानूनी व्यवसाय, संसदीय कार्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, खेल तथा राष्ट्रमंडल अध्ययन जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं।

राष्ट्रमंडल को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पर्यवेक्षक सदस्य का दर्जा प्राप्त है। सदस्य देशों का एक-दूसरे के प्रति कोई कानूनी दायित्व नहीं होता। इसके बावजूद वे भाषा, इतिह्रास, संस्कृति और उनके लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं विधि का शासन संबंधी साझा मूल्यों द्वारा एकबद्ध होते हैं। ये मूल्य राष्ट्रमण्डल चार्टर में उल्लिखित हैं।

3 अक्टूबर, 2013 को, 48 वर्षों की सदस्यता के पश्चात्, गैम्बिया ने राष्ट्रमण्डल की अपनी सदस्यता त्याग कर दिया। राष्ट्रमण्डल शासनाध्यक्षों की बैठक (चोगम) संगठन की मुख्य निर्णयन संस्था है जिसकी दो वर्ष में एक बार बैठक होती है। इसकी नवीनतम बैठक 10-17 नवम्बर, 2018 को कोलम्बो, श्रीलंका में संपन्न हुई जबकि आगामी बैठक वर्ष 2015 में माल्टा में होनी है।

राष्ट्रमण्डल के सभी छह आबादी वाले महाद्वीपों में 53 सदस्य राष्ट्र हैं जिनकी संयुक्त जनसंख्या 2.1 बिलियन है। भारत के पश्चात् सर्वाधिक जनसंख्या का राष्ट्रमण्डल देश पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश, यूनाइटेड किंगडम और दक्षिण अफ्रीका हैं, जबकि तुवालु सबसे कम जनसंख्या (लगभग 10,000 लोग) वाला राष्ट्रमण्डल देश है।

माल्टा और साइप्रस वर्ष 2004 में यूरोपीय संघ में भी शामिल हो गए। वर्ष 2013 में एकमात्र देश दक्षिण सूडान ने राष्ट्रमण्डल में शामिल होने की इच्छा जाहिर की। वर्ष 2002 में जिम्बाब्वे को मानवाधिकार उल्लंघन और जानबूझकर कुशासन के लिए निलंबित क्र दिया गया, और जिम्बाब्वे सरकार ने वर्ष 2003 में राष्ट्रमण्डल से अपनी सदस्यता समाप्त कर ली।

वर्ष 2007 का कॉमनवेल्थ सम्मेलन युगांडा के कम्पाला में आयोजित किया गया था जहां पर यह तय हुआ था कि अगला सम्मेलन 2011 में श्रीलंका में आयोजित किया जाएगा। परंतु श्रीलंका में लिट्टे के विरुद्ध छेड़े गए अभियान के फलस्वरूप जो गृहयुद्ध ठन गया, उसमें अंतिम दौर में तमिलों का नरसंहार किया गया तथा आम नागरिकों पर बर्बरतापूर्ण अत्याचार किया गया। श्रीलंका पर लगे इस दोष के कारण 2011 में पोर्ट ऑफ स्पेन की त्रिनिदाद टोबैगो में आयोजित चोगम सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि 2011 का चोगम सम्मेलन श्रीलंका के बदले ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में आयोजित किया जाएगा। वर्ष 2011 में ऑस्ट्रेलिया में हुए सम्मेलन में ही निर्णय लिया गया कि अगला सम्मेलन 2013 में श्रीलंका में आयोजित किया जाएगा।

राष्ट्रमण्डल की वर्तमान उच्च प्राथमिकता ऐसे रॉक उद्घोषणा, 2003 में रेखांकित लोकतंत्र एवं विकास का संवर्द्धन करना है। हाल के वर्षों में, राष्ट्रमण्डल, पर इस बात का आरोप लगा है कि वह अपने मूल मूल्यों के प्रति पर्याप्त कटिबद्ध नहीं है। इसके परिणामस्वरूप 11 मार्च, 2013 को महारानी एलिजाबेथ ने एक नवीन राष्ट्रमण्डल चार्टर पर हस्ताक्षर किए, जिसने भेदभाव के सभी रूपों, चाहे वह लिंग, जाति, रंग, समुदाय, राजनीतिक आस्था या अन्य आधारों पर हो, का विरोध किया।

गौरतलब है कि चोगम सम्मेलत 2015 का आयोजन स्थल माल्टा निर्धारित किया गया है। वर्ष 2017 तथा 2019 का चोगम सम्मेलन क्रमशः वनुआतु तथा मलेशिया में होना तय हुआ है। प्रथम चोगम सम्मेलन 1971 में सिंगापुर में आयोजित हुआ था। भारत में चोगम का सम्मेलन 1983 में गोवा में हुआ था। अब तक भारत में एक ही चोगम सम्मेलन आयोजित हुआ है। ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ चोगम की प्रमुख हैं और वर्ष 1973 से ओटावा सम्मेलन से इसमें हिस्सा लेती रही हैं।

नवम्बर, 2013 में आयोजित 28वें चोगम सम्मेलन के अंतर्गत जारी कोलंबो घोषणा का शीर्षक था- संपोष्य, समावेशी तथा समान विकास। सम्मेलन में इस बात को स्वीकार किया गया कि गरीबी निवारण एवं जलवायु परिवर्तन ही मुख्य वैश्विक संकट हैं और इन मुद्दों का अविलंब समाधान जरूरी है। इस बात पर सहमति बनी कि कर्ज तथा गरीबी जैसे मुद्दों के लिए बेहतर विकल्प खोजा जाए। लोकतांत्रिक मूल्यों, कानून का शासन, मानवाधिकार, धर्म एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, भ्रष्टाचार, शासन में पारदर्शिता, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा करारोपण जैसे मुद्दों पर भी विस्तृत चर्चा की गयी। इसके साथ-साथ छोटे राज्यों से संबंधित मुद्दों, छोटे प्रायद्वीपीय देशों, वैश्विक मुद्दे तथा गैर-राज्य आतंकवाद, युद्धाशस्त्र व्यापार संधि, निःशस्त्रीकरण, सेक्स हिंसा, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक विकास जैसे मुद्दों पर भी चोगम देशों के प्रतिनिधियों में विस्तृत चर्चा एवं इन मुद्दों के स्थायी समाधान के लिए दिशा-निर्देश निर्धारण की आवश्यकता पर बल दिया गया।

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