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केंद्रीय सूचना आयोग Central Information Commission – CIC – Vivace Panorama

केंद्रीय सूचना आयोग Central Information Commission – CIC

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का अध्याय-तीन, एक केंद्रीय सूचना आयोग तथा अध्याय-चार में राज्य सूचना आयोग के गठन का प्रावधान करते हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा-12 में केंद्रीय सूचना आयोग के गठन, धारा-13 में सूचना आयुक्तों की पदावधि एवं सेवाशर्ते तथा धारा-14 में उन्हें पद से हटाने संबंधी प्रावधान किए गए हैं।

केंद्रीय सूचना आयोग में एक अध्यक्ष अर्थात् मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम 10 केंद्रीय सूचना आयुक्तों का प्रावधान है। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। यह नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनी समिति, जिसमें लोकसभा में विपक्ष का नेता और प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत एक संघीय कैबिनेट मंत्री बतौर सदस्य होते हैं, की अनुशंसा पर की जाती है।

मुख्य सुचना आयुक्त एवं अन्य सुचना आयुक्तों का चयन सार्वजानिक सार्वजनिक जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त ऐसे व्यक्तियों में से किया जाता है जिन्हें विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंध, पत्रकारिता, जनसंचार या प्रशासन एवं शासन के क्षेत्र में व्यापक ज्ञान और अनुभव प्राप्त हो। आयोग का मुख्यालय नाइ दिल्ली में होगा किन्तु आयोग केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त कर भारत में अन्यत्र भी अपने कार्यालय स्थापित कर सकेगा।

सूचना आयोग की शक्तियां एवं कृत्य

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा- 18-20 तक में निम्नांकित शक्तियां एवं कृत्य केंद्रीय सूचना आयोग एवं राज्य सूचना आयोग को सौंपे गए हैं-

  • अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए आयोग निम्न में से किसी ऐसे व्यक्ति से शिकायत प्राप्त करे और उसकी जांच करे
  1. यदि वह लोक सूचना अधिकारी को आवेदन प्रस्तुत करने में इसलिए असमर्थ रहा है कि ऐसे अधिकारी की नियुक्ति नहीं हुई है या सहायक लोक सूचना अधिकारी ने आवेदन या अपील को अग्रेषित करने से इंकार किया है।
  2. जिसे इस अधिनियम के अधीन मांगी गई कोई सूचना तक पहुंच से इंकार किया गया हो।
  3. जिसे इस अधिनियम के अधीन निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना के लिए या सूचना तक पहुंच के लिए आवेदन का उत्तर नहीं दिया गया है।
  4. जिससे ऐसी फीस की राशि अदा करने की अपेक्षा की गई है, जो वह अनुचित समझता है।
  5. जो यह विश्वास करता है कि उसे इस अधिनियम के अधीन अपूर्ण, भ्रम में डालने वाली या मिथ्या सूचना दी गई है।
  6. इस अधिनियम के अधीन अभिलेखों के लिए अनुरोध करने या उन तक पहुंच प्राप्त करने से संबंधित किसी अन्य विषय के संबंध में।
  • आयोग का यह विनिश्चय हो जाता है कि किस प्रकरण में जांच के लिए युक्तिसंगत आधार हैं तो वह उसके संबंध में जांच आरंभ कर सकेगा।
  • आयोग को किसी वाद के विचरण के समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत दीवानी न्यायालय की निम्नांकित शक्तियांप्राप्त (निहित) होंगी
  1. किसी व्यक्ति को बुलाने और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने, लिखित या मौखिक गवाही लेने तथा शपथ पर परीक्षण करने;
  2. किसी दस्तावेज की तलाश करवाने और उसे पेश करवाने;
  3. शपथ पत्रों पत्र साक्ष्य लेने;
  4. किसी भी अदालत अथवा कार्यालय से कोई सार्वजनिक अभिलेख या उसकी प्रति प्राप्त करने;
  5. साक्षियों और प्रलेखों के परीक्षण के लिए आदेश करने; तथा
  6. अन्य कोई मामला जो दिया जाए, के संबंध में आवश्यक पहल करने की शक्तियां आयोग को प्राप्त होंगी।
  • इस अधिनियम के अधीन किसी शिकायत की जांच करते समय आयोग, ऐसे किसी अभिलेख का परीक्षण कर सकेगा जिस पर यह अधिनियम लागू होता है और जो लोकप्राधिकारी के नियंत्रण में है। संसद या राज्य विधायिका का कोई अन्य कानून, आयोग को ऐसा करने से नहीं रोक सकेगा।
  • अधिनियम की धारा-19 के तहत् कोई व्यक्ति जिसे निर्धारित समय में निर्णय प्राप्त नहीं हुआ है, या वह प्राप्त निर्णय से व्यथित है तो वह लोक प्राधिकरण में लोक सूचना अधिकारी की पंक्ति में ज्येष्ठ पंक्ति का है, को 30 दिन में अपील कर सकेगा।
  • आयोग के निर्णय बाध्यकारी होंगे।
  • निर्णय हेतु आयोग को निम्न शक्तियां प्राप्त होंगी–
  1. लोक प्राधिकरण से ऐसे उपाय कराना जो इस अधिनियम के सम्मिलित हैं-
  • सूचना तक पहुंच उपलब्ध कराना, यदि विशिष्ट रूप से प्रार्थना की गई है;
  • लोक सूचना अधिकारी को नियुक्त करना;
  • कतिपय सूचना या सूचना के प्रवर्गों को प्रकाशित करना;
  • अभिलेखों के संधारण, प्रबंधन तथा नष्ट करने से संबंधित पद्धतियों में आवश्यक परिवर्तन करना;
  • अपने अधिकारियों के लिए सूचना का अधिकार संबंधी प्रशिक्षण का प्रावधान करना; और
  • सूचना के अधिकार से संबंधित एक वार्षिक रिपोर्ट उपलब्ध कराना।
  1. लोक प्राधिकारी से, शिकायतकर्ता की, उसके द्वारा वहन की गई किसी हानि या अन्य नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति करना;
  2. इस अधिनियम के अधीन उपबंधित शास्त्रियों में से कोई शास्ति अधिरोपित करना;
  3. आवेदन को अस्वीकृत करना
  4. आयोग शिकायतकर्ता और प्राधिकारी को अपने निर्णय की, जिसके अंतर्गत अपील का कोई अधिकार भी है, सूचना देगा।
  5. आयोग, अपील का निर्णय ऐसी प्रक्रियानुसार करेगा, जो निर्धारित की जाए।
  • आयोग की राय में यदि लोक सूचना अधिकारी द्वारा बिना युक्तियुक्त कारण के आवेदन लेने से इंकार किया गया हो, निर्धारित समय में सूचना नहीं दी गई हो, या असद्भावनापूर्वक सूचना का आवेदन से इंकार किया गया हो या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी गई है या ऐसी सूचना नष्ट कर दी है जो आवेदन से संबंधित थी, या सूचना देने की प्रक्रिया में बाधा डाली गई है तो आवेदन प्राप्ति या सूचना देने के दिन से 250 रुपए प्रतिदिन की शास्ति अधिरोपित की जाएगी।

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