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भारी अभियांत्रिकी उद्योग Heavy Engineering Industry – Vivace Panorama

भारी अभियांत्रिकी उद्योग Heavy Engineering Industry

इस क्षेत्र का विकास स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद में हुआ है। इससे पहले देश पूर्णतः आयातों पर निर्भर था। भारी अभियांत्रिकी उद्योग द्वारा पूंजीगत सामानों एवं टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है, जिनमें औद्योगिक मशीनरी, विद्युत उत्पादन उपकरण, परिवहन उपकरण, रेल उपकरण, वायुयान तथा जलपोत निर्माण शामिल हैं।

औद्योगिक मशीनरी

इन इकाइयों में लौह व इस्पात, उर्वरक, खनन, भवन निर्माण, चीनी, कपड़ा, डीजल इंजन व पम्प निर्माण इत्यादि उद्योगों के लिए पूंजीगत माल तैयार किया जाता है। वर्ष 1958 में हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन की रांची में स्थापना की गयी, जिसमें तीन परियोजनाएं शामिल हैं-

  1. भारी मशीन निर्माण संयंत्र;
  2. भारी मशीनी उपकरण संयंत्र, तथा;
  3. फाउंट्री भट्टी संयंत्र।

इस्पात उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के अतिरिक्त यह निगम भारी कुटाई-पिसाई उपकरणों, क्रेन यंत्रों, खनन उपकरणों, दाब भट्टी उपकरणों, तेल उत्खनन यंत्रों इत्यादि का निर्माण भी करता है। खनन एवं संलग्न मशीनरी निगम (दुर्गापुर) द्वारा कोयला खनन उपकरणों का निर्माण किया जाता है। अपतटीय छेदन यंत्र मझगांव गोदी में तथा अधितटीय उत्खनन उपकरण हैदराबाद स्थित भेल कारखाने में तैयार किये जाते हैं।

विद्युत उत्पादन उपकरण

भारी विद्युतीय उद्योग के अंतर्गत वियुत के उत्पादन, संप्रेषण, वितरण एवं उपभोग हेतु प्रयुक्त उपकरण शामिल किये जाते हैं। इन उपकरणों में जेनरेटर, बॉयलर, टरबाइन, ट्रांसफॉर्मर तथा स्विचगियर इत्यादि प्रमुख हैं। इनमें से अधिकांश उत्पाद सार्वजनिक उपक्रमों (जैसे-भेल) द्वारा निर्मित किये जाते हैं। भेल के संयंत्र हरिद्वार, भोपाल, हैदराबाद, बंगलुरु, तिरुचिरापल्ली, रानीपेट (तमिलनाडु) तथा जगदीशपुर (उत्तर प्रदेश) में स्थापित किए गए हैं।

मोटरवाहन उद्योग


भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वाहनों का निर्माण शुरू हुआ। इस क्षेत्र के उत्पादों में वाणिज्यिक वाहन यात्री कारें, जीप, स्कूटर, मोटरसाइकिल, मोपेड तथा तिपहिया वाहन शामिल हैं। क्योंकि ऑटोमोबाइल निर्माण हेतु इस्पात अनिवार्य होने के कारण इन उद्योगों की अवस्थिति सामान्यतः लौह व इस्पात केंद्रों के निकटवर्ती भागों में होती है। इसके साथ ही टायर-ट्यूब, गियर, बैटरी, पेन्ट, एक्सल इत्यादि बनाने वाली इकाइयां भी आस-पास ही मौजूद होती हैं। यह उद्योग मुख्यतः बड़े शहरों के आस-पास संकेंद्रित हैं, जहाँ इसे हरूरी अधर संरचना एवं बाज़ार दोनों सुगमता से प्राप्त हो जाते हैं। दिल्ली, मुंबई, पुणे, कोलकाता, चेन्नई के अतिरिक्त जबलपुर, अहमदाबाद, लखनऊ, मैसूर, जमशेदपुर, फरीदाबाद, पनकी (कानपुर के निकट) तथा सतारा जैसे स्थानों पर भी वाहन उद्योग का विस्तार हुआ है। वाहनों के 90 प्रतिशत उपकरण भारत में निर्मित किये जाते हैं तथा शेष विशेषीकृत वाहन उपकरणों का आयात किया जाता है।

मोटरवाहन उद्योग भारत में 1940 में अस्तित्व में आया। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति पर, क्षेत्र ने मिलकर ऑटोमोटिव कम्पोनेंट निर्माण उद्योग की स्थापना की। हालांकि, राष्ट्रीयकरण और लाइसेंसराज के कारण 1950 और 1960 के दशक में संवृद्धि पारस्परिक रूप से धीमी थी जिसने भारतीय निजी क्षेत्र को आगे बढ़ने में कठिनाई उत्पन्न की। वर्ष 1970 के बाद, मोटरवाहन उद्योग ने वृद्धि करना प्रारंभ किया, लेकिन संवृद्धि दर मुख्य रूप से ट्रैक्टर, कमर्शियल वाहन और स्कूटर द्वारा बढ़ाई गई। कार फिर भी एक बेहद विलासिता वाला वाहन था। जापान मोटर निर्माताओं ने मारुति उद्योग जैसे अग्रणी संस्थान की स्थापना द्वारा भारतीय बाजार में प्रवेश किया। कई विदेशी कंपनियों ने भारतीय कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम चालू किए।

1980 के दशक में मोटरसाइकिल और हल्के वाणिज्यिक वाहनों के निर्माण के लिए कई जापानी कंपनियों ने संयुक्त उपक्रम स्थापित किए। इस समय भारत सरकार ने छोटी कारों के निर्माण के लिए सुजुकी के साथ संयुक्त उपक्रम स्थापित किया। 1991 में आर्थिक उदारीकरण का अनुसरण करते हुए, कई भारतीय और बहु-राष्ट्रीय कार कपनियों ने यहां काम शुरू किया। तब से, स्वचालित उपकरणों और ऑटोमोबाइल विनिर्माण ने घरेलू और निर्यात मांगों को पूरा करने के लिए संवृद्धि में वृद्धि की।

वर्ष 1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण का अनुगमन करते हुए भारतीय मोटरवाहन उद्योग ने एक स्थायी संवृद्धि का प्रदर्शन किया जो बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता और प्रतिबंधों में नरमी का परिणाम था। भारत की कई मोटरवाहन बनाने वाली कपनियों जैसे टाटा मोटर्स, मारुति सुजुकी और महिन्द्रा एंड महिन्द्रा ने अपने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशन का विस्तार किया।

भारत की कुछ जानी-पहचानी मोटरवाहन निर्माता कंपनियां इस प्रकार हैं-

हिन्दुस्तान मोटर लिमिटेड (एचएमएल) की स्वतंत्रता से कुछ समय पहले वर्ष 1942 में बी.एम.बिरला द्वारा स्थापित किया गया। यह सी.के. बिरला समूह की एक अग्रणी कपनी है। इसका काम गुजरात के निकट पोर्ट ओरवा में एक छोटे संयंत्र में शुरू किया गया। 1948 में इसकी विनिर्माण इकाई को उत्तरपारा (पश्चिम बंगाल), में स्थानांतरित किया गया जहां इसने अम्बेसडर गाड़ी का उत्पादन प्रारंभ किया। समय के साथ-साथ इसने यात्री कार, ट्रक और बहुप्रयोगी वाहनों के उत्पादन के लिए स्वयं को उच्च प्रौद्योगिकी युक्त बना लिया। हिंदुस्तान मोटर्स की तीन विनिर्माण इकाइयां हैं। ये हैं-

  1. थिरुवल्लूर (तमिलनाडु) संयंत्र में मित्सुविशि मोटर्स, जापान के साथ तकनीकी गठबंधन द्वारा मित्सुबिशी लान्सर का उत्पादन किया जाता है;
  2. उत्तरपारा (पश्चिम बंगाल) में यात्री कार (एम्बेसडर और कटेसा) और बहुउपयोगी वाहनों (ट्रैकर,पोर्टर और पुष्पक) का निर्माण किया जाता है,
  3. पीथमपुर (मध्य प्रदेश) में रोड ट्रस्टड दीकल डिवीजन जिसमें बहुउपयोगी वाहन आरटीवी का आस्ट्रेलिया की कपनी ओका मोटर के साथ तकनीकी सहयोग द्वारा उत्पादन किया जाता है।

टाटा मोटर्स की स्थापना वर्ष 1945 में की गई थी, जबकि इसका प्रथम वाहन 1954 में बाजार में उतरा। कंपनी को भारत की पहली इंजीनियरिंग उद्योग की कपनी होने का गौरव प्राप्त है जिसे न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज में सितम्बर 2004 में सूचीबद्ध किया गया।

यात्री कार में दूसरे सबसे बड़े निर्माता होने के अतिरिक्त, टाटा मोटर्स ने मध्यम एवं भारी वाणिज्यिक वाहनों की श्रेणी में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्च स्थान हासिल किया है।

टाटा की पहली स्वदेश निर्मित कार टाटा इंडिका थी, जिसके बाद वर्ष 2005 में टाटा ऐक नाम का मिनी ट्रक लाया गया। वर्ष 2009 में, टाटा मोटर्स ने विश्व की सर्वाधिक फ्यूल एफिशिएंट एवं सस्ती कार टाटा नैनो बनाकर मोटरवाहन उद्योग के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया।

वाणिज्यिक वाहनों की सभी श्रेणियों में टाटा मोटर्स बाजार में अग्रणी है। टाटा मोटर्स द्वारा बनाए जाने वाले भारी वाहनों में स्टारबस, ग्लोब्स, टर्बो मिनी बस, सेमी लो फ्लोर भारत स्टेज-II बस इत्यादि शामिल हैं।

जमशेदपुर में टाटा इंजीनियरिंग एवं लोकोमोटिव लिमिटेड (टेल्को) इंजन, ट्रांसमिशन गीयर बॉक्स एवं एक्सल के साथ टाटा-बेन्ज ट्रक का उत्पादन करती है।

महिन्द्रा एंड महिंद्रा कपनी महिन्द्रा समूह की अग्रणी कपनी है। वर्ष 1945 में इसकी स्थापना भारतीय बाजार के लिए आम इस्तेमाल के वाहनों को बनाने के उद्देश्य से की गई थी लेकिन जल्द ही इसने कृषि ट्रैक्टर और हल्के वाणिज्यिक वाहनों का निर्माण करना भी शुरू कर दिया। अब कपनी मोटर कपोनेंट के विकास और इंजीनियरिंग सेवाएं प्रदान करने के क्रम में महिंद्रा सिस्टम एंड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजीज (एमएसएटी) नामक एक पृथक् क्षेत्र का संचालन भी कर रही है। महिंद्रा एंड महिंद्रा की विनिर्माण इकाइयां जयपुर, रुद्रपुर, नागपुर, नासिक, मुम्बई और जहीराबाद में हैं।

फरवरी, 1981 में, मारूति उद्योग लिमिटेड को भारतीय कपनी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के तहत् सम्मिलित किया गया। इसकी स्थापना सक्षम सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के अभाव के कारण उत्पन्न हुई निजी वाहनों की बढ़ती मांग को पूरा करने के उद्देश्य से की गई थी। यह अक्टूबर 1982 में भारत सरकार और सुजुकी मोटर कंपनी (वर्तमान में सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन ऑफ जापान) के बीच पहले संयुक्त गठजोड़ के तौर पर शुरू हुआ। इसने भारत की पहली अधिकतम लोगों की पहुंच में आने वाली कार बनाई। इसने जनसंख्या के विभिन्न वर्गों की आवश्यकता पूरी करने के लिए विभिन्न प्रकार की यात्री कार के क्षेत्र में विविधीकरण किया। इसकी विनिर्माण इकाई पालम गुड़गांव रोड़, गुड़गांव, हरियाणा में अवस्थित है।

फिएट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड अब फिएट ऑटो स्पा के साथ फिएट इंडिया ऑटोमोबाइल प्राइवेट लिमिटेड और प्रीमियर ऑटोमोबाइल लिमिटेड के स्वामित्वधीन है। भारत में, इसकी स्थापना वर्ष 1905 में की गई थी जब बॉम्बे मोटर कार एजेंसी को इसका एजेंट नियुक्त किया गया था। फिएट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कुर्ला, मुम्बई, राजनगांव, पुणे (महाराष्ट्र) में कार निर्माण करती है।

अशोक लेलैंड कंपनी को वर्ष 1948 में चेन्नई में स्थापित किया गया था, जो विशेष रूप से भारी वाहन निर्माता कंपनी है। यह ट्रक, बस, सेना वाहन जैसे भारी वाहन बनाने वाली भारत की बड़ी कंपनियों में से एक है और साथ ही भारत के भारी वाहन प्रभाग में दूसरी सबसे बड़ी वाणिज्यिक वाहन निर्माता कंपनी भी है।

भारत की सर्वप्रथम ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनी आयशर की स्थापना 1960 में की गई थी। पूर्णतः स्वदेशी रूप से निर्मित ट्रैक्टर का निर्माण आयशर की फरीदाबाद फैक्टरी में किया गया था।

मजदा और स्वराज उद्यमों के बीच गठजोड़ से स्वराज मजदा अस्तित्व में आई जिसने भारत की उन्नत विशेषशता एवं विनिर्माण का प्रतिनिधित्व किया। कपनी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान एवं विकास सुधार का कार्य किया। कपनी ने बस, अनुसंधान एवं विकास सुधार का कार्य किया। कपनी ने बस, एम्बुलेंस, ट्रक इत्यादि कई उत्पाद निर्मित किए।

बजाज ऑटो, बजाज समूह की अग्रणी कंपनी है, जिसे विश्व की दोपहिया और तिपहिया वाहन निर्माता बड़ी कंपनियों में से एक का दर्जा प्राप्त है और बजाजब्रांडको यूरोप,लैटिन अमेरिका, संयुक्त राज्य अमेरिका और एशिया में कई देशों द्वारा अच्छी प्रकार जाना जाता है।

बजाज ऑटो लिमिटेड दुपहिया और तिपहिया वाहनों का सबसे बड़ा निर्यातक है। जापान की कावासाकी भारी उद्योग कपनी के साथ मिलकर बजाज ने आधुनिक तकनीकी युक्त दोपहिया वाहनों का निर्माण किया। बजाज ऑटो के दुपहिया और तिपहिया निर्माण की पुणे, औरंगाबाद और चाकन में इकाइयां हैं।

भारत में कुछ इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनियां भी हैं। इसमें से एक रेवा कार कपनी है, जिसे 1995 में सम्मिलित किया गया। पहली कार 11 मई, 2001 को बाजार में उतारी गई। रेवा (आरइवीए) की विनिर्माण इकाई बोमासांद्रा औद्योगिक क्षेत्र, बंगलुरु में अवस्थित है। यह कार कंपनी अभी भी अपनी शैशवास्था में है और निर्माणकर्ता उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में यह मजबूती से आगे बढ़ेगी।

शक्तिमान ट्रक और निशान जीप की रक्षा मंत्रालय के अधीन उत्पादित किया जाता है।

रेल उपकरण

रेल उपकरणों के निर्माण में भारत की स्थिति आत्मनिर्भरता के निकट पहुंच चुकी है। चितरंजन लोको मोटिव वर्क्स (चितरंजन), डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (वाराणसी) तथा भेल (भोपाल) में रेल इंजनों का निर्माण किया जाता है। निजी क्षेत्र में टेल्को (जमशेदपुर)रेल इंजनों का उत्पादन करती है। डीजल इंजनों एवं अन्य उपस्करों के निर्माण तथा मरम्पत हेतु रेल विभाग द्वारा पटियाला में डीजल कॉम्पोनेंट वर्क्स की स्थापना की गयी है। इंटीग्रल कोच फैक्टरी (पेराम्बूर) तथा रेल कोच फैक्टरी (कपूरथला) में सवारी डिब्बों का निर्माण होता है। इन क्षेत्रों के अलावा जेसप एंड कंपनी (कोलकाता) तथा भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बंगलुरु) भी रेल के डिब्बों का निर्माण करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां हैं। पटरियों व स्लीपर बार का निर्माण भिलाई में होता है। पहिए, टायर एवं एक्सल दुर्गापुर में बनाये जाते हैं।

वायुयान निर्माण

इस उद्योग का स्वामित्व पूरी तरह से भारत सरकार के हाथों में है जिसका कार्य संचालन हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा किया जाता है। एचएएल का मुख्य निर्माण केंद्र बंगलुरु है जहां कई प्रकार की निर्माण शाखाएं चल रही हैं- लड़ाकू एयरक्राफ्ट, एयरोस्पेस, हेलीकॉप्टर, इंजन, ढलाई घर और भट्टी तथा औद्योगिक एवं मरीन गैस टरबाइन। नासिक शाखा में लड़ाकू विमान का निर्माण होता है जबकि कानपुर शाखा में एयरक्राफ्ट वाहन का निर्माण होता है। अन्यकेंद्रों में कोरापुट (इंजन), उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में कोरवा (वैमानिकी), लखनऊ (ऐसेसरीज), हैदराबाद (वैमानिकी)।

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा विनिर्मित लड़ाकू विमानों में रूस का सुखोई 30 एमकेआई, मिग 27 एम और मिग 21 और आंतरिक क्षेत्र तक मार करने वाला ब्रिटिश जगुआर शामिल है। हेलीकॉप्टर में, उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर, धुव, चेतक और चीता जैसे बहुउद्देशीय विमान, और घुसपैठ को रोकने के लिए हल्का लड़ाकू विमान लांसर शामिल हैं। एयरोस्पेस इकाई, भारत के प्रक्षेपण वाहनों और उपग्रहों तथा सुदूर संवेदी उपग्रह तंत्र के विनिर्माण से सम्बद्ध है।

अब निजी क्षेत्र को भी नागरिक विमान विनिर्माण क्षेत्र में अनुमति दी गई है। तनेजा एयरोस्पेस ऐसी पहली कपनी बनी थी। निजी क्षेत्र अब अंतरिक्ष उपकरणों के विनिर्माण के साथ भी सम्बद्ध है।

जलपोत निर्माण

जलपोत निर्माण के मुख्य केंद्रों में हिदुस्तान शिपयार्ड (विशाखापत्तनम), मझगांव गोदी (मुंबई), कोचीन शिपयार्ड तथा गॉर्डन रीच वर्कशॉप (कोलकाता) शामिल हैं।

भारत में समुद्र में चलने वाले जहाजों के निर्माण की प्रक्रिया 1946 ई. में विशाखापट्टनम् में शुरू हुई। यहां से निर्मित किया गया पहला वाष्पचालित जहाज जल ऊषा था। वर्तमान में विशाखापट्टनम् स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड देश की सबसे बड़ी जहाज-निर्माण इकाई है। अन्य शिपयार्ड 1972 ई. में केरल में रथापित कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड है। गार्डन रिच शिप बिल्डर्स एण्ड इंजीनियर्स कोलकता और गोआ शिपयार्ड जहाज-निर्माण एवं उसकी मरम्मत के कार्यों के लिए एक अन्य इकाई है। मझगांव संयंत्र नौसैनिक जहाजों का निर्माण करता है।

मशीनी उपकरण उद्योग

मशीनी उपकरण औद्योगिक, रक्षा, रेलवे, वाहन विद्युत इत्यादि से जुड़ी मशीनरी के लिए आधार का निर्माण करते हैं। भारत में छेदन यंत्रों, उत्खनन उपकरणों, गियर शेपर्स, गियर बोबर्स, स्लोमिंग मशीनों, वेल्डिंग मशीनों भट्टियों, रोलिंग मिलों, यूनिट हेड पॉवर इत्यादि का निर्माण किया जाता है।

बंगलुरु स्थित हिंदुस्तान मशीन टूल्स (HMT) सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रणाधीन मशीनी उपकरणों का निर्माण करने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी है। इस संयंत्र की स्थापना स्विट्जरलैण्ड के सहयोग से 1953 ई. में की गई, पर इसने अपना उत्पादन कार्य 1956 ई. में शुरू किया। अनेक इकाइयों के साथ यह संयंत्र मुद्रण यंत्रों, लैम्प-निर्माण यंत्र, पहिये वाले कटाई यंत्र, घिर्णी आदि का निर्माण करता है। इसकी दो इकाइयां बंगलुरु में कार्यरत हैं, जबकि पिंजौर किताते (केरल), अजमेर (राजस्थान) एवं हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) में अन्य इकाइयां कायरत हैं।

इस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड का एक संयंत्र कोटा में और एक अन्य संयंत्र पालघाट (केरल) में पूर्व सोवियत सेरकार के सहयोग से स्थापित किया गया है। रांवी (झारखंड) में चेक सरकार के सहयोग से हैवी मशीन टूल्स प्लांट की स्थापना की गई है। सिकंदराबाद का प्राग टूल्स लिमिटेड सैन्य प्रशासन के अधीन कार्यरत है, जो नाजुक सैन्य उपकरणों का निर्माण करता है। कोलकाता में नेशनल इंस्टूमेंट फैक्टरी कार्यरत है। इनके अतिरिक्त निजी क्षेत्र की कंपनियां भी मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई, बंगलुरु एवं कोयम्बटूर में कार्यरत हैं।

हल्के इंजीनियरिंग उद्योग

हल्के इंजीनियरिंग उद्योग में भारत का मजबूत आघार है। वर्तमान में, हल्के वैद्युत इंजीनियरिंग उद्योग में उत्पादों की एक व्यापक श्रृंखला मौजूद है जिसमें रोलरबियरिंग सामान, वेल्डिंग उपकरण,सर्जिकल एवं मेडिकल यंत्र, औद्योगिक उत्प्रेरक, साइकिल, सामान्य उपयोग के पंखे, लैम्प, बैटरी, रेफ्रीजरेटर, कडीशनर और मोटर्स शामिल हैं।

इलेक्ट्रिक पंखे उद्योगवर्ष 1921 में प्रारंभ हुई, और तब से इसने निरंतर एवं उल्लेखनीय विकास किया है।

इलेक्ट्रिक लैम्प उद्योग ने विशेष रूप से स्वतंत्रता पश्चात् बेहद अच्छा विकास किया, हालांकि इसकी स्थापना पहले ही वर्ष 1932 में हो गई थी। इन उत्पाटों में टार्च एवं मोटर वाहन के लिए लैम्प, चक्रीय डायनामोस, प्रदीप्ति ट्यूब, पारा वाष्प लैम्प और बल्ब इत्यादि शामिल हैं। मुंबई और कोलकाता उत्पादन के बड़े केंद्र हैं।

शुष्क और स्टोरेज बैटरी का उत्पादन 1930 में प्रारंभ हो गया था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसमें उछाल आया। स्टोरेज बैटरी की आवश्यकता मुख्य रूप से मोटर वाहनों, ट्रेनलाइटिंग, डाक एवं टेलीग्राफ उपकरणों और पावर हाउसों में होती है।

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